मालिक लोग आते हैं, जाते है

 

मालिक लोग आते हैं, जाते है

कभी नीला कुर्ता पहनकर, कभी सफ़ेद, कभी हरा

तो कभी लाल कुर्ता पहनकर।

महान है मालिक लोग

पहले पांच साल पर आते थे

पर अब तो और भी जल्दी–जल्दी आते हैं

हमारे द्वार पर याचक बनकर।

मालिक लोग चले जाते हैं

तुम वहीं के वहीं रह जाते हो

आश्वासनों की अफ़ीम चाटते

किस्मत का रोना रोते; धरम–करम के भरम में जीते।

आगे बढ़ो! मालिकों के रंग–बिरंगे कुर्तों को नोचकर

उन्हें नंगा करो।

तभी तुम उनकी असलियत जान सकोगे।

तभी तुम्हें इस मायाजाल से मुक्ति मिलेगी।

तभी तुम्हें दिखाई देगा अपनी मुक्ति का रास्ता।