महान अक्टू्‍बर क्रान्ति के शताब्दी ‍वर्ष की शुरुआत
सजेंगे फिर नये लश्कर – मचेगा रण महाभीषण
अक्टूबर क्रान्ति की स्मृतियों से संकल्प लो – नयी सदी की नयी समाजवादी क्रान्तियों की तैयारी करो

सम्पादक मण्डल

बीते 7 नवम्बर को महान अक्टूबर क्रान्ति को 99 वर्ष पूरे हो गये और उसके शताब्दी वर्ष की शुरुआत हो गयी। यह दुनिया भर के मज़दूर वर्ग के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण अवसर है। इस पूरे वर्ष दुनिया भर में क्रान्तिकारी मज़दूर व कम्युनिस्ट संगठन अक्टूबर क्रान्ति की गौरवशाली विरासत को याद करेंगे और भावी संघर्षों का संकल्प लेंगे। यह मज़दूर वर्ग की ऐतिहासिक विजय का पर्व है।

हम एक ऐसे समय में अक्टूबर क्रान्ति के सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, जबकि दुनिया भर में पूँजीवादी व्यवस्था भयंकर संकट से ग्रस्त है। पिछले 8 वर्षों में जिस असमाधेय संकट ने पूँजीवादी विश्व को अपनी जकड़ में ले रखा है, वह जाने का नाम नहीं ले रहा है। हर वर्ष संकट से उबरने के नये दावे कारपोरेट घरानों के कलमघसीट अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी कर रहे हैं। मगर अति-उत्पादन और पूँजी के अति-संचय के संकट से उबरने की बजाय पूँजीवादी व्यवस्था और भी ज्‍यादा गहरे संकटों में घिरती जा रही है। इस संकट का बोझ हर जगह हुक्मरानों ने आम मेहनतकश अवाम पर डालने का काम किया है। नतीजतन, मुनाफे की अन्धी हवस और सट्टेबाज़ी के ज़रिये तुरत-फुरत मुनाफ़ा कमा लेने की होड़ के कारण जो संकट पैदा हुआ है, उसका बोझ सरकारी खर्चों में कटौती (यानी, शिक्षा, चिकित्‍सा, कृषि, खाद्यान्न व अन्य मूलभूत वस्तुओं का महँगा होना), छँटनी और तालाबन्दी के ज़रिये बेरोज़गारी और महँगाई के रूप में मज़दूर वर्ग पर डाला गया। नतीजतन, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आम मेहनतकश लोग सड़कों पर उतरे और कई देशों में जनविद्रोह तक हुए। अरब विश्व में पिछले कुछ वर्षों में कुछ बड़े जनविद्रोह हुए जिन्होंने ट्यूनीशिया और मिस्र में अलोकप्रिय तानाशाह सत्ताओं को उखाड़ फेंका। मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड की धार्मिक कट्टरपंथी सत्ता को भी जनविद्रोह ने सत्ताच्युत कर दिया। लेकिन उसकी जगह पर आयी सैन्य तानाशाह सत्ता भी मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश जनता के लिए एक दमनकारी सत्ता साबित हुई है। नतीजतन, मिस्र का समाज आज भी सुलग रहा है। अपने संकट से निपटने के लिए साम्राज्यवादी अमेरिका और यूरोप दुनिया भर में जगह-जगह और विशेष तौर पर मध्य-पूर्व और यूक्रेन में युद्ध भड़का रहे हैं। भारतीय पूँजीपति वर्ग भी संकट के कारण बढ़ती बेरोज़गारी, ग़रीबी और महँगाई से मेहनतकश वर्ग का ध्यान खींचने के लिए युद्ध का जुनून भड़काने से लेकर साम्प्रदायिक तनाव और जातिगत वैमनस्य फैलाने तक, हर तरक़ीब का इस्तेमाल कर रहा है। आर्थिक संकट के दौर में दुनिया के तमाम देशों में फासीवादी ताक़तें मज़बूत हो रही हैं, कई जगहों पर वे सत्ता में भी पहुँच रही हैं; कई देशों में प्रतिक्रियावादी, दक्षिणपंथी और मज़दूर-विरोधी पार्टियाँ या नेता सत्ता तक पहुँच रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में नस्लवाद को बढ़ावा देकर मज़दूर वर्ग को तोड़ने की कोशिशें की जा रही हैं, प्रवासी मज़दूरों के ख़ि‍लाफ़ गोरे मज़दूरों को भड़काया जा रहा है। इसका असली कारण यह है कि स्वयं गोरी आबादी के भीतर वर्ग अन्तरविरोध तेज़ी से बढ़े हैं। भारत में भी मज़दूर वर्ग को जाट व गैर-जाट, पटेल-पाटीदार व गैर पटेल-पाटीदार तथा मराठा व गैर-मराठा में तोड़ने और आरक्षण के प्रश्न पर उन्हें लड़ाने की साजि़श की जा रही है। ये सभी साज़ि‍शें यही दिखला रही हैं कि पूँजीवादी शासक वर्ग आर्थिक संकट के कारण राजनीतिक संकट के भँवर में भी फँसा हुआ है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प का चुनाव जीतना भी यही दिखला रहा है। लेकिन इन सब साज़ि‍शों के बावजूद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मज़दूर अपने हक़ों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। दक्षिण यूरोप के तमाम देश, मसलन, यूनान, इटली, पुर्तगाल और स्पेन तक आज मज़दूरों और युवाओं के व्यवस्था-विरोधी आन्दोलनों की चपेट में आ गये हैं। हमारे देश में भी होण्डा और मारुति के मज़दूरों से लेकर लुधियाना के टेक्सटाइल पट्टी के मज़दूर, दिल्ली के इस्पात मज़दूरों से लेकर तिरुपुर व यनम के मज़दूर और चेन्नई के आटोमोबाइल मजदूरों से लेकर केरल के मुन्नार के चाय बाग़ान मज़दूर तक पिछले कुछ वर्षों में सड़कों पर उतरते रहे हैं। एक ऐसे उथल-पुथल भरे समय में हम अक्टूबर क्रान्ति  के शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। ऐसे दौर में, अक्टूबर क्रान्ति को याद करने के मज़दूर वर्ग के लिए क्या मायने हैं? इसके लिए पहले संक्षेप में यह जानना ज़रूरी है कि अक्टूबर क्रान्ति में हुआ क्या था क्योंकि आज तमाम मज़दूर भी अपनी इस महान वैश्विक विरासत से वाकिफ नहीं हैं।

महान अक्टूबर क्रान्ति में क्या हुआ था?

1917 में रूस एक ऐसे परिवर्तन से होकर गुज़रा जिसने दुनिया के इतिहास की दिशा मोड़ दी और एक नये युग की शुरुआत की। बीसवीं सदी के पहले दशक की शुरुआत से ही विश्व पूँजीवाद आर्थिक संकट से गुज़र रहा था। यूरोप के तमाम साम्राज्यवादी देश दुनिया भर में मेहनतकश अवाम और गुलाम राष्ट्रीयताओं की लूट की बँटवारे के लिए आपस में प्रतिस्पर्द्धा में लगे हुए थे। उस समय तक ब्रिटेन साम्राज्यवादी दुनिया की सबसे अहम ताकत था। फ्रांस दूसरी अहम औपनिवेशिक साम्राज्यवादी शक्ति था। लेकिन उन्नीसवीं सदी का अन्त होते-होते जर्मनी तेज़ी से एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभर चुका था। दूसरी ओर संयुक्त राज्य अमेरिका भी दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक शक्ति के रूप में उभर रहा था। लेकिन जर्मनी के पास अपनी पूँजी की प्रचुरता को खपाने के लिए और साथ सस्ते कच्चे माल और सस्ते श्रम के दोहन के लिए उपनिवेश नहीं थे। जर्मनी की बढ़ती आर्थिक शक्तिमत्ता ने उसे ब्रिटेन और फ्रांस के साथ सीधी प्रतिस्पर्द्धा में ला खड़ा किया था। इस बढ़ती साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा के फलस्वरूप 1914 में विश्व के पुनर्विभाजन के लिए पहले विश्व युद्ध की शुरुआत हो गयी। एक तरफ जर्मनी, ऑस्ट्रिया और हंगरी थे तो दूसरी ओर ब्रिटेन, फ्रांस,अमेरि‍का व रूस। रूस की स्थिति उस समय एक पिछड़े साम्राज्यवादी देश की थी। वह पूर्वी यूरोप के पिछड़े देशों के लिए एक साम्राज्यवादी देश था। लेकिन वह स्वयं ब्रिटिश, फ्रांसीसी और अमेरिकी वित्‍तीय पूँजी के वर्चस्व के अधीन था। रूस में अभी ज़ार का राजतन्त्र कायम था। पहले विश्वयुद्ध में उसने मित्र शक्तियों यानी ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका के पक्ष में हिस्सा लिया। रूस की पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति युद्ध में जर्मनी की उन्नत सैन्य शक्ति का मुकाबला करने के लिए अपर्याप्त थी। जल्द ही तमाम मोर्चों पर रूस की हार होने लगी। रूस के सैनिकों को न तो पर्याप्त मात्रा में बन्दूकें हासिल थीं और न ही उनके पास पर्याप्त मात्रा में भोजन था। युद्ध के खर्च को ढो पाना रूस की अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किल था और जल्द ही देश में खाद्यान्न की कमी का संकट भी पैदा हो गया। सैनिकों की भारी आबादी वास्तव में किसान परिवारों से आती थी। वे वास्तव में वर्दियों में किसान ही थे। रूस में किसानों की स्थिति भी भयंकर थी। भूदासत्व का कानूनी तौर पर 1861 में उन्मूलन हो गया था, लेकिन उसके अच्छे-खासे अवशेष अभी भी देश में कायम थे। किसानों के बीच भूमि का बँटवारा नहीं किया गया था और देश की अधिकांश खेती योग्य ज़मीन या तो ज़ार की थी, या फिर चर्च और बड़े ज़मींदारों की। जो भूमि ग्राम समुदाय के पास थी उसके भी चक्रीय बँटवारे का निर्णय धनी किसान व कुलक ही लेते थे और हर व्यावहारिक मसले के लिए इस ज़मीन पर भी उन्हीं का नियन्त्रण था। ज़ार की सत्ता युद्ध का बोझ किसानों पर डाल रही थी और भूस्वामियों ने किसानों पर दबाव बढ़ा दिया था। जो भी संसाधन थे वे सभी युद्ध के मोर्चों पर स्वाहा हो जा रहे थे।

मज़दूरों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। खाद्यान्न संकट के कारण शहरों में भोजन की भयंकर कमी हो गयी थी। मज़दूरों को भरपेट भोजन तक नहीं मिल पा रहा था। मज़दूरों के काम के घण्टे 12 से 14 घण्टे होना आम बात थी। मज़दूरी इतनी भी नहीं मिल पा रही थी कि मज़दूर भरपेट खाना खा पाते। कुछ मज़दूरों को थोड़ा बेहतर वेतन मिलता था, मगर भोजन की भयंकर कमी और उसकी बढ़ती कीमतों के कारण उन्हें भी पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा था। पूरे देश में करीब 85 फीसदी आबादी ग़रीब व मंझोले किसानों की थी और मज़दूरों की आबादी करीब 10 प्रतिशत। मज़दूरों को बेहतर कार्यस्थितियां, बेहतर मज़दूरी और भरपेट भोजन चाहिए था और किसानों को ज़मीन चाहिए थी। और मज़दूरों और किसानों दोनों को ही युद्ध से निजात चाहिए था। देश में 1917 की शुरुआत आते-आते आम मेहनतकश जनता के सब्र का प्‍याला छलक रहा था। भुखमरी, गरीबी और महँगाई की असहनीय स्थिति ने रूस के आम मेहनतकश अवाम में विद्रोह की स्थिति पैदा कर दी थी। अन्तत:, फरवरी 1917 में एक स्वत:स्फूर्त जनविद्रोह ने ज़ार की सत्ता को उखाड़ फेंका। उस समय रूस की क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी जिसका नाम रूस की सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी (बोल्शेविक) था, इस जनविद्रोह का नेतृत्व लेने में सफल नहीं रही। नतीजतन, ज़ार की सत्ता की पतन के बाद एक मिली-जुली आरज़ी (अस्थायी) सरकार बनी जिसमें कि कई पूँजीवादी व निम्न-पूँजीवादी पार्टियाँ शामिल थीं। इस आरज़ी बुर्जुआ सरकार ने जनता से वायदा किया कि वह किसानों को ज़मीन देगी और शांति देगी, मज़दूरों को बेहतर मज़दूरी, छोटा कार्यदिवस और ट्रेड यूनियन बनाने का कानूनी अधिकार देगी। लेकिन इस पूँजीवादी आरज़ी सरकार ने अपने ज्‍़यादातर वायदों को पूरा नहीं किया। उसने घोषणा की कि वह मित्र देशों यानी ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका से किये हुए अपने वायदों को पूरा करेगी और युद्ध में हिस्सेदारी जारी रखेगी। साथ ही उसने भूमि सुधार यानी ज़मीन के किसानों में बँटवारे के काम को भी संविधान सभा के बनने और फिर उसके द्वारा कानून पारित किये जाने तक टाल दिया। मज़दूरों और आम मेहनतकश जनता को तात्कालिक तौर पर कुछ जनवादी और नागरिक अधिकार ज़रूर हासिल हुए जिसने की रूस में वर्ग संघर्ष को आगे बढ़ाने में तात्कालिक तौर पर मदद की। इतना करना आरज़ी पूँजीवादी सरकार की मजबूरी थी। लेकिन जो सबसे अहम वायदे उसने किये थे यानी ज़मीन और शांति का वायदा, उससे वह मुकर गयी। युद्ध में रूस की हिस्सेदारी जारी रहने से देश में अव्यवस्था, आर्थिक संकट और खाद्यान्न संकट बढ़ते ही जा रहे थे। नतीजतन, देश में नयी पूँजीवादी आरज़ी सरकार के खिलाफ जनअसन्तोष भी बढ़ता जा रहा था। देश भर के औद्योगिक केन्द्रों में हड़तालों की एक लहर चल पड़ी। साथ ही, गाँवों में किसानों का सब्र भी टूट चुका था और उनके बीच भी बगावत के हालात थे। कई जगहों पर उन्होंने भूमि समितियाँ बनाकर ज़मीनें कब्‍ज़ा करना शुरू कर दिया। आरज़ी सरकार ने केरेंस्की नामक एक बुर्जुआ नेता की अगुवाई में इन मज़दूर हड़तालों और किसान बग़ावतों का उसी प्रकार दमन शुरू कर दिया जिस प्रकार कि ज़ार की सरकार कर रही थी। देश में एक क्रान्तिकारी स्थिति निर्मित हो रही थी और आरज़ी सरकार सुलगते हुए जनविद्रोह को कुचलकर इस क्रान्तिकारी सम्भावना को कुचलने का प्रयास कर रही थी। ऐसे में, बोल्शेविक पार्टी के नेता लेनिन ने अप्रैल में ‘अप्रैल थीसीज़’ पेश की। इसमें लेनिन ने बोल्शेविक पार्टी का आम बग़ावत कर सत्ता अपने हाथों में लेने का आह्वान किया। लेनिन ने बताया कि पूँजीवादी आरज़ी सरकार बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति को पूरा नहीं करेगी, यानी कि वह ज़मीन का बँटवारा नहीं करेगी और न ही युद्ध से निजात दिलायेगी।। वह मज़दूरों की भी सभी जनवादी माँगों को पूरा नहीं करने वाली। वह जनविद्रोह की आशंका को देखते हुए साम्राज्यवाद, पूँजीपति वर्ग और साथ ही देशी ज़मीन्दार वर्ग से समझौते कर रही है। ऐसे में, अब यह ख़तरा पैदा हो गया है कि यह सरकार प्रतिक्रियावादियों की गोद में बैठकर जनवादी क्रान्ति का भी गला घोंट देगी। इन हालात में मज़दूर वर्ग को अपनी हिरावल पार्टी यानी बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में सत्ता पर कब्ज़ा करना चाहिए और समाजवादी क्रान्ति को अंजाम देना चाहिए। अगर मज़दूर वर्ग ने समाजवादी क्रान्ति के कार्यभार को अभी तत्काल पूरा नहीं किया तो न सिर्फ़ जनवादी क्रान्ति पूरी नहीं हो सकेगी, बल्कि उसकी हत्या भी हो जायेगी। लेनिन के प्रस्ताव को पहले बोल्शेविक पार्टी के ही नेतृत्वकारी निकाय ने स्वीकार नहीं किया। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व की बहुसंख्या लेनिन के प्रस्ताव को मानती गयी। अन्ततः बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय कमेटी ने आम बग़ावत और समाजवादी क्रान्ति के लेनिन के प्रस्ताव को स्वीकार किया।

बोल्शेविक पार्टी कई वर्षों के वर्ग संघर्षों में तपी-तपायी पार्टी थी। इसने ज़ार की तानाशाही के दौर में मज़दूरों के कई संघर्षों का नेतृत्व किया था और उनके बीच लगातार मौजूद रही थी। बोल्शेविक पार्टी ने मज़दूरों के बीच से सर्वाधिक उन्नत चेतना वाले, कर्मठ और बहादुर कार्यकर्ताओं को भर्ती किया था और एक लौह अनुशासन वाली और गोपनीय ढाँचे वाली मज़बूत पार्टी का निर्माण किया था। केवल ऐसी पार्टी ही ज़ारशाही और फिर पूँजीवादी सरकार द्वारा किये जाने वाले दमन का मुकाबला कर सकती थी और कुशलतापूर्वक मज़दूर वर्ग और आम ग़रीब किसान आबादी को नेतृत्व दे सकती थी। बोल्शेविक पार्टी ने अपने प्रचार के दायरे में सैनिकों को भी लाया था, जो कि किसानों के ही बेटे थे। सैनिकों की भारी तादाद ज़मीन और शान्ति की माँग से पूर्णतः सहमत थी। केवल बोल्शेविक पार्टी ही एकमात्र पार्टी थी जो कि ज़मीन के बँटवारे और युद्ध से वापसी के कदम को तत्काल लागू करने की बात कर रही थी। फरवरी 1917 के बाद से ही आम मेहनतकश जनता में भी यह बात साफ होती जा रही थी कि यदि भूमि सुधार और शान्ति चाहिए, तो पूँजीवादी आरज़ी सरकार को उखाड़ फेंकना ही एकमात्र रास्ता है। और इस रास्ते पर जनता को नेतृत्व देने को तैयार केवल एक ही पार्टी मौजूद थी—बोल्शेविक पार्टी। जल्द ही मज़दूर आबादी की भारी बहुसंख्या बोल्शेविक पार्टी के पक्ष में खड़ी हो गयी। सैनिकों की सोवियतों में भी बोल्शेविक पार्टी नियन्त्रण में आ गयी। मज़दूरों और सैनिकों की सोवियतों में बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व के काबिज़ होने के साथ बोल्शेविक पार्टी आम बग़ावत को अंजाम देने की स्थिति में पहुँच गयी थी।

किसानों के बीच पहले समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी नामक एक टटपुंजिया पार्टी का नेतृत्व प्रमुख था। बोल्शेविक पार्टी का उनके बीच आधार काफी कम था। मगर भूमि सुधार के मसले पर समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी भी संविधान सभा द्वारा कानून बनाये जाने की बात का समर्थन कर रही थी और भूमि सुधार को टाले जा रही थी। लिहाज़ा, किसानों की बड़ी आबादी भी जल्द ही बोल्शेविक पार्टी के पक्ष में आने लगी क्योंकि केवल बोल्शेविक पार्टी ही तत्काल भूमि सुधार की बात कर रही थी। अब बोल्शेविक पार्टी रूस की बहुसंख्यक आम मेहनतकश आबादी, यानी कि मज़दूर वर्ग व आम किसान वर्ग, के समर्थन को प्राप्त कर चुकी थी। यानी अब बोल्शेविक पार्टी के पास वह क्रान्तिकारी अनुशासित व गुप्त ढाँचा भी था जो क्रान्ति के नेतृत्व संचालन के लिए ज़रूरी था और साथ ही उसके पास व्यापक जनसमुदायों का समर्थन भी था। उसने नारा दिया ‘ज़मीन, शान्ति, रोटी’। यही वे चीज़ें थीं जो कि रूस की युद्ध, ग़रीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी और महँगाई से त्रस्त और थकी हुई जनता को चाहिए थीं। बोल्शेविक पार्टी ने एक क्रान्तिकारी सैन्य कमेटी स्थापित की। इसका संचालन आम बग़ावत के पहले लेनिन ने स्वयं अपने हाथ में लिया। देश भर में मज़दूर व सैनिक सड़कों पर थे और गाँवों में भी किसानों का विद्रोह उबल रहा था। 24 अक्टूबर की शाम से ही बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में क्रान्तिकारी सैनिकों व मज़दूरों ने पूँजीवादी सत्ता के सभी अंगों पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। सभी पोस्टल व टेलीग्राफ दफ़्तरों, सैन्य मुख्यालय, पुलिस मुख्यालय, बैंक, पोर्ट, रेलवे स्टेशनों पर बोल्शेविकों ने अपना नियन्त्रण कायम कर लिया गया। पूँजीवादी सत्ता जिन अंगों से काम करती है, उन्हें अब लकवा मार चुका था और समूची पूँजीवादी राज्यसत्ता पूर्णतः असहाय थी। इसके बाद, 25 अक्टूबर को रूस में राज्यसत्ता के प्रतीक शीत प्रासाद में बैठे आरज़ी सरकार के मन्त्रियों को आत्मसमर्पण करने का अल्टीमेटम दिया गया। अल्टीमेटम पूरा होने से पहले आत्मसमर्पण न होने पर बोल्शेविक सैनिकों ने धावा बोला और बहुत थोड़े प्रतिरोध के बाद ही विजय हासिल कर ली गयी। और इस तरह से रूस के पुराने कैलेण्डर के अनुसार 25 अक्टूबर (7 नवम्बर) को बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व दुनिया की पहली सफल समाजवादी मज़दूर क्रान्ति हुई। समस्त शक्ति मज़दूरों और सैनिकों की सोवियतों को सौंप दी गयी। क्रान्ति के तत्काल बाद भूमि सम्बन्धी आज्ञप्ति पारित हुई और भूमि सुधारों की शुरुआत कर दी गयी। दूसरी आज्ञप्ति युद्ध से वापसी की आज्ञप्ति थी। समाजवादी क्रान्ति ने वे दोनों प्रमुख माँगें तत्काल पूरी कर दीं जिन्हें पूँजीवादी आरज़ी सरकार आठ माह में पूरा नहीं कर सकी थी। क्रान्ति के बाद रूस ने साम्राज्यवादी युद्ध से अपने हाथ खींच लिए और 1918 का मध्य आते-आते रूस इस विनाशकारी युद्ध से पूरी तरह बाहर आ चुका था।

हालाँकि, अब रूस की मज़दूर सत्ता को प्रतिक्रियावादी कुलकों व ज़मीन्दारों की बग़ावत और साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का मुकाबला कर क्रान्ति को बचाने के लिए एक तीन वर्षों के गृहयुद्ध में उतरना पड़ा, लेकिन यह कोई साम्राज्यवादी युद्ध नहीं था जो कि मुनाफ़े की लूट में हिस्सेदारी के लिए लड़ा गया हो। इस गृहयुद्ध में मज़दूरों व सैनिकों ने किसानों के समर्थन के बल पर तीन वर्षों में ज़मीन्दारों की बग़ावत को परास्त किया और साथ ही चौदह साम्राज्यवादी देशों की घेराबन्दी को भी हरा दिया। 1921 आते-आते क्रान्तिकारी समाजवादी रूस गृहयुद्ध में विजयी हो चुका था और वहाँ मज़दूर सत्ता सुदृढ़ीकृत हो चुकी थी। इसके बाद अगले करीब साढ़े तीन दशकों में रूस की मेहनतकश जनता ने रूस में समाजवादी व्यवस्था का निर्माण किया। सारे कल-कारख़ानों, खानों-खदानों का राष्ट्रीकरण कर दिया गया। सारे बैंकों का राष्ट्रीकरण कर दिया गया। राज्यसत्ता पर अपनी क्रान्तिकारी पार्टी बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में अब मज़दूर वर्ग काबिज़ था इसलिए अब इन सारे संसाधानों का स्वामी साझा तौर पर देश का मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसान जनता थी। 1917 में जो बुर्जुआ भूमि सुधार लागू किये गये उससे अलग-अलग किसान निजी तौर पर ज़मीन के मालिक बने। लेकिन 1931 से 1936 के बीच सोवियत संघ में ज़मीन में भी निजी मालिकाना समाप्त कर दिया गया और साझी खेती की व्यवस्था स्थापित की गयी। 1930 के दशक में ही सोवियत रूस का अभूतपूर्व गति से उद्योगीकरण हुआ जिससे कि वह कुछ ही समय में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी औद्योगिक शक्ति बन गया। इस पैमाने पर उद्योग खड़े करने में दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक शक्ति अमेरिका को करीब डेढ़ सौ साल लगे थे। लेकिन रूस ने यह कार्य मज़दूर शक्ति के बूते पर डेढ़ दशक में ही कर दिखाया। पूरे देश में साक्षरता का स्तर 100 प्रतिशत के करीब पहुँचने लगा। मज़दूर वर्ग के जीवन स्तर में ज़बर्दस्त सुधार हुआ। भुखमरी और बेरोज़गारी पूरी तरह समाप्त कर दिये गये। रूस औरतों को वोट देने का अधिकार देने वाला पहला बड़ा देश बना (रूस से पहले न्यूज़ीलैण्ड में महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला था|। सार्विक मताधिकार सच्चे तौर पर पहली बार बिना लिंग या सम्पत्ति की शर्त के रूस में ही लागू हुआ। सोवियत संघ ने सभी दमित राष्ट्रीयताओं व जातीय समूहों को पहली बार साम्राज्यवादी दमन से मुक्त किया और उन्हें आत्मनिर्णय का अधिकार दिया। ये सभी दमित राष्ट्रीयताएँ समाजवादी प्रयोग में बराबरी की हिस्सेदार बनीं और हीनता के ध्ब्बे को हमेशा के लिए अपने माथे से मिटा दिया। सोवियत संघ के समाज से वेश्यावृत्ति पूरी तरह समाप्त हो गयी। हर आर्थिक मामले में रूस पूरी तरह अपने पैरों पर खड़ा हो गया। और यह सारा चमत्कार रूस के मज़दूर वर्ग ने हिटलर की नात्सी सेना को हराते हुए, द्वितीय विश्व युद्ध में दो करोड़ लोगों की कुर्बानी देते हुए और पूरे साम्राज्यवादी-पूँजीवादी विश्व की साज़िशों और तोड़-फोड़ के प्रयासों के बावजूद किया। 1953 में स्तालिन की मृत्यु के बाद बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व पर संशोधनवादियों का कब्ज़ा हो गया। इसका कारण रूस में समाजवादी प्रयोगों के दौरान हुई कुछ भूलें और ग़लतियाँ थीं, जिन पर इस शताब्दी वर्ष के दौरान हम ‘मज़दूर बिगुल’ में विस्तार में लिखेंगे। लेकिन यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि रूस के समाजवादी प्रयोगों को अमली जामा पहनाने में वहाँ की मज़दूर सत्ता और मज़दूर वर्ग की पार्टी से ग़लतियाँ हुईं। यह एक नये किस्म का और अभूतपूर्व प्रयोग था। यह एक नये किस्म की राज्यसत्ता थी। पहली बार शोषक अल्पसंख्या पर शोषित बहुसंख्या की तानाशाही और सर्वहारा जनवाद कायम किया गया था। हर नये प्रयोग के समान इसमें भी ग़लतियाँ होना लाज़िमी था। यह पहली मज़दूर क्रान्ति थी। इसके द्वारा खड़े किये गये समाजवादी प्रयोग के करीब चार दशक बाद असफल हो जाने पर कोई भी ऐतिहासिक नज़रिया रखने वाला ताज्जुब नहीं करेगा। ताज्जुब इस बात पर ज़रूर होता है कि चार दशकों के प्रयोग में ही समाजवादी सोवियत संघ ने वह सबकुछ कर दिखाया जो पूँजीवाद अपने तीन सौ के वर्षों के इतिहास में नहीं कर पाया, हालाँकि ‘समानता, स्वतन्त्रता और भ्रातृत्व’ का नारा उसी ने दिया था। चार दशकों के भीतर ही सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोग ने आने वाली बेहतर दुनिया की एक झलक दिखला दी। उसने दिखला दिया कि पूँजी का शासन अजर-अमर नहीं है। पूँजीवादी मानवता के लिए सबसे बेहतर व्यवस्था नहीं है। पूँजीवाद ‘इतिहास का अन्त’ नहीं है। अक्टूबर क्रान्ति ने दिखला दिया कि इससे बेहतर दुनिया सम्भव है और वह बेहतर दुनिया सर्वहारा वर्ग ही बना सकता है।

आज तमाम मज़दूर इस महान प्रयोग के बारे में जानते ही नहीं हैं। कारण यह है कि पूँजीवादी अखबार, समाचार चैनल, फिल्में और समूचा शिक्षा तन्त्र कभी भी हमें इसके बारे में नहीं बताता। हमें केवल इसकी ‘असफलता’ के बारे में बताया जाता है। हमें इसके बारे में दुष्प्रचार सुनाया जाता है। दूसरे शब्दों में, अक्टूबर क्रान्ति को पूँजीवादी शासक वर्ग ने जानबूझकर विस्मृति के अन्धेरे में धकेलने की लगातार कोशिश की है ताकि आज का मज़दूर वर्ग अपने पुरखों के इस महान प्रयोग से सीख और प्रेरणा ले सके। वे हमेशा हीनताबोध और आत्मविश्वास के अभाव में जियें। अपनी गौरवशाली और महान विरासत से वंचित मज़दूर वर्ग भविष्य के संघर्षों के लिए भी आत्मविश्वास और आत्मिक बल नहीं जुटा सकता है। यही कारण है कि अक्टूबर क्रान्ति की स्मृति से शासक वर्ग घबराता और लगातार उस पर राख और धूल की परतें चढ़ाने का प्रयास करता रहता है। ऐसे में, हमें इस महान मज़दूर क्रान्ति के ऐतिहासिक और अन्तरराष्ट्रीय महत्व को समझने की आज शिद्दत से ज़रूरत है, ताकि उससे हम भावी संघर्षों के लिए प्रेरणा और शक्ति ले सकें।

अक्टूबर क्रान्ति का महान ऐतिहासिक, युगान्तरकारी और अन्तरराष्ट्रीय महत्व

महान अक्टूबर क्रान्ति का ऐतिहासिक महत्व अभूतपूर्व और अद्वितीय है। मानव इतिहास में पहले भी क्रान्तियाँ और जनविद्रोह हुए हैं। आज से करीब 2090 साल पहले रोम में गुलामों ने बग़ावत की। गुलामों की बग़ावत के कारण दास प्रथा कमज़ोर हुई और फिर टूटी। दास स्वामियों का शासन ख़त्म हुआ तो ज़मीन्दारों व सामन्तों का शासन आया। यह पहले की दास व्यवस्था से बेहतर व्यवस्था थी। पहले दासों को ‘बोलने वाला औज़ार’ कहा जाता था; दास-स्वामी उन्हें अपने मनोरंजन के लिए आपस में तब तक लड़वाते थे जब तक कि वे मर नहीं जाते थे; उनसे तब तक काम करवाया जाता था जब तक कि वे गिरकर बेहोश नहीं हो जाते थे; दासों को मनुष्य ही नहीं माना जाता था। लेकिन सामन्ती व्यवस्था के तहत भूदास की स्थिति इससे बेहतर थी। इस रूप में सामन्ती व्यवस्था मानव इतिहास में एक अगला कदम थी। लेकिन यह भी भूदासों और किसानों के अमानवीय शोषण पर आधारित व्यवस्था थी। भूदासों की अपनी कोई राजनीतिक स्वतन्त्रता नहीं थी। वे ज़मीन के साथ बँधे हुए थे। उन्हें सामन्तों की ज़मीन पर कमर-तोड़ काम करना पड़ता था और बदले में उन्हें जीने भर की खुराक मिलती थी। किसानों को भी लगान के रूप में सामन्तों की ज़मीन पर बेगार करना पड़ता था या फिर फसल या नकदी के रूप में भारी लगान चुकाना पड़ता था। आगे चलकर दुनिया भर में सामन्ती व्यवस्था के विरुद्ध किसानों ने बग़ावतें कीं। इन बग़ावतों से सामन्ती व्यवस्था में दरारें पड़ीं। आगे चलकर उदीयमान क्रान्तिकारी बुर्जुआ वर्ग ने किसानों और दस्तकारों व कारीगरों को साथ लेकर सामन्तों के विरुद्ध जनवादी क्रान्तियाँ कीं क्योंकि सामन्ती व्यवस्था के तहत उसका आर्थिक विकास और राजनीतिक सत्ता भी सम्भव नहीं थी।

इन जनवादी क्रान्तियों के फलस्वरूप पूँजीपति वर्ग सत्ता में आया और उसने पूँजीवादी लोकतन्त्र (जनवाद) की स्थापना की। इस व्यवस्था में पूँजीपति वर्ग शासित व शोषित मज़दूर व आम मेहनतकश वर्ग से शासन करने की ‘सहमति’ लेता है। यह ‘सहमति’ चुनावों के ज़रिये ली जाती है। इससे व्यापक मेहनतकश अवाम में यह भ्रम पैदा होता कि पूँजीवादी सरकार को उसने ही चुना है। लेकिन वास्तव में यह ‘सहमति’ पूँजीपति वर्ग अपने मीडिया, शिक्षा तन्त्र व अन्य राजकीय उपकरणों द्वारा राय बनाकर निर्मित करता है। ठीक उसी प्रकार जैसे पिछले लोकसभा चुनावों में प्रचार पर दस हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करके टाटा, अम्बानी व अडानी सरीखे पूँजीपतियों ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमन्त्री बनाने के लिए पूरे समाज में राय का निर्माण किया था। बहरहाल, इस प्रकार पूँजीवादी जनवाद के रूप में पहली बार एक ऐसी शोषक सत्ता आयी जो कि कम-से-कम ऊपरी तौर पर ‘सहमति’ लेकर शोषितों के ऊपर शासन करती है और इसमें शासक वर्ग के शासन को सही ठहराने का कार्य प्रत्यक्ष रूप से धर्म के द्वारा या किसी दिव्यता के सिद्धान्त द्वारा नहीं होता। इस रूप में पूँजीवाद अपने पूर्ववर्ती वर्ग समाजों यानी दास व्यवस्था और सामन्ती व्यवस्था से भिन्न है। लेकिन एक मायने में वह उनके समान भी है। पूँजीवाद में भी शोषित बहुसंख्या के ऊपर एक शोषक अल्पसंख्यक वर्ग की तानाशाही होती है। पूँजीवादी जनवाद का यही अर्थ होता है—- बहुसंख्यक मज़दूर वर्ग व आम मेहनतकश आबादी पर पूँजीपतियों की तानाशाही। इस तानाशाही को पूँजीपतियों की कौन सी पार्टी संचालित करेगी, बस इसी का फैसला पूँजीवादी चुनावों में होता है। नागनाथ चले जाते हैं, साँपनाथ आ जाते हैं। संक्षेप में यह कि अक्टूबर क्रान्ति के पहले तक सभी क्रान्तियों या विद्रोहों के बाद जो सत्ता अस्तित्व में आयी वह किसी किसी शोषक अल्पसंख्या के शोषित बहुसंख्या पर शासन का प्रतिनिधित्व करती थी। दास व्यवस्था बहुसंख्यक दास आबादी व आम मेहनतकश आबादी पर अल्पसंख्यक दास स्वामियों के शासन का, सामन्ती व्यवस्था बहुसंख्यक भूदास, किसान व दस्तकार आबादी पर अल्पसंख्यक सामन्ती राजे-रजवाड़ों के शासक का और पूँजीवादी व्यवस्था बहुसंख्यक मज़दूर वर्ग व आम मेहनतकश जनता पर अल्पसंख्यक पूँजीपति वर्ग के शासन का प्रतिनिधित्व करती है। अक्टूबर क्रान्ति ने पहली बार एक ऐसी सत्ता की स्थापना की जिसमें कि शोषक अल्पसंख्यकों के ऊपर शोषित बहुसंख्यकों की सत्ता कायम की गयी। इस रूप में अक्टूबर क्रान्ति ने मानव इतिहास में एक नये युग की शुरुआत की। यह नया युग है समाजवादी संक्रमण का दीर्घकालिक ऐतिहासिक युग। यह लाज़िमी था कि इस लम्बे दौर में दुनिया में अलग-अलग देशों में मज़दूर वर्ग समाजवाद के कई असफल प्रयोग करे। बीसवीं सदी में मज़दूर वर्ग ने अलग-अलग देशों में समाजवाद के कई प्रयोग किये भी जो महान उपलब्धियाँ हासिल करने के बाद असफल हो गये। रूस में, चीन में, पूर्वी यूरोप में, वियतनाम में। लेकिन इन प्रयोगों में रूसी अक्टूबर क्रान्ति का विशिष्ट स्थान है क्योंकि उसने ही इस सिलसिले की शुरुआत की और दुनिया की पहली समाजवादी मज़दूर सत्ता की स्थापना की।

अक्टूबर क्रान्ति ने बुर्जुआ क्रान्ति के भी उन कार्यभारों को सर्वाधिक क्रान्तिकारी रूप में और पूर्णता के साथ पूरा किया जिन्हें स्वयं बुर्जुआ वर्ग ने कभी पूरा नहीं किया। सबसे आमूलगामी बुर्जुआ क्रान्तियों ने भी भूमि सुधार और जनवादी अधिकार देने के वायदे को उस ईमानदारी और आमूलगामिता के साथ पूरा नहीं किया जिसके साथ अक्टूबर क्रान्ति ने किया। अक्टूबर क्रान्ति ने हफ्ते भर में ही वह कर दिखाया जो कि बुर्जुआ वर्ग ने अपने तमाम वायदों के बावजूद दो सौ साल में नहीं किया था। लेनिन ने इसीलिए अक्टूबर क्रान्ति की पाँचवी वर्षगाँठ पर दिये एक भाषण में कहा था कि रूस की विशिष्ट परिस्थितियों में समाजवादी क्रान्ति ने बुर्जुआ वर्ग द्वारा ही जनवादी क्रान्ति की हत्या को रोका। समाजवादी क्रान्ति ने मज़दूर वर्ग के हाथों में सत्ता सौंपने और समाजवादी निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने से पहले छूटे-फटके बुर्जुआ जनवादी कार्यभारों को भी पूरा किया। रूस में एक विशिष्ट परिस्थिति में सर्वहारा वर्ग को इतिहास ने मजबूर कर दिया था कि वह सत्ता तत्काल अपने हाथों में ले। जैसा कि लेनिन ने स्वयं कहा था कि अक्टूबर क्रान्ति का समय हमने अपनी इच्छा से नहीं तय किया था। द्वितीय विश्वयुद्ध, परिणामतः पैदा हुए आर्थिक संकट, खाद्यान्न संकट, देश भर में मज़दूर हड़तालों और कारख़ाना कब्ज़ा की लहर, सोवियतों के स्वतःस्पफूर्त रूप से जाग उठने और भूमि कमेटियों द्वारा ज़मीन कब्ज़ा करने के आन्दोलन के कारण पैदा हुई विशिष्ट परिस्थितियों ने सर्वहारा वर्ग और उसकी हिरावल पार्टी के समक्ष ”समय से पहले ही” ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें उसके सामने दो ही विकल्प मौजूद थेः या तो सत्ता पर कब्ज़ा करके समाजवादी क्रान्ति की जाये और बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के उन अधूरे वायदों को पूरा किया जाये जिन्हें पूरा करने से स्वयं बुर्जुआ वर्ग मुकर गया था या फिर सर्वहारा वर्ग और उसकी हिरावल बोल्शेविक पार्टी बुर्जुआ वर्ग, प्रतिक्रियावादी कुलक भूस्वामी वर्ग तथा राजतन्त्रशाही के बचे हुए प्रतिक्रियावादी तत्वों के गठबन्धन को यह इजाज़त दे कि वह जनवादी क्रान्ति का गला घोंटने के साथ ही मज़दूर वर्ग को ‘इतिहास के रंगमंच से कई दशकों के लिए उठाकर बाहर फेंक दे।’ लेनिन का यह मूल्यांकन बिल्कुल दुरुस्त निकला। यदि उस समय मज़दूर वर्ग ने सत्ता अपने हाथों में न ली होती तो साम्राज्यवाद, रूसी पूँजीपति वर्ग और भूस्वामी वर्ग ने मिलकर रूसी जनवादी क्रान्ति का भी गला घोंट दिया होता। इस प्रकार रूस की विशिष्ट परिस्थिति में मज़दूर वर्ग द्वारा की गयी समाजवादी क्रान्ति ने जनवादी क्रान्ति की हत्या को भी रोका और जनवादी क्रान्ति के कई कार्यभार भी उसे ही पूरे करने पड़े। निश्चित तौर पर, इस विशिष्ट परिस्थिति ने रूसी समाजवादी क्रान्ति और रूसी मज़दूर वर्ग के समक्ष समाजवाद के निर्माण-सम्बन्धी कई अहम चुनौतियों और जटिलाओं को पेश किया, जिसका सामना रूसी बोल्शेविक पार्टी को लम्बे समय तक करना पड़ा और जिनके कारण कई दिक्कतों और विकृतियों का सामना भी रूसी समाजवादी प्रयोग को करना पड़ा। इन सभी परिस्थितियों के मद्देनज़र रूसी समाजवादी क्रान्ति द्वारा जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को पूरा किया जाना और फिर समाजवादी निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना एक अभूतपूर्व उपलब्धि था।

दमित राष्ट्रीयताओं का एक पूरा सागर रूसी साम्राज्य की परिधि पर लहरा रहा था। ज़ार के शासन ने इन राष्ट्रीयताओं को दशकों से बर्बर दमन और उत्पीड़न किया था। साथ ही इन उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के भीतर मौजूद सामन्त व ज़मीन्दार वर्ग ने भी इस उत्पीड़न को बढ़ाने का ही काम किया था। बुर्जुआ वर्ग जब आरज़ी सरकार को बनाकर सत्ता में आया तो उसने दुनिया के अन्य देशों के बुर्जुआ वर्ग के समान ही दमित राष्ट्रीयताओं को आत्मनिर्णय के अधिकार का वायदा किया लेकिन उसे कभी पूरा नहीं किया। रूस में मज़दूर वर्ग ने जैसे ही अपनी समाजवादी सत्ता की स्थापना की उसने तुरन्त ही दमित राष्ट्रीयताओं को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया। ऐसे में, कई राष्ट्रीयताएँ और देश पहले रूसी सोवियत समाजवादी गणराज्यों के संघ से कुछ समय के लिए बाहर हो गये। इसमें भी वहाँ के कट्टरवादी बुर्जुआ राष्ट्रवाद की प्रमुख भूमिका थी। लेकिन जल्द ही इन दमित राष्ट्रीयताओं के मज़दूर वर्ग ने इन देशों के राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन को अपने हाथों में लिया और उसे रूसी समाजवादी निर्माण के साथ जोड़ दिया। इन देशों के किसानों व आम मेहनतकश अवाम ने भी देखा कि नयी रूसी समाजवादी सत्ता का उनपर ज़बरन अपने शासन को कायम रखने का कोई इरादा नहीं है और आत्मनिर्णय की उनकी नीति ईमानदार और पारदर्शी है। नतीजतन, 1923 आते-आते सभी दमित राष्ट्रीयताओं में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सोवियत समाजवादी गणराज्य स्थापित हो चुके थे और वे रूसी समाजवादी सोवियत गणराज्यों के संघ का अंग बन गये। नतीजतन, सोवियत संघ अस्तित्व में आया और उसमें पूर्व ज़ारकालीन साम्राज्य में ज़बरन शामिल किये गये सभी देश अपनी इच्छा से बराबरी के दर्ज़े के साथ शामिल हुए। यह दिखलाता है कि मज़दूर वर्ग कभी भी किन्हीं दमित राष्ट्रीयताओं के दमन और उत्पीड़न का समर्थन नहीं करता। वह स्वयं अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहा है। ऐसे में, वह किसी और को ज़बरन अपनी अधीन रखकर कैसे चल सकता है? रूस के मज़दूर वर्ग ने बुर्जुआ अन्‍धराष्ट्रवाद का खण्डन करते हुए सच्चे अन्तरराष्ट्रीयतावाद का प्रदर्शन किया और दमित राष्ट्रीयताओं के दमन और औपनिवेशीकरण का ख़ात्मा कर एक समाजवादी सोवियत गणराज्य की स्थापना की।

महान अक्टूबर क्रान्ति ने यह दिखलाया कि बिना समाजवादी क्रान्ति के तमाम देशों को साम्राज्यवादी युद्ध की विभीषिका और विनाश से मुक्ति नहीं मिल सकती है। जब तक साम्राज्यवादी युद्ध का शिकार हो रहे तमाम देशों में मज़दूर वर्ग सत्ता में नहीं आता, तब तक वहाँ की बेगुनाह जनता साम्राज्यवादियों के मुनाफ़े की हवस में तबाहो-बर्बाद होती रहेगी। आज मध्य-पूर्व के तमाम देशों के साथ यही हो रहा है। उस समय रूस के साथ एक दूसरे रूप में यह हो रहा था। मध्य-पूर्व में आज जो देश पश्चिमी साम्राज्यवाद का शिकार बन रहे हैं, वे स्वयं पिछली कतारों के साम्राज्यवादी देश नहीं हैं। रूस स्वयं पिछली कतारों का साम्राज्यवादी देश था। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध में उसकी स्थिति ब्रिटेन और प्रफांस से काफी अलग थी और उनके मुनाप़फों के लिए रूसी सैनिकों और आम जनता को बलि चढ़ाया जा रहा था। इस साम्राज्यवादी युद्ध का सारा लाभ बड़ी साम्राज्यवादी ताक़तों को था और उसकी कीमत रूसी मेहनतकश जनता से वसूली जा रही थी। समाजवादी क्रान्ति ने रूस को इसी भयंकर स्थिति से निकाला और रूस की जनता को शान्ति का अवसर दिया। रूस साम्राज्यवादी विश्व से अलग हो गया और उसने 1918 आते-आते साम्राज्यवादी युद्ध के हरेक मोर्चे से अपने सैनिक वापस बुला लिये। इसका अर्थ यह नहीं था कि रूस का मज़दूर वर्ग शान्तिवादी था। उसने उसके बाद तीन वर्षों तक काप़फी खून देकर ज़मीन्दारों की बग़ावत को कुचला और साथ ही चैदह साम्राज्यवादी देशों की घेराबन्दी को भी परास्त किया। लेकिन यह युद्ध एक क्रान्तिकारी युद्ध था जिसमें मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसान वर्ग के बहादुर योद्धाओं ने स्वेच्छा से कुर्बानी दी, ताकि वे अपनी समाजवादी सत्ता की हिफ़ाज़त कर सकें, न कि साम्राज्यवादी-पूँजीवादी धनपशुओं के मुनाफ़े के लिए मरें।

अक्टूबर क्रान्ति की एक अन्य महान उपलब्धि थी कि उसने स्त्रियों और पुरुषों के बीच वर्ग समाज में मौजूद घृणित असमानता पर प्रहार किया। यह तो नहीं कहा जा सकता कि यह असमानता कुछ वर्षों में समाप्त की जा सकती है, मगर अक्टूबर क्रान्ति ने लैंगिक असमानता की जड़ों पर भयंकर चोट की। स्त्रियों को वोट देने का अधिकार, समान वेतन का अधिकार और सामाजिक जीवन में प्रखर और मुखर उपस्थिति का अधिकार मिला। समाजवाद के निर्माण में सोवियत संघ में स्त्री मज़दूरों और आम तौर पर स्त्रियों ने महती भूमिका निभायी। पहली बार इंजन ड्राइवर से लेकर वैज्ञानिक जैसे पेशों में औरतों का प्रवेश हुआ। स्त्रियों को मिली इस आज़ादी ने रूस के सामाजिक इतिहास में एक क्रान्तिकारी और युगान्तरकारी भूमिका निभायी।

लेकिन इन सभी उपलब्धियों के आधार में जो सबसे बड़ा क़दम मौजूद था जो कि अक्टूबर क्रान्ति के बाद समाजवादी सत्ता ने उठाया वह था पूँजीवादी निजी सम्पत्ति का ख़ात्मा और इस तौर पर पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों के सबसे अहम पहलू यानी पूँजीवादी निजी सम्पत्ति सम्बन्धों पर प्राणान्तक चोट। क्रान्ति के कुछ माह के भीतर ही सभी बैंकों, वित्तीय संस्थानों और बड़े कल-कारख़ानों व खानों-खदानों का राष्ट्रीकरण तत्काल प्रभाव से कर दिया गया। 1920 आते-आते रूस में 10 मज़दूरों वाले छोटे कारख़ानों का भी राष्ट्रीकरण कर दिया गया था। ज़मीन का भी राष्ट्रीकरण किया गया हालाँकि उसके साथ रैडिकल बुर्जुआ भूमि सुधार के तौर पर ज़मीनें अलग-अलग किसान परिवारों को भोगाधिकार हेतु दी गयीं। 1921 में ‘नयी आर्थिक नीतियों’ के लागू होने पर समाजवादी सत्ता को कुछ कदम पीछे हटाने पड़े थे क्योंकि 1917 से 1920 तक जारी गृहयुद्ध के दौरान पैदा हुए संकट ने समाजवादी सत्ता को किसान वर्ग के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से से अलगावग्रस्त कर दिया था। इस दौरान किसान आबादी के मँझोले और ऊपरी मँझोले हिस्सों ने (जो कि क्रान्ति के बाद के भूमि सुधार के बाद बहुसंख्यक हिस्सा बन गया था) फसल की जमाख़ोरी करनी शुरू कर दी थी और साथ ही समाजवादी सत्ता के साथ असहयोग कर दिया था। इसके कारण उद्योग और खेती के बीच का विनिमय रुक गया था और औद्योगिक उत्पादन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ था क्योंकि मज़दूर आबादी के लिए खाद्यान्न की कमी पैदा हो गयी थी और साथ ही उद्योगों को कच्चे माल पर्याप्त मात्र में नहीं मिल रहे थे। ज़मीन्दारों और साम्राज्यवादी घेरेबन्दी के ख़िलाफ़ गृहयुद्ध में इन दोनों ही चीज़ों की भारी आवश्यकता थी, अन्यथा समाजवादी सत्ता का टिके रहना ही असम्भव हो जाता। नतीजतन, गृहयुद्ध के इस दौर में जिसके दौरान कम्युनिस्ट पार्टी ने ”युद्ध कम्युनिज़्म” की नीतियों को लागू किया, मज़दूर वर्ग की राज्यसत्ता को किसानों के अच्छे-ख़ासे हिस्से से जबरन फसल वसूली करनी पड़ी। जबरन फसल वसूली का तय निशाना तो खाते-पीते धनी व मँझोले किसान थे, मगर उसकी ज़द में कई बार निम्न मँझोले किसान भी आ जाते थे, जो कि कुल किसान आबादी की बहुसंख्या थे। इसके कारण किसान वर्ग के बड़े हिस्से ने धनी किसानों के नेतृत्व में सोवियत सत्ता से असहयोग कर दिया था और गृहयुद्ध ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि सोवियत सत्ता तत्काल मज़दूर-किसान संश्रय को फिर से मज़बूत करने के लिए कुछ नहीं कर सकती थी। नतीजतन, गृहयुद्ध की समाप्ति तक मज़दूर सत्ता को किसानों की इस आबादी के असहयोग से निपटने के लिए मजबूरन जबरन फसल वसूली करनी पड़ी। लेकिन 1920 के अन्त में गृहयुद्ध में विजय के बाद तत्काल जबरन फसल वसूली की व्यवस्था को समाप्त किया गया और फसल के रूप में कर की व्यवस्था को बहाल किया गया। 1921 में ही छोटे उद्योगों को भी स्वायत्तता दे दी गयी और बड़े उद्योगों में एक व्यक्ति के प्रबन्धन के सिद्धान्त और बाज़ार अर्थव्यवस्था को छूट दे दी गयी थी। कारण यह था कि रूस का मज़दूर वर्ग अभी राजनीतिक व तकनीकी तौर पर इतना उन्नत नहीं सिद्ध हुआ था कि वह स्वयं समूचे औद्योगिक प्रबन्‍धन और उत्पादन व विनिमय के संचालन व प्रबन्‍धन को अपने हाथों में ले पाता। इसलिए लेनिन के नेतृत्व में ये आर्थिक परिवर्तन किये गये जिन्हें ‘नयी आर्थिक नीतियों’ के नाम से जाना गया। लेनिन ने कहा था कि गृहयुद्ध व ‘युद्ध कम्युनिज़्म’ का दौर रूसी क्रान्ति पर परिस्थितियों ने थोप दिया था जिस दौरान रूसी समाजवादी सत्ता ने कुछ ऐसे किलों पर कब्ज़ा किया जिन पर कायम रह पाना सम्भव नहीं था। इसलिए मज़दूर सत्ता की हिफ़ाज़त के लिए यह ज़रूरी था कि सर्वहारा सत्ता को कायम रखने के लिए कुछ कदम पीछे हटाये जायें और किसान वर्ग से मज़बूत संश्रय कायम किया जाय, जो कि गृहयुद्ध के बीच कमज़ोर हो गया था। इसका कारण यह था कि रूस में समाजवादी सत्ता विशिष्ट परिस्थितियों के कारण एक ऐसे देश में कायम हुई थी जिसमें मज़दूर आबादी कुल रूसी आबादी का मात्र 10 से 12 प्रतिशत था जबकि मँझोले किसानों समेत समूची किसान आबादी 80 फीसदी से भी ज़्यादा थी। लेनिन ने स्पष्ट किया कि एक ऐसे देश में समाजवादी निर्माण में सर्वहारा सत्ता को कई बार कदम पीछे हटाने होंगे और फिर सधे हुए कदमों से दुबारा आगे बढ़ना होगा। 1921 में ‘नयी आर्थिक नीतियों’ के लागू होने के करीब 3 से 4 वर्षों में रूस के आर्थिक हालात सुधर गये। 1923 में लेनिन की मृत्यु के बाद समाजवादी निर्माण के कार्य का नेतृत्व संचालन स्तालिन के हाथों में आया।

बोल्शेविक पार्टी में बुखारिन के दक्षिणपंथी अवसरवाद (जो कि पूँजीवादी तरीके से उत्पादक शक्तियों के विकास का मार्ग सुझा रहा था) और त्रात्स्की के वामपंथी दुस्साहसवाद की लाइन के विरुद्ध लड़ते हुए, ज़िनोवियेव व कामेनेव के अवसरवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए स्तालिन ने समाजवादी निर्माण के कार्य को आगे बढ़ाया। 1927-8 तक उद्योगों में राजकीय नियन्त्रण को वापस मज़बूत किया गया और 1930 से 1935 के बीच स्तालिन के नेतृत्व में सामूहिकीकरण का आन्दोलन चला जिसमें किसानों की व्यापक बहुसंख्या को सहमत करते हुए और बड़े किसानों व कुलकों के प्रतिरोध को कुचलते हुए खेती में भी निजी भोगाधिकार की व्यवस्था को समाप्त किया गया और सामूहिक फार्मों और राजकीय फार्मों के तहत खेती होने लगी। 1936 तक सोवियत संघ में उद्योग और खेती दोनों से ही पूँजीवादी निजी सम्पत्ति का पूर्णतः ख़ात्मा हो गया। इसने सोवियत संघ को बड़े पैमाने के उत्पादन के ज़रिये विकास की लम्बी छलाँगें लगाने का मौका दिया और 1930 के दशक के अन्त तक सोवियत संघ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी औद्योगिक शक्ति बन गया। यह सारा कार्य पूँजीवादी मुनाफ़ाख़ोरी और लूट की बदौलत नहीं बल्कि मज़दूर वर्ग की सामूहिक पहलकदमी के बूते और सामूहिक मालिकाने की व्यवस्था के बूते किया गया। मज़दूर वर्ग के जीवन स्तर में ज़बर्दस्त छलाँग लगी। मज़दूर वर्ग के बेटे-बेटियों को भी अब ऐसा जीवन मिला जिसमें कि उनके बीच से कलाकार, वैज्ञानिक, तकनीशियन, बुद्धिजीवी, अध्यापक और बड़े खिलाड़ी पैदा हुए। सोवियत संघ ने विज्ञान के क्षेत्र में भी ज़बर्दस्त छलाँगें लगायीं और समाजवाद के दौर की उपलब्ध्यिों के बूते पर ही 1950 के दशक के अन्त में सोवियत संघ ने मानव इतिहास में पहले इंसान को अन्तरिक्ष में भेजा जिसका नाम था यूरी गगारिन।

इस समाजवादी विकास के पूरे क्रम के दौरान स्तालिन और बोल्शेविक पार्टी द्वारा तमाम ग़लतियाँ भी हुईं, जिसमें प्रमुख थी यह सोच कि पूँजीवादी निजी सम्पत्ति के ख़ात्मे के बाद समाजवादी क्रान्ति का प्रमुख कार्यभार पूरा हो गया है और अब आर्थिक विकास यानी उत्पादक शक्तियों का विकास ही एकमात्र कार्यभार रह गया है। इस सोच के कारण आर्थिक विकास का ऐसा रास्ता अख़्तियार किया गया जिसने समूचे मज़दूर वर्ग के जीवन को कई गुना बेहतर बनाते हुए भी कुशल व अकुशल, मानसिक श्रम व शारीरिक श्रम, खेती और उद्योग और गाँव और शहर के अन्तर को बढ़ाया। इसके कारण वेतन असमानताएँ व अन्य बुर्जुआ अधिकार पैदा हुए। नतीजतन, समाज में एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ जो कि वास्तव में एक नया बुर्जुआ वर्ग था। यह नया बुर्जुआ वर्ग समाज में पैदा होने के साथ पार्टी और राज्यसत्ता में घुसपैठ करने लगा और उसने पार्टी और राज्यसत्ता के भीतर अपनी मोर्चेबन्दी कर ली। इन्हीं समस्याओं के आगे बढ़ने के कारण स्तालिन की मृत्यु के बाद सोवियत संघ में पूँजीवादी पुनर्स्थापना हुई और समाज, पार्टी और राज्यसत्ता के बीच मौजूद एक विशेषाधिकार प्राप्त और अधिशेष में बड़ा हिस्सा हड़पने वाले नये बुर्जुआ वर्ग ने पार्टी के भीतर एक तख्तापलट किया और 1956 में बीसवीं कांग्रेस तक यह प्रक्रिया मुख्यतः और मूलतः पूरी हो गयी।

लेनिन ने और बाद में स्तालिन ने (1948 से 1952 के बीच) स्वयं इस ख़तरे की ओर इशारा किया था। लेकिन स्तालिन को समाजवाद की इन समस्याओं का हल करने का कभी मौका नहीं मिला। इसका कारण सोवियत संघ में पार्टी और राज्यसत्ता के भीतर जारी वर्ग संघर्ष और साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध और नात्सी ख़तरे से लड़ने की चुनौती भी था और साथ ही बोल्शेविक पार्टी में मौजूद ‘उत्पादक शक्तियों के विकास’ के सिद्धान्त का असर भी था। लेनिन ने अक्टूबर क्रान्ति की पाँचवीं वर्षगाँठ पर कहा था कि यह लाज़िमी है कि हम ग़लतियाँ करेंगे और यह समय बतायेगा कि इन ग़लतियों के बावजूद हम समाजवादी सत्ता को टिकाये रख पायेंगे या नहीं। लेकिन अगर हम समाजवादी सत्ता को अन्ततः नहीं भी टिका पाते, तो इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं होगी क्योंकि यह मज़दूर सत्ता और समाजवादी निर्माण का पहला प्रयोग है और वह भी एक ऐसे देश में जहाँ मज़दूर वर्ग अल्पसंख्यक है और टटपुँजिया किसान आबादी बहुसंख्यक और वह भी बेहद प्रतिकूल बाह्य परिस्थितियों में।

सोवियत संघ के समाजवादी प्रयोग के अन्ततः रुक जानेे के बावजूद उसने चार दशकों में दिखला दिया कि मज़दूर सत्ता स्थापित हो सकती है और समाजवाद वास्तव में पूँजीवाद का एक कहीं बेहतर विकल्प दे सकता है। यह हमें भुखमरी, बेरोज़गारी, ग़रीबी, वेश्यावृत्ति, ऊँच-नीच, राष्ट्रीय उत्पीड़न और युद्ध से निजात दिला सकता है। इस प्रयोग ने दिखला दिया कि जिस मज़दूर आबादी को अनपढ़, गँवार, पिछड़ा हुआ माना जाना है वह एक विशाल देश में न सिर्फ़ अपनी सत्ता को स्थापित कर सकती है, बल्कि उसे चला सकती है और एक बेहतर समाज की रचना कर सकती है। इस तौर पर, अक्टूबर क्रान्ति ने मानव इतिहास में एक निर्णायक विच्छेद का प्रदर्शन किया और एक नये युग का आरम्भ कियाः समाजवादी संक्रमण का युग। इस युग की आरम्भ के बाद मज़दूर वर्ग ने कई अन्य देशों में समाजवादी प्रयोग करके, विशेष तौर पर चीन में, नये मानक स्थापित किये और नये चमत्कार किये। लेकिन ये सभी प्रयोग पहले दौर के समाजवादी प्रयोग थे। मज़दूर वर्ग ने अपनी किशोरावस्था में कुछ महान लेकिन त्रुटिपूर्ण प्रयोग किये। पहले दौर के प्रयोगों के बाद हम एक लम्बे निराशा के दौर से होकर गुज़रे हैं। लेकिन वह निराशा का दौर भी अब अपने ख़ात्मे की ओर है। पूँजीवादी व्यवस्था दुनिया को क्या दे सकती है यह हमारे सामने है। बीसवीं सदी के ये तमाम प्रयोग हम मज़दूरों की साझा विरासत हैं और इस साझा विरासत की नकल करते हुए नहीं बल्कि इससे वैज्ञानिक तौर पर सीखते हुए हम इक्कीसवीं सदी में नयी समाजवादी क्रान्तियों के प्रयोगों को अंजाम दे सकते हैं। इनसे आलोचनात्मक शिक्षण लिये बग़ैर और इन्हें भूलकर हम नये प्रयोग नहीं कर सकते, जैसा कि आज भारत और दुनिया में कई धुरीविहीन ”मुक्त-चिन्तक” तथाकथित कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन कह रहे हैं। इन महान प्रयोगों से सीखना भी होगा और इन महान प्रयोगों से आगे भी जाना होगा। निश्चित तौर पर, इन तमाम प्रयोगों में महान अक्टूबर क्रान्ति का हमेशा से एक महान स्थान रहा है और रहेगा। 

(अगले अंक में पढ़ें – अक्टूबर क्रान्ति की विरासत और इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रान्तियों की चुनौतियाँ)

 

 

मज़दूर बिगुल, अक्‍टूबर-नवम्‍बर 2016


 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन

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