राजनीतिक उद्वेलन और प्रचार कार्य का महत्व

व्ला.इ. लेनिन

…सभी देशों के मज़दूर आन्दोलन के इतिहास से यह पता चलता है कि मज़दूरों के सबसे अग्रणी संस्तर ही समाजवाद के विचारों को सबसे पहले और सबसे अच्छी तरह ग्रहण करते हैं। इन संस्तरों से ही वे हरावल मज़दूर आते हैं जिन्हें हर मज़दूर आन्दोलन आगे बढ़ाता है, वे मज़दूर जो मज़दूर समूहों का पूरा विश्वास पा सकते हैं, जो सर्वहारा की शिक्षा और संगठन के कार्य में अपना सर्वस्व अर्पित करते हैं, जो पूरी तरह सचेतन रूप से समाजवाद को स्वीकार करते हैं और जिन्होंने स्वतन्त्र रूप से समाजवादी सिद्धान्त निरूपित तक कर लिये हैं। हर जानदार मज़दूर आन्दोलन अपने ऐसे नेता, अपने प्रूदों और वाइयाँ, वाइटलिंग और बेबेल सामने लाता रहा है। रूसी मज़दूर आन्दोलन भी इस मामले में यूरोप से पीछे नहीं रहने वाला है। आज जबकि शिक्षित समाज ईमानदारी भरे, ग़ैरक़ानूनी साहित्य में दिलचस्पी खो रहा है, तो मज़दूरों में ज्ञान की और समाजवाद की उत्कट अभिलाषा बढ़ रही है, मज़दूरों में सच्चे वीर सामने आ रहे हैं, जो अपने जीवन के बेहूदा हालात के बावजूद, फ़ैक्टरी में जड़ीभूत कर देने वाले जेल-जैसे श्रम के बावजूद ऐसा चरित्र और इतना दृढ़ संकल्प रखते हैं कि वे अध्ययन में जुटे रहते हैं और अपने को सचेतन सामाजिक-जनवादी ”मज़दूर बुद्धिजीवी” बनाते हैं। रूस में ऐसे ”मज़दूर बुद्धिजीवी” अब हैं और हमें इस बात के लिए पूरा प्रयत्न करना चाहिए कि इनकी संख्या निरन्तर बढ़े, इनकी उच्च बौद्धिक आवश्यकताएँ पूरी हों, कि इनके बीच से रूसी सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी के नेता बनें। वह समाचारपत्र, जो सभी रूसी सामाजिक-जनवादियों का मुखपत्र बनना चाहता है, उसे इन अग्रणी मज़दूरों के स्तर पर ही होना चाहिए, उसे न केवल अपने स्तर को कृत्रिम रूप से नीचा नहीं करना चाहिए, बल्कि उल्टे, उसे निरन्तर ऊँचा उठाना चाहिए, विश्व सामाजिक-जनवाद के सभी कार्यनीतिक, राजनीतिक और सैद्धान्तिक प्रश्नों पर ध्यान देना चाहिए। ऐसा होने पर ही मज़दूर बुद्धिजीवियों की आवश्यकताएँ पूरी होंगी और वे रूसी मज़दूरों के और परिणामत: रूसी क्रान्ति के ध्येयों को अपने हाथों में ले लेंगे।

संख्या में कम अग्रणी मज़दूरों के संस्तर के बाद औसत मज़दूरों का व्यापक संस्तर आता है। ये मज़दूर भी समाजवाद के लिए लालायित हैं, मज़दूर अध्ययन मण्डलों में भाग लेते हैं, समाजवादी अख़बार और पुस्तकें पढ़ते हैं, प्रचार-कार्य में भाग लेते हैं। उपरोक्त संस्तर से ये केवल इसी बात में भिन्न हैं कि ये सामाजिक-जनवादी मज़दूर आन्दोलन का स्वतन्‍त्र रूप से संचालन नहीं कर सकते। उस समाचारपत्र में, जो पार्टी का मुखपत्र होगा, औसत मज़दूर कुछ लेख नहीं समझ पायेगा, जटिल सैद्धान्तिक या व्यावहारिक प्रश्न उसके लिए पूरी तरह स्पष्ट नहीं होगा। इससे यह निष्कर्ष कतई नहीं निकलता कि अख़बार को अपना स्तर अपने अधिकांश पाठकों के स्तर तक नीचे लाना चाहिए। उल्टे, अख़बार को उनका स्तर ऊँचा उठाना चाहिए और औसत मज़दूरों के संस्तर से अग्रणी मज़दूरों को सामने लाने में मदद करनी चाहिए। मज़दूर आन्दोलन की घटनाओं में और आन्दोलनकारी प्रचार के तात्कालिक प्रश्नों में ही सबसे अधिक रुचि लेने वाले तथा स्थानीय व्यावहारिक गतिविधियों में डूबे हुए ऐसे मज़दूरों को अपने हर क़दम के साथ सारे रूसी मज़दूर आन्दोलन का, उसके ऐतिहासिक कार्यभार का, समाजवाद के अन्तिम ध्येय का विचार जोड़ना चाहिए, इसलिए ऐसे समाचारपत्र को जिसके अधिकांश पाठक औसत मज़दूर ही हैं, हर स्थानीय और संकीर्ण प्रश्न के साथ समाजवाद और राजनीतिक संघर्ष को जोड़ना चाहिए।

अन्तत:, औसत संस्तर के बाद सर्वहारा के निम्नतर संस्तर के समूह आते हैं। बहुत सम्भव है कि समाजवादी समाचारपत्र पूरी तरह या प्राय: पूरी तरह उनकी समझ से परे होगा (आख़िर पश्चिमी यूरोप में भी सामाजिक-जनवादी मतदाताओं की संख्या सामाजिक-जनवादी अख़बारों के पाठकों की संख्या से कहीं अधिक है), लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना बिल्कुल बेतुका होगा कि सामाजिक-जनवादियों के समाचारपत्र को मज़दूरों के यथासम्भव अधिक निम्नतर संस्तर के अनुरूप बनाना चाहिए। इससे तो केवल यही निष्कर्ष निकलता है कि ऐसे संस्तरों पर प्रचार के दूसरे साधनों से प्रभाव डालना चाहिए : अधिक सरल, सुबोध भाषा में लिखी पुस्तिकाओं, मौखिक प्रचार तथा मुख्यत: स्थानीय घटनाओं पर परचों द्वारा। सामाजिक-जनवादियों को तो इतने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए : बहुत सम्भव है कि मज़दूरों के निम्नतर संस्तरों में वर्ग-चेतना जगाने के पहले क़दम क़ानूनी शिक्षात्मक कार्यों के रूप में ही उठाये जाने चाहिए। पार्टी के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि वह इन कार्यों का उपयोग करे, इन्हें उस दिशा में ही लक्षित करे, जहाँ इनकी सबसे अधिक आवश्यकता है; क़ानूनी ढंग से काम करने वालों को उस ज़मीन को जोतने के लिए भेजे, जिसमें बाद में सामाजिक-जनवादी आन्दोलनकारी प्रचारक बीज बोयेंगे। बेशक मज़दूरों के निम्नतर संस्तरों में प्रचार-कार्य में प्रचारकों को अपनी निजी विशिष्टताओं, स्थान, व्यवसाय आदि की विशिष्टताओं का उपयोग करने की सर्वाधिक व्यापक सम्भावनाएँ मिलनी चाहिए। बर्नस्टीन के ख़िलाफ़ पुस्तक में काउत्स्की लिखते हैं, ”कार्यनीति और प्रचार को गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए”। ”प्रचार का तरीक़ा व्यक्तिगत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। प्रचार-कार्य में हर प्रचारक को वे साधन चुनने की छूट देनी चाहिए, जो उसके पास हैं : कोई प्रचारक अपने जोश से सबसे अधिक प्रभावित करता है तो कोई दूसरा अपने तीखे कटाक्षों से, जबकि तीसरा ढेरों मिसालें देकर, वग़ैरह-वग़ैरह। प्रचारक के अनुरूप होते हुए प्रचार को जनता के भी अनुरूप होना चाहिए। प्रचारक को ऐसे बोलना चाहिए कि सुनने वाले उसकी बातें समझें; उसे यह ध्यान में रखना चाहिए कि श्रोता क्या कुछ जानते हैं। कहना न होगा कि ये सब बातें केवल किसानों के बीच प्रचार-कार्य पर ही लागू नहीं होती हैं। गाड़ीवानों से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए, जैसे जहाज़ियों से और जहाज़ियों से वैसे बात नहीं करनी चाहिए, जैसे छापाख़ाने के मज़दूरों से। प्रचार-कार्य व्यक्तियों के अनुरूप होना चाहिए, लेकिन हमारी कार्यनीति — हमारी राजनीतिक गतिविधियाँ एक ही होनी चाहिए” (पृ. 2-3)। सामाजिक-जनवादी सिद्धान्त के अग्रणी प्रतिनिधि के इन शब्दों में पार्टी की सारी गतिविधियों में प्रचार-कार्य का मर्म बड़ी अच्छी तरह व्यक्त किया गया है। ये शब्द बताते हैं कि उन लोगों के सन्देह कितने निराधार हैं, जो यह सोचते हैं कि राजनीतिक संघर्ष चलाने वाली क्रान्तिकारी पार्टी गठित किया जाना आन्दोलनकारी प्रचार-कार्य में बाधक होगा, उसे पृष्ठभूमि में डाल देगा या प्रचारकों की स्वतन्त्रता सीमित करेगा। इसके विपरीत सुसंगठित पार्टी ही व्यापक प्रचार-कार्य कर सकती है, सभी आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों पर प्रचारकों को आवश्यक निर्देश (और सामग्री) दे सकती है, प्रचार-कार्य की हर स्थानीय सफलता का उपयोग सभी रूसी मज़दूरों की शिक्षा के लिए कर सकती है, प्रचारकों को ऐसे लोगों के बीच या ऐसे स्थानों पर भेज सकती है, जहाँ वे सर्वाधिक सफलता से काम कर सकते हैं। सुसंगठित पार्टी में ही प्रचारक की योग्यता रखने वाले लोग अपने को पूरी तरह इस कार्य को अर्पित करने की दशा में होंगे, जिससे प्रचार-कार्य का भी और सामाजिक-जनवादी कार्य के शेष सभी पहलुओं का भी हित होगा। इससे यह पता चलता है कि जो व्यक्ति आर्थिक संघर्ष के पीछे राजनीतिक उद्वेलन और प्रचार-कार्य को भुला देता है, जो मज़दूर आन्दोलन को राजनीतिक पार्टी के संघर्ष में संगठित करने की आवश्यकता को भुला देता है, वह, और सब बातों के अलावा सर्वहारा के निम्नतर संस्तरों को मज़दूरों के ध्येय में शामिल करने का कार्य सुदृढ़ आधार पर और सफलतापूर्वक करने के अवसर तक से अपने आप को वंचित करता है।

(‘रूसी सामाजिक जनवादियों के बीच में प्रतिगामी प्रवृत्ति’ शीर्षक लेख (1899 में लिखित) का एक अंश)

नोट: 1. इस उद्धरण का शीर्षक हमने दिया है — सं.; 2. इस लेख में ‘सामाजिक जनवादियों’ शब्द का प्रयोग कम्युनिस्टों के लिए किया गया है। बाद में इसका इस्तेमाल संशोधनवादियों के लिए किया जाने लगा। — सं.

 

मज़दूर बिगुलमार्च 2012

 


 

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