अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर विश्वभर में गूँजी मज़दूर मुक्ति की आवाज़

लखविन्दर

मई दिवस के शहीद अल्बर्ट पार्सन्स ने फाँसी के तख्ते से चीखकर पूँजीपति वर्ग के चेतावनी दी थी – ‘‘अगर तुम सोचते हो कि हमें फाँसी पर लटकाकर तुम मज़दूर आन्दोलन को…ग़रीबी और बदहाली में कमरतोड़ मेहनत करनेवाले लाखों लोगों के आन्दोलन को कुचल डालोगे, अगर तुम्हारी यही राय है – तो ख़ुशी से हमें फाँसी दे दो। लेकिन याद रखो…आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो लेकिन यहाँ-वहाँ, तुम्हारे पीछे, तुम्हारे सामने, हर ओर लपटें भड़क उठेंगी। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे।…’’ मज़दूरों के उस महान नेता ने बिल्कुल सच कहा था। मज़दूर शहीदों की कुर्बानियाँ विश्व मज़दूर वर्ग को अथाह प्रेरणा व ऊर्जा देती आयी हैं।

काठमाण्‍डु, नेपाल में मई दिवस की रैली

काठमाण्‍डु, नेपाल में मई दिवस की रैली

भले ही हर वर्ष पहली मई को मनाए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस की महान विरासत पर धूल-राख की मोटी चादर डालने की रंग-बिरंगी पूँजीवादी ताकतों ने हर सम्भव कोशिश की है लेकिन मई दिवस आज भी मज़दूर वर्ग के लिए अथाह प्रेरणा का स्रोत है। इस दिन को महज एक अनुष्ठान में बदल देने की कोशिशें होती रही हैं। इसे चुनावी वोट मदारियों ने मज़दूरों की वोटे हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया है। इस दिन पर कुछ पूँजीवादी नेताओं को मज़दूरों के मसीहे बनाकर पेश करने की कोशिश की जाती है। मई दिवस के महत्तव को घटाने के लिए इस दिन मंचों पर घटिया स्तर के गीत-नाच पेश किए जाते हैं। पूँजीपतियों की दलाल ट्रेड यूनियनों ने इस दिन को अपने नीच उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया है। पूँजीपति इस पर मज़दूरों को यह बताने की कोशिश करते हैं कि यह दिन तो और मेहनत करके कारोबार बढ़ाने की कसमें खाने का दिन है। बहुत सारे ऐसे हैं जो मज़दूरों की सोच को पूँजीवादी व्यवस्था के खिलाफ़ जाने से रोकने के लिए इस दिन पर कार्यस्थल (कारखाना, खेत, भट्ठा आदि) स्तर की आर्थिक माँगों से ऊपर की कोई बात नहीं करते। अगर वे सरकार के खिलाफ़ भी बोलते हैं तो उनका मकसद मज़दूरों के दिमाग में अर्थवादी माँगे बिठाना ही होता है। इन ताकतों में खुद को वामपंथी ऐलान करने वाले नकली लाल झण्डों की भूमिका काफी अहम है। मज़दूर वर्ग के पूँजीवाद के खिलाफ़ संघर्ष की धार को कुन्द करने के लिए इनसे बढ़िया भूमिका और कौन निभा सकता है? लेकिन इस सब के बावजूद भी कुल मिलाकर मज़दूरों का पूँजीवादी व्यवस्था के खिलाफ़ गुस्सा बढ़ता जा रहा है जो हर साल मई दिवस के विभिन्न आयोजनों में देखने को मिलता है।

इस वर्ष भी विश्वभर में करोड़ों मज़दूरों न  पूँजीवादी लूट के खिलाफ़ जोरदार आवाज़ बुलन्द की है। आयोजन चाहे क्रान्तिकारी ताकतों की पहलीकदमी पर हुए हों या चाहे पूँजीपरस्त नेताओं/संगठनों की पहलकदमी पर हुए हों, अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर मज़दूरों द्वारा दिखाया जोश यह दिखाता है कि वे मौजूदा लुटेरी व्यवस्था से किस कदर दुखी हैं, कि वे पूँजीपक्षधर नेताओं के लक्ष्यों से अगली कार्रवाई चाहते हैं, कि वे गुलामी वाली परिस्थितियों से छुटकारा चाहते हैं। अनेक स्थानों पर क्रान्तिकारी व मज़दूर पक्षधर ताकतों के नेतृत्व में आयोजन हुए जिनके दौरान मज़दूर वर्ग की मुक्ति की लड़ाई जारी रखने, पूँजीवादी व्यवस्था को जड़ से मिटाने, पूँजीपति वर्ग के मज़दूर वर्ग और अन्य मेहनतकश लोगों के खिलाफ़ तीखे हो रहे हमलों के खिलाफ़ संघर्ष तेज़ करने के संकल्प लिए गये।

इस वर्ष पहली मई के दिन विश्वभर में मज़दूर कहीं सैकड़ों, कहीं हजारों तो कहीं लाखों की संख्या में इकठ्ठे होकर मई दिवस के प्यारे मज़दूर शहीदों को लाल सलाम कह रहे थे, मज़दूर वर्ग के रोशन भविष्य के लिए दी गर्इं उनकी कुर्बानियों को याद कर रहे थे। कई जगह मज़दूरों ने सरकार की पूँजीपति वर्ग के हित्त में और मज़दूर वर्ग के खिलाफ़ नीतियों का तीखा विरोध दर्ज कराया। इस दौरान पुलीस के साथ तीखी झड़पें हुर्इं। बड़ी संख्या में मज़दूरों की गिरफ़्तारियाँ हुर्इं, मज़दूर और पुलिस वाले जख्मी हुए। अपने जोशीले प्रदर्शनों और समागमों के ज़रिए इस बार फिर मई दिन पर मज़दूर वर्ग ने शासक पूँजीपति वर्ग के सामने यह ऐलान किया है कि वे गुलामी की जं़जीरें हर हाल में तोड़ कर रहेंगे।

यहाँ हम विश्व में मई दिवस पर हुई कुछ गतिविधियों की जानकारी साझा करेंगे।

मज़दूर वर्ग ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में अपनी पहली राज्यसत्ता कायम की थी जो विश्व मज़दूर वर्ग के लिए प्रेरणा व शिक्षा का स्रोत रही है। फ्रांस के मज़दूर आज भी अपनी पूँजीवादी लूट-अन्याय के खिलाफ़ सख्त लड़ाई लड़ रहे हैं और विश्व के मज़दूरों का सिर गर्व के साथ ऊँचा कर रहे हैं। मार्च-अप्रैल महीनों के दौरान फ्रांस के मज़दूरों, नौजवानों, छात्रों ने सरकार की मज़दूर व जनविरोधी नीतियों खासकर श्रम कानूनों में मज़दूर विरोधी संशोधनों के प्रस्तावों के खिलाभ ज़बरदस्त आन्दोलन लड़ा है। लाखों की संख्या में मज़दूरों, नौजवानों, छात्रों ने सड़कों पर उतरकर हुक़्मरानों को टक्कर दी है। 28 अप्रैल को भी लाखों मज़दूरों ने सरकार के खिलाफ़ प्रदर्शन किये थे। पहली मई के लिए भी बड़े प्रदर्शनों का ऐलान किया गया था। पहली मई को फ्रांस की सड़कों पर तथाकथित वामपंथी सरकार की कट्टर पूँजीवादी नीतियों के खिलाफ़ मज़ूदरों-नौजवानों की बाढ़ सी आ गयी। पाँच लाख से अधिक लोगों ने मई दिवस के प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। हुक़्मरानों ने ताकत के जरिए मज़दूरों की आवाज़ दबानी चाही। लाठियाँ बरसाई गयीं, आँसू गैस के गोले फेंके गये, बड़ी संख्या लोगों की गिरफ़्तारियाँ हुर्इं। लेकिन मज़दूरों-नौजवानों का जोश ठण्डा नहीं पड़ा बल्कि उनका लड़ाई लड़ने का अहसास और भी गहरा हो गया।

दक्षिण कोरिया मई दिवस सभा

दक्षिण कोरिया मई दिवस सभा

दक्षिण कोरिया में दसियों हजार मज़दूरों ने मई दिवस पर हुक़्मरानों की मज़दूर अधिकारों को कुचलने की नीतियों के खिलाफ़ जोरदार प्रदर्शन किये। यहाँ भी सरकार पूँजीपतियों को मज़दूरों की छँटनी करने की बड़ी छूटें देने के लिए और अन्य श्रम अधिकार छीनने के लिए कानून ला रही है। यहाँ भी मज़दूरों की पुलीस के साथ सख्य टक्कर हुई। मज़दूर जख्मी हुए, गिरफ़्तार किए गये लेकिन उनका लाल झण्डा झुका नहीं।

रूस में तेज़ी से बढ़ती आर्थिक बदहाली का शिकार मज़दूर लाखों की संख्या में मई दिवस पर सड़कों पर उतर आये। मास्को के लाल चौक में दसियों हज़ार मज़दूरों ने मई दिवस परेड में भागीदारी की और पूँजीवादी हुक़्मरानों को चुनौती दी। उनके हाथों में मज़दूर वर्ग के महान शिक्षकों व नेताओं मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्टालिन की तस्वीरें थीं। वे समाजवाद की पुनःस्थापना के लिए आवाज़ उठा रहे थे और पूँजीवादी हुक़्मरानों के दिलों में कँपकँपी पैदा कर रहे थे।

मास्‍को में मई दिवस की रैली में शामिल मज़दूर के हाथ में लेनिन व स्‍तालिन के पोस्‍टर

मास्‍को में मई दिवस की रैली में शामिल मज़दूर के हाथ में लेनिन व स्‍तालिन के पोस्‍टर

तुर्की में मई दिवस के प्रदर्शनों को रोकने के लिए सरकार ने अनेक सख्त पाबन्दियों का ऐलान किया था। इंस्ताबुल शहर के तकसीम चौक पर लोगों के इकट्ठे होने पर भी रोक लगाई गयी थी। तकसीम चौक राजनीतिक रोष प्रदर्शनों-रैलियों के लिए अहम स्थान है। मई दिवस के साथ इसका खास सम्बन्ध है। पहली मई 1977 के प्रदर्शन को रोकने के लिए यहाँ दक्षिणपंथी बंदूकधारियों ने 36 लोगों को शहीद कर दिया था। इस जगह पर मई दिवस के प्रदर्शन रोकने के लिए हर वर्ष की तरह इस बार भी सरकार ने जोरदार ताकत झोंकी थी। अमेरिकी साम्राज्यवादी हुक़्मरानों ने खुफिया एजंसियों और अन्य ढंगों से सरकार की मदद की। इंस्ताबुल शहर में लगभग 25 हजार पुलीस बल तैनात किया गया। हैलीकॉप्टर प्रदर्शनकारियों की निशानदेही करने के लिए शहर के ऊपर मँडरा रहे थे। तकसीम चौक पर मज़दूरों को पहुँचने से रोकने के लिए दमन किया गया। पुलिस के एक ट्रक ने एक बुजुर्ग प्रदर्शनकारी को टायरों तले कुचल दिया। दो सौ अधिक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

ढाका, बांग्‍लादेश में मई दिवस की रैली

ढाका, बांग्‍लादेश में मई दिवस की रैली

मई दिवस की जन्मभूमि अमेरिका में भी मज़दूरों ने अनेक जगहों पर बड़े प्रदर्शन किये। सिएटल में कई हजार मज़दूरों ने एकजुट होकर मज़दूर अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। वे प्रवासियों के अधिकारों के लिए जोरदार आवाज़ बुलन्द कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा प्रवासी मज़दूरों के खिलाफ़ भड़काई जा रही नफरत के खिलाफ़ आक्रोश था। प्रदर्शन को रोकने के लिए यहाँ भी पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आँसू गैस के गोले फेंके, गिरफ़्तारियाँ कीं। उधर कनाडा में भी बड़े प्रदर्शन हुए और मज़दूरों-नौजवानों को दमन का सामना करना पड़ा।

सारे ब्रिटेन में मई दिवस पर प्रदर्शन हुए। इस दौरान अन्य मुद्दों के साथ-साथ यूरोप में फासीवादी ताकतों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई गयी। ताईवान में हजारों मज़दूरों ने काम के घण्टे घटाने और वेतन वृद्धि के लिए प्रदर्शन किए। यूनान में सरकार द्वारा जनता की सहूलतें छीने जाने के खिलाफ़ मज़दूरों ने जोरदार आवाज बुलन्द की।

बगदाद, इराक

बगदाद, इराक

भारत में भी मज़दूर वर्ग ने बड़ी संख्या में मई दिवस आयोजनों में भागीदारी की। मज़दूर शहीदों को तहेदिल से याद किया गया, सरकार की मज़दूर विरोधी-जन विरोधी नीतियों के खिलाफ़ आवाज उठाई गयी। फासीवादी ताकतों द्वारा जनता को आपस में धर्म के नाम पर बाँटने और जनवादी अधिकारों के हनन के खिलाफ़ आवाज़ उठाई गयी। हमारे देश में औद्योगिक मज़दूर बड़े स्तर पर असंगठित हैं। जो संगठित भी हैं उनमें भी ज़्यादा प्रभाव नकली लाल झण्डों वाली पार्टियों व अन्य हुक़्मरान वर्गीय पार्टियों के साथ जुड़ी यूनियनों का है। क्रान्ति-पक्षधर अधिकतर पार्टियाँ/ग्रुप औद्योगिक मज़ूदरों के आन्दोलन को ज़रूरी अहमियत नहीं देते। कुछ क्रान्तिकारी ग्रुप गम्भीरता से भारत से औद्योगिक मज़दूरों को संगठित करने में लगे हुए हैं। इन संगठनों ने जोश-खरोश के साथ मई दिवस मनाया। कई जगहों पर मई दिवस आयोजनों के लिए लम्बी मुहिमें चलाकर व्यापक मज़दूर आबादी को मई दिवस की महान विरासत के साथ जोड़ने की कोशिश की गयी। दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत के मज़दूरों को भी मई दिवस की महान विरासत के साथ जोड़ने के लिए बहुत कुछ किया जाना ज़रूरी है। मई दिवस को रस्म अदायगी में बदल देने, अर्थवादी माँगों-मसलों से जोड़ कर इस दिन के क्रान्तिकारी महत्व को घटाने आदि की साजिशें से निपटने के लिए क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों काम करना होगा। हर साल मई दिन पर विश्व मज़दूर वर्ग के एक अच्छे-खासे हिस्से द्वारा प्रदर्शित जोश-खरोश हमें अथाह प्रेरणा देता है, ऊर्जावान करता है, मज़दूर वर्ग के रोशन भविष्य में हमारा विश्वास और पक्का करता है।

मज़दूर बिगुल, मई 2016


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments