वृत्तचित्र/फ़िल्में

इस पेज़ पर दिए गये संसाधन  किसी भी रूप में मज़दूर बिगुल अख़बार से संबंधित नहीं है पर मज़दूर कार्यकर्ताओं की सहूलियत के लिए हम यहाँ औद्योगिक दुर्घटनाओं, श्रम कानूनों के नग्‍न उल्‍लंघन इत्‍यादि पर बनी फ़ि‍ल्‍मों या वृत्‍तचित्रों या फ़िर मज़दूरों को उनको ऐतिहासिक मिशन से परिचित कराने वाली  फ़ि‍ल्‍मों या वृत्‍तचित्रों का परिचय व लिंक देंगे। आप भी ऐसी फ़िल्‍में व वृत्‍तचित्र सुझा सकते हैं जो यहाँ दिये जा सकते हों।
The Resources given on this page do not belong to Mazdoor Bigul newspaper in any form but for the convenience of labor activists, we are providing introduction and links to movies and documentaries on industrial accidents, naked violation of labor laws and also related to historical mission of workers.You can also suggest movies and documentaries for this page.

 

 

कचरा-पूणे, महाराष्‍ट्र के सफ़ाई कामगारों के जीवन पर (‍मराठी व हिन्‍दी में, हिन्‍दी उपशीर्षक के साथ)
Kachra – On working conditions of sanitation workers of Pune, Maharashtra (In Marathi and Hindi with Hindi subtitle)

वर्किंगमेन्‍स डेथ-माईकल गलॉगर द्वारा 2005 में बनायी गयी ये फ़ि‍ल्‍म अलग अलग पेशे के  मज़दूरों की नारकीय ज़िन्‍दगी बयां करती है।
WorkingMan’s Death – Directed by Michael Glawogger in 2005, The film deals with the extremes to which workers go to earn a living in several countries around the world.

फ़िल्‍म में कुल 6 भाग हैं

  • Heroes – Miners of Donets Basin, Ukraine
  • Ghosts – Sulfur carriers in Ijen, Indonesia
  • Lions – Butchers in an open-air market in Port Harcourt, Nigeria
  • Brothers – Welders in the Gadani ship-breaking yard in Pakistan
  • The Future – Steel workers in Liaoning, China
  • Epilogue – Youths in Landschaftspark Duisburg-Nord in Germany

पूरी फ़िल्‍म इस लिंक से डाउनलोड की जा सकती है

http://thepiratebay.sx/torrent/4166454/Workingmans.Death.2005.PAL.DVDR

अलग अलग भाग यहाँ दिये जा रहे हैं।

Working Man’s Death – Brothers by aljazeeraenglish

Working Man’s Death – Lions by aljazeeraenglish

Working Man’s Death – Heroes by aljazeeraenglish

Working Man’s Death – Ghosts by aljazeeraenglish

मौत और मायूसी के कारख़ाने – औद्योगिक दुर्घटनाओं पर 
Factories of Death and Despair – On Industrial accidents

दूर बैठकर यह अन्दाज़ा लगाना भी कठिन है कि राजधानी के चमचमाते इलाक़ों के अगल-बगल ऐसे औद्योगिक क्षेत्र मौजूद हैं जहाँ मज़दूर आज भी सौ साल पहले जैसे हालात में काम कर रहे हैं। लाखों-लाख मज़दूर बस दो वक़्त की रोटी के लिए रोज़ मौत के साये में काम करते हैं।… कागज़ों पर मज़दूरों के लिए 250 से ज्यादा क़ानून बने हुए हैं लेकिन काम के घण्टे, न्यूनतम मज़दूरी, पीएफ़, ईएसआई कार्ड, सुरक्षा इन्तज़ाम जैसी चीज़ें यहाँ किसी भद्दे मज़ाक से कम नहीं… आये दिन होने वाली दुर्घटनाओं और मज़दूरों की मौतों की ख़बर या तो मज़दूर की मौत के साथ ही मर जाती है या फ़ि‍र इन कारख़ाना इलाक़ों की अदृश्य दीवारों में क़ैद होकर रह जाती है। दुर्घटनाएँ होती रहती हैं, लोग मरते रहते हैं, मगर ख़ामोशी के एक सर्द पर्दे के पीछे सबकुछ यूँ ही चलता रहता है, बदस्तूर…

फ़ैज़ के लफ़्ज़ों में:

कहीं नहीं है, कहीं भी नहीं लहू का सुराग़

न दस्त-ओ-नाख़ून-ए-क़ातिल न आस्तीं पे निशाँ

न सुर्ख़ी-ए-लब-ए-ख़ंज़र, न रंग-ए-नोक-ए-सनाँ

न ख़ाक पे कोई धब्बा न बाम पे कोई दाग़

कहीं नहीं है, कहीं भी नहीं लहू का सुराग़ …

यह डॉक्युमेण्ट्री फ़ि‍ल्म तरक़्क़ी की चकाचौंध के पीछे की अँधेरी दुनिया में दाखिल होकर स्वर्गलोक के तलघर के बाशिन्दों की ज़िन्दगी से रूबरू कराती है, तीखे सवाल उठाती है और उनके जवाब तलाशती है।

निर्देशकः चारुचन्द्र पाठक

द शिपब्रेकर्स-मुंबई में जहाज़ तोड़ने वाले मज़दूरों के जीवन पर बना वृतचित्र
The Ship-breakers – About working conditions in Mumbai Ship-breaking industry  

 

द शिपब्रेकर्स-बंगलादेश में जहाज़ तोड़ने वाले मज़दूरों के जीवन पर बना वृतचित्र
The Ship-breakers -About working conditions in Bangladesh Ship-breaking industry  

 

http://www.cbsnews.com/video/watch/?id=3228443n

लड़ाई जारी है – मई दिवस के इतिहास व आज के समय में भारत के मज़दूरों की हालात पर एक लघु वृत्‍तचित्र
Fight is yet not over – A Short documentary on the importance of May Day and condition of working class in India 

मज़दूर मांगपत्रक आन्‍दोलन – भारत के मज़दूरों की आज के दौर की मांगों को लेकर शुरू हुए आन्‍दोलन पर

आज़ादी के बाद भारत के शासक वर्ग ने पूँजीवादी विकास के जिस रास्‍ते पर इस देश को अागे बढ़ाया उसका नतीजा यह हुआ कि जहाँ एक ओर समाज के मुट्ठी भर लोगों की विलासिता दुनिया के उन्‍नत देशों के रईसों को भी पीछे छोड़ रही है वहीं इस देश की आम मेहनतकश आबादी जीवन की बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी तरस रही है। ऐसे में अब समय आ गया है कि भारत के मज़दूर वर्ग की साझा माँगों के आधार पर एक देशव्‍यापी आन्‍दोलन खड़ा किया जाए जिसमें अलग-अलग कारखानों के पूँजीपतियों के सामने माँग रखने की बजाय पूँजीपतियों की मैंनेजिंग कमेटी यानी सरकार के सामने माँग रखी जाए। मज़दूर माँगपत्रक आन्‍दोलन एक ऐसा ही प्रयास है जिसकी पहल देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में काम कर रहे स्‍वतंत्र मज़दूर संगठनों एवं मज़दूर अखबार ‘मज़दूर बिगुल’ ने की है।

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