बुलेट ट्रेन के लिए क़र्ज़ देने वाले जापान के भारत प्रेम की हक़ीक़त क्या है?

 मुकेश असीम

भारतीय रेल की इस समय जितनी बुरी हालत है, उतनी पहले कभी नहीं थी। आये दिन दुर्घटनाएँ हो रही हैं, गाड़ियाँ लगातार देरी से चल रही हैं, खानपान की व्यवस्था का बुरा हाल है। तरहतरह की तिकड़मों से यात्रियों से पैसे वसूले जा रहे हैं। रेल मार्गों, रेल गाड़ियों, यात्रियों की संख्या में और माल ढुलाई की मात्रा में भारी बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन रेलकर्मियों की तादाद लगातार घटायी जा रही है। रेल पटरियों आदि के रखरखाव, सुरक्षा आदि से जुड़े हज़ारों पद ख़ाली पड़े हैं। रेल सुरक्षा के आधुनिकीकरण के लिए, पटरियों के नवीनीकरण आदि के लिए योजनाएँ वर्षों से लम्बित हैं। मगर मोदी सरकार की प्राथमिकता है बुलेट ट्रेन! जिस रूट पर यह बुलेट ट्रेन चलेगी, यानी अहमदाबाद से मुम्बई, उसकी दूरी 524 किलोमीटर है और दिनभर इस रूट पर दर्जनों ट्रेनें आतीजाती हैं। अहमदाबाद से मुम्बई की रोज़ 10 उड़ानें हैं। 6 लेन के एक्सप्रेसवे के साथ अहमदाबाद और मुम्बई स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग नेटवर्क से भी जुड़े हैं। कुछ घण्टों में कार या एसी बसें अहमदाबाद से मुम्बई पहुँच जाती हैं। इस बुलेट ट्रेन परियोजना की अनुमानित लागत 98,805 करोड़ रुपये है, जिसमें 2017 से 2023 के बीच सात साल के निर्माण काल के दौरान मूल्य और ब्याज़ वृद्धि भी शामिल है। इस क़र्ज़ का अधिकांश हिस्सा जापान इण्टरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी के ज़रिये कम ब्याज़ वाले लोन से आयेगा। एलवेटिड कॉरिडोर के लिए 10,000 करोड़ की अतिरिक्त लागत जोड़कर कुल क़र्ज़ एक लाख 10 हज़ार करोड़। यह राशि भारत के स्वास्थ्य बजट का तीन गुना है और देश में हर साल शिक्षा पर ख़र्च होने वाले बजट की रकम से भी ज़्यादा है।सम्पादक

अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन की घोषणा करते हुए नरेन्द्र मोदी ने बड़े गर्व से कहा कि जापान ने 1,10,000 करोड़ रुपये का क़र्ज़ ”लगभग मुफ़्त” दे दिया है। आइए ज़रा देखें कि इसकी असलियत क्या है।

चीन और जापान दोनों की अर्थव्यवस्था में मुद्रा की भयंकर अतिरिक्त नक़दी तरलता है। इसकी वजह से जापान की बैंकिंग व्यवस्था को तबाह हुए 20 साल हो चुके। 1990 के दशक में दुनिया के 10 सबसे बड़े बैंकों में 6-7 जापानी होते थे, आज कोई इनका नाम तक नहीं सुनता। जापानी सेण्ट्रल बैंक कई साल से नकारात्मक ब्याज़ दर पर चल रहा है – जमाराशि पर ब्याज़ देता नहीं लेता है! लोग किसी तरह कुछ ख़र्च करें तो माँग बढे़, कहीं निवेश हो। जीडीपी में 20 साल में कोई वृद्धि नहीं, उसका शेयर बाज़ार का इण्डेक्स निक्केई 20 साल पहले के स्तर पर वापस जाने की ज़द्दोजहद में है। *इस आर्थिक संकट से निकलने के लिए पूँजीवाद के अन्तिम हथियार अर्थात सैन्यीकरण और युद्ध की और ले जाने की नीति उसके वर्तमान प्रधानमन्त्री शिंजो अबे की है जबकि पिछले युद्ध की बर्बादी के बाद जापान ने सेना लगभग समाप्त कर दी थी।

चीन ने भी बड़े पैमाने पर निर्यात से भारी विदेशी मुद्रा अर्जित की है। अभी उसके बैंक दुनिया के सबसे बड़े बैंक हैं। शहरों, सड़कों, रेल लाइनों, एयरपोर्टों में भारी निवेश के बाद भी यह अतिरिक्त तरलता उसकी अर्थव्यवस्था को संकट में डाल रही है। उसके बनाये कई शानदार शहरों में कोई रहने वाला नहीं है, इन्हें भूतिया शहर कहा जाता है। बुलेट ट्रेन ख़ाली चल रही हैं। बैंक जापान की तरह बर्बादी के क़गार पर हैं।

अब ये दोनों प्रतियोगिता में हैं कि एशिया-अफ़्रीका के देशों को क़र्ज़ देकर वहाँ बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लगायें, जिसमें इनके उद्योगों का सामान ख़रीद कर लगाया जाये। चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा में दो ख़रब डॉलर से एयरपोर्ट और बन्दरगाह बनाया। इसे अब दुनिया का सबसे बड़ा निर्जन इण्टरनेशनल एयरपोर्ट (बिल्कुल ख़ाली, कोई उड़ान नहीं!) कहा जाता है। लेकिन चीन के उद्योगों के माल की बिक्री तो हो गयी और क़र्ज़ वापस आता रहेगा। इसी तरह चीन दुनिया में हज़ारों ख़रब डॉलर के प्रोजेक्ट लगाने के ऐलान कर रहा है, कितना होगा देखना बाक़ी है।

जापान भी इस दौड़ में है। अब 0.1% ब्याज़ उसके बैंकों के लिए कोई नुक़सान नहीं क्योंकि वहाँ तो और ब्याज़ देना पड़ता है पैसा रखने के लिए। साथ में कुल लागत के 30% के बराबर की ख़रीदारी बुलेट ट्रेन के लिए जापान से की जायेगी, उसमें 20-25% मार्जिन लगाइये तो उसका मुनाफ़ा सुनिश्चित है।

लेकिन विदेशी मुद्रा के क़र्ज़ में सिर्फ़ ब्याज़ नहीं होता बल्कि एक्सचेंज रेट रिस्क भी होता है जिसे हेज़ किया जाता है और उसका ख़र्च 5-6% आता है। तो जीरो बन गया 6%! रेलवे ने जो प्रीमियम रेट की गाड़ियाँ चलायी हैं उनमें जगह भर नहीं रही है तो बुलेट ट्रेन का क्या होगा? कुछ अमीर लोगों की सुविधा की लागत आि‍ख़र नये टैक्स लगाकर पूरी की जायेगी।

लेकिन एक और पेंच है। जापान इस प्रोजेक्ट के बदले में बाक़ी एशिया-अफ़्रीका के प्रोजेक्ट में भारतीय बैंकों को साझीदार बनाने का समझौता कर रहा है। भारतीय बैंक एक और तो डूबे क़र्ज़ों से निपट रहे हैं, साथ ही नये क़र्ज़ नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि अर्थव्यवस्था में माँग के अभाव में नया निवेश नहीं हो रहा है। उद्योगों को बैंक क़र्ज़ की दर पिछले साठ साल में निम्न स्तर पर है। इसी स्थिति में मोदी जी अपने नोटबन्दी नाम के मास्टर स्ट्रोक से बैंकों में भारी मात्रा में नक़दी जमा करा चुके हैं जिस पर उन्हें ब्याज़ से और हानि हो रही है। ख़ुद रिज़र्व बैंक भारी घाटा उठा चुका है और जमा राशि पर ब्याज़ दरें तेज़ी से कम की जा रही हैं। अब इस नक़दी को कहाँ लगाया जाये?

भारत-जापान मिलकर चीन के वन बेल्ट वन रोड (OBOR) के मुकाबले का कुछ करने का प्रयत्न कर रहे हैं जैसे ईरान में चाबहार पोर्ट। पिछले दिनों दोनों ने मिलकर अहमदाबाद में अफ़्रीकी देशों का सम्मलेन भी किया था जिसमें बीसियों ख़रब डॉलर के क़र्ज़ और निवेश की घोषणाएँ हुईं।

इसी कि़स्म के बड़े क़र्ज़ देने के लिए ही भारत के बैंकों को बड़ा बनाने की ज़रूरत है जिसके लिए सरकार 27 सरकारी बैंकों का विलय करके सिर्फ़ 5 या 6 बैंक बना देना चाहती है। पर समस्या यह है कि जापान और चीन ने यह सब तब किया था जब उनकी अर्थव्यवस्था एक हद तक उन्नत हो चुकी थी और उनके बैंक दुनिया में शिखर पर थे। भारतीय पूँजीपति इस रास्ते पर पहले ही चलने की कोशिश में है, क्योंकि विश्व पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का गहन संकट उसे निर्यात के द्वारा जापान-चीन की तरह विकसित होने का भी मौक़ा नहीं दे पा रहा है। चीन-जापान के बैंकों में तो संकट इस सबके बाद आया था जबकि भारतीय बैंक तो पहले ही भारी विपत्ति में हैं, क्योंकि उनके 15% क़र्ज़ डूबने की स्थिति में हैं।

सबसे बड़ी बात यह कि भारत की ही तरह जिन देशों में ये भुतहा प्रोजेक्ट लगाये जायेंगे वे किस तरह इनका क़र्ज़ चुकायेंगे? अपनी जनता पर भारी तबाही और लूट से भी कैसे यह क़र्ज़ चुकाया जायेगा? तब क्या होगा? युद्ध या क्रान्तियाँ? यह शोषित जनता को चुनना होगा।

(लेखक बैंकिंग व राजनीतिक अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ हैं)

 

मज़दूर बिगुल,सितम्‍बर 2017

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