बेहिसाब बढ़ती आर्थिक और सामाजिक असमानता

मुकेश असीम

मौजूदा सामाजिक व्यवस्था में आर्थिक असमानता की स्थिति बताने के लिए बहुत सारे आँकड़े दोहराने की भी आज ज़रूरत नहीं रह गयी है क्योंकि अब तो ख़ुद पूँजीवादी अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी भी इस बात से इंकार नहीं कर पा रहे हैं कि दुनिया भर में आर्थिक असमानता बेहद तेज़ चाल से बढ़ रही है। भारत तो इनमें से भी सर्वाधिक ग़ैरबराबरी वाले चन्द देशों में से है। यहाँ तो शीर्ष पर के 10% अमीर लोग 2010 में 69% सम्पत्ति के मालिक थे और तब से सिर्फ़़ 6 वर्षों में ये बढ़कर 2016 में 81% दौलत पर क़ब्ज़ा जमा चुके हैं। वहीं तली के 50% पूरी तरह सम्पत्तिहीन ही नहीं, बल्कि क़र्ज़ में किसी तरह मालिकों के लिए श्रम करते हुए जीवन बिताने को विवश हैं।

वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के शीर्ष पर जिनकी दौलत लगातार बढ़ रही है वे कौन लोग हैं? क्या ये वंचित-दलित समूहों के लोग हैं? नहीं, ये तो समाज के शासक अभिजात वर्ग से ही हो सकते हैं, हमारे देश में जिसका अधिकांश भाग आज भी सवर्ण कहे जाने वाले समुदायों से आता है, हालाँकि ज़मींदारी की समाप्ति, हरित क्रान्ति और पूँजीवादी विकास दौर के बाद पिछड़ी जातियों में से भी एक छोटे भूपति हिस्से ने भी इसमें कुछ हिस्सेदारी हासिल कर ली है; जहाँ तक दलित-आदिवासी समुदायों की बात है उनमें इनकी तादाद अभी भी अत्यन्त अल्प है। इसके विपरीत तली पर और भी विकराल, निर्मम होते शोषण की मार झेलने वाले कौन हैं – क्या ये ब्राह्मणवादी सवर्ण तबक़े से आते हैं? अगर किसी को सच में ही ऐसा लगता हो तो उसके साथ कोई तर्क नहीं किया जा सकता! यह बिल्कुल दिन के उजाले की तरह साफ़, स्पष्ट है कि हमारे समाज में सबसे नीचे का यह तबक़ा आज भी अधिक संख्या में उन वंचित – दलित, आदिवासी, पिछड़े – समुदायों से आता है जो इतिहास में एक लम्बे वक़्त से आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक हर तरह से बिल्कुल हाशिये पर रखे गये थे, यद्यपि सवर्ण कहे जाने वाले समुदायों में से भी एक हिस्सा अब पूँजीवादी शोषण से बरबाद होकर अब शोषित तबक़े का अंग बन चुका है।

आय एवं सम्पत्ति का यह बेतहाशा केन्द्रीकरण किस आर्थिक व्यवस्था का परिणाम है? क्या ज़मींदारी, सामन्ती अर्थव्यवस्था का? अगर आज की स्थिति में भी कोई यह जवाब दे तो इस जवाब वालों के साथ भी कोई कैसे और क्या तर्क करे? यह केन्द्रीकरण तो हो रहा है निजी सम्पत्ति और अधिकतम मुनाफ़े के लिए माल उत्पादन करने वाली पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था द्वारा जिसमें आधे से अधिक सम्पत्तिहीन लोगों के पास किसी तरह जीवन यापन का मात्र एक ही रास्ता है – हर रोज़ ख़ुद को बेचना अर्थात अपनी श्रम शक्ति को किसी पूँजीपति मालिक को बेचना, जिसके बदले में उन्हें मात्र किसी तरह जि़न्दा रहने लायक़ मुआवज़ा मिलता है और उनके श्रम का अधिकांश उत्पाद पूँजीपति द्वारा क़ब्ज़ा लिया जाता है जिससे उसका मुनाफ़ा और पूँजी रूपी दौलत बढ़ती जाती है। जब तक समाज में उत्पादन के सभी साधनों अर्थात पूँजी/सम्पत्ति पर इन पूँजीपतियों के मालिकाने को समाप्त कर इन पर सामूहिक मालिकाना क़ायम न किया जाये, तब तक शोषण से मुक्ति और वास्तविक समानता वाले समाज का निर्माण किसी हालत में मुमकिन नहीं है क्योंकि जिनके हाथ में सारी पूँजी है वे ही समस्त रूपों में राजनीति, क़ानून, शिक्षा, संस्कृति, मीडिया, धर्म, नैतिकता के भी मालिक हैं अर्थात इन सब चीज़ों का कारोबार भी उन्हीं के नियन्त्रण में चलता है। सम्पत्तिहीन सर्वहाराओं ने सरमायेदारों के इस निजी मालिकाने को समाप्त कर ऐसी आर्थिक व्यवस्था स्थापित करनी होगी जिसमें न केवल हर व्यक्ति को जीवन निर्वाह के लिए बग़ैर ख़ुद को दूसरे व्यक्ति को बेचने की मज़बूरी रहित समुचित रोज़गार उपलब्ध हो, बल्कि जीवनयापन हेतु हर व्यक्ति को किसी न किसी तरह का श्रम करना ही पड़े, किसी को भी दूसरे मनुष्य के श्रम के उत्पादन पर जि़न्दा रहने का विशेषाधिकार हासिल न हो सके।

इस बात में बहुत सरलीकरण तो है पर यही मार्क्सवाद का एक मूल सिद्धान्त है कि किसी भी समाज में मनुष्यों के बीच के तमाम आपसी रिश्तों-नातों को निर्धारित करने में धर्म, नस्ल, लिंग, जाति, इतिहास, संस्कृति, परम्पराओं आदि की एक अत्यन्त अहम भूमिका तो ज़रूर है लेकिन ख़ुद को बेचने की मज़बूरी वाला व्यक्ति कभी भी ख़ुद को ख़रीदने वाले मालिक के साथ किसी तरह की समानता हासिल नहीं कर सकता; चाहे उस समाज के संविधान, क़ानून, धर्म, नैतिकता, आदि में इसके कितने भी प्रावधान, दावे क्यों न किये गये हों, यह सब असली जि़न्दगी में खोखले ही सिद्ध होते हैं। उस समानता को वास्तविकता में हासिल करने के लिए मनुष्यों के बीच ख़रीदने-बेचने के हर तरह के रूपों वाली व्यवस्था को जड़ मूल से ख़त्म कर देना क़तई ज़रूरी है। इस काम को किये बग़ैर सारे नैतिक, राजनीतिक, क़ानूनी, सांस्कृतिक, धार्मिक आन्दोलन अपनी तमाम ईमानदारी, सिद्धान्तों और बलिदानों के बावजूद भी शोषण की समाप्ति नहीं कर सकते। इसी बात को लेकर बहुत से लोग कहते हैं कि मार्क्सवादी तो बस आर्थिक सम्बन्धों को ही मुख्य मानते हैं, वे सामाजिक शोषण की उपेक्षा करते हैं।

विशेष तौर पर अम्बेडकरवादियों व अन्य सामाजिक न्यायवादियों की ओर से कहा जाता है कि मार्क्सवाद भारत में इसलिए संगत और उपयुक्त नहीं है क्योंकि वह आर्थिक शोषण को ही मुख्य मानता है जबकि भारत में सामाजिक शोषण सबसे बड़ी समस्या है और इसके जारी रहते आर्थिक शोषण के ख़िलाफ़ लड़ाई हो ही नहीं सकती। उनका यह भी कहना है कि मार्क्सवादी सामाजिक शोषण के दर्द को महसूस नहीं करते इसलिए मात्र इस दर्द को अपने जीवन में झेल रहे व्यक्ति ही इसके ख़िलाफ़ ईमानदारी से संघर्ष कर सकते हैं। इस सामाजिक शोषण को दूर कर सामाजिक न्याय क़ायम करने के लिए इनके द्वारा वर्तमान व्यवस्था के सभी अंगों में भागीदारी – ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’ को मुख्य समाधान के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है। यह काम आरक्षण व्यवस्था के द्वारा ही किया जा सकता है इसलिए सामाजिक शोषण की समाप्ति के संघर्ष का मुख्य नारा समाज के प्रत्येक क्षेत्र में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण और उसका पूरी ईमानदारी से लागू किया जाना बन जाता है। यहाँ यह साफ़ कर देना ज़रूरी है कि सभी समुदायों की भागीदारी का सिद्धान्त अपने आप में कोई ग़लत सिद्धान्त नहीं है। सवाल सिर्फ़़ यह है कि क्या पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था के शोषण के रहते हुए ही मात्र भागीदारी से सामाजिक शोषण और अत्याचार को समाप्त किया जा सकता है?

इसको समझने के लिए हम एक उदाहरण लेते हैं। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में 3 जनवरी 2017 को प्रकाशित समाचार से पता चलता है कि बेजवाड़ा विल्सन के नेतृत्व वाले सफ़ाई कर्मचारी आन्दोलन द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण में पाया गया कि पिछले 10 सालों में देश भर में 1344 सफ़ाई कर्मियों की मृत्यु सीवर-गटर में काम करते हुए हुई है। इसमें सबसे बड़ी तादाद 294 तमिलनाडु राज्य की है, जो कुल मौतों का 22% है अर्थात हर 4 में से एक से थोड़ा ही कम! वैसे तो इन मौतों की निरन्तर आती ख़बरों से यह संख्या भी वास्तविक संख्या से काफ़ी कम ही लगती है, फिर भी इसके आधार पर भी कुछ समझा जाना ज़रूरी है। हम सभी जानते हैं कि सीवर-गटर में उतरकर सफ़ाई का अत्यन्त अमानवीय कार्य दलित कर्मियों द्वारा किया जाता है और भारतीय राज्य व्यवस्था की मशीनरी इनकी जि़न्दगी की कोई क़ीमत न मानते हुए इनके लिए कोई सुरक्षात्मक प्रबन्ध नहीं करती इसलिए इतनी बड़ी तादाद में ये मृत्यु होती हैं।

लेकिन तमिलनाडु वह राज्य है जिसमें महाराष्ट्र के साथ ही ब्राह्मणवाद विरोधी वैचारिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का सबसे लम्बा इतिहास है; बल्कि वहाँ यह सबसे शक्तिशाली और प्रभावी राजनीतिक आन्दोलन है और पिछले 50 वर्षों से वहाँ निरन्तर ब्राह्मणवाद विरोधी विचारधारा वाले राजनीतिक दलों की सरकार चली आयी है। वहाँ आरक्षण भी सर्वाधिक – 69% – ही नहीं है, बल्कि लागू भी सर्वाधिक बेहतर तरीक़े से किया गया है। 1927 में ही मद्रास राज्य में नौकरियों के लिए निम्न आरक्षण व्यवस्था की गयी थी – 12 में से 2 ब्राह्मण, 5 ग़ैर ब्राह्मण हिन्दू, 2 मुस्लिम, 2 एंग्लोइण्डियन, 1 अनुसूचित जाति। फिर भी राज्य व्यवस्था द्वारा सुरक्षा का कोई इन्तज़ाम न होने से शोषित-पीड़ित दलित सफ़ाई कर्मी सबसे अधिक इसी राज्य में मृत्यु का शिकार हो रहे हैं, क्या इससे कुछ सवाल खड़े नहीं होते? इसी तरह अन्तर्जातीय विवाहों के बाद ‘ऑनर किलिंग’ के नाम पर दलितों की हत्याओं की ख़बरें भी इस राज्य से लगातार आती रहती हैं। आख़िर भागीदारी सुनिश्चित होने से भी इस राज्य में सामाजिक शोषण में कमी क्यों नहीं आयी?

यह उदाहरण दर्शाता है कि आरक्षण के अधिकार ने दलित, पिछड़ों, आदिवासियों के लिए शिक्षा और रोज़गार में प्रवेश के रास्ते खोले और उनके एक हिस्से को अत्यन्त ग़रीबी और वंचना भरे जीवन से मुक्त होकर तरक़्क़ी भी हासिल हुई। इस नाते यह एक प्रगतिशील व्यवस्था थी। लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था में मात्र आरक्षण से सबसे ग़रीब कमजोर तबक़ों के जीवन से अन्याय नहीं मिटाया जा सकता। सम्पत्तिहीन, अपनी श्रम शक्ति बेचने को मजबूर सर्वाधिक वंचित, ग़रीब लोग फिर भी शोषित तथा मजबूर ही रह जाते हैं क्योंकि आरक्षण सिर्फ़़ पूँजीवाद में उपलब्ध अत्यन्त सीमित शिक्षा-रोज़गार के अवसरों में से ही हिस्सा बाँटता है, सबको शिक्षा और रोज़गार नहीं दे सकता। अब तो शिक्षा के अत्यन्त महँगा होने व औपचारिक रोज़गार सृजन में भारी गिरावट की वजह से पहले से ही सीमित ये अवसर और भी न्यून होते जा रहे हैं। इसलिए मात्र जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी-भागीदारी वाले आरक्षण का नारा सबसे ग़रीब दलित-पिछड़ी जनता के हितों के अनुरूप नहीं है, उनको सामाजिक या शोषण के किसी भी अन्य रूप से मुक्त नहीं कर सकता। मौजूदा व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में भी जनवादी अधिकारों की बात हो तो इनके लिए तो अनिवार्य समान सार्वजनिक शिक्षा और सबके लिए न्यूनतम जीवन निर्वाह योग्य मज़दूरी वाला रोज़गार का सवाल ही असली सवाल है। इसलिए यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि सामाजिक शोषण के उन्मूलन के लिए ब्राह्मणवाद का विरोध ज़रूरी तो है लेकिन शिक्षा, रोज़गार के वास्तविक सवाल को पीछे छोड़कर किया गया ब्राह्मणवाद विरोध खोखला विरोध ही बनकर रह जाता है क्योंकि सर्वाधिक कमजोर, मजबूर लोग फिर भी उसी सामाजिक शोषण, अत्याचार का शिकार ही रह जाते हैं क्योंकि जि़न्दा रहने के लिए श्रम शक्ति के बाज़ार में खड़ा रहने की उनकी विवशता उन्हें भागीदारी के जनवादी अधिकार से भी वंचित कर देती है।

इसलिए यह कहना ज़रूरी है कि समाज में मनुष्यों के बीच ख़रीदने-बेचने के वर्तमान रिश्तों को समाप्त किये बग़ैर ही सामाजिक या आर्थिक किसी भी तरह के शोषण से मुक्ति और समानता स्थापित नहीं हो सकती। जिसको ऐसा लगता है कि इसके बिना ही यह काम किया जा सकता है वह अपने ख़यालों में मस्त रहने के लिए आज़ाद हैं, पर ख़ुद को बेचने के लिए मजबूर इंसान, ख़ुद को ख़रीदने वाले शख्स की बराबरी कभी हासिल नहीं कर सकता, यही सामाजिक विज्ञान की अकाट्य सच्चाई है। कुछ भी बड़ी-बड़ी बातें क्यों न करें पर ख़रीदने वाले सरमायेदार मालिकों को और भी अमीर बनाती तथा शोषित-वंचित सर्वहारा, जिसमें अधिकांश दलित, पिछड़े, आदिवासी हैं, को और भी भयंकर कंगाली और दुर्दिनों में धकेलती पूँजीवादी व्यवस्था के हिमायती मानव मर्यादा और समानता के हिमायती नहीं हो सकते!

सिर्फ़़ दर्द महसूस करने से ही दर्द दूर नहीं किया जा सकता; दर्द की वजह समझकर उपयुक्त दवा या सर्जरी करने से ही दर्द का इलाज हो सकता है! उसके लिए सिर्फ़़ भावना से काम नहीं चलेगा, शोषण से मुक्ति का विज्ञान भी सीखना ही होगा। मार्क्सवाद वही विज्ञान है! हाँ, मार्क्सवाद के विज्ञान का डॉक्टर बनने के लिए किसी पर किसी मनुस्मृति, आदि की भी कोई रोक नहीं है, जो शोषण से मुक्ति के संघर्ष में उतरना चाहे, वह इसका अध्ययन और प्रयोग कर सकता है! मार्क्सवाद पर आज भी दुनिया में किसी धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, राष्ट्रीयता का क़ब्ज़ा नहीं – जिन्हें शोषण से मुक्ति चाहिए उन्हें आगे बढ़कर इस पर अधिकार ज़माने से कोई नहीं रोक सकता, इसलिए फ़लाँ ने इस पर क़ब्ज़ा किया हुआ है, यह शिकायत तो न ही करें!

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2018

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