• March 24, 2017

    आधार : लूटतन्त्र की रक्षा के लिए जनता पर निगरानी और नियन्त्रण का औज़ार

    आधार, कैशलेस और डिजिटल के मेल से सत्ताधारियों के लिए किसी भी जनसमूह के जीवन को नियन्त्रित ही नहीं पूरी तरह बाधित करने की भी शक्ति मिल जायेगी। अभी ही हम विभिन्न स्थानों पर मोबाइल या इण्टरनेट बन्द कर देने की ख़बरें पढ़ते हैं। लेकिन इसके बाद सत्ता के लिए मुमकिन होगा पूरे समूहों के तमाम सम्पर्कों को काट देना, उनके खातों पर रोक लगाकर उनके साधनों से, कुछ ख़रीद पाने तक से रोक देना, अर्थात जीवन की ज़रूरी सुविधाओं से वंचित करना। ख़ासतौर पर भारत की धर्म, जाति, आदि पूर्वाग्रहों-नफ़रत आधारित शासक वर्ग की राजनीतिक ताक़तों और उनके संरक्षण वाले गिरोहों के हाथ में ऐसे केन्द्रीय डाटा भण्डार बहुत ख़तरनाक सिद्ध हो सकते हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि 1984 में दिल्ली और 2002 में गुजरात दोनों जगह शासक पार्टियों ने पुलिस-प्रशासन के संरक्षण में जिन भयानक हत्याकाण्डों को अंजाम दिया था, उनमें चुन-चुनकर व्यक्तियों और उनकी सम्पत्ति को निशाना बनाया गया था और इसमें वोटर लिस्ट और अन्य सरकारी जानकारियों का इस्तेमाल हुआ था।

  • February 28, 2017

    पूँजीपतियों की हड़ताल

    ये महज चन्द उदाहरण नहीं है बल्कि हर पूँजीवादी देश में चलने वाली एक आम रिवायत है। पूँजीपति लगातार निवेश, नौकरियाँ, कर्ज़, माल और सेवाएँ – यानी वे संसाधन जिन पर समाज की निर्भरता है – रोककर सरकारों पर दबाव बनाते रहते हैं और लोगों की कीमत पर अपने मुनाफे़ के लिए काम करवाते हैं। उनके हथकण्डों में छँटनी करना, नौकरियाँ और पैसे दूसरे देशों में भेजना, कर्ज़ देने से इंकार करना या फिर ऐसा करने की धमकी देना शामिल होता है। इसके साथ ही यह वादा भी होता है कि जब सरकार उनके मनमाफ़ि‍क नीतिगत बदलाव कर देगी तो वे अपना रुख बदल लेंगे।

  • February 27, 2017

    स्वच्छता अभियान की देशव्यापी नौटंकी के बीच मुम्बई में सार्वजनिक शौचालय में गिरकर लोगों की...

    मुम्बई के ज़्यादातर सार्वजनिक शौचालय बनाये तो म्हाडा या बीएमसी द्वारा जाते हैं पर उन्हें चलाने का ठेका एनजीओ या प्राइवेट कम्पनियों को दिया गया है। बेहद ग़रीब इलाक़े में एकदम जर्जर शौचालय के लिए भी ये ठेकेदार 2, 3 से 5 रुपया चार्ज लेते हैं। पूरी मुम्बई में सार्वजनिक शौचालयों से सालाना लगभग 400 करोड़ की कमाई होती है। जाहिर है कि ये इन कम्पनियों के लिए बेहद मुनाफ़़ेे का सौदा है जहाँ ख़र्च कुछ भी नहीं है और कमाई इतनी ज़्यादा है।

  • February 27, 2017

    नरेन्द्र मोदी – यानी झूठ बोलने की मशीन के नये कारनामे

    नरेन्द्र मोदी की मूर्खता का कारण उनका टटपुँजिया वर्ग चरित्र है और गली-कूचों में चलने वाली इस राजनीति में पारंगत प्रचारक, जिसे गुण्डई भी पढ़ सकते हैं, की बोली है जिसे वे प्रधानमन्त्री पद से बोलने लगते हैं। यह टटपुँजिया वर्ग चरित्र उनकी कई अभिव्यक्तियों में झलक जाता है, मसलन कैमरा देखते ही उनकी भाव-भंगिमा में ख़ास कि़स्म का बदलाव आता है, शायद शरीर में सिहरन भी होती हो जिस वजह से अक्सर अख़बारों में आये फ़ोटो में उनका चेहरा कैमरे की तरफ़ होता है।

  • February 27, 2017

    बजट और आर्थिक सर्वेक्षण: अर्थव्यवस्था की ख़स्ता हालत को झूठों से छिपाने और ग़रीबों की क़ीम...

    अनौपचारिक क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 45% है और औपचारिक क्षेत्र से अपनी कम लागत की वजह से प्रतियोगिता में बाज़ार के एक बड़े हिस्से पर छाया हुआ है। अभी इन सारे प्रावधानों-उपायों से इसे औपचारिक की ओर धकेला जा रहा है जहाँ कम लागत का फ़ायदा समाप्त हो जाने से यह बड़ी कॉर्पोरेट पूँजी के सामने नहीं टिक पायेगा। इससे बड़ी संख्या में श्रमिक बेरोज़गार होंगे, छोटे काम-धन्धों में लगे कारोबारी और छोटे किसान बरबाद हो जायेंगे। लेकिन अर्थव्यवस्था में ज़्यादा विकास-विस्तार न होने पर भी मौजूदा बाज़ार में ही इस बड़ी कॉर्पोरेट पूँजी और उसके कार्टेलों का एकाधिकार, और नतीजतन मुनाफ़ा बढ़ेगा। इसलिए इसके प्रवक्ता कॉर्पोरेट मीडिया और आर्थिक विशेषज्ञ बजट की तारीफ़ों के पुल बाँधने में लगे हैं।