साम्राज्यवादी डाकुओं की बढ़ती लूट,

देशी सरमायेदारों की फूलती थैलियां,

मेहनतकशें की बढ़ती तबाही,

बेरोजगारी, आसमान छूती मंहगाई,

छंटनी–तालाबंदी, तबाही–बर्बादी,

काले कानून, लाठी–गोली का प्रजातंत्र,

बिकता न्याय,

अराजकता, लूटपाट, गुण्डागर्दी,

दलाली, कमीशनखोरी, भ्रष्टाचार,

मण्डल–कमण्डल, दंगे–फसाद,

भ्रष्ट सरकार, झूठी संसद, नपुंसक विरोध

इनसे निजात पाने की राह क्या है?

इलेक्शन या इंकलाब?