क्रांतिकारी लोकस्‍वराज्‍य अभियान
बहुत होते हैं सत्तर साल अपनी बरबादी को पहचानने के लिए!
किस चीज़ का इन्तज़ार है? और कब तक?

साथियो!

आज़ादी के 70 वर्ष बीत चुके हैं। हर स्वतन्त्रता दिवस पर हम अपनी छतों-मुण्डेरों पर तिरंगे फहराकर खुद को यह याद दिलाने की कोशिश करते हैं कि हम आज़ाद हैं। देश का खाता-पीता उच्च मध्यवर्ग भी अपनी कार के शीशे उतार कर रेड लाइटों पर मेहनतकशों-ग़रीबों के बच्चों से 5-5 रुपये में तिरंगा ख़रीदकर अपनी ‘राष्ट्रभक्ति’ साबित कर देता है। लेकिन सवाल यह है कि सात दशकों के आज़ाद भारत में किसे क्या मिला? किसकी कोठियाँ और बंगले खड़े हो गये और कौन मुफ़लिसी की ज़ि‍न्दगी बिता रहा है? यह किसकी आज़ादी है? कौन हर स्वतन्त्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर आज़ादी का जश्न मना रहा है और कौन झुग्गी-बस्तियों और झोपड़ियों में अपने हालात का मातम मना रहा है? इन सवालों का जवाब पाने के लिए आइये कुछ ठोस सच्चाइयों और आँकड़ों पर निगाह डालें।

सात दशकों की आज़ादी या आम जनता की बरबादी?

पहले मनमोहन सिंह की कांग्रेस-नीत सरकार और अब नरेन्द्र मोदी की भाजपा-नीत सरकार ये दावे करतीं रहीं हैं कि भारत तेज़ रफ्तार से तरक्की कर रहा है। वृद्धि दर 7-8 प्रतिशत तक पहुँच रही है! यह सच है कि देश के ऊपर के 15 फीसदी लोगों के लिए देश में तरक्की हो रही है। अम्बानी-अडानी और टाटा-बिड़ला जैसों के लिए देश ज़रूर तरक्की कर रहा है। खाते-पीते उच्च मध्यवर्ग को भी इस तरक्की की मलाई मिल रही है। उनके लिए शॉपिंग मॉल, आठ लेन के एक्सप्रेस वे से लेकर मल्टीप्लेक्सों की भीड़ लग गयी है। लेकिन इन सारी धन-दौलत और ऐशो-आराम के सामान पैदा करने वाले 80 प्रतिशत मज़दूरों, ग़रीब किसानों और आम मेहनतकश अवाम को क्या इस विकास से कुछ हासिल हुआ है? हाँ, हुआ है! कमरतोड़ महँगाई, भुखमरी, ग़रीबी, कुपोषण, बेघरी और बेरोज़गारी! आइये कुछ आँकड़ों पर निगाह दौड़ाते हैं।

तरक्की के तमाम दावों के बावजूद हमारे देश में आज भी करीब 20 करोड़ लोग रोज़ भूखे सोते हैं। 2006 की एक सरकारी रपट के अनुसार 77 प्रतिशत भारतीय जनता 20 रुपये प्रतिदिन से कम की आय पर जीती है। 58 प्रतिशत बच्चे दो वर्ष के होते-होते बाधित विकास के शिकार हो जाते हैं। 3000 बच्चे रोज़ सिर्फ़ भूख से मरते हैं और अन्य भोजन व स्वास्थ्य-सम्बन्धी कारणों से होने वाली बच्चों की मौतों को जोड़ दें तो यह आँकड़ा करीब 9000 पहुँच जाता है। दुनिया भर में पाँच वर्ष से कम आयु में होने वाली मौतों का 24 प्रतिशत भारत में होता है। दुनिया में नवजात मृत्यु का 30 प्रतिशत अकेले हमारे देश में होता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा कुपोषण-पीड़ित देश है। पाँच वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों में 42 प्रतिशत कम वज़न के हैं। 20 प्रतिशत बच्चे क्षीण (वेस्टेड) हैं। वैश्विक न्यूनतम ग़रीबी दर 1.25 डॉलर प्रतिदिन है लेकिन भारत के 90 प्रतिशत लोग 1 डॉलर प्रतिदिन से कम कमाते हैं। इन भयंकर हालात के कारण जानने के लिए मोदी सरकार के अन्तिम बजट पर नज़र डालना काफ़ी होगा।

आख़ि‍री बजट 21,47,000 करोड़ (लगभग 21.5 लाख करोड़) रुपये का था। इसमें से श्रम और रोज़गार सृजन के लिए मात्र 7,378 करोड़ रुपये (0.34 प्रतिशत) रखा गया था। उच्चतर शिक्षा के लिए मात्र 33330 करोड़ रुपये रखे गये हैं। मानव संसाधन विकास के लिए मात्र 79,686 करोड़ रुपये, यानी कुल बजट का मात्र 3.71 प्रतिशत रखा गया है। जन स्वास्थ्य हेतु कुल बजट का मात्र 1.1 प्रतिशत ख़र्च किया जायेगा। दूसरी ओर सार्वजनिक ख़र्चों में और जनता हेतु खाद्यान्न के लिए मिलने वाली सब्सिडी में भारी कटौती की गयी है और जन वितरण प्रणाली का बण्टाधार कर दिया गया है। यह प्रक्रिया मनमोहन सिंह सरकार ने ही शुरू कर दी थी। एग्रो-आधारित व सम्बन्धित क्षेत्र में वायदा व्यापार और अडानी जैसे पूँजीपतियों को दाल व तेल आदि की जमाखोरी और सट्टेबाज़ी की खुली छूट दे दी गयी है। यही कारण है कि खाने के सामानों की महँगाई नियन्त्रण में नहीं आने वाली है। सबि्ज़याँ और दालें आम मेहनतकश आबादी की तश्तरी से ग़ायब हो चुकी हैं। देश में कुल कार्यशक्ति है करीब 77 करोड़ जबकि कुल रोज़गार हैं 48 करोड़, यानी कि करीब 29 करोड़ काम करने योग्य लोग बेरोज़गार हैं। 4 करोड़ लोग तो पढ़े-लिखे बेरोज़गार हैं जो ग्रेजुएट व पोस्टग्रेजुएट की डिग्रियों के साथ खलासी व चपरासी के पदों के लिए आवेदन कर रहे हैं! आज देश में करीब 22 करोड़ असंगठित मज़दूर 12-12 घण्टे काम कर रहे हैं। यदि 8 घण्टे के कार्यदिवस के कानून को ही सरकार लागू कर दे तो 11 करोड़ नये रोज़गार तुरन्त पैदा हो जायेंगे! लेकिन उल्टा सरकार एक नये कानून के ज़रिये बाल मज़दूरी तक को खुली छूट दे रही है और नये श्रम कानूनों के ज़रिये ठेका मज़दूरी को बढ़ाने का काम कर रही है। ऐसे में, ज़ाहिर है कि बेरोज़गारी आने वाले समय में और ज़्यादा बढ़ेगी। सरकारी नौकरियों में भर्ती में भारी कटौती की गयी है और सरकारी उपक्रमों में भी नयी भर्तिया अधिकतर ठेके पर हो रही हैं। यही कारण है कि रोज़गार सृजन पर कुल बजट का मात्र 0.34 प्रतिशत रखा गया है। वहीं दूसरी ओर सरकार अन्धराष्ट्रवाद और पाकिस्तान का भय दिखाकर रक्षा क्षेत्र पर बजट का 16.76 प्रतिशत ख़र्च कर रही है, यानी, 359,854 करोड़ रुपये! लेकिन वास्तव में पुलिस और फौज-फाटे का इस्तेमाल देश भर में मज़दूर आन्दोलनों को कुचलने, आम मेहनतकश जनता को दबाकर रखने, कश्मीर व उत्तर-पूर्व में दमन के लिए होता है। आज जो युद्धोन्माद फैलाया जा रहा है, उसकी असलियत भी हमें समझने की ज़रूरत है साथियो।

दोस्तो! ग़रीब मेहनती जनता के आँसुओं के समन्दर में कुछ ऐयाशी की मीनारे खड़ी हैं। ये ऐयाशी की मीनारें देश के 15 फीसदी आबादी, यानी पूँजीपतियों, नेताओं-नौकरशाहों, ठेकेदारों, शेयर दलालों और उच्च मध्यवर्ग की हैं। बजट में करीब 1300 करोड़ रुपये केवल राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और संसद पर खर्च पर रखे गये हैं। संसद-नामक सुअरबाड़े की एक मिनट की कार्रवाई पर 3 लाख रुपये, यानी प्रतिदिन करीब 14 करोड़ रुपये ख़र्च होते हैं। और इस ख़र्च पर बनाये जाते हैं जनता-विरोधी कानून और नियम! हर सांसद को प्रति वर्ष 0.48 करोड़ रुपये मिलते हैं। अगर इसमें विकास निधि को जोड़ दें तो सांसदों को मिलने वाली रकम हो जाती है 2.5 करोड़ रुपये प्रति वर्ष। यानी कि 543 सांसदों को प्रति वर्ष 1500 करोड़ रुपये मिलते हैं! देश के फौज, पुलिस, नौकरशाही, वीआईपी सुरक्षा और कैबीनेट पर ही हर साल अरबों रुपये ख़र्च होते हैं। इस भारी-भरकम और ख़र्चीले जनतन्त्र की कीमत पूँजीपतियों से नहीं बल्कि जनता से वसूली जाती है। यही कारण है कि पिछले तीन दशकों से अप्रत्यक्ष करों में लगातार बढ़ोत्तरी की जा रही है और पूँजीपतियों से वसूला जाने वाला कारपोरेट टैक्स व प्रत्यक्ष कर (आयकर) घटाया जा रहा है। देश के सबसे धनी 0.01 प्रतिशत लोगों और बाकी जनता की औसत आय में करीब 200 गुने का अन्तर है। सात दशकों में पूँजीपति घरानों की सम्पत्ति में 1000 गुने तक की बढ़ोत्तरी हुई है। जनता के जल-जंगल-जमीन की लूट के ज़रिये पिछले 15 वर्षों में इसमें और ज़्यादा तेज़ रफ्तार से बढ़ोत्तरी हुई है। ये दो तस्वीरें हैं एक ही देश की। एक ओर ग़रीबी और मुफ़लिसी की शिकार 80 प्रतिशत जनता है और दूसरी ओर मुट्ठी भर धनपशु हैं, जो परजीवी जोंकों के समान जनता के शरीर से चिपके हुए उसका खून चूस रहे हैं। पिछले सात दशकों की आज़ादी में हमें यही हासिल हुआ हैः ग़रीबों की आँसुओं के समन्दर में अमीरज़ादों की ऐश्वर्य की मीनारें!

शासक वर्गों द्वारा फैलाये जा रहे युद्धोन्माद की असलियत को पहचानो!

आज पाकिस्तान और चीन से युद्ध भड़काने की साज़िशें चल रही हैं। कारपोरेट घरानों के दरबारी और भाट की भूमिका अदा करने वाला इलेक्ट्रानिक व प्रिण्ट मीडिया युद्धोन्माद भड़का रहा है। भारत का सोशल मीडिया पर उछलकूद मचाने वाला उच्च मध्यवर्ग इस उन्माद में पगला सा गया है। लेकिन ज़रा सोचिये दोस्तो! इस युद्ध से किसे क्या मिलेगा? इस युद्ध में क्या इस उच्च मध्यवर्ग के लोग मरेंगे? सीमा पर कौन लड़ेगा? मज़दूरों और किसानों के बेटे-बेटियाँ! और मरेंगे भी वही! आज भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में महँगाई, बेरोज़गारी और ग़रीबी चरम पर है। हुक्मरान जनता के बीच अलोकप्रिय हो रहे हैं और उनकी सत्ता संकटग्रस्त है। ऐसे में, सबसे अच्छा होता है कि एक युद्ध पैदा करके जनता के गुस्से को ग़लत दिशा में मोड़ दिया जाय और अन्धराष्ट्रवाद की लहर में सारे असली मुद्दे किनारे कर दिये जायें। आज दोनों देशों के हुक्मरानों को इससे फ़ायदा है। इसीलिए आज यह युद्धोन्माद भड़काया जा रहा है। भाजपा के सुब्रमन्यम स्वामी ने एक बार कहा था कि भारत को पाकिस्तान पर आणविक हमला कर देना चाहिए और खुद भारतीय जनता को आणविक युद्ध में 10 करोड़ लोगों की कुरबानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए! यह फासीवादी पागलपन दोनों ही देशों को विनाश की ओर ले जायेगा। स्वामी जैसे अर्द्ध-पागलों से पूछा जाना चाहिए कि क्या वे अपने बच्चों, नाती-पोतों को आणविक युद्ध करने के लिए भेजेंगे? क्या मोदी, गडकरी, राजनाथ सिंह, पर्रीकर जैसे लोग खुद ये युद्ध लड़ने जायेंगे? नहीं दोस्तो! इसमें दोनों देशों के ग़रीबों के बेटे-बेटियाँ मरेंगे! युद्ध के दौरान ये हुक्मरान तो अपने सुरक्षित बंकरों में जाम छलका रहे होंगे! इसलिए हमें इस युद्धोन्माद में कतई नहीं फँसना चाहिए और असल मुद्दों पर सोचना और लड़ना चाहिए।

जाति-धर्म के झगड़े छोड़ो! सही लड़ाई से नाता जोड़ो!

दोस्तो! इस समय पूरे देश में एक बार फिर से जाति और धर्म के नाम पर जनता को बाँटा जा रहा है। एक तरफ हिन्दू और मुसलमान के बीच धर्म के नाम पर झगड़े पैदा किये जा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर आरक्षण के नाम पर नौजवान आबादी को आपस में लड़ाया जा रहा है। संघ परिवार कभी ‘लव-जिहाद’ का नकली मुद्दा उछालता है तो कभी ‘राम मन्दिर’ का। जब ये फेल हो जाते हैं तो गोरक्षा के नाम पर धार्मिक उन्माद पैदा किया जाता है। क्या आपने कभी सोचा है कि हमेशा उसी समय ये झगड़े क्यों पैदा किये जाते हैं जब देश में महँगाई, बेरोज़गारी और ग़रीबी अपने चरम पर होती है? क्या आपने कभी सोचा है कि जाति-धर्म के झगड़ों में हमेशा हर समुदाय के आम मेहनतकश क्यों मरते हैं, कभी कोई तोगड़िया या ओवैसी क्यों नहीं मरता? दोस्तो! ज़रा गहराई से सोचिये!

आरक्षण की राजनीति के बारे में जितना कहा जाय कम है। आज चारों ओर “रोज़गारविहीन विकास” का बोलबाला है। नौकरियाँ लगातार घट रही हैं और बेरोज़़गारी लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में सत्ताधारी वर्ग जब नौकरियों या उच्च शिक्षा में आरक्षण का लुकमा फेंकते हैं तो पहले से नौकरियों पर आश्रित, मध्यवर्गीय, सवर्ण जातियों के छात्रों और बेरोज़़गार युवाओं को लगता है कि आरक्षण की बैसाखी के सहारे दलित और पिछड़ी जातियाँ उनके रोज़गार के रहे-सहे अवसरों को भी छीन रही हैं। वे इस ज़मीनी हक़ीक़त को नहीं देख पाते कि वास्तव में रोज़़गार के अवसर ही इतने कम हो गये हैं कि यदि आरक्षण को एकदम समाप्त कर दिया जाये तब भी सवर्ण जाति के सभी बेरोज़़गारों को रोज़़गार नहीं मिल पायेगा। साथ ही, उच्च व मध्य जाति की आम मेहनतकश जनता में भी ब्राह्मणवादी विचारों का प्रभाव इन्हीं जातियों के कुलीनों द्वारा स्थापित किया जाता है। यही कारण है कि उनके सामने कभी मैनेजमेण्ट कोटा या एनआरआई कोटा को लेकर शोर नहीं मचाया जाता, मगर जातिगत आरक्षण के मसले पर उन्हें “योग्यता के साथ खिलवाड़” की याद दिलायी जाती है। वास्तव में, यहाँ योग्यता-अयोग्यता का कोई प्रश्न ही नहीं है। चूँकि शासक वर्ग आज अपनी निजीकरण-उदारीकरण की मुनाफ़ाखोर नीतियों के कारण रोज़गार दे ही नहीं सकता, इसलिए आरक्षण को मुद्दा बनाकर ग़ैर-दलित बेरोज़गारों के समक्ष दलित आबादी को एक नकली दुश्मन बनाकर खड़ा कर दिया जाता है, जैसा कि हालिया महीनों में लगातार किया गया है।

लेकिन ठीक इसी तरह दलित और पिछड़ी जाति के युवाओं को दलितों के बीच पैदा हुआ एक छोटा-सा शासक वर्ग यह नहीं देखने देता कि यदि आरक्षण के प्रतिशत को कुछ और बढ़ा दिया जाये और यदि वह ईमानदार और प्रभावी ढंग से लागू कर दिया जाये, तब भी दलित और पिछड़ी जातियों के पचास प्रतिशत बेरोज़़गार युवाओं को भी रोज़़गार नसीब न हो सकेगा। उनके लिए रोज़़गार के जो थोड़े से नये अवसर उपलब्ध होंगे, उनका भी लाभ मुख्यतः मध्यवर्गीय बन चुके दलितों और आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक रूप से प्रभावशाली पिछड़ी जातियों के लोगों की एक अत्यन्त छोटी-सी आबादी के खाते में ही चला जायेगा तथा गाँवों-शहरों में सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा का जीवन बिताने वाली बहुसंख्यक आबादी को इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा। आज जो आरक्षण है, उसकी सीटें न भरना भ्रष्टाचार है और हमें इसका विरोध करना चाहिए। मगर साथ ही हमें दलित मेहनतकश अवाम को भी समझाना चाहिए कि आरक्षण के रास्ते अब कुछ विशेष हासिल नहीं होने वाला है। ऐसे समय में जब मोदी सरकार घोषित तौर पर बची-खुची सरकारी नौकरियों को ख़त्म कर रही है और देश के सारे लोगों को “उद्यमी” बन जाने की सलाह दे रही है, तो आरक्षण का लाभ कैसे और किसे मिल पायेगा? इसलिए आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में खड़े होना वास्तव में उस चीज़ के लिए लड़ना है, जो कि है ही नहीं! लेकिन सरकार यही चाहती है कि हम इसके पक्ष या विपक्ष में खड़े हो जाएँ। यह शासक वर्ग का ‘ट्रैप’ है और इसमें हमें कतई नहीं फँसना चाहिए और ‘सभी के लिए समान व निशुल्क शिक्षा तथा सभी के लिए रोज़गार’ को संवैधानिक तौर पर हरेक नागरिक के बुनियादी अधिकार के तौर पर मान्यता देने के लिए लड़ना चाहिए। हमें आज वर्ग-आधारित जाति-विरोधी आन्दोलन खड़ा करते हुए सभी को समान व निशुल्क शिक्षा व सभी को रोज़गार’ को बुनियादी अधिकार बनाने के लिए लड़ना चाहिए।

शहीदे-आज़म भगतसिंह का सपनाः ख़त्म करो पूँजी का राज! लड़ो बनाओ लोकस्वराज्य!

साथियो, शहीदे-आज़म भगतसिंह ने फाँसी पर चढ़ने से पहले ही कहा था कि अगर कांग्रेस के नेतृत्व में आज़ादी आती है तो वह मुट्ठी भर धन्नासेठों की आज़ादी होगी और इससे देश के ग़रीब किसानों और मज़दूरों को कुछ विशेष प्राप्त नहीं होगा। लॉर्ड इरविंग और लॉर्ड कैनिंग की जगह तेज बहादुर सप्रु और पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास ले लेंगे लेकिन मज़दूरों का शोषण बदस्तूर जारी रहेगा, जनता पहले के ही समान ग़रीबी और बेरोज़गारी का दंश झेलती रहेगी। सात दशकों की आज़ादी के अनुभव ने इन भविष्यवाणियों को शब्दशः सही साबित किया है। भगतसिंह और उनके साथियों का मानना था कि उनकी लड़ाई केवल अंग्रेज़ी गुलामी के ख़ि‍लाफ़ नहीं है, बल्कि हर प्रकार के शोषण और लूट के ख़िलाफ़ है। भगतसिंह ने कहा था, “हम गोरी बुराई की जगह भूरी बुराई लाने की ज़हमत नहीं उठाना चाहते।” भगतसिंह का मानना था कि इस देश के आम मेहनतकश ग़रीबों को सच्ची आज़ादी मिलने का केवल एक अर्थ हो सकता है-समस्त कल-कारखानों, सभी खेतों-खलिहानों और सभी खानों-खदानों पर आम मेहनतकश अवाम का साझा हक़। एक ऐसी व्यवस्था को ही हम लोकस्वराज्य व्यवस्था कहते हैं। सिर्फ़ स्वराज्य नहीं! बल्कि आम मेहनतकश जनता का स्वराज्य! इससे कम कुछ भी हम आम मेहनतकश लोगों की ज़िन्दगी में बेहतरी नहीं ला सकता है। सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन उनकी पूँजी-परस्त नीतियाँ वही रहेंगी। क्या पिछले कई दशकों के दौरान ये साबित नहीं हुआ है? इसलिए हम शहीदे-आज़म भगतसिंह का अनुसरण करते हुए आज एक ऐसी लोकस्वराज्य व्यवस्था के निर्माण को अपना लक्ष्य मानते हैं। शहीदे-आज़म भगतसिंह ने यह भी कहा था कि ऐसी व्यवस्था का निर्माण खुद-ब-खुद नहीं हो सकता है। यह कार्य मेहनतकश जनता को स्वयं करना होगा। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा था कि आम मेहनतकश जनता यह कार्य तभी कर सकती है, जब वह अपनी क्रान्तिकारी पार्टी का निर्माण करे। यह क्रान्तिकारी पार्टी चुनावों की नौटंकी के ज़रिये नहीं बल्कि क्रान्ति के ज़रिये सत्ता मेहनतकश जनता के हाथों में पहुँचायेगी! हम सभी जानते हैं कि चुनावों में इस या उस पार्टी की सरकार बनने से समूची राज्य व्यवस्था में कोई फर्क नहीं आता; पुलिस, फौज, नौकरशाही, न्यायपालिका, कानून-संविधान वही रहते हैं। वास्तव में, व्यवस्था का ये पूरा ढाँचा अगर बरकरार रहता है, तो अव्वलन तो कोई क्रान्तिकारी पार्टी चुनावों में बहुमत प्राप्त कर ही नहीं सकती, और अगर किसी तरह बहुमत प्राप्त कर भी गयी तो महज़ इस जीत के आधार पर वह कोई परिवर्तन नहीं ला सकती। जैसे ही वह बैंक, वित्तीय संस्थानों, उद्योगों, खानों-खदानों आदि का राष्ट्रीयकरण करेगी वैसे ही देश के धन्नासेठ, ठेकेदार, बड़े व्यापारी सेना और पुलिस के अधिकारी जमातों के साथ मिलकर और साम्राज्यवाद की मदद से उसका तख्तापलट करने का प्रयास करेंगे। ऐसे में, भी अन्ततः फैसला बल प्रयोग से ही होगा। भगतसिंह का इसीलिए मानना था कि जनता की व्यापक पहलकदमी और भागीदारी पर आधारित इंक़लाब के रास्ते ही समूची पूँजीवादी राज्यसत्ता के इन सभी खाने के दाँतों को तोड़ा जा सकता है और एक सच्चा लोकस्वराज्य स्थापित किया जा सकता है। हमारा मानना है कि आठ दशकों बाद भी शहीदे-आज़म की यह बात सही है और इस पर अमल के ज़रिये ही एक नयी व्यवस्था, एक नये समाज का निर्माण सम्भव है। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी को चुनाव के क्षेत्र को पूँजीपतियों, अमीरों और अम्बानियों-अदानियों की नुमाइन्दगी करने वाली तमाम चुनावबाज़ पार्टियों के लिए खाली छोड़ देना चाहिए! उल्टे मज़दूरों-मेहनतकशों की इंक़लाबी पार्टी को पूँजीवादी चुनावों में भी रणकौशलात्मक तौर पर हस्तक्षेप करना चाहिए और उसमें मज़दूरों-मेहनतकशों के अलग व स्वतन्त्र क्रान्तिकारी पक्ष को खड़ा करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो मज़दूर वर्ग का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा इस या उस अमीरज़ादों की चुनावबाज़ पार्टी का पिछलग्गू बनेगा। इसके अतिरिक्त, इन चुनावों को क्रान्तिकारी पार्टी को अपने क्रान्तिकारी प्रचार के मंच के तौर पर प्रयोग करना चाहिए। इस तौर पर, मेहनतकशों की इंक़लाबी पार्टी को चुनावों का रणकौशलात्मक प्रयोग करना चाहिए और इस मैदान को धनपशुओं की चुनावबाज़ पार्टियों की धींगामुश्ती के लिए खाली नहीं छोड़ना चाहिए। आज ऐसी कोई देशव्यापी इंकलाबी मज़दूर पार्टी नहीं है, लेकिन उसे खड़ा करना आज मेहनतकश-मज़दूरों का सबसे बड़ा कार्यभार है। ज़ाहिर है, इस रणकौशलात्मक भागीदारी से ही क्रान्ति का ऐतिहासिक कार्यभार सम्पन्न नहीं होगा लेकिन इसके बग़ैर इस महान कार्यभार को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ना भी मुश्किल होगा।

यह रास्ता मुश्किल और लम्बा है दोस्तो! लेकिन यही एकमात्र रास्ता है। हम पिछले वर्षों में अण्णा हज़ारे के ‘इण्डिया अगेंस्ट करप्शन’ और केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के ढोंग और नौटंकी को भी देख चुके हैं। ये भी वास्तव में छोटे मालिकों, ठेकेदारों और व्यापारियों की ही पार्टी है। कांग्रेस और भाजपा के बारे में जितना कम कहा जाये अच्छा है। संसदीय वामपंथियों (भाकपा, माकपा व भाकपा-माले) का काम हमेशा से पूँजीवादी व्यवस्था की आख़ि‍री सुरक्षा पंक्ति का रहा है। लाल मिर्च खाकर ‘विरोध-विरोध’ की रट लगाने वाले इन संसदीय तोतों की भूमिका ज़्यादा से ज़्यादा कांग्रेस या किसी ‘तीसरे मोर्चे’ की पूँछ में कंघी करने की होती है। जिन राज्यों में ये सत्ता में पहुँचे हैं वहाँ इन्होंने भी मज़दूरों और किसानों पर वैसे ही जुल्म ढाये हैं जैसे कांग्रेस और भाजपा की सरकारें ढाती हैं। इनका अवसरवाद और ग़द्दारी आज किसी से छिपी नहीं है। सुधारवाद और एनजीओपंथ ने इस देश को पिछले तमाम दशकों में क्या दिया? पहले सर्वोदयी याचकों और भूदानियों ने जनता के आक्रोश पर ठण्डे पानी के छिड़काव का काम किया था, आज वही काम एनजीओपंथी कर रहे हैं। लुब्बेलुबाब ये कि हम चुनावी जंजाल और सुधारवादी धोखे की असलियत को पिछले सात दशकों में पहचान चुके हैं। ऐसे में, हमारे पास एक ही रास्ता हैशहीदे-आज़म भगतसिंह का रास्ता! इंक़लाब का रास्ता! मेहनतकश अवाम की इंक़लाबी पार्टी खड़ी करने का रास्ता! इसके बिना न तो हम अपने रोज़मर्रा के हक़ों, मसलन, भोजन, रिहायश, रोज़गार आदि के लिए लड़ सकते हैं और न ही अपने अन्तिम लक्ष्य को पूरा कर सकते हैं, यानी कि समूची सत्ता मेहनतकश के हाथों सौंपने का लक्ष्य।

लोकस्वराज्य अभियान’ का लक्ष्य

‘लोकस्वराज्य अभियान’ का मकसद इसी विचार को जन-जन तक पहुँचाना है। दोस्तो! अगर हम आज़ादी के समय ही शहीदे-आज़म भगतसिंह के बताये रास्ते को अपना पाते तो शायद आज देश की यह हालत न होती। हम एक बेहतर समाज में जी रहे होते। लेकिन एक सपने को हम आधी सदी से भी ज़्यादा समय तक टालते रहे हैं। अब इसे और ज़्यादा नहीं टाला जा सकता है। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के जीवन और भविष्य का प्रश्न है। अगर आपको भी यह लगता है कि जो कुछ है, वह सही नहीं है, इसे बदला जाना चाहिए, तो नीचे दिये पते पर सम्पर्क करें और लोकस्वराज्य अभियान से जुड़ें। हमें हमसफ़रों की ज़रूरत है। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्रान्ति का यह काम कुछ बहादुर युवा नहीं कर सकते। यह कार्य व्यापक मेहनतकश अवाम की गोलबन्दी और संगठन के बिना नहीं हो सकता है। यह आम जनता की भागीदारी के बिना नहीं हो सकता है। हम विशेषकर नौजवानों का आह्नान करेंगे कि वे इस अभियान से जुड़ें। इतिहास में ठहराव की बर्फ़ हमेशा युवा रक्त की गर्मी से पिघलती है। क्या आज के युवा अपनी इस ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी से मुँह चुरायेंगे? हमें नहीं लगता! हमारे देश में ऐसे युवाओं की कमी नहीं है जिनके दिलों में अन्याय और ग़ैर-बराबरी को देखकर आग लगती है। लेकिन कोई विकल्प न होने के कारण हम कुछ कर नहीं पाते। हमारे इस अभियान का मकसद एक ऐसा क्रान्तिकारी विकल्प खड़ा करना है जिससे ऐसे तमाम युवा, तमाम नागरिक और बुद्धिजीवी जुड़ सकें जो क्रान्तिकारी परिवर्तन के हिमायती हैं; जो रियायतें माँग-माँगकर और सुधारों की पैबन्दें लगा-लगाकर और चुनावी मदारियों के धोखे में जीना स्वीकार नहीं करते; जो शहीदे-आज़म भगतसिंह और उनके साथियों के रास्ते को मानते हैं; जो इज़्ज़त और आसूदगी की ज़िन्दगी चाहते हैं; जो न्याय और बराबरी चाहते हैं। इसलिए हम सभी इंसाफ़पसन्द इंसानों का आह्वान करते हैं : क्रान्तिकारी लोकस्वराज्य अभियान से जुड़ें! भगतसिंह के सपनों को साकार करने की मुहिम में शामिल हों!

क्रान्तिकारी अभिवादन के साथ,

बिगुल मज़दूर दस्ता, नौजवान भारत सभा, दिशा छात्र संगठन

यूनीवर्सिटी कम्युनिटी फ़ॉर डेमोक्रेसी एण्ड इक्वॉलिटी (यूसीडीई)

भगतसिंह ने दी आवाज, बदलो-बदलो देश समाज

भगतसिंह का सपना, आज भी अधूरा, मेहनतकश और नौजवान उसे करेंगे पूरा

यह पर्चा पढ़कर रख देने और भूल जाने के लिए नहीं है। पहली बात तो यह कि इस मुहिम को पूरे देश में फैलाने के लिए, पर्चे-साहित्य-पोस्टर आदि भारी तादाद में छापने के लिए और हमारे प्रचार-दस्तों के अभियानों के लिए आप अपनी सुविधाओं में से कटौती करके ज़्यादा से ज़्यादा आर्थिक सहयोग करें। हमारी अपील यह भी है कि आप हमारे सम्पर्क केन्द्रों को अपना नियमित आर्थिक सहयोग भेजें।  साथ ही, यह पर्चा नई क्रान्ति के रास्ते पर हमसफ़र बनने का न्यौता भी है। यदि आप भी सोचते हैं कि आपकी कोई भूमिका हो सकती है तो आइये, हम विस्तार से पूरे कार्यक्रम और ठोस योजना पर विचार-विमर्श करें, मतभेदों को सुलझायें और ठोस व्यावहारिक तैयारी एवं आन्दोलन के कामों में जुट जायें।

 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन

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