बैंक कानून में संशोधन अध्यादेश : हज़ारों करोड़ कर्ज़ लेकर डकार जाने वालों का बोझ उठाने के लिए जनता तैयार रहे

मुकेश त्यागी

पहले से चल रही चर्चा के मुताबिक़ ही 5 मई को केन्द्र सरकार ने बैंकिंग नियमन क़ानून में संशोधन का अध्यादेश जारी कर दिया। इसका मक़सद बैंकों के भारी मात्रा में बकाया क़र्ज़ों या एनपीए का तेज़ गति से समाधान करना बताया गया है। ऐसे क़र्जे़ इस वक़्त कहीं 6 लाख करोड़ तो कहीं 8 लाख करोड़ रुपये के बताये जाते हैं, लेकिन यह संख्या वास्तव में इससे कहीं ज़्यादा है क्योंकि इसमें बकाया ब्याज़ और बट्टे खाते में डाले जा चुके क़र्ज़ की रक़म सम्मिलित नहीं है। इसमें से 88% से अधिक रक़म बड़े कॉर्पोरेट ने दबाई हुई है। अब बताया जा रहा है कि इनमें से 50 सबसे बड़े क़र्ज़दारों के मामले हल करना सरकार की प्राथमिकता है। इस लेख में हम इस अध्यादेश को लाने के मक़सद, इसके असर और कार्य-पद्धति के साथ ही बैंकों के एनपीए के बढ़ने के मूल कारणों, शासकों द्वारा उसके समाधान के उपायों और मेहनतकश लोगों के जीवन पर उसके असर की भी चर्चा करेंगे।
कितना है डूबा क़र्ज़?
इस न चुकाये गये बकाया क़र्ज़ की असली रक़म समझने के लिए हमें इस वर्ष के बजट से पहले प्रस्तुत आर्थिक सर्वे पर एक नज़र डालनी होगी। सर्वे में बताया गया था कि ‘तथ्य यह है कि बकाया क़र्ज़ की बड़ी मात्रा बहुत थोड़े क़र्ज़दारों के पास है। मात्र 50 कम्पनियों के पास इसका 71% है जिनमें से हरेक के पास औसतन 20 हज़ार करोड़ का बकाया है, जिसमें से भी सबसे बड़ी 10 कम्पनियों में प्रत्येक के पास औसतन 40 हज़ार करोड़ रुपये बकाया हैं।’ अर्थात सबसे ज़्यादा चर्चा वाला विजय माल्या तो नौ हज़ार करोड़ के साथ छुटभैया चोर ही है! इस तरह हिसाब लगाया जाये तो इन 50 बड़े क़र्ज़दारों के पास ही 10 लाख करोड़ का बकाया है जो कुल रक़म का सिर्फ़ 71% हिस्सा है। मतलब कुल बकाया न चुकाये गये क़र्ज़ की रक़म 14 लाख करोड़ तक जा पहुँचती है!
अध्यादेश का मक़सद
इस अध्यादेश का मक़सद भी आर्थिक सर्वे से ही पता चल जाता है। इसमें आगे कहा गया था कि ‘साथ ही कई अहम कारणों की वजह से इन बड़े क़र्ज़दारों से वसूली करना बड़ा मुश्किल है!’ तो फिर क्या करना चाहिए? बीमारी का इलाज भी यहाँ ही बता दिया गया था, ‘शीर्ष 100 क़र्ज़दारों में से 33 पर बकाया रक़म को आधा करना होगा, 10 का बकाया 3 चौथाई तक कम करना होगा और शेष 57 का बकाया 3 चौथाई से भी ज़्यादा घटाना होगा।’ इस बात की वजह एक उदाहरण से समझ सकते हैं – भूषण स्टील नाम की कम्पनी, जो पहले भी एक बार फ्रॉड कर चुकी थी, को बैंकों ने जमकर क़र्ज़ दिया जिसकी रक़म अब 46 हज़ार करोड़ है लेकिन इसकी बाज़ार क़ीमत अब सिर्फ़ 2 हज़ार करोड़ है। ऐसे कई उदाहरण हैं।
लेकिन समस्या थी कि यह कम करने का काम किया कैसे जाये? वह उपाय इस अध्यादेश द्वारा किया गया है। संशोधन द्वारा क़ानून में यह बात जोड़ी गयी है कि अब सरकार या रिज़र्व बैंक बैंकों को निर्देश जारी कर सकेंगे कि वे बकाया क़र्ज़ के मामले को जल्दी, निश्चित समय सीमा के अन्तर्गत सुलझाएँ। इस काम का निर्देशन और पड़ताल रिज़र्व बैंक द्वारा बनाई समिति करेगी जिसे बैंक रिपोर्ट करेंगे। इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी? बताया जा रहा है कि यूनाइटेड बैंक, सिण्डिकेट बैंक तथा आईडीबीआई बैंक के प्रबन्धकों पर मुक़दमे और गिरफ़्तारी के बाद सरकारी बैंकों के शीर्ष प्रबन्धक भ्रष्टाचार के मामलों से बचने के लिए क़र्ज़दारों से बात करने और फ़ैसला लेने में हिचक रहे थे। अब सरकार या रिज़र्व बैंक के निर्देश से फ़ैसला लेने में उन्हें डर नहीं रहेगा। वास्तव में क़र्ज़ का मामला कैसे सुलझाया जायेगा यह आज के अध्यादेश का हिस्सा नहीं है लेकिन इस काम में ‘भ्रष्टाचार’ के मामलों का डर अपने आप में ही काफ़ी है यह बताने के लिए कि क्या किया जाने वाला है! साथ ही सरकारी और बैंक अफ़सरों के पहले के बयान भी इस बारे में काफ़ी कुछ बताते हैं। इकनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया ने इस अध्यादेश के लिए सरकार से बहुत मिन्नत-आरजू की थी और इसकी प्रधान अरुन्धति भट्टाचार्य ने अब कहा है कि इस क़ानून से ‘पारदर्शिता’ बढ़ेगी तथा बकाया क़र्ज़ों से निपटने के मामलों में बैंकों का भरोसा बढ़ेगा!
ख़ैर भारतीय बैंकों के प्रबन्धकों से तो असली बात कहने की अपेक्षा करना ही ग़लत है, लेकिन इस अध्यादेश के बारे में पूछे जाने पर होंगकोंग एण्ड शंघाई बैंक के भारत के मुखिया स्टुअर्ट मिल्नी ने यह कहा, ‘बैंकिंग उद्योग का मूल सवाल है कि (इन क़र्ज़ों को कम करने से होने वाला) घाटा सहन करने के लिए पूँजी कहाँ से आयेगी। भारतीय बैंकों के प्रबन्धक बहुत चतुर हैं, उन्हें अपने होने वाले घाटे का पूरा अन्दाज़ा है। हम यहाँ 90 अरब डॉलर के घाटे की बात कर रहे हैं जो एक विशालकाय संख्या है। रिज़र्व बैंक को वह अधिकार दिया गया है जो उसके पास पहले भी था अर्थात बैंक को क़र्ज़दार पर दिवालिया क़ानून को लागू करने का निर्देश देना। पर समस्या यह है कि बैंकों के पास ‘मुण्डन’ (प्रबन्धकीय भाषा में इसे घाटा नहीं बल्कि हेअरकट या मुण्डन कहा जा रहा है!) के लिए पूँजी कहाँ से आये; और इसका कोई सरल जवाब नहीं, ज़बरदस्त घाटा उठाना ही पड़ेगा।’
तो सच सामने है कि बैंकों को कहा जा रहा है कि वे घाटा उठाकर इन बकायादार कम्पनियों को राहत दें। यह कैसे किया जायेगा? पहली बात तो यह कि नये नियम के अन्तर्गत बैंक को एक तय वक़्त में क़र्ज़दार के साथ समझौता करना होगा अर्थात दबाव बैंक के ऊपर है क़र्ज़दार पर नहीं! साफ़ है कि बैंक को काग़ज़ों में थोड़ा-बहुत मोलभाव दिखा कर क़र्ज़दार द्वारा प्रस्तावित रक़म पर समझौता करने का दबाव पड़ने वाला है; जैसे विजय माल्या 6 हज़ार करोड़ रुपये का ऑफ़र दे रहा है तो मूल-सूद का क़रीब इतना ही रुपया बैंक को छोड़ देना पड़ेगा। इसे प्रबन्धकीय भाषा में ‘हेयरकट’ या मुण्डन कहा जा रहा है। बैंकों को कहा गया है कि मामला निपटाने के लिए वह ‘मुण्डन’ को तैयार रहें। अगर बैंक तय समय में मामला नहीं निपटाते तो नये क़ानून में रिज़र्व बैंक या सरकार उनको निर्देश जारी कर सकेगी कि इतने प्रतिशत ‘मुण्डन’ करवा लें। असल में बैंक प्रबन्धन को इससे कोई ऐतराज़ भी नहीं, उन्हें सिर्फ़ यह भरोसा चाहिए था कि उन्होंने यह क़र्ज़दार से रिश्वत लेकर नहीं बल्कि रिज़र्व बैंक या सरकार के निर्देश पर किया। लेकिन इसमें भी अगर कोई बैंक राजी न हो तो यह भी प्रावधान कर दिया गया है कि कुल क़र्ज़ के 60% वाले बैंकों का फ़ैसला बाक़ी बैंकों को भी मानना होगा।
अध्यादेश का प्रभाव
अध्यादेश का असर भी तुरन्त शुरू हो गया। मिन्ट की 8 मई की रिपोर्ट के अनुसार एसबीआई के नेतृत्व में बैंक जल्दी ही एस्सार स्टील (45 हज़ार करोड़) और भूषण स्टील के क़र्ज़ के पुनर्गठन का फ़ैसला लेने के लिए तैयार हैं जिसमें ब्याज़ दर घटाना, किश्तों के लिए और समय देना, क़र्ज़ को कम ब्याज़ वाले बाण्ड्स में बदलना शामिल है। कुछ और बड़ी कम्पनियाँ जो इस क़तार में हो सकती हैं — वीडियोकॉन (33 हज़ार करोड़), एस्सार पॉवर (11 हज़ार करोड़), जयप्रकाश समूह की 3 कम्पनियाँ (कुल 48 हज़ार करोड़), नवीन जिन्दल की जिन्दल स्टील (46 हज़ार करोड़) और अनिल अम्बानी की रिलायंस कम्युनिकेशन (42 हज़ार करोड़), आदि।
दूसरा तरीक़ा होगा कि बैंक क़र्ज़दार कम्पनी की सम्पत्ति को बेचे। पर पहले तो इतने लम्बे समय में कम्पनी के मालिक उसकी क़ीमती सम्पत्ति को कुशलता से चोरी कर अपने दूसरे नामों पर ट्रांसफ़र करा चुके होते हैं, इसलिए ज़्यादा कुछ मिलता नहीं है जैसे भूषण स्टील का मामला है। उस पर निश्चित वक़्त की हद लगा देने से और भी कम क़ीमत मिलेगी। इस स्थिति में बहुत सी निजी वित्तीय कम्पनियाँ इन सम्पत्तियों को औने-पौने दाम ख़रीद कर भारी मुनाफ़़ा कमायेंगी और बैंकों को घाटा सहना पड़ेगा। यह काम पहले ही चल रहा है, पर अब और तेज़ होगा। इसके लिए कई वित्तीय पूँजीपति इस काम के लिए कम्पनियाँ पहले ही बनाकर तैयार बैठे हैं जिन्हें एसेट रिकवरी कम्पनी (एआरसी) कहा जाता है। यह भी हो सकता है कि क़र्ज़दार ख़ुद ही दूसरे नाम से अपनी सम्पत्ति को इन गिरी हुई क़ीमत पर ख़रीदें जबकि इनकी ऊँची क़ीमत नाम पर उन्होंने पहले बड़ा क़र्ज़ लिया था। इकोनॉमिक टाइम्स ने 14 मार्च को एक रिपोर्ट में कहा कि सरकारी बैंकों ने मार्च के महीने में ही 20 हज़ार करोड़ के क़र्ज़ को बिक्री पर लगाया है, लेकिन इसमें से सिर्फ़ 10% के ही बिकने की उम्मीद है क्योंकि इन क़र्ज़ों के लिए मिलने वाला बाज़ार भाव बहुत कम, अक्सर 50% ही रहता है और फ़िलहाल स्थिति विकट है, क्योंकि प्रबन्धक बाद में सरकारी एजेंसियों द्वारा जाँच के डर से कम क़ीमत पर बिक्री का फ़ैसला लेने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन अभी तक डरे जो बैंक प्रबन्धक इसमें हिचक रहे थे, उनका वह डर अब अभयदान मिलने के बाद न रहेगा।
एआरसी कैसे काम करती है। इसका एक उदाहरण पिछले दिनों हुआ क़र्ज़ का एक सौदा है। भारती शिपयार्ड का 10 हज़ार करोड़ का क़र्ज़ एनपीए हुआ। अब यह क़र्ज़ 3 हज़ार करोड़ में एडेलवीस एआरसी को बेच दिया गया जिसे शुरू में सिर्फ़ 450 करोड़ देने हैं, बाक़ी किश्तों में। कम्पनी का नाम बदल दिया गया है और 7 हज़ार करोड़ सर से उतरे तो यह मुनाफ़़ा भी कमाने लगेगी! कम्पनी की क़ीमत बढ़ेगी, तो पूरी कम्पनी या बढ़े दाम पर शेयर बेचकर दाँव लगाने वाले वित्तीय पूँजीपति तगड़ा मुनाफ़़ा कमायेंगे। पर बैंक का 7 हज़ार करोड़ का बट्टे खाते में जाने वाला नुक़सान? वह तो बस ‘मुण्डन’ कहलायेगा, पर इस तरह 10 हज़ार करोड़ एनपीए तो कम हो गया न!
तीसरा तरीक़ा, सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के द्वारा इन सम्पत्तियों को ख़रीदा जाना। पता चलेगा कि बेकार, सड़-गल चुकी इकाइयाँ महँगे दाम में इनके गले बाँध दी जायेंगी। अध्यादेश जारी होते ही ऐसी ख़बरें भी आनी शुरू हो गयी हैं। बिज़नेस स्टैण्डर्ड की 7 मई की ख़बर के अनुसार — ‘सार्वजनिक क्षेत्र की स्टील उत्पादक कम्पनी सेल ने संकेत दिये हैं कि अगर इस्पात क्षेत्र की फँसी हुई सम्पत्तियों की पेशकश की जाती है तो वह उसे लेने की पहल कर सकती है। अगर फँसी हुई सम्पत्तियों की नीलामी की जाती है तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सार्वजनिक उपक्रमों में पहले सम्पर्क कर सकते हैं। माना जा रहा है कि बैंक रणनीतिक क़र्ज़ पुनर्गठन में शामिल कम से कम दो स्टील कम्पनियों का प्रबन्धन सौंपने के विकल्प तलाश रहे हैं। लेकिन इस दिशा में अब तक बात नहीं बन पायी है।’ इसी का एक और रूप अक्टूबर 2016 में सबसे बड़े क़र्ज़दारों में से एक एस्सार के मामले में देखने को मिला था। इसमें पहले सरकारी कम्पनी ओएनजीसी ने रूसी कम्पनी रोसनेफ़्ट में निवेश किया, फिर उस पैसे से रोसनेफ़्ट ने एस्सार को ख़रीद लिया। एस्सार का क़र्ज़ ख़त्म, पर जमा करने वाली असल में एक सरकारी कम्पनी थी।
एक और तरीक़ा – क़र्ज़ को इक्विटी या शेयर में बदलना एक चतुराई भरा तरीक़ा है। इसमें कहा जायेगा कि क़र्ज़ लेने वाली कम्पनी के मालिकाने का एक बड़ा हिस्सा बैंक के नाम कर दिया गया। पर असल खेल यह होगा कि शेयर किस क़ीमत पर ट्रांसफ़र हुए। शेयर बाज़ार में तो हम जानते ही हैं कि कैसे क़ीमतें उठायी और गिरायी जाती हैं। पता यह चलेगा कि बैंकों के नाम ये शेयर वास्तविक से कहीं ऊँची क़ीमत पर ट्रांसफ़र करके क़र्ज़ चुकता कर दिया गया और बाद में क़ीमत गिरने के बाद बहुत कम वसूली हुई।
ऊपर हमने एसबीआई की अध्यक्ष द्वारा इस अध्यादेश की प्रशंसा का जि़क्र किया था। उनकी प्रशंसा वाजिब भी है क्योंकि सिर्फ़ उनके ही बैंक ने 2017 के बाद से 4 लाख करोड़ के क़र्ज़ बट्टे खाते में डाले हैं और अभी और बहुत से डालने हैं। लेकिन अब वह अकेली नहीं हैं, उन्हें कोई डरने का कारण नहीं है क्योंकि उन्हें अब रिज़र्व बैंक और सरकार का वरदहस्त हासिल है। यही अरुन्धति भट्टाचार्य थीं जिन्होंने किसानों के कुछ हज़ार की क़र्ज़ माफ़ी पर क़र्ज़दारों के क़र्ज़ चुकता करने का ‘अनुशासन’ ख़राब होने की भारी चिन्ता ज़ाहिर की थी, लेकिन हज़ारों करोड़ के क़र्ज़दारों को छूट मिलने में इन्हें कोई चिन्ता की बात नज़र नहीं आती! उन्होंने फिर से टीवी पर इंटरव्यू दिये हैं जिसमें वह कहती हैं कि इनमें बिरले लोग ही जानबूझकर क़र्ज़ नहीं चुकाते, बल्कि अर्थव्यवस्था के कारणों से इसके लिए मजबूर हो जाते हैं। इसलिए इन्हें राहत देना ‘राष्ट्रहित’ में है।
बैंकों के घाटे का बोझ कौन उठायेगा?
कुल मिलाकर, इन बड़े कॉर्पोरेट क़र्ज़दारों को आसानी से इन क़र्ज़ों के जाल से छुटकारा दिलाने के नाम पर सरकारी बैंक और कम्पनियाँ इस क़र्ज़ का एक बड़ा हिस्सा अपने सर पर ले लेंगी। लेकिन यह घाटा आखि़र में बढ़ते टैक्सों और क़ीमतों के द्वारा देश की ग़रीब मेहनतकश जनता से ही वसूल किया जायेगा। जबकि क़र्ज़ मुक्त कॉर्पोरेट फिर से नये क़र्ज़ लेने (और फिर हज़म कर लेने!) के पात्र बन जायेंगे। पूरी तरह सड़ती और परजीवी पूँजीवादी व्यवस्था में यही कहानी बार-बार दोहरायी जाती है। बैंकों को जो घाटा होगा उसकी भरपाई आखि़र हम लोग ही करेंगे, बढ़ते बैंक चार्ज, घटते डिपाजिट ब्याज़ से सिर्फ़ बैंक ग्राहक ही नहीं, बल्कि बैंक में जमा करने लायक़ कमाई न करने वाले भी क्योंकि सरकार बैंक को और पूँजी देगी। तो आम मेहनतकश लोग और टैक्स दें, बढ़े रेल भाड़े दें, बढ़ी क़ीमतें दें, ‘राष्ट्रवादी’ बनें! सरकार पहले ही बैंकों को देने के लिए 70 हज़ार करोड़ रुपये का प्रावधान कर चुकी है जिसे अरुन्धति भट्टाचार्य ने ऊँट के मुँह में जीरा की संज्ञा दी है।
अब हम इस बढ़ते एनपीए के कारणों पर नज़र डालते हैं। बड़ा मामला होने से पूँजीवादी मीडिया तन्त्र और उसके ‘विश्लेषक’ भी इसकी चर्चा करने से बच नहीं पाते लेकिन वह इसे भ्रष्टाचार या क्रोनी कैपिटलिज़्म (भ्रष्ट पूँजीवाद, जैसे कोई सच्चा, ईमानदार पूँजीवाद भी होता है!) से पैदा समस्या बताकर इसके मूल कारणों को छिपा जाते हैं और पूँजीवादी व्यवस्था के नियमों के सुधार और भ्रष्ट व्यक्तियों के खि़लाफ़ जाँच/अभियोग को इसका हल बताते रहते हैं। कुछ हद तक भ्रष्टाचार की इसमें भूमिका है भी। लेकिन वह इसका मूल कारण नहीं। सिर्फ़ सरकारी बैंकों में ही नहीं, मुनाफ़़े के लिए चलने वाले आईसीआईसीआई, एक्सिस, यस, आदि निजी बैंकों में भी एनपीए में भारी वृद्धि हुई है। फिर इसका मूल कारण क्या है?
मार्क्स ने पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था के विश्लेषण में दिखाया है कि प्रत्येक पूँजीपति के लिए बाज़ार में अपने हिस्से और मुनाफ़़े को बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी है कि वह निरन्तर उत्पादक शक्तियों का विकास-विस्तार करें तथा कम लागत पर अधिक उत्पादकता वाले उद्योग लगाते रहें। हर पूँजीपति क्योंकि अपने लिए सोचता है और पूरी अर्थव्यवस्था में बाज़ार में उत्पादित माल की माँग और सभी पूँजीपतियों द्वारा कुल उत्पादन में मेल के लिए योजना नहीं होती इसलिए कुछ समय बाद ही बाज़ार की माँग से ज़्यादा उत्पादन या अतिउत्पादन की स्थिति आ जाती है। ध्यान रहे कि यह समाज की आवश्यकता से अधिक नहीं बल्कि माँग अर्थात समाज में क्रय शक्ति से अधिक उत्पादन की स्थिति है। इस संकट में कुछ पूँजीपतियों का दिवालिया हो जाना एक स्वाभाविक नतीजा होता है। कुछ उद्योगों के इस तरह बन्द हो जाने पर यह प्रक्रिया पुनः जारी होकर फिर कुछ समय बाद इसी तरह फिर से चक्रीय संकट की स्थिति बनती है। लेकिन हाल के दशकों में यह संकट चक्रीय न रहकर निरन्तर चलने वाला संकट बन गया है अर्थात एक संकट से निकलने का प्रयास एक और नये, और गहरे संकट की स्थिति पैदा कर रहा है।
2001-02 के समय में जो आर्थिक संकट का दौर था उसमें पूँजीवादी देशों के केन्द्रीय बैंकों द्वारा ब्याज़ दरों को कम कर पूँजीपतियों को राहत देने की नीति अपनायी गयी थी जिसे सस्ती मुद्रा नीति भी कहा जाता है। इससे जो सस्ता धन क़र्ज़ के रूप में उपलब्ध हुआ उससे ज़मीन-मकान और शेयर-बाण्ड्स जैसी वित्तीय सम्पत्तियों के दामों में भारी वृद्धि द्वारा एक नक़ली सम्पन्नता का माहौल बनाया गया जिससे कुछ समय तक बाज़ार में माँग बढ़ी ख़ास तौर पर किश्तों पर ख़रीदारी द्वारा। पूँजीपतियों को भी ख़ूब सस्ता क़र्ज़ निवेश के लिए मिला और उन्होंने उत्पादक क्षमता में निवेश भी किया। लेकिन कुछ साल बाद ही इससे पैदा हुए तीव्र आर्थिक संकट ने इस माँग को चौपट कर दिया। अभी रिज़र्व बैंक के अनुसार भारतीय उद्योग स्थापित क्षमता के 68-70% पर ही काम कर पा रहे हैं। इसलिए कुछ उद्योगों का दिवालिया होना इसका स्वाभाविक नतीजा है। यही बैंकों के क़र्ज़ों को संकट में डाल रहा है।
पर पूँजीवाद के शुरुआती दौर में उद्योगों को, साथ में बैंकों को भी, दिवालिया होने दिया जाता था। लेकिन एकाधिकारी वित्तीय पूँजी के दौर में ऐसा होने के बजाय शासक वर्ग इसका बोझ भी पहले से ही शोषित मेहनतकश और टटपुँजिया तबके पर डाल कर ख़ुद की पूँजी और मुनाफ़़े को सुरक्षित करने के प्रयास में है। इसीलिए ‘राष्ट्रहित’ में उद्योगों और ख़ास तौर पर बैंकों को मदद करने का माहौल बनाया जा रहा है। इसी का नतीजा है ‘असफल होने के लिए ज़्यादा बड़ा’ (टू बिग टू फेल) का सिद्धान्त सामने लाया गया है अर्थात कुछ बैंक और उद्योग इतने बड़े हैं कि उनको किसी हालत में भी बन्द होने देना ‘राष्ट्रहित’ में नहीं है। इस तथाकथित ‘सिद्धान्त’ की आड़ में सभी पूँजीवादी देशों में इनके घाटे का बोझ ख़र्च में कमी, पेट पर बेल्ट कसने, आदि के नाम पर जनता पर डाला जाता है — अमीरों के लिए प्रत्यक्ष करों में कटौती, ग़रीबों के लिए अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि, शिक्षा-स्वास्थ्य के ख़र्च में कमी, वंचितों-महिलाओं-बच्चों के कल्याण कार्यक्रमों में कटौती, सरकार नियन्त्रित वस्तुओं के मूल्यों में इज़ाफ़ा, रेल-बस भाड़े बढ़ाना, आदि इसके लक्षण हैं जिसके द्वारा मेहनतकश लोगों के ख़ून का आखि़री क़तरा तक चूसकर पूँजीपतियों के मुनाफ़़े में कमी को रोका जा सके। यही इस वक़्त भारत में चल रहा है।

 

मज़दूर बिगुल, मई 2017

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