अक्टूबर क्रान्ति की शतवार्षिकी पर बिगुल मज़दूर दस्ता की ओर से पूर्वी उत्तर प्रदेश में निकाला गया परचा

रूसी क्रान्ति (7 नवम्बर) के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर
अक्टूबर क्रान्ति से सबक लो!
नई समाजवादी क्रान्ति की मशाल जलाओ!!

सजेंगे फिर नये लश्कर
मचेगा रण महाभीषण
उठो ओ शिल्पियों!
नवयुद्ध के उपकरण गढ़ने का समय फिर आ रहा है….
–शशिप्रकाश

मेहनतकश भाइयो!
यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिस घटना ने वास्तव में बीसवीं सदी को सर्वाधिक प्रभावित किया वह 7 नवम्बर (पुराने रूसी कैलेण्डर के अनुसार 25 अक्टूबर), 1917 को हुई रूसी समाजवादी क्रान्ति थी। इस घटना ने न सिर्फ तत्कालीन विश्व को हिलाकर रख दिया था, बल्कि आने वाले कई दशकों तक अक्टूबर क्रान्ति के तोप के धमाके दुनिया भर को गुंजायमान करते रहे। इस पहली सफल समाजवादी क्रान्ति ने आन्तरिक संकटों और विदेशी घेरेबन्दी को झेलते हुए भी दुनिया की सभी गुलाम कौमों की आज़ादी की लड़ाई को हर प्रकार की मदद पहुँचाई। इस क्रान्ति का अमिट प्रभाव हमारे देश के भी क्रान्तिकारी आन्दोलन और स्वतन्त्रता आन्दोलन पर पड़ा। शहीदेआज़म भगतसिंह और उनके साथियों व अन्य कई क्रान्तिकारी समूहों पर रूसी क्रान्ति और उसके नेता लेनिन के गहरे प्रभाव के बारे में कम ही लोग जानते हैं।
रूस में समाजवादी क्रान्ति के बाद वहाँ पर मज़दूरों-मेहनतकशों की राज्यसत्ता ने व्यापक किसान आबादी के सहयोग से देश के भीतर मौजूद भूस्वामी शक्तियों के प्रतिक्रियावादी विद्रोह और अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस, जापान आदि जैसे 14 साम्राज्यवादी देशों की घेरेबन्दी का एक साथ अकेले मुक़ाबला किया और चार वर्षों के भीतर 1921 तक उन्हें पूरी तरह परास्त कर दिया। यह कौन-सी ताकत थी जिसने रूस के हजारों-हजार मज़दूरों को, किसानों को अपनी जान की बाजी लगाकर समाजवादी रूस की हिफाजत करने के लिए प्रेरित किया? क्या यह लेनिन व स्तालिन थे, जिनके डर से लोगों ने ऐसा किया? तमाम सरकारी व कम्पटीशन की किताबें और डिस्कवरी व हिस्ट्री जैसे साम्राज्यवादी भोंपू चैनल तो हमें यही यकीन दिलाना चाहते हैं। लेकिन फिर से द्वितीय विश्वयुद्ध में भी सवा दो करोड़ मज़दूरों-मेहनतकशों ने अपनी जान की कुर्बानी देकर न सिर्फ सोवियत संघ की नात्सी हमले से हिफाजत की बल्कि दुनिया को भी फासीवादी बर्बरता की विभीषिका से बचाया। क्या यह स्तालिन का डर था? हम सभी जानते हैं कि सोवियत संघ और उसके समाजवादी प्रयोग के बारे में इस तरह का प्रचार लोगों को भ्रमित करने के लिए पूँजीवादी लुटेरों द्वारा किया गया दुष्प्रचार था, जो आज भी चल रहा है। लोग जान केवल उस चीज को बचाने के लिए देते हैं जिससे वे प्यार करते हैं। ये भाड़े के सैनिक नहीं थे जिन्होंने सोवियत संघ की ओर से युद्ध लड़ा बल्कि कारखानों, खदानों व खेतों में काम करने वाले आम मेहनतकश लोग थे।
अगर पूँजीवादी मीडिया के दुष्प्रचार को छोड़ दें तो हम पाते हैं कि सोवियत समाजवाद के प्रयोगों ने लगभग 40 वर्षों में ही रूस को मध्ययुगीन पिछड़ेपन, बर्बरता और गरीबी की गर्त में पड़े एक देश से दुनिया की सबसे तेज बढ़ती और दूसरी सबसे बड़ी औद्योगिक शक्ति में तब्दील कर दिया। रूस ने वह मुकाम महज़ चालीस सालों में हासिल कर लिया जिसे हासिल करने में अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस व जर्मनी को सौ-डेढ़ सौ साल लग गये थे। इन चालीस वर्षों में रूस ने बेरोजगारी, गरीबी व भुखमरी का पूर्ण रूप से खात्मा कर दिया। 1930 की मन्दी से जब दुनिया के पूँजीवादी देश कराह रहे थे, तो रूस द्रुत और समानतामूलक आर्थिक प्रगति का साक्षी बन रहा था। देश से वेश्यावृत्ति व गुप्त रोग पूरी तरह से समाप्त कर दिये गये थे। क्रान्ति के तुरन्त बाद स्त्रियों को वोट देने का अधिकार दिया और ऐसा करने वाला सोवियत संघ दुनिया का दूसरा देश था। सोवियत संघ ने स्त्रियों को चूल्हे-चैखट की गुलामी से मुक्त कर सामाजिक उत्पादक श्रम और सार्वजनिक जीवन का भागीदार बनाया। सोवियत संघ ने आम मेहनतकशों के जीवन स्तर में जो जबर्दस्त बढ़ोत्तरी की उसे तमाम गैर-मार्क्सवादी, गैर-कम्युनिस्ट प्रेक्षकों ने भी स्वीकार किया। प्रेमचन्द ने लिखा कि “मैं बोल्षेविज़्म के उसूलों का कायल हो गया हूँ।” रूस यात्रा के बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा कि-“अगर मै यहाँ न आता तो मेरी जीवन यात्रा अधूरी रह जाती। जो चीज़ मेरे दिमाग़ में आती है वह यह कि क्या असाधारण साहस है….वे एक नई दुनिया बनाने के लिए दृढ़ निष्चय हैं, उनके पास खोने के लिए ज़रा भी समय नहीं है। क्योंकि सारी दुनिया इनके ख़िलाफ़ है। अगर यह मैंने ख़ुद अपनी आँखों से नहीं देखा होता तो मैं कभी इस पर भरोसा नहीं कर पाता कि अज्ञान और अपमान के अँधेरे में डूबे लाखों लोग न सिर्फ साक्षर बन रहे हैं बल्कि मानव होने की गरिमा भी हासिल कर रहे हैं।” इन समाजवादी प्रयोगों ने देश की जनता को गरीबी, बेरोजगारी, पिछड़ेपन, निरक्षरता, राष्ट्रीय दमन, लैंगिक दमन से मुक्ति दिलायी और यही कारण था कि सोवियत संघ के लिए सोवियत मज़दूर, मेहनतकश व किसान बार-बार लड़े और कुर्बानियाँ दीं। सोवियत संघ के समाजवाद के प्रयोग ने इतिहास में एक उल्कापिण्ड के समान प्रकट होकर सारी दुनिया के मेहनतकशों, मज़दूरों और किसानों के संघर्षों को आलोकित कर दिया था और यही कारण है कि आज पूरी दुनिया में रूसी क्रान्ति के सौ वर्ष पूरे होने पर जलसों का आयोजन किया जा रहा है। लेकिन हम केवल जलसा मनाकर बात खत्म नहीं कर सकते।
सोवियत संघ में समाजवाद का प्रयोग लगभग चालीस वर्षों बाद 1956 में गिर क्यों गया? और सत्ता ख्रुश्चेव के नेतृत्व में संशोधनवादी धड़े के हाथों में कैसे पहुँच गयी? चालीस वर्ष के समाजवादी प्रयोगों में कहाँ कमी-ख़ामी रह गयी जिसके कारण फिर से पूँजीवादी पथगामी रूस में सत्ता में आ गये और मज़दूरों की सत्ता का पतन हो गया? समाजवाद की फिलहाली हार के बुनियादी कारण क्या हैं? यह जानना बेहद जरूरी है!
पर्चे की सीमा देखते हुए बहुत संक्षेप में इस पर कुछ बात की जा सकती है। वास्तव में समाजवादी समाज पूँजीवाद और कम्युनिज्म के बीच का, “वर्ग समाज और वर्गविहीन समाज” के बीच का काल होता है। मेहनतकश वर्ग इस दौरान बलपूर्वक सम्पत्तिवान, परजीवी वर्गों पर शासन कायम करके उत्पादन के साधनों पर से उनका स्वामित्व छीन लेता है (पर ये पुराने शोषक-शासक अपनी लुटेरी मानसिकता और अपने “खोये हुए स्वर्ग” को फिर से पाने की चाहत के साथ समाज में मौजूद होते हैं)। इसके साथ ही छोटे पैमाने पर (गाँव के मँझोले व छोटे किसानों, छोटे उद्यमियों-कारोबारियों आदि के बीच) पूँजीवादी किस्म का उत्पादन समाजवाद के शुरुआती समयों में लम्बी अवधि तक मौज़ूद रहता है, निजी स्वामित्व छोटे पैमाने पर मौज़ूद रहता है और आम जनता के एक अच्छे-खासे हिस्से के भीतर धनी बनने की और मुनाफ़ा कमाने की पुरानी बीमारी भी मौज़ूद रहती है। यह छोटे पैमाने का पूँजीवादी उत्पादन नये-नये पूँजीवादी तत्त्वों और मानसिकता को समाजवाद के भीतर नये सिरे से पैदा भी करता रहता है। इसके अलावा समाजवादी समाज में भी शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम करने वालों के बीच, कारख़ानों में काम करने वाले और खेतों में काम करने वालों के बीच तथा गाँव में रहने वालों और शहर में रहने वालों के बीच का अन्तर भी मौजूद रहता है। इसके अतिरिक्त, समाजवाद के बहुत आगे की मंजिलों में ही यह सम्भव हो सकता है कि लोग क्षमता मुताबिक काम करते हैं और ज़रूरत मुताबिक पाते हैं। शुरू में तो लम्बे समय तक यही हो सकता है कि लोग जितना श्रम करें उसी के हिसाब से उन्हें मज़दूरी मिले। अब चूँकि लोगों की श्रम करने की प्राकृतिक क्षमता एक नहीं होती, इस कारण से भी समाजवाद के शुरुआती लम्बे समय में असमानता पैदा होने का एक आधार मौजूद रहता है। कुल मतलब यह कि उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का मालिकाना कायम करना शोषण और असमानता के खात्मे का सबसे जरूरी पहला कदम है, पर यही सब कुछ नहीं। इसके बाद भी समाज में असमानता और पूँजीवाद के उतने किस्म के उत्पादन केन्द्र और पालन-पोषण केन्द्र मौजूद रहते हैं, जो ऊपर गिनाये गये हैं। इन्हीं कारणों से समाजवादी समाज के भीतर भी नये किस्म के पूँजीवादी तत्त्व मजबूत होते जाते हैं और समय रहते इन खरपतवारों को नष्ट करके जमीन की अच्छी तरह निराई-गुड़ाई और कीटनाशकों का छिड़काव न किया जाये तो यह समाजवाद की पूरी फसल तबाह कर डालते हैं। ये नये पूँजीवादी तत्त्व कम्युनिस्ट पार्टी और सर्वहारा राज्यसत्ता पर काबिज हो जाते हैं और पूँजीवाद की पुनस्र्थापना हो जाती है। 1953 में स्तालिन की मृत्यु के बाद सोवियत संघ में यही हुआ। ख्रुश्चेव के नेतृत्व में वहाँ एक नये किस्म का पूँजीवाद बहाल हो गया –“समाजवादी” मुखौटे और नकली लाल झण्डे वाला, सरकारी या राजकीय पूँजीवाद! बहुत कुछ हमारे देश के पब्लिक सेक्टर जैसा! 1990 में यह मुखौटा भी गिर गया और महान अक्टूबर क्रान्ति के देश में एक बार फिर खुला पूँजीवाद बहाल हो गया।
पूँजीवादी भोंपू लगातार चिल्ला रहे हैं कि समाजवाद फेल हो गया और नकली वामपंथी इसके कारणों को तलाशने की जगह सिद्धान्तों में ही अवसरवादी घालमेल कर रहे हैं और बता रहे हैं कि “ये समय की माँग है”! इतिहास बोध हमें बताता है कि अतीत में भी क्रांतियों के शुरुआती संस्करण असफल होते रहे हैं। सात-आठ सौ संस्करण तक कई दास विद्रोह कुचल दिये गये, तब कहीं जाकर दास प्रथा के युग का पूरी तरह से ख़ात्मा हो सका था। सामन्तवर्ग से संघर्ष करते हुए निर्णायक विजय हासिल करने में और पूँजीवादी सामाजिक ढाँचे का निर्माण करने में पूँजीपति वर्ग को तकरीबन चार सौ वर्षों का समय लग गया। फिर इसमें निराश होने की कोई बात नहीं कि समाजवादी क्रान्ति फ़िलहाल कुछ समय के लिए सदियों से जड़ जमाये पूँजीवाद से हार गई है। फिर हमें यह भी याद रखना होगा कि पहले की सभी क्रान्तियों ने एक पुरानी पड़ चुकी शोषण की व्यवस्था की जगह एक नये प्रकार की शोषण की व्यवस्था की स्थापना की, लेकिन समाजवादी क्रान्ति का मकसद सभी वर्ग व्यवस्थाओं का, हर तरह के शोषण का और हर तरह की असमानता का नाश करना था। पूँजीवादी व्यवस्था मानवता के पैर की बेड़ी बन चुकी है मानवता आज नहीं तो कल इन बेड़ियों को तोड़ डालेगी, यह निश्चित है!
वर्तमान दुनिया में पिछले एक दशक से एक गम्भीर आर्थिक संकट जारी है। ज़ाहिर है, मालिकों का वर्ग इस संकट का बोझ अपने ऊपर से उतारकर मज़दूरों व निम्न मध्यवर्ग के कन्धों पर डाल देता है। उनकी मुनाफाखोरी से पैदा हुए संकट का खामियाजा छँटनी, तालाबन्दी, नौकरियाँ घटने, महँगाई और ग़रीबी के बढ़ने के रूप में आम मेहनतकश जनता को चुकाना पड़ता है। संकट के दौर में ही तमाम साम्राज्यवादियों के बीच निवेश के अवसरों, सस्ते कच्चे माल व श्रम और बाजार के लिए गलाकाटू प्रतिस्पर्द्धा भी बढ़ती जाती है। यही कारण है कि दुनिया भर के हुक्मरान युद्धोन्माद भड़काने में लगे हुए हैं क्योंकि हर युद्ध जनता के लिए तो मौत और विनाश की गाथा लिखता है, लेकिन मुनाफाखोर कम्पनियों और साम्राज्यवादियों के लिए संकट से निकलने का रास्ता बनाता है। जब विनाश होता है, तो पुनर्निर्माण की आवश्यकता होती है और जब पुनर्निर्माण की आवश्यकता होती है तो लाभप्रद निवेश की सम्भावनाएँ फिर से पैदा होती हैं। लेकिन ऐसा युद्ध अगर आज दुनिया पर थोपा गया तो वह मानवता के विनाश की ओर भी जा सकता है। इसी मुनाफे की हवस ने ही पर्यावरण को एक ऐसी तबाही में धकेल दिया है, कि हमारे समूचे अस्तित्व पर खतरा मण्डरा रहा है। फिर से हिटलर और मुसोलिनी की मृतात्मायें नव फासीवादी ताकतों के रूप में अपनी कब्र से बाहर निकल रही हैं। हमारे देश में भी धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें फल-फूल रही हैं, ये ताकतें मेहनतकश अवाम को लगातार बाँटनें में लगी हैं। ये हैं वे सारी चीजें जिन्हें पूँजीवाद की “सफलता”, निजी मुनाफ़े, निजी स्वामित्व और व्यक्तिवाद पर टिकी समूची व्यवस्था की “कामयाबी” कहा जाता है! स्पष्ट है कि आज पूँजीवाद पूरी दुनिया को युद्ध, ग़रीबी, बर्बरता, भुखमरी, बेरोजगारी और पर्यावरणीय विनाश के अलावा कुछ नहीं दे सकता है। यदि हम इसका विकल्प नहीं तलाशते तो हमारी आने वाली पीढ़ियाँ और इतिहास हमें कठघरे में खड़ा करेगा। विकल्प क्या हो सकता है? सोवियत संघ ने बिना शक दिखलाया कि समाजवादी व्यवस्था वह विकल्प हो सकती है जो कि मानवता को इन अभिशापों से मुक्त कर सकती है और उसे नयी ऊँचाइयों तक पहुँचा सकती है।
हर वर्ग अपने अतीत की लड़ाइयों से सबक लेता है, ताकि आने वाले संघर्ष में वह दुश्मन को निर्णायक तौर परास्त कर सके। मज़दूर वर्ग को इस सदी में पूँजीपति वर्ग को निर्णायक शिकस्त देने के अपने अतीत से कुछ ज़रूरी सबक निकालने होंगें।
पहला सबक – सर्वहारा क्रान्ति की सबसे पहली ज़रूरत है सर्वहारा वर्ग की, पूरे देश के स्तर पर संगठित एक क्रान्तिकारी पार्टी। यह क्रान्तिकारी पार्टी लेनिन के मार्गदर्शन में निर्मित बोल्शेविक पार्टी की तरह संघर्षों की आग में तपकर इस्पात बनी हो, पूँजीवाद की सशस्त्र सेना-पुलिस से लैस राज्यसत्ता से लोहा लेने में सक्षम हो (न कि महज़ चुनावबाजी और ट्रेडयूनियनबाजी का धन्धा करती हो), औद्योगिक सर्वहारा और ग्रामीण सर्वहारा में ही नहीं बल्कि बहुसंख्यक गरीब व परेशानहाल मँझोले किसानों में भी इसकी गहरी पैठ हो और यह अपने देश की परिस्थितियों की समझ के आधार पर क्रान्ति का कार्यक्रम और रास्ता तय करने में सक्षम हो, तभी यह अक्टूबर क्रान्ति का नया संस्करण तैयार कर सकती है।
दूसरा सबक – जब हम अक्टूबर क्रान्ति के पहले के रूस में करीब बीस वर्षों तक जारी, ऐसी पार्टी के निर्माण और गठन की प्रक्रिया पर निगाह डालते हैं तो यह सच्चाई दिन की रोशनी की तरह साफ़ हो जाती है कि कठिन विचारधारात्मक संघर्ष, अटल विचारधारात्मक दृढ़ता और गहरी विचारधारात्मक समझ के बिना कोई सच्ची सर्वहारा पार्टी क्रान्ति करना तो दूर, गठित ही नहीं हो सकती और यदि गठित हो भी गयी तो जल्दी ही बिखर जायेगी। लेनिन और उनके साथी बोल्शेविकों ने एकदम अलग-थलग पड़ जाने का खतरा मोल लेते हुए भी विचारधारा के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं किया और मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी विचारधारा में किसी भी तरह की मिलावट की मेंशेविकों और कार्ल काउत्स्की के चेलों की साजिशों को एकदम से खारिज कर दिया। उन्होंने पार्टी को कभी भी चवन्निया मेम्बरी वाली महज़ चुनावबाज, यूनियनबाज, धन्धेबाज संगठन नहीं बनने दिया। दाँवपेंच के रूप में लेनिन की पार्टी ने पूँजीवादी चुनावों और संसद का भी इस्तेमाल किया और ट्रेडयूनियनों में काम करते हुए आर्थिक संघर्ष भी लगातार चलाये तथा जनता को जगाने के लिए विभिन्न प्रकार की राजनीतिक सुधारपरक कार्रवाइयाँ भी कीं, पर पार्टी ने इस बात को कभी नहीं भुलाया कि बिना बल-प्रयोग और हिंसा के, महज़ चुनावों के जरिये शोषक वर्गों से सत्ता छीनी नहीं जा सकती। वे पूँजीवादी राज्यसत्ता की सैन्य शक्ति और दमनतन्त्र को उखाड़ फेंकने के लिए क्रान्तिकारी तैयारी लगातार करते रहे और एक बार फिर अक्टूबर क्रान्ति ने इस बात को सही साबित किया कि शोषक वर्ग कभी भी समझाने-बुझाने या अल्पमत-बहुमत से सत्ता नहीं सौंप सकते। अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को याद रखने का मतलब यह है कि भारत का सर्वहारा वर्ग भी भा.क.पा., मा.क.पा., भा.क.पा. मा-ले (लिबरेशन ग्रुप) और ऐसे तमाम सुधारवादी, अर्थवादी, पूँजीवादी संसदवादी कम्युनिस्ट संगठनों के भ्रमजाल से बाहर आकर कम्युनिज्म के सही क्रान्तिकारी चरित्र को पहचाने।
तीसरा सबक -अक्टूबर क्रान्ति और उसके नेता लेनिन की यह भी शिक्षा है कि क्रान्ति मुट्ठीभर समझदार और बहादुर क्रान्तिकारी नहीं, बल्कि व्यापक मेहनतकश जनता करती है। अर्थवाद और संसदवाद के विरोध के नाम पर इन सभी रूपों-रणकौशलों को छोड़कर किसी भी रूप में महज़ हथियारबन्द कार्रवाइयों पर जोर देना वामपन्थी दुस्साहसवाद, या “अतिवामपन्थ” का मध्यमवर्गीय भटकाव है जिसका फ़ायदा अन्ततोगत्वा भाकपा-माकपा ब्राण्ड नकली कम्युनिस्टों और पूँजीवादी सत्ता को ही मिलता है।
चौथा सबक -अक्टूबर क्रान्ति का निचोड़ निकालते हुए लेनिन ने सैकड़ों बार विचारधारात्मक दृढ़ता को स्पष्ट किया था और कहा था कि वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को कभी न भूलो। इनको भूलने का मतलब ही है पूँजीवादी जनवाद और शान्तिपूर्ण संक्रमण के भ्रमजालों में जा फँसना और क्रान्ति के मार्ग को भूल जाना। आगे चलकर अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को माओ ने महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान पुष्ट करने के साथ ही आगे विकसित किया और बताया कि सर्वहारा वर्ग राज्यसत्ता पर काबिज होने के बाद एक लम्बे समय तक यदि अपने अधिनायकत्व के अन्तर्गत सभी पूँजीवादी तत्त्वों के विरुद्ध सतत क्रान्ति नहीं चलायेगा और पूँजीवादी मूल्यों-विचारों-संस्थाओं के विरुद्ध सतत सांस्कृतिक क्रान्ति नहीं चलायेगा तो पूँजीवाद की पुनस्र्थापना अवश्यम्भावी होगी।

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