विकलांगों के आये “अच्छे दिन”, “रामराज्य” में विकलांगों की पुलिस कर रही पिटाई!
मुनीश
हाल ही में एक भाजपाई मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी में देवता का अंश है! यानी कि वे “दिव्यांश” हैं। और इन्हीं “दिव्यांश” प्रधानमंत्री की पार्टी की सरकार के नीचे काम करने वाली जयपुर पुलिस ने दिव्यांगों की पिटाई की! “रामराज्य” में “दिव्यांश” प्रधानमंत्री की पार्टी के लोग दिव्यांगों को पिटवा रहे हैं! पिछली 23 मई से विकलांग आन्दोलन 2016 के बैनर तले राजस्थान की राजधानी जयपुर में विशेष योग्यजन अपनी माँगों को लेकर आन्देालनरत हैं। भाजपा सरकार ने राजस्थान में सत्ता में आते ही विशेष योग्यजनों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती कर दी थी जैसे कि आस्था कार्ड के तहत मिलने वाला 25 किलो गेहूँ बन्द कर दिया गया था। भाजपाई “रामराज्य” में सरकार के ऐसे तुग़लक़ी फ़रमानों की गर्म आँच से झुलसते विकलांगों ने सरकार के ऐसे ग़लत फ़ैसलों के विरोध में आन्दोलन करने व अपनी माँगों का ज्ञापन सरकार को देने का प्रयास किया। राजस्थान के महिला एवं बाल विकास मंत्री ने तो आन्दोलनकारियों से मिलने तक से इंकार कर दिया। उनके इस असंवेदनशील व्यवहार का विरोध करने पर पुलिस ने एक विकलांग व्यक्ति को थप्पड़ जड़ दिया। इसके पहले आन्दोलन की शुरुआत में पुलिस ने आन्दोलनकारियों पर बर्बर लाठीचार्ज किया गया व एक महिला आन्देालनकारी की तिपहिया साइकिल तोड़ दी।
आन्दोलनकारियों की प्रमुख माँग है कि सरकार उनको रोज़ग़ार दे व फरवरी 1996 से बैकलॉग वाले पदों को विशेष भर्ती अभियान चलाकर पूरा करे। यही वादा भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भी किया था पर अब सरकार इसे लागू करने में टालमटोल कर रही है। उनकी दूसरी माँग है कि विकलांग व्यक्तियों को देय मासिक पेंशन 500 से बढ़ाकर 1500 रुपये की जाये। कई अन्य राज्यों में पेंशन राशि 2000 तक है। इस पर राजस्थान सरकार के मंत्री का कहना था कि मध्यप्रदेश व गुजरात में तो विकलांग पेशन मात्र 400 रुपये है, हम तो 100 रुपये ज़्यादा दे रहे हैं। यही है भाजपा शासित राज्यों के ”विकास का मॉडल”! आन्देालनकारियों का कहना है कि विशेष योग्यजनों के लिये हर जिले में हॉस्टल खोला जाये ताकि बाहर जाकर लिखने-पढ़ने वाले छात्रों को आवास की समस्या का सामना ना करना पड़े, साथ ही रोस्टर प्रणाली को ठीक से लागू करते हुये ठेके पर रखे गये कर्मचारियों को स्थायी किया जाये। विकलांग आन्दोलन 2016 के सदस्यों ने अपना 21 सूत्री माँगपत्रक सरकार को सौंपा। 30 मई की बातचीत में सरकार ने आन्दोलनकारियों की माँगों के सम्बन्ध में गोलमोल बात करते हुए कमेटी गठित करने का कोरा आश्वासन दिया पर आन्दोलनकारियों का कहना था कि सरकार उनकी जायज़ माँगों पर तुरन्त कार्रवाई करे। कांग्रेस शासन के दौरान जनता कई बार गठित ऐसी कमेटियों का हश्र देख चुकी है। विकलांग जन ये जानना चाहते थे कि भाजपा सरकार टालमटोल क्यों कर रही है जबकि इनमें से कुछ माँगें तो ख़ुद भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में मौजूद हैं? अब राज्य सरकार बहाना बनाते हुए कह रही है कि ये माँगें मानने का अधिकार केन्द्र सरकार के पास है और “दिव्यांश” मोदी की केन्द्र सरकार के मंत्रीगण कह रहे हैं कि ये ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की है! इस तरह केंद्र व राज्य सरकार दोनों वाजिब माँगों पर टालमटोल कर रही हैं। हाल ही में वसुन्धरा सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए उल्टा आन्दोलनकारियों पर ही आरोप जड़ दिया कि वे गुमराह होकर “राजनीति” कर रहे हैं! पर सवाल यह है कि जब ख़ुद भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में विकलांग जनों को रोज़ग़ार देने की बात की थी, सुशासन व विकास की बात की थी, तब ख़ुद भाजपा क्या गुमराह होकर “राजनीति” कर रही थी?
मज़दूर बिगुल, जून 2016













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