जीडीपी की विकास दर में गिरावट और अर्थव्यवस्था की बिगड़ती हालत
सबसे बुरी मार मेहनतकशों पर ही पड़नी है

 मुकेश असीम

वित्तीय वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही अप्रैल-जून के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आँकड़े घोषित हुए तो इसमें वृद्धि की दर मात्र 5.7% ही रही। ऐसे बहुत से विश्लेषक और अर्थशास्त्री हैं जो इस गिरावट पर अचम्भा प्रकट कर रहे हैं, लेकिन जो लोग भी सरकारी प्रचार तन्त्र से प्रभावित हुए बगै़र अर्थव्यवस्था की वास्तविक गति-स्थिति पर नज़र रखते हैं, उनके लिए इसमें अचम्भे की कोई बात नहीं। जीडीपी गणना का आधार वर्ष और पद्धति बदलकर वृद्धि दर को कृत्रिम ढंग से बढ़ा देने के स्वांग के बावजूद भी 2016 की शुरुआत से ही अर्थव्यवस्था में ज़बरदस्त तेज़ी के प्रचार के नाटक से पर्दा उठाने लगा था और इसकी वास्तविक कमजोरी सामने आने लगी थी। नोटबन्दी नामक नरेन्द्र मोदी के घातक ‘मास्टरस्ट्रोक’ ने तो इसकी मज़बूती की धुर्रियाँ ही उड़ा दीं और इसका संकट देश की अधिकांश जनता के जीवन में भारी मुसीबत बनकर स्पष्ट रूप से सामने आ गया। रही-सही कमी इस तिमाही में जीएसटी के लागू करने की तैयारियों ने निकाल दी। ये दोनों अर्थव्यवस्था के संकट का मूल कारण तो नहीं हैं, लेकिन करेले पर नीम चढ़े की तरह इन्होंने संकट की गति को अचानक तीव्र ज़रूर किया है। इसलिए जिस दिन रद्द किये गये नोटों के 99% के वापस आने की ख़बर ने नोटबन्दी के ताबूत में आि‍ख़री कील ठोंकी, उसके ठीक अगले दिन ही जीडीपी में गहरी गिरावट की सूचना को बड़ी संख्या में लोगों ने साथ जोड़कर देखा और अपने द्वारा सही गयी मुसीबतों के लिए मोदी सरकार के इस विनाशकारी क़दम को पूरी तरह जि़म्मेदार मान लिया है।

जीडीपी और अर्थव्यवस्था के और विश्लेषण के पहले इस दर को कितना भरोसे लायक माना जाये इस पर कुछ टिप्पणी ज़रूरी है। भारत में जीडीपी की गणना करने वाला सांख्यिकी संगठन इसके लिए सिर्फ़ संगठित क्षेत्र से ही सूचना इकठ्ठा करता है, अनौपचारिक क्षेत्र से नहीं, जबकि यह देश की अर्थव्यवस्था का 40% से अधिक है। राष्ट्रीय सैम्पल सर्वेक्षण की 2015-16 की 73वें दौर की रिपोर्ट बताती है कि देश में कृषि के अतिरिक्त ऐसे 6 करोड़ 30 लाख गै़र पंजीकृत कारोबार हैं जिनमें 11 करोड़ से अधिक लोग रोज़गार पाते हैं। फिर जीडीपी की गणना कैसे होती है? औपचारिक संगठित क्षेत्र की वृद्धि को ही अनौपचारिक क्षेत्र की ही वृद्धि मानकर उसे भी उसी अनुपात में बढ़ा दिया जाता है। किन्तु दोनों में वृद्धि की दर को एक समान मान लेने की अवधारणा तथ्यपूर्ण नहीं है। नोटबन्दी के असर के बारे में सभी विश्लेषकों ने माना है कि इसका अधिक असर अनौपचारिक क्षेत्र पर ही हुआ है जहाँ नक़दी का उपयोग ज़्यादा होता रहा है। इसके मुकाबले संगठित क्षेत्र के कुछ कारोबारों को तो इसका फ़ायदा भी हुआ था, क्योंकि बहुत सारे लोग नक़दी की कमी और सामान्य कारोबारियों के बन्द होने की मज़बूरी में अपनी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए औपचारिक क्षेत्र के कारोबार से करने लगे थे। लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र के बहुत से कारोबार बन्द हो गये थे और बड़े पैमाने पर इस क्षेत्र के कर्मियों को बेरोज़गार हो जाना पड़ा था, जो अब तक भी वापस रोज़गार पाने में कामयाब नहीं हुए हैं। अचल सम्पत्ति और विनिर्माण सहित यही क्षेत्र अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक रोज़गार प्रदान करने वाले हैं और यह सर्वविदित है कि ये अभी भी नोटबन्दी के विनाशक प्रभाव से बाहर नहीं निकल पाये हैं। इसलिए इनकी वृद्धि दर को औपचारिक क्षेत्र के बराबर मानने की अवधारणा मूलतः त्रुटिपूर्ण है और जीडीपी की वृद्धि दर को कृत्रिम रूप से ऊँचा कर देती है।

जीडीपी वृद्धि दर का एक महत्त्वपूर्ण भाग औद्योगिक उत्पादन की स्थिति है। इसकी गणना के तरीक़े में भी कुछ अजीब-सी स्थिति सामने आ रही है कि औद्योगिक उत्पादन में पेट की गैस की दवाएँ, जिन्हें एण्टासिड की गोलियों के नाम से भी जाना जाता है, का एक महत्त्वपूर्ण योगदान है! जून 2017 के महीने में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) की वृद्धि दर गिरावट के साथ नकारात्मक -0.10% रही; लेकिन कमाल की बात यह कि इस वृद्धि में गैस की गोलियों का हिस्सा 1.54% रहा अर्थात अगर इसे निकाल दिया तो इसमें भारी गिरावट होती। अप्रैल और मई के महीने में भी आईआईपी की दर क्रमशः 1.70% और 3.10% बतायी गयी, जिसमें से गैस की गोलियों का योगदान क्रमशः 1.96% और 2.42% रहा! जुलाई की हालत भी ऐसी ही है, 1.20% की वृद्धि दर में 1.39% सिर्फ़ गैस की गोलियों से आया! मतलब औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि पूरी तरह इन गैस की गोलियों पर टिकी है! अब इतनी गैस की दवाएँ कौन बना रहा है और कौन खा रहा है, ये तो मोदी-जेटली और उनकी सरकार ही बता सकती है! लेकिन यह जीडीपी और अर्थव्यवस्था के सम्पूर्ण सरकारी आँकड़ों को सन्देहास्पद तो बना ही देता है।

अब हम जीडीपी को बढ़ाने वाली अर्थव्यवस्था की कुल माँग के विभिन्न भागों की चर्चा करेंगे। इसके 6 भाग होते हैं – सरकारी उपभोग, निजी उपभोग, स्थाई पूँजी निवेश, विदेशी व्यापार खाते का बैलेंस, वस्तुओं के भण्डारण की मात्रा में परिवर्तन और बहुमूल्य वस्तुएँ जैसी सोना, चाँदी, गहने, कलाकृतियाँ और अन्य अनोखी चीज़ें। द मिण्ट के एक लेख में सुदीप्तो मण्डल ने सही टिप्पणी की है कि अभी अर्थव्यवस्था की स्थिति 6 इंजनों वाले उस हवाई जहाज़ की है जिसके 5 इंजन बन्द पड़ चुके हैं और वह एक ही इंजन के सहारे उड़ने की कोशिश कर रहा है।

यह अकेला इंजन है सरकारी उपभोग ख़र्च। अर्थव्यवस्था में संकट और रोज़गार के संकट की वज़ह से निजी आमदनी बढ़ नहीं रही है, लोग भविष्य के प्रति आशंकित हैं और बाज़ार में गै़र-ज़रूरी ख़रीदारी से बच रहे हैं, इसलिए आम तौर पर जीडीपी को गति देने वाला सबसे बड़ा हिस्सा निजी माँग और उपभोग स्वाभाविक तौर पर ही दबाव में है और अर्थव्यवस्था को गति देने में असमर्थ है। यह पिछले साल की पहली तिमाही में 8.4% बढ़ा था, लेकिन इस तिमाही में मात्र 6.1% बढ़ा है। ऐसी स्थिति में सरकारी उपभोग का ख़र्च ही वह एकमात्र इंजन है जो गाड़ी को खींचने में लगा है। अप्रैल-जून 2017 की तिमाही में इसमें 17.2% की वृद्धि हुई है। नतीजा यह है कि इस पूरे वित्तीय वर्ष के सरकारी ख़र्च का अधिकांश – 92.4% – पहले चार महीनों अर्थात जुलाई तक ही ख़र्च हो चुका है। फिर आगे अगर जीडीपी की गति को जारी रखना है तो बढे़ वित्तीय घाटे अर्थात क़र्ज़ लेकर ही किया जा सकता है जो बाद में जनता पर टैक्सों के बोझ को ही बढ़ायेगा। एक सवाल यह भी उठता है कि इतना सरकारी ख़र्च आि‍ख़र हो कहाँ रहा है? शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला-बाल कल्याण, आदिवासी-दलित कल्याण, आदि कल्याण योजनाओं पर तो बजट ख़र्च कम हुआ है तो बढ़त कहाँ है? अगर कुछ हिस्सा आधारभूत ढाँचे – सड़कों, आदि – पर भी मान लिया जाये तब भी सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है। क्या यह ख़र्च अनुत्पादक सरकारी अमले जैसे पुलिस, अफ़सरशाही और अस्त्र-शस्त्र, आदि पर किया जा रहा है? इससे तो अर्थव्यवस्था अर्थात जनता पर बोझ बढ़ने ही वाला है।

सरकारी उपभोग के अतिरिक्त अर्थव्यवस्था में कुल माँग को प्रभावित करने वाले दो अन्य अंग हैं – स्थाई पूँजी निवेश या कुल स्थाई पूँजी निर्माण और व्यापार खाते का बैलेंस। इनमें से कुल स्थाई पूँजी निर्माण 2016-17 की पहली तिमाही के 7.4% के मुकाबले तेज़ी से गिरकर इस तिमाही में मात्र 1.6% ही रह गया है। यह गिरावट और भी स्पष्ट होगी, अगर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक पर ध्यान दिया जाये – कैपिटल गुड्स अर्थात पूँजीगत वस्तुओं का उत्पादन इस तिमाही में 3.9% गिरा है। अगर सिर्फ़ जून महीने को देखें तो गिरावट और भी ज़्यादा अर्थात 6.8% रही। इसका अर्थ है कि निजी पूँजी निवेश नहीं हो रहा है, क्योंकि पहले ही कम माँग के कारण उद्योग स्थापित क्षमता के लगभग 70% पर काम कर रहे हैं। फिर कोई नये उद्योग में निवेश की योजना कैसे बनाये? वर्ष 2011-12 में 34% के उच्चतम स्तर के बाद से यह गिरावट निरन्तर जारी है। 2016-17 तक यह 29.3% ही रह गया था। इसमें से भी निजी निवेश का योगदान देखें तो वह 2011-12 के 27% से 2016-17 में घटकर 21.9% ही रह गया। इस साल भी यह गिरावट जारी है। पिछली मनमोहन सिंह और अब की नरेन्द्र मोदी दोनों सरकारों की तमाम कोशिशों – ईज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस हो या मेक इन इण्डिया, तमाम कि़स्म की टैक्स, वित्तीय और वातावरण, श्रम क़ानून, आदि की रियायतें, निजी पूँजी निवेश है कि बढ़ने का नाम नहीं ले रहा। कुछ रिपोर्टों के अनुसार तो भारतीय पूँजीपति देश के बजाय विदेशों में ज़्यादा निवेश करते हैं। वैसे भी राष्ट्रवाद का सबक़ सिर्फ़ आम जनता के लिए होता है कि देश के लिए क़ुर्बानी करें, पूँजीपतियों के लिए नहीं! पूँजीपति राष्ट्रवाद के लिए नहीं, वहाँ निवेश करता है जहाँ मुनाफ़ा अधिक मिले! 60 वर्षों में उद्योगों को लगभग सबसे निचले स्तर की क़र्ज़ वृद्धि भी इसकी पुष्टि करती है। इस सबके बावजूद भी कोई अन्धभक्त ही इस बात पर भरोसा करता रह सकता है कि अचानक पूँजी निवेश की स्थिति सुधर कर अर्थव्यवस्था तेज़ गति पकड़ लेगी।

जीडीपी में माँग का एक और महत्त्वपूर्ण कारक विदेश व्यापार खाते का बैलेंस तो भारत में पहले ही नकारात्मक कारक है, क्योंकि भारत का विदेश व्यापार खाता सरप्लस नहीं बल्कि घाटे में चलता है। इस तिमाही में यह घाटा पिछले वर्ष की इसी तिमाही के मुकाबले 295% बढ़ा है यानी लगभग 4 गुना हो गया। निर्यात में मन्दी और आयात में 13% वृद्धि ने अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका दिया है। आयात में यह भारी वृद्धि तब हुई है, जबकि पेट्रोलियम समेत अनेक जिंसों के दाम अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में काफ़ी कम हैं। निर्यात में मन्दी के पीछे एक कारण तो सम्पूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था के संकट के चलते वैश्विक माँग में कमी है। लेकिन यहाँ भी भारत की निर्यात वृद्धि दूसरे देशों से कम रही है, जिसका कारण मोदी जी पूँजी बाज़ार में विदेशी पूँजी को आमन्त्रित करने से रुपये की क़ीमत में हुई वृद्धि है। इसने निर्यात को महँगा और आयात को सस्ता कर दिया है, जबकि देश में उत्पादन वृद्धि के बजाय मात्र शेयर बाज़ार में क़ीमतें बढ़ाई हैं।

जीडीपी के दो और बचे हिस्से हैं – भण्डारण की मात्रा और बहुमूल्य जिंसें। जीएसटी की तैयारी में भण्डारण की मात्रा में कमी को सरकार जीडीपी की वृद्धि दर के लिए जि़म्मेदार बता रही है, लेकिन काफ़ी सारे विश्लेषकों ने यह तथ्य प्रस्तुत किया है कि यह कमी इस तिमाही में नहीं, बल्कि पहले से ही जारी थी और इसे इस तिमाही की गिरावट के लिए जि़म्मेदार नहीं माना जा सकता। जहाँ तक बहुमूल्य जिंसों का सवाल है इन पर ख़र्च 200% बढ़ा है जो माँग के अन्यथा परिवर्तन को दर्शाता है। उत्पादक निवेश की सम्भावनाओं की कमी से इन बहुमूल्य वस्तुओं में गै़र-उत्पादक निवेश बढ़ रहा है।

एक और बात जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत है, वह है कृषि क्षेत्र। अच्छे मानसून की वज़ह से इसमें गतिविधि बढ़ी थी और उत्पादन भी 2.3% बढ़ा है। लेकिन क़ीमतों में गिरावट की वज़ह से मूल्य के रूप में देखें तो कुल उत्पादन मात्र 0.3% बढ़ा। अर्थात किसानों को मिलने वाले धन में कोई वृद्धि नहीं हुई, जबकि अधिक गतिविधि पर श्रम और अन्य अवयवों की लागत बढ़ना तय है। इस प्रकार इस अच्छे उत्पादन के वर्ष में भी किसानों का घाटा और छोटे किसानों की विपन्नता निश्चित ही बढ़ी है जो पूँजीवाद का अनिवार्य परिणाम है। लेकिन यह भी निजी उपभोग माँग को नीचे ले जाता है।

कुल मिलाकर यह तस्वीर बताती है कि अर्थव्यवस्था में जारी संकट किसी एक क्षेत्र में न होकर एक सर्वव्यापक संकट है। आश्चर्य इस बात पर नहीं होना चाहिए कि जीडीपी की वृद्धि दर गिरी है, बल्कि इस बात पर होना चाहिए कि यह इतनी कम कैसे गिरी है! इतनी वृद्धि दर भी एक अचम्भा है और हमने ऊपर पहले ही इसकी गणना की पद्धति पर कुछ सवाल उठाये थे, जो इसके लिए जि़म्मेदार हो सकते हैं। इस बात पर विभिन्न पूँजीवादी संस्थानों के विश्लेषक भी सहमत हैं। क्रेडिट सुइस इण्डिया के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय घने अन्धेरे दौर से गुज़र रही है। जीएसटी सहित विभिन्न संरचनात्मक सुधारों की वज़ह से निकट भविष्य में वृद्धि, वित्तीय सेहत, मुद्रास्फीति, मुद्रा और बैंकिंग प्रणाली को लेकर गहन अनिश्चितता की स्थिति पैदा हुई है। वृहद आर्थिक मोर्चे पर अनिश्चितता के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था घने कोहरे से होकर गुज़र रही है। इससे निवेश प्रभावित होगा, जिससे वृद्धि नीचे आयेगी, जीडीपी भी घटेगी तथा अगले वित्त वर्ष के लिए आय का अनुमान भी प्रभावित होगा। ख़ुद सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया का कहना है कि यह गिरावट तात्कालिक नहीं बल्कि संरचनात्मक है और अगली कई तिमाहियों तक इससे निकलने की सम्भावना नहीं है। ख़ुद वित्त मन्त्री अरुण जेटली को भी मानना पड़ा है कि यह चिन्ताजनक है लेकिन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह इसे ‘तकनीकी समस्या’ बता रहे हैं। शायद इसलिए कि उनके सोशल मीडिया प्रचार की तकनीक में इस समस्या का सुलझाकर अर्थव्यवस्था को तेज़ गति से बढ़ाकर दिखा सकने का कोई उपाय नहीं है!

लेकिन वास्तविकता यह है कि यह निजी सम्पत्ति और मुनाफ़े पर आधारित पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था के निरन्तर गहराते संकट का ही एक अनिवार्य अंग है, जिसके चलते नये रोज़गार सृजित नहीं हो रहे, वास्तविक मज़दूरी कम हो रही है, आम जनता की आमदनी में संकुचन से बाज़ार में माँग संकुचित होती है, स्थापित पूँजी निवेश से हुआ उत्पादन बाज़ार माँग से ज़्यादा हो जाता है; अतः नया पूँजी निवेश बन्द होकर स्थापित उद्योग में गलाकाट प्रतियोगिता से कई उद्योग बन्द होते हैं। इस संकट का कोई स्थाई समाधान पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था के पास नहीं है, इसलिए संकट को समाप्त करने के लिए उठाये गये सभी क़दम और नये संकट को जन्म देते रहते हैं। लेकिन इन सब संकटों की मार आख़ि‍र में मेहनतकश तबक़े के सिर पर ही पड़ती है।

 

मज़दूर बिगुल,सितम्‍बर 2017

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