आधार : लूटतन्त्र की रक्षा के लिए जनता पर निगरानी और नियन्त्रण का औज़ार

मुकेश त्यागी

‘सबका साथ सबका विकास’ वाली सरकार ने फ़रमान जारी किया है कि बच्चों को स्कूल में मिड डे मील तभी मिलेगा जब उनके पास आधार होगा! इसी तरह राशन कार्ड पर मिलने वाला गेहूँ, चावल या चीनी लेने के लिए पहले आधार चाहिए, बुढ़ापा पेंशन लेनी हो या ट्रेन टिकट, बच्चों को स्कूल की परीक्षा देनी हो या मज़दूर को जि़न्दगी भर काम करने के बाद रिटायर होते वक़्त अपना ही जमा किया प्रोविडेण्ट फ़ण्ड या दलित-आदिवासी छात्रों को अपनी छात्रवृत्ति लेनी हो, आधार पहले चाहिए। बेहूदगी और असंवेदनशीलता इस हद तक है कि भोपाल गैस काण्ड के दर्दनाक बीमारियों से दरपेश पीड़ितों को अस्पताल में इलाज कराने के लिए अब पहले आधार दिखाना पड़ेगा और बँधुआ मज़दूर की मुक्ति में मदद अफ़सरशाही तब ही करेगी जब पहले वह आधार दिखाये। गर्भवती महिला या नवजात बच्चों के लिए भी किसी योजना का फ़ायदा लेना हो तो पहले महिला और बच्चे का आधार बनवाना ज़रूरी है। स्थिति यह है कि किसी भी सार्वजनिक सेवा का लाभ लेने के लिए पहले आधार होना ज़रूरी किया जा रहा है और फिर इसके बाद आधार का बायोमेट्रिक (जैविक) सत्यापन करना ज़रूरी कर दिया जा रहा है।

2009 में जब आधार बनाने की योजना शुरू की गयी थी तो कहा गया था कि इसमें पंजीकरण करवाना स्वैच्छिक होगा। उस वक़्त इसका मक़सद बताया गया था, लाभकारी कार्यक्रमों को ज़रूरतमन्द ग़रीबों-वंचितों तक पहुँचाना, छद्म लाभ लेने वालों को अलग करना, भ्रष्टाचार को कम करना, सरकारी योजनाओं को पारदर्शी और कुशल बनाना, आदि। जनता को यह समझाने की कोशिश की गयी कि सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए हमें अपने अधिकारों और निजता से कुछ समझौता तो करना ही पड़ेगा और हर व्यक्ति की पहचान और हर जानकारी सरकार के पास होने से वह ग़रीबों के फ़ायदे के लिए न सिर्फ़ सही नीतियाँ बना पायेगी बल्कि उनका फ़ायदा भी सही व्यक्तियों तक पहुँचा पायेगी जिससे ग़रीबी मिटाने में सफलता मिलेगी। लेकिन इतने सालों में इसके लागू होने का तजुर्बा बता रहा है कि यह असल में सर्वाधिक वंचित ज़रूरतमन्दों को लाभकारी योजनाओं के फ़ायदे से वंचित करने और सरकारी तन्त्र के करीबियों को फ़ायदा पहुँचाने का औजार तो है ही, साथ में यह नागरिकों पर निग़हबानी और जासूसी करने का तन्त्र है जो न सिर्फ़ हमारी निजता का हनन करता है बल्कि हमारे जनतान्त्रिक अधिकारों को कुचलने, गला घोंटने का फन्दा तैयार कर रहा है। न सिर्फ़ सारे सरकारी कल्याण कार्यक्रम, जिनमें पहले से ही बहुत सी खामियाँ थीं, अब पूरी तरह बरबाद किये जा रहे हैं बल्कि हमारे दैनन्दिन जीवन के हर क्षेत्र पर सरकारी तन्त्र का शिकंजा कसने और जनतान्त्रिक आज़ादी और अभिव्यक्ति का गला घोंटने की भी तैयारी की जा रही है।

आधार – ग़रीबों का समावेश नहीं, बहिष्कार

क्या वास्तव में आधार के उपयोग से सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता और कार्यकुशलता में इज़ाफ़ा हुआ है? इसके बारे में सामाजिक संगठनों और शोधकर्ताओं ने काफ़ी अध्ययन किये हैं और वस्तुस्थिति को इसके विपरीत पाया है। आन्ध्रप्रदेश के नागरिक आपूर्ति विभाग ने 2015 में इस बात की जाँच की कि एक चौथाई लोग राशन क्यों नहीं ले रहे हैं तो पाया कि 790 में से 290 का उँगलियों का सत्यापन असफल था और 93 का आधार डाटा ग़लत प्राप्त हो रहा था अर्थात उँगली की छाप तो सही मिलती थी लेकिन आधार की जानकारी और राशन कार्ड में जानकारी बेमेल थी। राजस्थान में निकाली गयी जवाबदेही यात्रा में भी काफ़ी लोगों ने बताया कि वे राशन या पेंशन नहीं ले पा रहे थे क्योंकि या तो उँगलियों का सत्यापन नहीं होता था या डाटा ग़लत मिलता था। बहुत से लोगों को राशन लेने के लिए 4-5 बार चक्कर लगाने पड़ रहे थे – कभी बिजली नहीं, कभी नेटवर्क नहीं तो कभी मशीन ठीक नहीं या उँगली का सत्यापन नहीं हुआ। बहुत जगह से नेटवर्क के लिए पेड़ों या छतों पर चढ़ने जैसी ख़बरें भी मिल रही हैं। असल में शुरू से ही मालूम था कि बायोमेट्रिक्स अर्थात उँगली की छाप और आँख की पुतली से व्यक्ति की पहचान की तकनीक पूरी तरह सही नतीजा नहीं देती। आमतौर पर भी इसमें 2-5% ग़लती होती है पर भारत के गर्म, धूलभरे, बिना एयरकण्डीशन वाले वातावरण में और ख़ासतौर पर कड़ी मेहनत कर घिसे हाथ वाले ग़रीब लोगों के मामले में तो यह क़तई भरोसे के काबिल नहीं है जबकि ख़ास यही लोग हैं जिन्हें लाभकारी योजनाओं की ख़ास ज़रूरत है। पर इन ज़रूरतमन्द मेहनतकश लोगों के लिए यह इनके लाभ मिलने का नहीं बल्कि वंचित होने का सबब बन गया है।

जहाँ तक आधार के द्वारा विभिन्न लाभकारी योजनाओं के स्थान पर सीधे कैश देने का सवाल है, उसमें आधार क्या कर सकता है, व्यक्ति की सही पहचान की बात को अगर मान भी लिया जाये तो। किस व्यक्ति को फ़ायदा दिया जाये, यह तय करने का काम तो उसी राजनीतिक-प्रशासनिक तन्त्र का है जिसका अब है। फिर यह कैश वितरण के लिए बैंक का एजेण्ट और एक बिचौलिया बन जाता है जो आधार के सत्यापन के ज़रिये कैश देता है। इसमें कुछ स्वचालित नहीं है और लूट-खसोट का तन्त्र न सिर्फ़ ज्यों का त्यों है बल्कि आधार के ज़रिये लाभ के अधिकारी को परेशान कर लाभ से वंचित करने के बहाने उनके पास और बढ़ जाते हैं। झारखण्ड, दिल्ली, छत्तीसगढ़, गुजरात सब राज्यों में जहाँ भी इसे ज़रूरी बनाया गया है वहाँ न सिर्फ़ इससे कार्यकुशलता घटी है, बल्कि यह सार्वजनिक सेवाओं से ग़रीब और असहाय व्यक्तियों – आदिवासियों, दलितों, वृद्धों, महिलाओं-विधवाओं, अपंगों – को वंचित करने का ज़रिया बन गया है तथा इन सेवाओं में भ्रष्टाचार और चोरी को बढ़ा रहा है।

आधार को ज़रूरी कर देने से हर सार्वजनिक सेवा प्राप्त करने के लिए आवश्यक शर्तें भी बढ़ा दी गयी हैं – बिजली, उँगली स्कैन करने वाली मशीन, इण्टरनेट और सर्वर का कनेक्शन। इनमें से एक भी उपलब्ध न हो या उँगली सत्यापित न हो या सत्यापित होने पर व्यक्ति का डाटा आधार की जानकारी से मेल न खाये तो व्यक्ति को सेवा प्राप्त करने से वंचित किया जा सकता है। सत्यापन की ही स्थिति यह है कि सबसे पहले पेंशन और रोज़गार गारण्टी योजना के लिए इसका उपयोग शुरू करने वाले आन्ध्रप्रदेश में 20-22% सत्यापन असफल होते हैं अर्थात हर 5 में से एक! अन्य राज्यों में असफलता का आँकड़ा 30% तक जाता है। राजस्थान में जब सामाजिक सुरक्षा पेंशन को आधार से जोड़ा गया तो जिनके पास आधार नहीं था, या जिनकी जानकारी में ग़लतियाँ थीं ऐसे 10 लाख से अधिक लोगों को मृत या डुप्लीकेट कहकर उनकी पेंशन बन्द कर दी गयी। लेकिन जब शिकायतों के बाद कुछ सामाजिक संगठनों ने जाँच की तो पाया गया कि इनमें से बहुसंख्या मृत नहीं बल्कि जीवित थे। लेकिन ये सब लोग अत्यन्त ग़रीब, वृद्ध, असहाय, विधवा महिलाएँ, आदि थे जिन्हें प्रशासनिक तन्त्र ने एक झटके में 500 रुपये महीना पेंशन से वंचित कर दिया।

आधार की शुरुआत के समय कहा गया था कि जिन के पास कोई पहचानपत्र नहीं हैं, वे कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं और आधार के द्वारा उन्हें पहचानपत्र देने से वे भी इन योजनाओं का लाभ ले सकेंगे। लेकिन आधार बनाते समय पहले से कोई पहचानपत्र होना ही एक आवश्यकता है तो इन लोगों का आधार भी नहीं बनता। हालाँकि परिचयदाता के द्वारा भी आधार देने का प्रावधान है लेकिन उस तरह से मात्र 2 लाख अर्थात नगण्य आधार ही आज तक जारी हुए हैं। इस तरह जो सबसे ग़रीब और योजनाओं के लाभ से वंचित लोग हैं वह पहले से ही इससे बाहर हैं। फिर राशनकार्ड हो या पेंशन हर जगह इन लोगों को फ़र्ज़ी घोषित कर इनके नामों को इन योजनाओं से काट दिया जा रहा है। इस प्रकार आधार ग़रीब लोगों के लिए समावेशी होने के बजाय उन्हें वंचित करने का औजार बन गयी है।

हम कुछ स्थितियों की कल्पना कर सकते हैं। 12 करोड़ स्कूली बच्चों को अब कहा जायेगा कि दोपहर का खाना लेने के लिए पहले आधार सत्यापन कराओ। स्कूल के शिक्षक और छात्र सब छोड़कर इस काम में लगेंगे। ऐसी जगह ढूँढें़गे जहाँ नेटवर्क मिलता हो। फिर भी अगर बिजली न हुई या सर्वर से कनेक्शन न मिला तो खाना नहीं मिलेगा। अगर कनेक्शन मिल गया तो भी जिस बच्चे का सत्यापन फेल हो जाये उसे कहा जायेगा कि आज खाना नहीं मिलेगा, आज भूखे रहो! अस्पताल में मरीज बीमारी से तड़प रहा है, लेकिन इलाज के लिए पहले आधार चाहिए, आधार नहीं तो मरीज को तड़पने या मर जाने के लिए छोड़ दिया जायेगा! कितनी निर्दय, अमानवीय, भयावह स्थिति होगी यह; और वह कैसी निरंकुश शासन व्यवस्था है जो ऐसी नीतियाँ निर्धारित करती है, फ़ैसले लेती है कि तड़पते मरीज के इलाज के लिए पहले आधार माँगा जाये? स्कूल में आये बच्चे को मिड डे मील देने के पहले उससे पहचान का सबूत देने को कहा जाये?

यह ऐसी शासन व्यवस्था ही कर सकती है जो सबको स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध न होने को समस्या नहीं मानती बल्कि उसकी नज़र में जो लोग बगै़र पहचान का सबूत दिये इलाज करवाना चाहते हैं, वे मरीज समस्या हैं। ऐसी हुकूमत के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन की अनुपलब्धता और बच्चों में बढ़ता कुपोषण समस्या नहीं है बल्कि बग़ैर पहचान का सबूत दिये स्कूल में मिड डे मील लेने आ गये बच्चे समस्या हैं। यह सिर्फ़ ऐसी हुकूमत कर सकती है जो ग़रीब, मेहनतकश लोगों की ग़रीबी का कारण वर्तमान व्यवस्था में निहित शोषण को नहीं मानती बल्कि उसकी नज़र में ये सब लोग काहिल, कामचोर, भ्रष्ट हैं जो मेहनती, प्रतिभाशाली पूँजीपतियों के पुरुषार्थ से कमाये धन को मिड डे मील, राशन और इलाज आदि के ज़रिये लूट लेना चाहते हैं। इसलिए यह हुकूमत ऐसी ताक़त चाहती है कि वह जब जिसे अपराधी या सन्देहास्पद माने, उसकी पहचान कर उसे ये सुविधाएँ लेने के बहाने इस तथाकथित लूट से रोक सके।

यह तो स्पष्ट ही है कि आधार का मक़सद जनता तक सुविधाएँ पहुँचाना नहीं है। तो फिर मक़सद क्या है? मक़सद है एक ऐसी निगरानी व्यवस्था जो देश के हर नागरिक को हर समय उसके चाहे बिना ही पहचान कर सके, उसकी हर गतिविधि पर नज़र रख सके और जहाँ, जब चाहे उसे किसी गतिविधि से रोक सके, उससे ख़फ़ा हो जाये तो उसका राशन, वेतन, पेंशन, स्कूल में बच्चे के दाि‍ख़ले, अस्पताल में इलाज, मोबाइल पर बात करने, इण्टरनेट के ज़रिये कुछ करने-पढ़ने, पुस्तकालय से कोई किताब लेने, कहीं जाने के लिए ट्रेन/बस का टिकट लेने अर्थात किसी भी सुविधा से वंचित कर सकने की ताक़त हासिल कर सके।

तकनीकी पहलू

आधार की वास्तविकता को समझने के लिए इसके कुछ तकनीकी पहलुओं पर भी ग़ौर कर लेना ज़रूरी है। हालाँकि यह बात कुछ हद तक मानी जा सकती है कि प्रशासनिक ज़रूरतों के लिए व्यक्ति की सही पहचान की जाये। लेकिन उसके लिए सबकी जैविक पहचान और अन्य सारी जानकारियाँ एक केन्द्रीय स्थान पर एकत्र करने और हर व्यवहार/लेन-देन के वक़्त उसे सत्यापित करने की क़तई कोई आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए दुनिया भर में, सभी विकसित देशों में भी विभिन्न कि़स्म के पहचान पत्र आदि जारी किये जाते हैं, जिनमें ज़रूरत भर की जानकारी रहती है लेकिन वह ख़ुद उस व्यक्ति के पास रहती है, न कि किसी एक जगह सरकार के पास; बल्कि जनवादी चिन्तन तो यही कहता है कि सरकार या प्रशासन का कोई भी अंग किसी भी नागरिक के बारे में ज़रूरत से बिल्कुल भी ज़्यादा सूचनाएँ इकठ्ठा न करे क्योंकि सत्ता की ताक़त के पास व्यक्ति के बारे में ज़रूरत से अधिक जानकारी हमेशा ग़लत मक़सद के लिए इस्तेमाल होने का ख़तरा बना रहता है। ख़ासतौर पर आधुनिक तकनीक के साथ एक केन्द्रीय जगह पर एकत्र जानकारी का भण्डार सबसे अधिक असुरक्षित है। यह अगर नेटवर्क पर भी उपलब्ध है तो फिर तो इसकी कोई सुरक्षा जैसी चीज़ होती ही नहीं। बैंकों से लेकर भारी सुरक्षा वाले अमेरिकी सीआईए के सूचना भण्डारों में बार-बार सेंध लग चुकी है। ऊपर से बायोमेट्रिक अर्थात जैविक सूचनाओं के साथ छेड़छाड़ करना, उनकी नक़ल करना, उनका नेटवर्क बीच में ही चोरी कर दूसरों द्वारा इस्तेमाल करना बेहद आसान है, बिना बहुत तकनीकी ज्ञान और महँगे उपकरणों के। यहाँ तक कि उँगलियों पर गोंद, बोरोलीन, मोम, आदि के प्रयोग से भी इनको स्कैन करने वाली मशीनों को भ्रमित किया जा सकता है। लेकिन सबसे ख़तरनाक है कि तकनीक के उपयोग से यह सब जानकारी बड़ी संख्या में बनायी जा सकती है और इसको बगै़र सम्बन्धित व्यक्तियों की उपस्थिति और जानकारी के प्रयोग किया जा सकता है। ख़ुद आधार अथॉरिटी इससे इंकार नहीं करती कि उसके द्वारा किये गये सत्यापन पर पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए जब यह अथॉरिटी किसी अन्य एजेंसी के साथ आधार द्वारा पहचान सत्यापन का समझौता करती है तो उसमें साफ़ लिखा जाता है कि इसमें सही सत्यापन की कोई गारण्टी नहीं है।

पिछले दिनों जो मामले सामने आये हैं, वह इस बात की पुष्टि करते हैं कि उपरोक्त बातें मात्र आशंकाएँ नहीं हैं, बल्कि वास्तविकता में यह सब किया जा रहा है। एक बड़े बैंक, एक्सिस बैंक और उसके दो पार्टनर संगठनों द्वारा एक व्यक्ति की जैविक सूचनाओं को रिकॉर्ड कर 10 महीने में उनके 397 बार इस्तेमाल का मामला सामने आया है। रिलायन्स जिओ के 6 सेल्समैन इन्दौर में आधार डाटा बेचते हुए पकड़े गये जिसको ख़रीदकर कोई दूसरे व्यक्ति के नाम पर सिम ले सकता है। 5 लाख बच्चों की सम्पूर्ण आधार जानकारी एक वेबसाइट पर खुलेआम उपलब्ध पकड़ी गयी है। क्योंकि आधार अथॉरिटी अब विभिन्न संस्थाओं को आधार सत्यापन और सूचना प्राप्त करने की सुविधा प्रदान कर रही है तो इन सब को मौक़ा है कि वह हमारी जानकारी-सहमति के बग़ैर इसे एकत्र कर इसका दुरुपयोग करें। इसमें किसी व्यक्ति के नाम पर सिम कार्ड लेने, खाता खोलने से लेकर कोई भी आपराधिक गतिविधि शामिल हो सकती है, जिसका नतीजा बाद में निर्दोष व्यक्ति को भुगतना पड़े। दूसरे, इन जानकारियों का इस्तेमाल बहुत सारे लोगों के स्थान पर इन गिरोहों द्वारा विभिन्न सार्वजानिक योजनाओं का लाभ चोरी से लेने में भी किया जा सकता है।

आधार डाटा के असुरक्षित होने से भी ज़्यादा ख़तरनाक है कि आधार अथॉरिटी अब कुछ निजी कम्पनियों को इस पर आधारित नये कारोबारी तकनीकी मॉडल बनाने में मदद कर रही है। जैसे इण्डिया स्टैक नामक कम्पनी का दावा है कि वह हाई रेसोल्यूशन कैमरा से बायोमेट्रिक पढ़ सकती है और इसके इस्तेमाल से भीड़ में से ही, यहाँ तक कि किसी वीडियो में से भी, आधार के द्वारा व्यक्ति की पहचान कर उसकी पूरी जानकारी तुरन्त मुहैया करा सकती है जिसमें उसका आधार डाटा ही नहीं, उसकी आर्थिक गतिविधियों का इतिहास, उसका पुलिस रिकॉर्ड, कारोबार-नौकरी आदि का ब्यौरा भी शामिल होगा। यह कम्पनी इस सुविधा को अब अन्य कॉर्पोरेट को बेचने का विज्ञापन कर रही है। लेकिन यह अन्दाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि सरकारी एजेंसियाँ इसका इस्तेमाल नागरिकों पर निगरानी करने और राजनीतिक विरोधियों पर नियन्त्रण और दमन का शिकंजा कसने के लिए किस तरह कर सकती हैं।

आधार, कैशलेस, डिजिटल – फासीवादी ढाँचे के अंग

अगर आधार को कैशलेस और डिजिटल के वर्तमान अभियान के साथ जोड़कर देखा जाये तो स्थिति और भी स्पष्ट होगी। मोबाइल के द्वारा हर व्यक्ति कहाँ जाता है प्रत्येक स्थान का ब्यौरा मौजूद है, डिजिटल के द्वारा उसकी हर गतिविधि – क्या ख़रीदा, क्या खाया, क्या किया, किससे मिला, क्या लेन-देन, सौदा किया, और उससे भी बढ़कर क्या किताब-पत्रिका पढ़ी, कौन सी वेबसाइट पर गया, कौन से विचार के लेख पसन्द-नापसन्द किये, क्या टिप्पणियाँ कीं – सब पर नज़र रखी जा सकती है। इन सब जानकारी के आधार पर उस पर दमन की नकेल ही नहीं कसी जा सकती, बल्कि इस जानकारी को ग़लत सन्दर्भों में जोड़कर उसको बदनाम करने का अभियान भी चलाया जा सकता है। ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिए – कलकत्ता या कोचीन का कोई व्यक्ति अहमदाबाद में है और व्हाट्सप्प के ज़रिये उसके फ़ोटो और स्थान के साथ यह ख़बर फैला दी जाये कि उसने फ़लाँ-फ़लाँ तारीख़ को बीफ़ खाया/ख़रीदा था; नतीजा क्या होगा? और यह कोरी कल्पना नहीं है, इस तरह की तमाम चीज़ें राजनीतिक विरोधियों और कुछ समुदायों के व्यक्तियों के बारे में आज भी ज़ोरों से फैलाई जा रही हैं, लेकिन आधार, कैशलेस और डिजिटल के मेल से जो किया जा सकेगा वह और बहुत ज़्यादा ख़तरनाक है।

यहाँ तक तो बात हुई व्यक्तियों के सन्दर्भ में। समूहों के सन्दर्भ में देखें तो आधार, कैशलेस और डिजिटल के मेल से सत्ताधारियों के लिए किसी भी जनसमूह के जीवन को नियन्त्रित ही नहीं पूरी तरह बाधित करने की भी शक्ति मिल जायेगी। अभी ही हम विभिन्न स्थानों पर मोबाइल या इण्टरनेट बन्द कर देने की ख़बरें पढ़ते हैं। लेकिन इसके बाद सत्ता के लिए मुमकिन होगा पूरे समूहों के तमाम सम्पर्कों को काट देना, उनके खातों पर रोक लगाकर उनके साधनों से, कुछ ख़रीद पाने तक से रोक देना, अर्थात जीवन की ज़रूरी सुविधाओं से वंचित करना। ख़ासतौर पर भारत की धर्म, जाति, आदि पूर्वाग्रहों-नफ़रत आधारित शासक वर्ग की राजनीतिक ताक़तों और उनके संरक्षण वाले गिरोहों के हाथ में ऐसे केन्द्रीय डाटा भण्डार बहुत ख़तरनाक सिद्ध हो सकते हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि 1984 में दिल्ली और 2002 में गुजरात दोनों जगह शासक पार्टियों ने पुलिस-प्रशासन के संरक्षण में जिन भयानक हत्याकाण्डों को अंजाम दिया था, उनमें चुन-चुनकर व्यक्तियों और उनकी सम्पत्ति को निशाना बनाया गया था और इसमें वोटर लिस्ट और अन्य सरकारी जानकारियों का इस्तेमाल हुआ था। 1930 के दशक में यहूदियों का जनसंहार शुरू करने के पहले जर्मन नाजियों ने उन्हें भी अपना और अपनी कारोबार-सम्पति का पंजीकरण कराने के लिए कहा था जिससे नाज़ी हुकूमत उनके लिए उचित व्यवस्था कर सके। बाद में इसका इस्तेमाल किस तरह किया गया, यह हम सब अच्छी तरह जानते हैं।

यहीं पर हम उच्चतम व अन्य न्यायालयों की भूमिका पर भी ग़ौर करते हैं जिनसे बहुत से जनवादी-लिबरल ही नहीं, बल्कि वामपन्थी भी जनवादी अधिकारों की हिफ़ाज़त की उम्मीद रखते हैं। यह सच है कि उच्चतम न्यायालय ने कई बार सरकार को कहा है कि वह आधार सूचना की उचित सुरक्षा का क़ानून बनाये बग़ैर इसे आगे न बढ़ाये और इसे किसी भी सार्वजनिक सेवा के लिए आवश्यक न करे। लेकिन सरकार जब ऐसा करती है तो उसको रोकना तो छोड़िए, उच्चतम न्यायालय उसकी सुनवाई के लिए भी तैयार नहीं होता, अभी तक ऐसी सुनवाई नहीं हुई है। उलटे ख़ुद इस न्यायालय ने ही मोबाइल सिम कार्ड के लिए आधार सत्यापन को ज़रूरी करने का आदेश भी दे दिया है अर्थात इस आधार पर सुनवाई जब होगी तब भी क्या होगा यह स्पष्ट है। जहाँ तक संसद का सवाल है उसमें तो अक्सर होने वाली फ़र्ज़ी संसदीय बहसों से भी छुटकारा पा लिया गया और आधार क़ानून को मनी बिल के रूप में लोकसभा में पेश करके पास करने की रस्म अदायगी कर दी गयी। इस सबसे यह समझा जा सकता है कि वर्तमान पूँजीवादी राज्यसत्ता के किसी अंग से इसे कोई चुनौती की उम्मीद निहायत बेवक़ूफ़ाना होगी। संविधान और जनतन्त्र में भरोसा रखने वालों के लिए यह जानना भी बेहतर होगा कि आधार क़ानून के अनुसार आधार अथॉरिटी को ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि उसके डाटा में सेंध लगने पर वह जनता को सूचित करे या जिनका डाटा चोरी हो गया है उन्हें ही बताये। और उसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का कवच भी दिया गया है जिससे सूचना अधिकार के तहत पूछने पर भी वह बताने से मना कर सकती है!

अतः इसके राजनीतिक निहितार्थ को देखें तो भारत में पहले ही पूँजीवादी शासक वर्ग फासीवाद की ओर तेज़ी से क़दम बढ़ा चुका है, जनता के जनवादी अधिकारों और अभिव्यक्ति पर तेज़ी से हमले कर रहा है, पूरे मेहनतकश वर्ग और ख़ासतौर पर अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, दलितों और महिलाओं के अधिकारों पर शिकंजा कस रहा है। इस स्थिति में उसके आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक आक्रमण के साथ आधार, कैशलेस, डिजिटल का यह अभियान उसके लिए जनता पर निगरानी और नियन्त्रण के एक सशक्त प्रशासनिक ढाँचे को खड़ा करने के ज़रिये के रूप में चलाया जा रहा है।

मज़दूर बिगुल, मार्च 2017

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