क्या आपको अपने मोबाइल फ़ोन में से किसी बच्चे की आहों की आवाज़ आ रही है

गुरप्रीत

इस समय विश्व की मध्यवर्गीय आबादी में एप्पल कम्पनी का नया आई फ़ोन 7 चर्चा का विषय बना हुआ है। आई फ़ोन का नया मॉडल या अन्य मोबाइल, लैपटॉप, कारें आदि जैसी उपभोगी वस्तुओं के नये मॉडल आने और उन्हें ख़रीदने की दौड़ शुरू होना, उन्हें स्टेटस का प्रतीक बनाना – विश्व भर की मध्यवर्गीय आबादी को नीरस ज़िन्दगी के लिए एक खु़शनुमा, दिलचस्प व्यस्तता और बातचीत करने के लिए नये विषय मिल जाते हैं। दूसरों के मोबाइल के नये मॉडल देखकर जलना या फिर पुराने मॉडल देखकर खु़श होना, सैल्फि़याँ लेना और स्क्रीन पर उँगलियाँ मारते हुए घण्टों तक सोशल मीडिया, इण्टरनेट में डूबे रहना इसके साथ जुड़े पल उनकी ज़िन्दगी के अन्य खु़शी भरे पलों में से एक होते हैं। मौजूदा पूँजीवादी युग में फैले अलगाव ने एक तरफ़ मनुष्य को अन्य मनुष्यों से दूर कर दिया जिसके चलते लोग इंसानों की जगह वस्तुओं, साधनों में से खु़शियाँ खोजते हैं, दूसरी तरफ़ इस अलगाव ने जानने की मानवीय इच्छा को इतना दबा दिया है, हमें इन वस्तुओं के शोरूम की शीशों के पीछे चमकने से लेकर उनको ख़रीदने/इस्तेमाल करने तक का तो पता होता है लेकिन यह नहीं पता होता कि शोरूम के शीशों के पीछे तक पहुँचने के लिए ये वस्तुएँ कैसा सफ़र तय करती हैं।

अगर आपको मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था की कार्य-प्रणाली के बारे में पता है तो आप जानते होंगे कि ये महँगी और चमक-दमक वाली वस्तुएँ उन मज़दूरों के हाथों से बनकर निकलती हैं जो इन्हें ख़रीदना तो दूर बल्कि इन्हें बनाने की मेहनत के बदले दो वक़्त की पेट भर रोटी भी नहीं खा सकते। लाखों लोगों की उम्र वक़्त से पहले ही ढल जाती है, हड्डियाँ गल जाती हैं, शरीर अनेकों बीमारियों का शिकार हो जाता है और कई बे-वक़्ती मौत मारे जाते हैं। एप्पल के आई फ़ोन या और मोबाइल फ़ोन की बात करें तो शायद आपको चीन के उन कारख़ानों के बारे में पता हो जहाँ हज़ारों मज़दूर 12-14 घण्टे काम करते हैं, दड़बेनुमा कमरों में रहते हैं। उन्हें बेहतर ज़िन्दगी नहीं मिलती बल्कि कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाते हैं और उनमें से अनेकों कारख़ानों और होस्टलों की इमारतों से कूदकर ख़ुदकुशी कर लेते हैं। एशिया और अफ़्रीका के घरों में औरतें पीस रेट पर रोज़ाना 7-8 घण्टे काम करके मोबाइल के चार्जरों के लिए तारें बाँधने का काम करती हैं और इस काम के बदले उन्हें एक वक़्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती होती है। भारत में ऐसे काम के बदले औसतन सिर्फ़ 30-40 रुपये रोज़ाना कमाई होती है।

चलिए, आपको आपके मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप के शोरूम के शीशों के पीछे पहुँचने से पहले की एक और दासताँ सुनाते हैं। इन यन्त्रों में लीथीयम बैटरियाँ इस्तेमाल की जाती हैं और ये बैटरियाँ बनाने के लिए कोबाल्ट धातु का इस्तेमाल किया जाता है। इस कोबाल्ट का आधे से भी ज़्यादा हिस्सा डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कौंगो देश से आता है। इतने महँगे यन्त्रों के लिए सबसे अधिक कोबाल्ट बेचने वाला यह देश 2014 में मानवीय विकास सूचकांक में आख़री से दूसरे नम्बर पर था।

यह कोबाल्ट खदानों में से निकलता है और इन खदानों में कुछ बड़ी कम्पनियों की खदानें हैं और अनेकों छोटी निजी खदानें हैं। ये छोटी खदानें कौंगो के माइनिंग कोड एण्ड रेगूलेशन के अन्तर्गत नहीं आती, इसलिए न तो इन श्रमिकों को कोई संवैधानिक अधिकार हासिल हैं, ऊपर से ख़तरा भी बहुत ज़्यादा है। इन सैकड़ों फुट गहरी और कुछ फुट चौड़ी दमघोटू खदानों में श्रमिक अपनी जान की बाज़ी लगाकर उतरते हैं और घण्टों तक काम करके कोबाल्ट की कच्ची धातु निकालते हैं। जान का ख़तरा उठाकर इन खदानों में काम करने वालों को इतनी भी कमाई नहीं होती कि वे ग़रीबी से पीछा छुड़ा सकें।

इन खदानों में हवा निकासी का कोई प्रबन्ध नहीं होता, मज़दूरों के पहनने के लिए दस्ताने, गैस-मास्क आदि जैसे सुरक्षा साधन भी नहीं होते। कोबाल्ट की धूल में घण्टों तक साँस लेना फेफड़ों के लिए हानिकारक होता है और यहाँ साँस की बीमारियाँ आम हैं। इन मामलों में इन खदानों की विश्व की अन्य अनेकों कोयला और अन्य खनिज निकालने वाली खदानों के साथ साझापन है। लेकिन एक मामले में ये खदानें अन्य खदानों से भी बदतर हैं।

कौंगो की इन खदानों में 40,000 बच्चे काम करते हैं। इन बच्चों को दमघोटू खदानों में उच्च तापमान, वर्षा, तूफान में भी काम करना पड़ता है। इनमें 7-8 वर्ष के बच्चे भी हैं जिन्हें ख़ुद से अधिक भार उठाना पड़ता है। इन बच्चों में से अधिकतर की तेज़ी से काम न करने के लिए पिटाई भी होती है। एक 9 वर्ष के मज़दूर को अब से ही पीठ की समस्या शुरू हो गयी है। एक 14 वर्षीय बच्चा बताता है कि उसने 24 घण्टों की शिफ़्ट में भी खदान में काम किया है। एक 15 वर्ष का बच्चा बताता है कि इस काम की सारी कमाई सिर्फ़ खाने में ही ख़र्च हो जाती है। ये बच्चे मुश्किल से 2 डाॅलर प्रतिदिन कमाते हैं। तीन बच्चों की जुबानी कही यह कहानी हज़ारों बच्चों की दासताँ है।

हर वर्ष सैकड़ों मज़दूर इन खदानों में हादसों के दौरान मारे जाते हैं, कभी आग लगने के कारण और कभी खदान के खिसकने के कारण। हज़ारों बच्चे और मज़दूर अनेकों खदानों के खिसकने के कारण दबकर मारे जा चुके हैं और उनकी लाशें भी बाहर नहीं निकाली जा सकीं। धरती की छाती चीरकर उन्होंने जो खदानें बनायीं वे ही उनकी क़ब्रें बन गयीं। इन खदानों में न बच्चों की सुरक्षा के लिए उचित प्रबन्ध हैं और न ही कोई मुआवज़ा है।

कौंगो में ग़रीबी और बेरोज़गारी इतनी ज़्यादा है कि मज़दूरों के बच्चों को ये काम मज़बूरी में करना पड़ता है और उन्हें दूसरा कोई काम कम ही मिल पाता है। यह काम छोड़ने का मतलब होगा भूखे मरना। ऐसी हालत में इन बच्चों के लिए स्कूल जाकर पढ़ना तो बस एक सपना है। कुछ बच्चों, नौजवानों के हिस्से अगर पढ़ाई आती भी है तो एक समय उनको ग़रीबी के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। वे 1-2 वर्ष खदानों में काम करके फ़ीस जोड़ कर आगे पढ़ने के लिए खदानों की ओर मुँह करते हैं लेकिन उनमें से बहुत थोड़े ही दुबारा पढ़ाई शुरू कर पाते हैं।

इन खदानों से कोबाल्ट की कच्ची धातु निकालकर बड़ी-बड़ी कार्पोरेशनों को बेचा जाता है जो आगे संशोधन करके कोबाल्ट को मोबाइल, लैपटॉप आदि बनाने वाली कोबाल्ट एप्पल, सोनी, सामसुंग, माइक्रोसोफ़्ट जैसी 16 के क़रीब कम्पनियों को बेचते हैं। कोबाल्ट बेचने वाली कार्पोरेशनें और इसे ख़रीदकर अपने उत्पाद बनाने वाली कम्पनियाँ हर वर्ष अरबों की कमाई करती हैं, लेकिन धरती की छाती से कोबाल्ट निकालने वाले बच्चों के हिस्से आता है घण्टों तक काम करने पर भी ग़रीबी भरा बचपन, हडिड्यों और जोड़ों की बीमारियाँ, वक़्त से पहले उम्र का ढलना और अनेकों मामलों में हमेशा के लिए इन खदानों में दब जाना।

जब कुछ संस्थाओं द्वारा इन कम्पनियों के साथ उनके लिए कोबाल्ट पैदा करने वाले इन मज़दूरों और बच्चों के बारे में बात की गयी तो कइयों ने इसके बारे में कोई जानकारी होने से इनकार किया और कइयों ने कहा कि उनके लिए यह बता पाना सम्भव ही नहीं है कि हमारा कोबाल्ट कौंगो से आता है या नहीं। असल में यह पता करना कोई मुश्किल बात नहीं है, अनेकों संस्थाओं ने इसके बारे में जाँच-पड़ताल करके कौंगो का कोबाल्ट इन 16 कम्पनियों तक पहुँचने की पुष्टि की है। असल मामला इसकी ज़िम्मेदारी लेने और मज़दूरों को अच्छी सहूलियतें और वेतन देने का है जिसके लिए कोई भी कम्पनी तैयार नहीं है। क्योंकि ये सभी कम्पनियाँ मुनाफ़े के लिए काम करती हैं और इन बच्चों और मज़दूरों की ओर ध्यान देने का मतलब होगा अपने मुनाफ़े में से कटौती करना जिसके लिए ये कम्पनियाँ बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं।

अगर आपके दिल में कोई मानवीय संवेदना है तो अपनी दुख-दर्द भरी ज़िन्दगी और मौत द्वारा आपके लिए मोबाइल, लैपटॉप आदि जैसी सहूलियतें तैयार करने वाले ये बच्चे आपसे अपनी बेहतर ज़िन्दगी की भी उम्मीद रखते हैं। इनकी ज़िन्दगी इससे बेहतर नहीं होने वाली कि आप मोबाइल, लैपटॉप त्याग दो और न ही इससे कि ऐसे बच्चों के लिए किसी एनजीओ को चन्द रुपये देकर ख़ुद को तसल्ली देते रहो। इसके लिए ज़रूरी है कि लूट और मुनाफ़े पर टिकी पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को ही बदला जाये जो मुनाफ़े के लिए करोड़ों बच्चों की बलि लेता है, एक तरफ़ करोड़ों लोगों पर घण्टों तक श्रम का बोझ लादता है और दूसरी तरफ़ मुट्ठी भर मालिक वर्ग को अरबों की दौलत के ढेर पर बिठाता है। अगली बार अपने मोबाइल को ध्यान से कान लगाकर सुनो, इसमें से इन खदानों में अपनी ज़िन्दगी गँवा रहे बच्चों की आहों की आवाज़ आ रही है जो आपको यह मुनाफ़ाखोर व्यवस्था बदल देने के लिए ललकार रही है।

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2017


 

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