नोटबन्‍दी – जनता की गाढ़ी कमाई से सरमायेदारों की तिजोरियाँ भरने का बन्दोबस्त

मुकेश त्यागी

8 नवम्बर को भारत सरकार ने 500 और 1000 हज़ार रुपये के चालू नोट प्रचलन से हटा लिये और उनकी जगह 500 और 2000 के नये नोट चालू करने का ऐलान किया जो 10 नवम्बर से चलन में आये। सरकार द्वारा शुरू में इस फ़ैसले के मक़सद बताये गये थे – काले धन पर हमला,  भ्रष्टाचार को रोकना और नक़ली नोटों का चलन रोककर इन्हें इस्तेमाल करने वाले आतंकवादियों की कमर तोड़ना। लेकिन जब इन उद्देश्यों के पूरा होने पर सवाल उठने लगे तो अब सरकार के सुर बदल गये हैं, अब सरकार इन सबकी बात को पीछे कर कैशलेस लेनदेन की व्यवस्था चालू करने पर मुख्य ज़ोर दे रही है। सरकार ने यह भी नहीं बताया है कि अगर इन नोटों की वजह से ही देश में काला धन, भ्रष्टाचार और अपराध-आतंकवाद होता है तो फिर इनको स्थाई रूप से ख़त्म करने के बजाय वापस चालू करने का क्या मतलब है? और दो हज़ार का और भी बड़ा नोट ले आने से क्या और ज़्यादा काला धन पैदा नहीं होगा?

करेंसी नोटों को बन्द करने के इस फ़ैसले से होने वाली तबाही और मौतों की ख़बरें पूरे देश भर से आ रही हैं। एक ऐसे देश में जहाँ कुल लेनदेन का 98 फ़ीसदी नक़दी के ज़रिये किया जाता है, कुल करेंसी में से 86.4 फ़ीसदी मूल्य के नोटों को अचानक बन्द करने से भारी अफ़रा-तफ़री पैदा होना लाजि़मी था। अभी तक 100 से ज़्यादा मौतों की ख़बरें आ चुकी हैं। पूरी की पूरी असंगठित अर्थव्यवस्था ठप पड़ी हुई है, जो भारत की कुल कार्यशक्ति के 93 फ़ीसदी रोज़़गार देती है और सकल घरेलू उत्पाद का 45 फ़ीसदी हिस्सा भी है। पहले से बदहाली झेल रही शहरी-ग्रामीण जनता इस बात से भी डरी हुई है कि उसके बचाये हुए पैसे रद्दी काग़ज़ में तब्दील हो रहे हैं। बैंकों के बाहर अपनी ख़ून-पसीने की कमाई को पकड़े हुए लोगों की लम्बी क़तारें पूरे देश भर में देखी जा सकती हैं। इन क़तारों में लगे लोग अपना काम-धन्धा या मज़दूरी छोड़कर आते हैं और दिनोंदिन ख़ाली हाथ लौट जाने को मजबूर हैं। अपने पैसे ही न निकाल पाना और ऊपर से अपनी दैनिक कमाई से भी वंचित होना आम लोगों के लिए दोहरी तक़लीफ़ का सबब बना हुआ है।

फिर इस नोटबन्दी का क्या मतलब है? इसके लिए समझना होगा कि जहाँ तक बड़े सम्पत्तिशाली और संगठित कारोबारी तबक़े का सवाल है पूँजीवादी व्यवस्था में धन-सम्पदा नोटों के रूप में नहीं बल्कि ज़मीन-मकान, जंगल, ख़ान, कारख़ानों, सोना-चाँदी, हीरे-मोती, जैसे दिखायी देने वाले रूपों से भी ज़्यादा देशी-विदेशी कम्पनियों के शेयरों-बॉन्ड्स, देशी-विदेशी बैंक खातों, पनामा-सिंगापुर जैसे टैक्स चोरी के अड्डों में स्थापित काग़ज़ी कम्पनियों और बैंक खातों, मॉरीशस की काग़ज़ी कम्पनियों के पी-नोट्स, वग़ैरह जटिल रूपों में भी रहती है। मौजूद व्यवस्था में जिन के पास असली सम्पत्ति है वह असल में इसे नोटों के रूप में भरकर नहीं रखते क्योंकि उससे यह सम्पत्ति बढ़ती नहीं बल्कि इसके रखने में कुछ ख़र्च ही होता है और चोरी जाने का ख़तरा भी होता है| इसके बजाय वह इसे उपरोक्त विभिन्न रूपों-कारोबारों में निवेश करते हैं जिससे उनकी सम्पत्ति लगातार बढ़ती रहे। बल्कि ऐसे लोग तो आजकल बैंक नोटों का रोज़़मर्रा के कामकाज में भी ज़्यादा इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि ये अपना ज़्यादा काम डेबिट-क्रेडिट कार्ड या ऑनलाइन लेन-देन के ज़रिये करते हैं। इनके लिए करेंसी नोट के रूप में मुद्रा का इस्तेमाल बहुत सीमित है और सम्पत्ति की ख़रीद-फ़रोख्त़ में टैक्स बचाने, रिश्वत देने, राजनीतिक दलों को देने या ऐसे ही कुछ और कार्यों के लिए ही उसे अस्थाई तौर पर नोटों में बदला जाता है।

इसके विपरीत देश की अर्थव्यवस्था में 45% हिस्सा रखने वाला एक अनौपचारिक-असंगठित क्षेत्र है जिसमें छोटे उद्योग, व्यवसाय, पटरी-रेहडी दुकानदार, छोटे-मध्यम किसान और कुल मज़दूरों का अधिकांश हिस्सा आता है। इनके लिए नक़दी कारोबार और जीविका का अनिवार्य-अटूट अंग है। इन कारोबारों के लिए नक़दी उनकी कुल चालू पूँजी है क्योंकि इनका सारा लेन-देन कैश में ही होता है। ये इस नक़द चालू पूँजी से ही कच्चा माल ख़रीदते हैं, कल-पुर्जों का मेण्टेनेंस करते हैं, मज़दूरी का भुगतान करते हैं और फिर तैयार माल बेचकर इस चक्र को चलाते रहते हैं। इसी चक्र में से अपने मुनाफ़े का हिस्सा निकालकर अपने ख़र्च में भी लगाते हैं। अगर इस पूँजी का कोई हिस्सा किसी वजह से कहीं अटक जाये तो उस हद तक इनका कारोबार ही रुक जाता है जो अगर कुछ वक़्त ले तो इन्हें कारोबार को बन्द करना होता है। अगर कारोबार कुछ समय बन्द रह जाये तो ये अपनी पूँजी को ही खाने लगते हैं और दोबारा कारोबार शुरू करना मुश्किल होता जाता है। काम बन्द होते ही इनके कामगार सड़क पर आ जाते हैं और उनके लिए भूखे मरने की नौबत आ जाती है। इसीलिए नोटबन्दी के कुछ दिन बाद से ही देश के हर कोने से – तिरुपुर का हौज़री, भिवण्डी-इछलकरंजी का पावरलूम, लुधियाना का साइकिल-हौज़री, आगरा का जूता-पेठा, फि़रोज़़ाबाद का काँच-चूड़ी, मुरादाबाद का बर्तन, बंगाल का जूट-चाय बाग़ान, बनारस-भदोही का साड़ी-क़ालीन, आदि हर तरफ़़ से एक ही ख़बर है कि 50 से 70% तक कारोबार बन्द है, हर जगह लाखों मज़दूरों को काम पर ना आने के लिए कह दिया गया है।

लगभग 93% भारतीय श्रमिक असंगठित, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं और इनकी पूरी आमदनी नक़दी में है। नक़दी के अभाव से इनके छोटे धन्धे बन्द हो रहे हैं या इनका रोज़़गार छिन जा रहा है। इन मज़दूरों और छोटे कारोबारियों दोनों को ही इसकी वजह से या तो और भी कम मज़दूरी पर काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है या अपना माल बड़े कारोबारियों को उनकी मनमानी क़ीमतों पर बेचकर नुक़सान उठाना पड़ रहा है। नहीं तो सूदखोरों के पास जाकर अपनी भविष्य की कमाई का एक हिस्सा सूद के रूप में उनके नाम लिख देने के साथ किसी तरह कुछ बचाकर इकठ्ठा की गयी एकाध बहुमूल्य वस्तु गिरवी भी रखने की मज़बूरी है जो फिर वापस न आने की बड़ी सम्भावना है।

यही स्थिति गाँवों के छोटे-मध्यम किसानों की है। ये किसान अपनी एक फ़सल बेचकर जो नक़दी पाते हैं, उससे ना सिर्फ़़़ अपने परिवार के ख़र्च का इन्तज़ाम करते हैं बल्कि अगली फ़सल बोने का भी। इनके पास ऐसी क्षमता नहीं है कि वे अपनी फ़सल को कुछ समय भी रोक सकें। अब नोटबन्दी की वजह से नक़दी की कमी के बहाने धान, आलू, टमाटर, प्याज, सेव, कपास, आदि सभी फ़सलों की क़ीमतों में मण्डी के ख़रीदार आढ़तियों ने 40-50 फ़ीसदी तक की कमी कर दी है। इन हालात में इन्हें एक और तो अपनी ख़रीफ़ की फ़सल को नक़दी की कमी में औने-पौने दाम बेचने की मज़बूरी है, वहीं अगली फ़सल की बुआई के लिए साधन जुटाने वास्ते सूदखोरों से 30-50% के सूद पर क़र्ज़ लेना मज़बूरी है जिसके लिए खेत और गहने भी गिरवी रखे जाते हैं। धनी किसानों-कारोबारियों (यही सूद का धन्धा भी करते हैं) के अपने समर्थक वर्ग आधार की मदद करने के लिए सरकार ने सहकारी बैंकों/समितियों पर भारी रुकावटें भी लगा दी हैं क्योंकि इनसे कुछ मध्यम-छोटे किसानों को कुछ क़र्ज़ मिलता था, अब वह रास्ता भी बन्द हो गया है। इस प्रक्रिया में बहुत से ग़रीब किसान अपनी ज़मीनों से हाथ धो बैठेंगे। पिछले तीन वर्षों में खेती-किसानी के संकट और सूखे ने पहले ही कृषि ज़मीनों की क़ीमतों में भारी कमी कर दी है।  कुछ क्षेत्रों में तो खेती लायक ज़मीनों की क़ीमतें 40% तक नीचे आयी हैं। ऐसे हालात में क़र्ज़ लेने वाले किसानों के लिए स्थिति और भी ख़राब होने वाली है, कम क़र्ज़ के लिए ज़्यादा खेत गिरवी तथा संकट की स्थिति में ज़मीन बेचने पर और कम क़ीमत मिलने की मज़बूरी। इस स्थिति में छोटे-मध्यम किसानों की ज़मीनों को इन धनी किसानों-कारोबारियों द्वारा ख़रीदकर उन्हें मज़दूर बनाने की प्रक्रिया में और भी तेज़ी आयेगी।

ऊपर से सरकार ने पुराने नोटों को बदलने के जो नियम बनाये हैं उसमें बहुत से ग़रीब लोग अपने थोडे से पुराने नोटों को बदलवाने में भी असमर्थ हैं। याद रखें कि अभी भी 5 करोड़ से ज़्यादा वयस्क लोगों के पास आधार या और कोई पहचान नहीं है। जनधन योजना में खुले 25 करोड़ खातों (जिनमें से 6 करोड़ में अभी भी शून्य राशि जमा है!) के बाद भी कुल जनसंख्या के मात्र 53% वयस्कों के बैंक खाते हैं। इनमें से भी 40 फ़ीसदी अर्थात हर 5 में से 2 खाते निष्क्रिय हैं अर्थात सालों से उनमें कोई गतिविधि नहीं हुई। असल में तो सिर्फ़़़ 15 फ़ीसदी खातों में ही लेन-देन होता है। कुल जनसंख्या के 60% लोग ऐसी जगहों पर रहते हैं जहाँ कोई बैंक शाखा नहीं है अर्थात ये लोग बैंक में कुछ करना चाहें तो इन्हें अपना काम-धन्धा छोड़कर मीलों चलकर जाना होता है। ऊपर से सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में पाये जाने वाले सहकारी बैंकों को नोट बदलने से रोक दिया। अब तो 31 दिसम्बर तक पुराने नोट बदल पाने के अपने पहले ऐलान से मुकरकर सरकार ने 24 नवम्बर को ही नोट बदलने का काम बन्द कर दिया। इससे ज़ाहिर है कि बहुत सारे खाता-पहचान पत्र विहीन ग़रीब लोगों को अपने पुराने नोटों को बदलवा पाने में असमर्थ रहने पर अपने 500 के नोटों को 200-300 रुपये में बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा है जो इनके लिए एक कमरतोड़ नुक़सान है। मेहनतकश लोगों में भी सबसे ज़्यादा शोषित मज़दूर स्त्रियाँ होती हैं जिन्हें श्रम के शोषण के साथ पुरुषवादी समाज का भी अत्याचार झेलना होता है। शराबी, अपराधी, ग़ैरजि़म्मेदार मर्दों से विवाहित स्त्रियों के लिए नक़दी के रूप में रखी कुछ छिपायी हुई रक़म मुसीबत के वक़्त का सहारा होती है। अब यह रक़म इनमें से ज़्यादातर के हाथ से निकल गयी है।

साथ ही जो नक़दी जनता के बड़े हिस्से को अपने छोटे कारोबारों की चालू पूँजी या वक़्त ज़रूरत की बचत को बैंकों में जमा करने के लिए मजबूर किया गया है उस पर बैंकों ने तुरन्त ही ब्याज़ दरें घटा दी हैं मतलब एक और नुक़सान! कुल मिलाकर देखें तो नोटबन्दी की पूरी प्रक्रिया में आम मेहनतकश जनता की थोडी बहुत सम्पत्ति का एक बडा हिस्सा उनके हाथ से निकलकर सम्पत्तिशाली तबक़े के हाथ में हस्तान्तरित हो जाने वाला है। भारत पहले ही एक बेहद असमानता वाला समाज है – 10% शीर्ष तबक़े के पास 81% सम्पत्ति है (इसमें भी 1% शीर्ष तबक़े के पास ही 58% सम्पदा है), जबकि नीचे के 50% के पास सिर्फ़़ 2% सम्पत्ति है। ऐसे समाज में नोटबन्दी का नतीजा असमानता को और भी ज़्यादा बढ़ायेगा तथा निम्न मध्य तबक़े की 40% जनसंख्या को भी और ग़रीबी-कंगाली की ओर धकेलने की प्रक्रिया को और तेज़ करेगा। जहाँ तक इन कुछ बेहतर स्थिति वाले निम्न मध्यवर्गीय अर्द्ध श्रमिकों-छोटे कारोबारियों का सवाल है, उन्हें पहले ही घटते निर्यात और घरेलू माँग में कमी से कम होते निवेश की वजह से नौकरियों से हाथ धोना पड़ रहा है। अब नक़दी के अभाव से माँग और निवेश में मन्दी से यह प्रक्रिया और तेज़ होगी। एक अनुमान के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में एक फ़ीसदी की गिरावट से 20 लाख से ज़्यादा लोग बेरोज़़गार होंगे। इस आधार पर सकल घरेलू उत्पाद दर में गिरावट के विभिन्न अनुमानों के आधार पर 50 लाख से 1 करोड़ लोग तक अपने रोज़़गार से हाथ धो सकते हैं। और ज़्यादातर अर्थशास्त्रियों के अनुमानानुसार यह स्थिति सिर्फ़़ कुछ महीने नहीं बल्कि एक साल या उससे भी ज़्यादा तक रह सकती है। इस ज़बरदस्ती लाद दी गयी बेरोज़़गारी से अपनी थोड़ी सी जमा-पूँजी खोकर कंगाल हुए बहुत से मेहनतकश लोगों के लिए तो यह बदहाली स्थाई भी बन सकती है।

इसके विपरीत हम पूँजीपति और अमीर तबक़े की स्थिति पर नज़र डालते हैं। सस्ती ब्याज़ दरों पर जमा की रक़म से अब बैंक क़र्ज़ की ब्याज़ दरों को भी कुछ हद तक घटाया जा रहा है। यह क़र्ज़ कौन लेता है? बैंकों से क़र्ज़ का 80% हिस्सा पूँजीपतियों और उच्च मध्यम वर्ग के अमीरों द्वारा निवेश से और कमाई के लिए लिया जाता है। अब सस्ती ब्याज़ दरों से इन्हें तुरन्त इसका फ़ायदा होगा, उनकी पूँजी की लागत कम होने से मुनाफ़ा बढ़ेगा। दस बड़े पूँजीपति घरानों ने ही 7.3 लाख करोड़ रुपये बैंकों से क़र्ज़ लिया है। अगर ब्याज़ दर 0.1% भी कम हो तो इन्हें 730 करोड़ रुपये का लाभ होगा जो इन ग़रीब जमा करने वालों की जेब से आयेगा। इसीलिए यह सब पूँजीपति इसके समर्थन में खड़े हैं।

अब ज़मीन-मकान आदि सम्पत्ति की क़ीमतें कम होने के सवाल पर आते हैं। हमें समझना चाहिए कि क़ीमतें बढ़ने और कम होने दोनों चक्रों का फ़ायदा उसी तबक़े को होता है जिसके पास पूँजी, सूचना और पहुँच होती है। पिछले सालों में जिन बहुत से लोगों ने क़र्ज़ लेकर महँगी क़ीमतों पर ज़मीन-मकान ख़रीदे हैं अब नौकरियाँ-मज़दूरी कम होने की स्थिति में इनको ही कम क़ीमतों पर बेचने को मजबूर होना पड़ेगा न कि रियल एस्टेट के कारोबारियों को। बल्कि ये कारोबारी ही फिर से सस्ती क़ीमतों पर सम्पत्ति ख़रीदकर अगले क़ीमत वृद्धि चक्र में मुनाफ़ा कमाने की स्थिति में होंगे, न कि अमीर बनने के सपने देखते निम्न मध्य वर्गीय लोग। अमेरिका में वित्तीय संकट के दौरान यही हुआ था। निम्न मध्य वर्गीय लोगों ने क़र्ज़ लेकर जो घर महँगे दामों पर ख़रीदे थे, रोज़़गार छिन जाने से जब उनकी किश्तें जमा ना हुईं तो बैंकों ने उन्हें अपने क़ब्ज़े में लेकर नीलाम कर दिया जिसे सम्पत्ति के कारोबारियों ने औने-पौने दामों ख़रीदा तथा अब फिर से इनकी क़ीमतें 2008 के स्तर पर आने से भारी मुनाफ़ा कमाया। डूबे क़र्ज़ सस्ते में ख़रीद कर मुनाफ़ा कमाने का भी एक बड़ा कारोबार है जिसके लिए कई कम्पनियाँ भारत में भी खड़ी हो चुकी हैं।

अब समझते हैं कि काला धन असल में होता क्या है, क्यों और कैसे पैदा होता है और इसका क्या किया जाता है। काले धन का अर्थ है ग़ैरक़ानूनी कार्यों तथा टैक्स चोरी से हासिल किया गया धन। इसको कुछ उदाहरणों से समझते हैं। पिछले दिनों ही बिजली उत्पादन करने वाली बड़ी कम्पनियों द्वारा 60 हज़ार करोड़ रुपये काला धन का मामला सामने आया था। इन कम्पनियों, जिनमें जिन्दल, अनिल अम्बानी और गौतम अडानी की कम्पनियाँ भी हैं, ने ऑस्ट्रेलिया से कोयला आयात किया लेकिन ऑस्ट्रेलिया की कम्पनी से सौदा इन कम्पनियों ने नहीं, बल्कि इनकी ही दुबई या सिंगापुर स्थित कम्पनियों ने किया, कहें कि 50 डॉलर प्रति टन पर और फिर अपनी इस कम्पनी से इन कम्पनियों ने यही कोयला मान लीजिये 100 डॉलर प्रति टन पर ख़रीद लिया। तो भारत से 100 डॉलर बाहर गया लेकिन ऑस्ट्रेलिया 50 डॉलर ही पहुँचा। बीच का 50 डॉलर दुबई/सिंगापूर में इनकी अपनी कम्पनी के पास ही रह गया – यह काला धन है! इससे इन कम्पनियों को क्या फ़ायदा हुआ? इनकी भारतीय कम्पनी ने ज़्यादा लागत और कम मुनाफ़ा दिखाकर टैक्स बचाया; लागत ज़्यादा दिखाकर बिजली के दाम बढ़वाये और उपभोक्ताओं को लूटा; कई बार घाटा दिखाकर बैंक का क़र्ज़ मार लिया जो बाद में आधा या पूरा बट्टे खाते में डाल दिया गया। ऐसे ही अडानी पॉवर ने दक्षिण कोरिया से मशीनरी मँगाने में 5 हज़ार करोड़ रुपया ज़्यादा का बिल दिखाकर इतना काला धन विदेश में रख लिया। आयात में की गयी इस गड़बड़ी को ओवर इन्वॉयसिंग या अधिक क़ीमत का फ़र्ज़ी बिल बनवाना कह सकते हैं। निर्यात में इसका उल्टा या अण्डर इन्वॉयसिंग किया जाता है अर्थात सामान ज़्यादा क़ीमत का भेजा गया और बिल कम क़ीमत का बनवा कर अन्तर विदेश में रख लिया गया। रिज़र्व बैंक ने अभी कुछ दिन पहले ही बताया कि 40 साल में इस तरीक़़़े से 170 खरब रुपया काला धन विदेश में भेज दिया गया।

विदेश में रख लिया गया यह काला धन ही स्विस बैंकों या पनामा जैसे टैक्स चोरी की पनाहगाहों में जमा होता है और बाद में घूम-फिरकर मॉरीशस आदि जगहों में स्थापित काग़ज़ी कम्पनियों के पी-नोट्स में लग जाता है और विदेशी निवेश के तौर पर बिना कोई टैक्स चुकाये भारत पहुँच जाता है। विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के नाम पर भारत सरकार इस पर फिर से होने वाली कमाई पर भी टैक्स छूट तो देती ही है, यह हज़ारों करोड़ रुपया किसका है यह सवाल भी नहीं पूछती!

फिर देश के अन्दर भी विभिन्न तरह से काला धन पैदा होता है। जैसे बेलारी/गोवा आदि में लौह खनन करने वाले रेड्डी बन्धुओं जैसे माफि़या कारोबारियों ने जितना लौह अयस्क निकालकर बेचा उससे बहुत कम खातों में दिखाया और बाक़ी काले धन के रूप में रह गया। इसके अतिरिक्त किराये, निवेश और बॉण्ड आदि गतिविधियों (राजनेता, पुलिस, नौकरशाह) और आमदनी छुपाने के अनेक तरीक़़ों (रियल एस्टेट कारोबारी, निजी अस्पताल, शिक्षा के सेठ) के ज़रिये भी काला धन बनाया जाता है। लेकिन कुछ अपवादस्वरूप कंजूस कि़स्म के व्यक्तियों को छोड़कर यह काला धन बैंक नोटों के रूप में नहीं रखा जाता बल्कि ज़मीन-मकान जैसी सम्पत्तियों, बहुमूल्य धातुओं, तथा कि़स्म-कि़स्म की कम्पनियाँ-ट्रस्ट-सोसायटी, आदि बनाकर और कारोबार में लगा दिया जाता है जिससे और भी कमाई होती रहे। इस धन को क़ानूनी बनाने के अनेक उपाय हैं, इसमें इन्हें टैक्स वकीलों, चार्टर्ड एकाउण्टेण्टों और ख़ुुद सरकारी अमले की मदद भी मिलती है। इन तरीक़़ों का इस्तेमाल करते हुए छुटभैयों (काग़ज़ों पर चलने वाली अनेक खैराती संस्थाएँ यही काम करती हैं) से लेकर बड़ी मछलियाँ तक करों की छूट वाले देशों के ज़रिये भारत में सीधे विदेशी निवेश के रूप में वापस ले आती हैं। ग़ैरक़ानूनी धन पैदा करने और चलाने के इन उपायों पर नोटबन्दी का कोई असर नहीं पड़ेगा।

उपरोक्त से यह तो साफ़़ ही है कि घरों में नोटों के ढेर न लगाकर, बैंकों के ज़रिये ही यह काला या चोरी का धन विभिन्न कारोबार में लग जाता है। अनेक विश्लेषकों ने बख़ूूबी दिखाया है कि पिछली छापामारी के आँकड़े दिखाते हैं कि सिर्फ़़ 5% काला धन ही नक़दी (जिसमें जेवर भी शामिल हैं) के रूप में रहता है। इसलिए नोटबन्दी से कालाधन वाले असली कारोबारियों को न तो कुछ नुक़सान होने वाला है न ही इनका काले धन का चोरी का कारोबार रुकने वाला है। अगर इनके पास तात्कालिक ज़रूरत के लिए कुछ नोट इकठ्ठा हों भी तो भी वर्तमान व्यवस्था में राजनेताओं, अफ़सरों, पुलिस, वित्तीय व्यवस्था में इनका रुतबा और पहुँच इतनी गहरी है कि उन्हें खपाने में इन्हें कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं आती। कुछ कमीशन – सुविधा शुल्क देकर उनके काले धन को ठिकाने लगाने में इन्हें कोई तक़लीफ़ पेश आने वाली नहीं है।

जहाँ तक पूँजीवादी तबक़े की मीडिया और विश्लेषकों का सवाल है, वे इसे अस्थाई तक़लीफ़ के बाद टैक्स चोरी पर रोक लगने के तर्क से उचित ठहरा रहे हैं। लेकिन अगर टैक्स चोरी को ही रोकना है तो वोडाफ़ोन का 20 हज़ार करोड़ का टैक्स (केर्न, वेदान्ता, आदि भी हैं) इस सरकार ने माफ़ क्यों किया? अभी साढ़े चार हज़ार करोड़ के बग़ैर नियम के टैक्स छूट को सीएजी ने उजागर किया, वह कैसे? विदेशी निवेशकों और पी-नोट्स के पैसे पर टैक्स छूट क्यों? इन सब बड़े टैक्स चोरों को पकड़ने में क्या ऐतराज़ है? अगर वर्तमान शासकों को काला धन वास्तव में ही ज़ब्त करना या बन्द करना होता तो ऊपर दिये गये उदाहरणों वाले कारोबारियों की जाँच करते, उसमें पैदा काले धन का पता लगाते और उसे ज़ब्त कर इनको सज़ा दिलवाते। लेकिन सब सामने होते हुए भी इन मामलों में कुछ न कर पुराने नोटों को बन्द कर नये चलाने की नौटंकी से काले धन और भ्रष्टाचार से लड़ने की नौटंकी की जा रही है। असल में तो शासन में बैठे लोग इस पूँजीपति वर्ग के ही प्रतिनिधि हैं और उनके धन से ही चुनाव लड़कर सत्ता प्राप्त कर उनकी सेवा करते हैं तो उनसे इनके ि‍ख़‍लाफ़  कोई क़दम की उम्मीद करना ही बेमानी है। अब जबकि इस नौटंकी की पोल खुलने लगी है तो आयकर विभाग द्वारा छापे मारकर काला धन पकड़ने का प्रचार शुरु किया गया है लेकिन हमें जानना चाहिए कि यह छापामारी आयकर विभाग का एक नियमित कार्य है जिसको प्रचारित कर काले धन के ि‍ख़‍लाफ़  लड़ने का यह छद्म प्रचार ही चल रहा है। अगर यह करने से ही काला धन निकलने वाला था तो इसके लिए पूरे देश की जनता को परेशन किये बग़ैर 2 साल पहले ही किया जा सकता था। लेकिन ऐसा करने का कोई वस्तविक इरादा नहीं है, नहीं तो कई लाख करोड़ के टैक्स डिफॉल्टरों और बैंक क़र्ज़ दबाये बैठे पूँजीपतियों की सम्पत्ति क्यों नहीं ज़ब्त कर ली जाती?

इनको राहत देने के लिए तो पहले एक 45 फ़ीसदी टैक्स वाली स्कीम आयी थी काला धन बाहर लाने वाली; मोदी-जेतली जोड़ी ने खु़द ही वाहवाही भी कर ली थी कि 65 हज़ार करोड़ का काला धन घोषित हो गया। अब उसमें से 24 हज़ार करोड़ के दावे तो फ़र्ज़ी निकल आये हैं तथा ऐसे ही और भी निकल सकते हैं।  फिर नोटबन्दी आयी; इस बार कहा गया 5 लाख करोड़ काली कमाई नष्ट कर देगा मोदी जी का ब्रह्मास्त्र! यह सब रिज़र्व बैंक सरकार को देगा जिससे मोदी जी देश में अच्छे दिन ला देंगे। अब पूरा एक महीना अभी बाक़ी है और बस 3 लाख करोड़ ही बाहर बचा है। यह तीर भी ख़ाली गया। अब फि़फ़्टी-फि़फ़्टी का फ़ार्मूला लाया गया है मामले को सँभालने के लिए। लगता है कि आखि़र के दिनों में इसमें भी बड़ी रक़म घोषित होने के ऐलान होंगे, चाहे बाद में फ़र्ज़ी ही निकलें! इससे फिर प्रचार किया जायेगा कि मोदी जी की सख्ती से सब काले धन वाले डर गये और खु़द ही बाहर आ गये। इसीलिए आजकल इनकम टैक्स की रेड में नोट और सोना बरामदगी की कहानियाँ ख़ूब प्रचारित हो रही हैं। थोड़ी अधिक उम्र वाले जिन लोगों को इमरजेंसी की थोड़ी याद होगी वो जानते हैं कि उस दौरान भी रेडियो/अख़बार में इनकम टैक्स छापों या सूदखोरों के पकड़े जाने की ख़बरें भरी होती थीं।  वैसे इनकम टैक्स में एक डिपार्टमेण्ट ही है जिसका काम ही साल भर यह छापे मारना है, उसमें से कुछ ख़बरें रोज़़ छपवाना कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन जिस तरह से यह प्रचार चल रहा है उससे मोदी की ग़रीबों के लिए काली कमाई वाले अमीर लोगों के ि‍ख़‍लाफ़  जान की बाजी लगाकर लड़ने वाली इमेज के लिए ज़रूरी है कि किसी तरह यह दिखाना कि बड़ी मात्रा में काला धन ज़ब्त हुआ है।

यह आम तजुर्बे और ज्ञान का विषय है कि जहाँ भी अफ़सरशाही के नियन्त्रण में जीवन की गतिविधि आती हैं उसमें बेईमानी और कालाबाज़ारी बढ़ती ही जाती है। यह नियन्त्रण केरोसिन तेल पर हो या चीनी, सीमेण्ट या सोने या रुपये पर हो, नतीजा यही होता है। इसलिए नोटबन्दी से पैदा की गयी मुद्रा की नक़ली कमी से भी कालाबाज़ारी का एक बड़ा और नया धन्धा खड़ा होना ही था, जो अब हम सबके सामने है। लेकिन इन छापों में करोड़ों पकड़े जाने से यह धन्धा बन्द नहीं होता। इससे तो निजी गिरोहों द्वारा शुरू किये जाने वाले इस धन्धे में पुलिस-अफ़सरशाही-जजों और उनके ज़रिये राजनीतिक तन्त्र – सरकार की हिस्सेदारी और तालमेल स्थापित होता है। ऐसे ही सरकारी तन्त्र से लेकर निजी कारोबारियों और अपराधी गिरोहों की साँठ-गाँठ की गिरोहबन्दी पूरे प्रशासनिक-आर्थिक-राजनीतिक ताने-बाने को अपने नियन्त्रण में लेती है। अभी आयकर-पुलिस की जो छापेमारी चल रही है, मोदी जी जो चेतावनी जारी कर रहे हैं, उसका इंगित यही है – काला धन्धा करना है तो हमसे बचकर नहीं कर पाओगे! हमारा हिस्सा, चुनाव के समय हमारी मदद, सामाजिक गतिविधियों पर नियन्त्रण के लिए गुण्डा दल की व्यवस्था और रसद-पानी – यह सब करो तभी कर पाओगे। और यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है, इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व में ठीक यही काम कांग्रेस एक ज़माने में कर चुकी है। हाँ, अब वाला फासीवादी शासक गिरोह उससे भी अधिक नियन्त्रण स्थापित करना चाहता है।

वे भारत को भ्रष्टाचार और गन्दे धन से मुक्त कराने का दावा करते हैं। उनके सत्ता में आने के लिए वोट मिलने की वजहों में से एक पिछली संप्रग दो सरकार के दौरान घोटालों की लहर भी थी, जिसका कारगर तरीक़़े से इस्तेमाल करते हुए उन्होंने देश को पारदर्शी बनाने और ‘बहुत कम सरकारी दख़ल के साथ अधिकतम प्रशासन’ का वादा किया था। वे अपना आधा कार्यकाल बिता चुके हैं और उनके शासन में ऊँचे कि़स्म के भ्रष्टाचार की फ़सल भरपूर लहलहाती हुई दिख रही है। भ्रष्टाचार के मुहाने यानी राजनीतिक दल अभी भी अपारदर्शी हैं और सूचना का अधिकार के दायरे से बाहर हैं। ‘पनामा लिस्ट’ में दिये गये 648 काले धन वालों के नाम अभी भी जारी नहीं किये गये हैं। उनकी सरकार ने बैंकों द्वारा दिये गये 1.14 लाख करोड़ रुपये के कॉरपोरेट क़र्ज़ों को नन-परफ़ॉर्मिंग असेट्स (एनपीए) कहकर माफ़ कर दिया है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए 11 लाख करोड़ है, लेकिन कॉरपोरेट लुटेरों के ि‍ख़‍लाफ़  कोई भी कार्रवाई नहीं की जा रही है। कॉरपोरेट अरबपतियों का सीधा कर बकाया 5 लाख करोड़ से ऊपर चला गया है, लेकिन मोदी ने कभी भी इसके ि‍ख़‍लाफ़  ज़ुबान तक नहीं खोली। पिछले दशक के दौरान उनको करों से छूट 40 लाख करोड़ से ऊपर चली गयी, जिसकी सालाना दर मोदी के कार्यकाल के दौरान 6 लाख करोड़ को पार कर चुकी है, जो संप्रग सरकार के दौरान 5 लाख करोड़ थी। मोदी अपने आप में कॉरपोरेट भ्रष्टाचार के भारी समर्थक रहे हैं, जो ग़ैरक़ानूनी धन का असली जन्मदाता है।

यहाँ तक कि यह भी सन्देह किया जा रहा है कि नोटबन्दी में भी भारी भ्रष्टाचार हुआ है। इस फ़ैसले को लेकर जो नाटकीय गोपनीयता बरती गयी, वह असल में लोगों को दिखाने के लिए थी। इस फ़ैसले के बारे में भाजपा के अन्दरूनी दायरे को पहले से ही पता था, जिसमें राजनेता, नौकरशाह और बिज़नेसमेन शामिल हैं। इसको 30 सितम्बर को ख़त्म होने वाली तिमाही के दौरान बैंकों में पैसे जमा करने में आने वाली उछाल में साफ़़-साफ़़ देखा जा सकता है। विभिन्न राज्यों से ख़बरें आ रही हैं कि भाजपा ने नोटबन्दी के पहले के महीनों में बड़े पैमाने पर ज़मीन-मकान ख़रीदे। इसमें इस्तेमाल होने वाले धन का स्रोत क्या था? ख़बरों के मुताबिक़़ भाजपा की पश्चिम बंगाल ईकाई ने घोषणा से कुछ घण्टों पहले अपने बैंक खाते में कुल 3 करोड़ रुपए जमा किये। एक भाजपा नेता ने नोटबन्दी के काफ़ी पहले ही 2000 रुपये के नोटों की गड्डियों की तस्वीरें पोस्ट कर दी थी और एक डिजिटल पेमेण्ट कम्पनी ने 8 नवम्बर 2016 की रात 8 बजे होने वाली घोषणा की अगली सुबह एक अख़बार में नोटबन्दी की तारीफ़़ करते हुए पूरे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशिक कराया। असल में, नोटबन्दी ने बन्द किये गये नोटों को कमीशन पर बदलने का एक नया धन्धा ही शुरू कर दिया है। इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं है कि ट्रांसपेरेंसी इण्टरनेशनल द्वारा भारत की रैंकिंग में मोदी के राज में कोई बदलाव नहीं आया है जो 168 देशों में 76वें स्थान पर बना हुआ है।

जहाँ तक नक़ली नोटों का रोक लगने का सवाल है अब तो ख़ुद सरकार ने भी इसकी बात करनी कम कर दी है क्योंकि ‘द हिन्दू’ और ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (11 नवम्बर 2016) की रिपोर्ट के अनुसार NIA जैसी केन्द्रीय एजेंसियों और भारतीय सांख्यिकी संस्थान, कोलकाता (ISI) के अनुसार हर वर्ष 70 करोड़ रुपये के नक़ली नोट प्रचलन में आते हैं और देश में कुल नक़ली करेंसी की मात्रा 400 करोड़ रुपये या 10 लाख नोटों में 250 नोट आँकी गयी है। अब इसको ख़त्म करने के लिए पूरी करेंसी को बदलने पर 15-20 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करना अगर मूर्खता भी नहीं तो अविवेकी फ़ैसला तो कहा ही जायेगा जैसे सड़क पर चींटी मारने के लिए रोड रोलर चलाना! वैसे रिज़र्व बैंक का यह भी कहना है कि छापने की जल्दी के कारण इन नये नोटों में कोई सुरक्षा उपाय नहीं जोड़े जा सके। मतलब इनके नक़ली नोट छापना और भी आसान होगा। इसीलिए नये नोट बाज़ार में आने के चन्द दिनों के अन्दर ही इनके नक़ली नोट भी बड़ी मात्रा में देश के विभिन्न कोनों से पकड़े जाने शुरू हो गये हैं।

वर्तमान पूँजीवादी सामाजिक व्यवस्था का आधार ही मेहनतकशों के श्रम द्वारा उत्पादित मूल्य को हथियाकर अधिकतम मुनाफ़ा और निजी सम्पत्ति इकठ्ठा करना है, जिसमें एक और आधी से ज़्यादा सम्पत्ति के मालिक 1% लोग हैं और दूसरी और ग़रीब लोगों की बहुसंख्या। इतनी भयंकर असमानता और शोषण वाले समाज में न भ्रष्टाचार ख़त्म हो सकता है न अपराध। इनको ख़त्म करने के लिए तो पूँजीवाद को ही समाप्त करना होगा।  हाँ, वास्तविक समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए ऐसे नाटक दुनिया भर में बहुत देशों में पहले भी ख़ूब हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे। ख़ास तौर पर मोदी सरकार जो विकास, रोज़़गार, आदि के बड़े वादे कर सत्ता में आयी थी जो बाद में सिर्फ़़ जुमले निकले, उसके लिए एक के बाद एक ऐसे कुछ मुद्दे और ख़बरें पैदा करते रहना ज़रूरी है जिससे उसके समर्थकों में उसका दिमाग़ी सम्मोहन टूटने न पाये क्योंकि असलियत में तो इसके आने के बाद भी जनता के जीवन में किसी सुधार-राहत के बजाय और नयी-नयी मुसीबतें ही पैदा हुई हैं। इससे काला धन/भ्रष्टाचार/अपराध/आतंकवाद ख़त्म हो जायेगा – यह कहना शेखचिल्ली के कि़स्से सुनाने से ज़्यादा कुछ नहीं।

जहाँ तक कैशलेस लेन-देन का सवाल है, अब जबकि सरकार को यह स्वीकार करना पड़ा है कि अवैध घोषित सब नोट वापस बैंक में जमा हो जाने वाले हैं और जनता को बेहद तक़लीफ़ देने के बाद भी लगभग नगण्य काला धन बाहर आयेगा तो मोदी ने नया राग अलापना शुरू कर दिया है कि वह देश में कैशलेस व्यवस्था लाना चाहते हैं। तर्क दिया जा रहा है कि नक़दी के बजाय डिजिटल लेन-देन बढ़ने से रिकॉर्ड रहेगा, खातों में पारदर्शिता बढ़ेगी, भ्रष्टाचार और काला धन कम होगा, इससे ज़्यादा टैक्स वसूल होगा, जिसे सरकार समाज कल्याण के कार्यों पर ख़र्च करेगी।

जहाँ तक कैश के कम इस्तेमाल से काला धन कम होने का सवाल है, यह बात सही है कि आम लोगों द्वारा किये गये लेन-देन का रिकॉर्ड रहेगा लेकिन इससे काले धन के कारोबारियों पर रोक लगेगी ऐसा कोई अर्थशास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसके विपरीत बग़ैर कैश के भी काला धन पैदा होने के बहुत से उदाहरण हैं। जैसे, शेयरों के सट्टाबाज़ार स्टॉक एक्सचेंज का काम-काज पूरी तरह ‘कैशलेस’ होता है।  फिर भी काले धन का यह प्रमुख अड्डा है, सबसे ज़्यादा स्कैम, घपले, ठगी, आदि यहीं होती है। 1995 के हर्षद मेहता गिरोह ने तो पूरे बैंकिंग सिस्टम के ही घुटने टिकवा दिये थे। 2001 में केतन पारीख गिरोह ने फिर से बैंकिंग सिस्टम को तगड़ा झटका दिया था। पर इन दोनों ने कैश क़तई इस्तेमाल नहीं किया था, यह सब कुछ बैंकिंग चैनल के ज़रिये हुआ था। शायद मोदी सरकार की नज़र में यह घपला था ही नहीं, इन दोनों को तो ईनाम मिलना चाहिए, कैशलेस के ब्राण्ड एम्बेसडर होने का! आयात में क़ीमत से ज़्यादा बिल और निर्यात में क़ीमत से कम बिल द्वारा काला धन पैदा करने वाले तरीक़़े जो ऊपर बताये गये वे भी ‘कैशलेस’ और डिजिटल तरीक़़े से ही चलते हैं। इसका पैसा जब मॉरीशस-सिंगापुर होते हुए बिना पहचान वाले पी-नोट्स के ज़रिये विदेशी निवेश के रूप में आता है तो वह भी कैशलेश और डिजिटल होता है। बड़े प्रोज़ेक्ट्स बढ़ी-चढ़ी लागत के फ़र्ज़ी बिलों के ज़रिये जो बैंक क़र्ज़ लिया और बाद में कम्पनी को बीमार कर मारा जाता है वह भी सब कैशलेस ही होता है। विजय माल्या ने जो 9 हज़ार करोड़ का चूना बैंकों को लगाया वह भी तो पक्का कैशलेस और डिजिटल था, बोरी में नक़दी भरकर नहीं भागा वह!

अगर दुनिया के और देशों का भी उदाहरण देखें तो दक्षिण कोरिया और नाइजीरिया जैसे देशों में सकल घरेलू उत्पाद में नक़दी की मात्रा बहुत कम – लगभग 4% – है लेकिन दोनों में भ्रष्टाचार कम होने का कोई प्रमाण नहीं बल्कि दक्षिण कोरिया की राष्ट्रपति को तो फि़लहाल ही भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते पद से हटने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इसके विपरीत जापान में भारत के 11.7% के मुकाबले 20% नक़दी है लेकिन वहाँ भारत से बहुत ज़्यादा भ्रष्टाचार का कोई प्रमाण नहीं।

फिर मात्र आम लोगों के लेन-देन का रिकॉर्ड रखने में सरकार इतनी दिलचस्पी क्यों दिखा रही है? इसकी एक बड़ी वजह है कि इससे लोगों के ऊपर निगाह रखना, उनकी जासूसी करने का एक मजबूत तन्त्र खड़ा होगा। हाल के वक़्त में दुनिया के सभी पूँजीवादी देशों की सरकारें भिन्न विचार रखने वाले, अधिनायकवादी प्रवृत्तियों का विरोध करने वाले व्यक्तियों पर निगहबानी का शिकंजा कसने में बहुत निवेश कर रही हैं जिससे जनवादी आन्दोलनों को नियन्त्रित किया जा सके। इसका एक दूसरा उपयोग ऐसे कार्यकर्ताओं को बदनाम करने के लिए उनके किसी पुराने लेन-देन, किसी वस्तु की ख़रीद को बग़ैर सन्दर्भ बताये प्रचारित करने में भी किया जाता है। गुजरात के 2002 के साम्प्रदायिक दंगों में मोदी की भूमिका की विरोधी कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को बदनाम करने के लिए अभी कुछ ही समय पहले गुजरात पुलिस ने ऐसे ही उनके क्रेडिट कार्ड के रिकॉर्ड का प्रयोग किया था।

इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण नक़दी रहित मात्र इलेक्ट्रॉनिक मुद्रा की स्थिति में किसी व्यक्ति ही नहीं बल्कि पूरे इलाक़़े के जनसमुदाय के जीवन को मात्र कीबोर्ड पर कुछ बटन दबाकर पंगु बना देना भी शासक तबक़े के लिए बहुत आसान हो जायेगा। अभी ही हम देखते हैं कि किसी भी आन्दोलन की स्थिति में प्रशासन सबसे पहले मोबाइल-इण्टरनेट को ही बन्द करता है। पिछले एक साल में हरि‍याणा के जाट आन्दोलन, गुजरात के पाटीदार आन्दोलन, कश्मीर, झारखण्ड, उत्तर-पूर्व आदि में कुल जोडें तो 250 दिन तक इण्टरनेट/मोबाइल पर रोक लगायी जा चुकी है। कैशलेस डिजीटल लेन-देन पर निर्भरता की स्थिति में प्रशासन के लिए किसी भी क्षेत्र के समस्त जनसमुदाय को उनके धन तथा वस्तुओं की ख़रीद-फ़रोख्त़ की आम सुविधा से भी वंचित कर पाना बेहद आसान होगा। ऐसी स्थिति किसी भी देश की जनता के लिए क़तई स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह उनके स्वतन्त्रता और जनवादी अधिकारों के हनन का रास्ता खोल देगी।

इसलिए नोटबन्दी मात्र किसी नीति के ग़लत क्रियान्वयन और कुप्रबन्ध से जनता को होने वाली तक़लीफ़ का ही सवाल नहीं है बल्कि ग़रीब, कमजोर, वंचित, शोषित, मेहनतकश बहुसंख्यक तबक़े से ताक़तवर और पहुँच वाले पूँजीपति और उच्च मध्यम वर्ग को धन/सम्पदा के बड़े और स्थाई हस्तान्तरण, साफ़़ शब्दों में कहें तो लूट और डकैती, का बड़ा सवाल है। लेकिन बुर्जुआ विपक्षी पार्टियाँ, कुछ संसदीय ‘वामपन्थी’ दलों समेत, नोटबन्दी के इस मुद्दे को मात्र कुप्रबन्ध/असुविधा के सवाल तक सीमित करना चाहते हैं क्योंकि वह जनता के गुस्से को पूँजीवादी शासन व्यवस्था के ही ि‍ख़‍लाफ़  जाने से रोकने के लिए प्रयासरत हैं।  इसके असली जनविरोधी स्वरूप के सवाल को ये पार्टियाँ नहीं उठाना चाहतीं क्योंकि अन्त में ये सब सरमायेदार तबक़े की ही सेवा करती हैं।

 

मज़दूर बिगुल, दिसम्‍बर 2016

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