साढ़े चार साल के मोदी राज की कमाई!
ध्वस्त अर्थव्यवस्था, घपले-घोटाले, महँगाई-बेरोज़गारी,
जन-अधिकारों पर डाका और नफ़रत की खेती की ख़ून से सिंचाई

संपादक मण्डल

अपना कार्यकाल पूरा करते-करते मोदी सरकार की कलई पूरी तरह खुलने लगी है। जब सारी जांच एजेंसियाँ जेब में हों और मीडिया की हैसियत पूँजीपतियों और उनकी मैनेजिंग कमेटी (सरकार) के दरवाजे़ पर बैठी हुई कुतिया से ज़्यादा न रह गयी हो तो सच्चाई को काफ़ी दिनों तक छिपाया जा सकता है। मगर गन्दगी इतनी ज़्यादा बढ़ गयी है कि ध्यान भटकाने के तमाम हथकण्डों और ढाँकने-तोपने की सभी तिकड़मों के बावजूद बदबू चारों ओर फैलने लगी है और रामनामी दुशाले के नीचे से मैला बहकर बाहर आने लगा है।

‘’ना खाऊँगा ना खाने दूँगा’’ का नारा उछालने वाले मोदी की हरचन्द कोशिशों के बावजूद राफेल घोटाले की सच्चाई छिपाये नहीं छिप रही है। एक झूठ को ढँकने की कोशिश में सरकार दस झूठ बोल रही है और एक-एक करके सब उजागर हो जा रहे हैं।  बात-बात पर सदाचार और शुचिता की दुहाई देने वाले हिन्दुत्ववादी फ़ासिस्ट किसी भी मायने में दूसरी पार्टियों से कम भ्रष्ट नहीं होते यह तो पहले भी साबित हो चुका है। मगर इस सरकार ने तो घपलों के तमाम कीर्तिमान ध्वस्त कर दिये हैं। राफेल घोटाला तो रक्षा सौदों में अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है ही, मध्य प्रदेश में व्यापम, बिहार में सृजन, छत्तीसगढ़ में चावल घोटाले सहित इनकी राज्य सरकारें भी घोटालों की होड़ में किसी से पीछे नहीं हैं। यहाँ पर हम घोटालों की सूची नहीं गिनाने जा रहे हैं। केन्द्र से लेकर राज्य तक हर स्तर पर इतने घोटाले हैं कि नाम गिनाने में ही पूरा पन्ना भर जायेगा। वैसे भी चोर की नीयत तो एक ही चोरी से पता चल जाती है। जिस चौकीदार की नाक के नीचे से एक के बाद चोर नोटों की थैलियाँ लेकर निकल जाते हों और विदेशों में बैठकर क़ानून को ठेंगा दिखाते रहते हों उसे कौन अपने घर की रखवाली सौंपता है? तमाम सार्वजनिक प्रतिष्ठान (जो जनता की हड्डियाँ निचोड़कर संचित सरकारी खजाने से खड़े किये गये हैं) और जल, जंगल, ज़मीन, खनिजों के भण्डार आदि प्राकृतिक सम्पदा कौड़ियों के मोल पूँजीपतियों को बेचना भी अपने आप में एक भयंकर घोटाला है, जिसकी राशि सभी घोटालों से अधिक होगी।

और यह गै़र-कानूनी लूट तब है, जब श्रम क़ानूनों में भारी बदलावों के बाद, मज़दूरों की हड्डियाँ निचोड़ने के लिए पूँजीपतियों को छुट्टा छोड़ दिया गया है। उत्पादन-स्थल पर अपना हड्डी-निचोड़ शोषण करवाने के बाद, आम आदमी अपनी छोटी-छोटी बचतों से बैंक में जो पैसा रखता है या बीमा में जो पैसा लगाता है, उसे पूँजीपति निवेश करके एक से आठ कमाता है, और आम आदमी को बैंक से ब्याज के रूप में नगण्य राशि मिलती है। मोदी सरकार की कारगुजारियों से अब इस राशि के भी डूब जाने का ख़तरा मँडराता हुआ दिख रहा है। (देखें पेज 16)

फ़र्ज़ी आँकड़े दिखाकर विकास का ढोल चाहे जितना पीट लिया जाये, असलियत यह है कि अब इस सरकार के दावे दुनिया भर में मज़ाक का विषय बन चुके हैं। औद्योगिक उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है, खेती भयंकर संकट में है, पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें आपस में रेस लगा रही हैं, डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत गिरते जाने के कारण आयात महँगे हो रहे हैं जिसका सीधा असर महँगाई पर पड़ रहा है। बेरोज़गारी की हालत यह है कि मुट्ठी भर नौकरियों के लिए लाखों लोग पिले पड़ रहे हैं। कारख़ाना इलाक़ों में बेरोज़गार मज़दूरों की भरमार है, जिन्हें काम मिल रहा है वे भी मालिक की मनमानी शर्तों पर काम करने को मजबूर हैं। खाने-पीने, मकान के किरायों, बिजली से लेकर दवा-इलाज और बच्चों की पढ़ाई तक के बढ़ते ख़र्चों ने मज़दूरों ही नहीं, आम मध्यवर्गीय आबादी की भी कमर तोड़कर रख दी है। ऊपर से सरकार उनकी पेंशन और बीमे की रकमों पर भी डाका डाल रही है।

लोग इस खुली डकैती के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठायें और जाति-धर्म के नाम पर एक-दूसरे का ख़ून बहाने में भी लगे रहें इसके लिए इस सरकार और आर.एस.एस. के तमाम संगठनों ने समाज में ज़हर फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब चुनाव सिर पर आ जाने और कोई भी जुमला काम नहीं आने के बाद ठगों का यह गिरोह फिर से राम मन्दिर का राग अलापने में जुट गया है और जगह-जगह साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने का कोई मौक़ा नहीं गँवा रहा है। केरल में सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर संघी वहाँ उत्पात मचाये हुए हैं। कांग्रेस भी अपने टुच्चे चुनावी स्वार्थों के चलते उसमें कूद गयी है जिसका फ़ायदा भी संघियों को ही मिलेगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जगह-जगह छोटी-छोटी घटनाओं को साम्प्रदायिक रंग देकर दंगा भड़काने की कोशिश की जा रही है। मध्य प्रदेश और राजस्थान से लेकर बिहार, महाराष्ट्र और कई अन्य राज्यों से भी ऐसी ख़बरें आ रही हैं। संघ, भाजपा, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद आदि से जुड़े लोग स्थानीय मनमुटाव और विवादों को भड़काने और धार्मिक रंग देने का काम कर रहे हैं। जिन विवादों को स्थानीय लोग आपस में बातचीत करके सुलझा सकते थे उन्हें जानबूझकर भावनाएँ भड़काने के लिए बढ़ाया जाता है। बड़े पैमाने पर झूठी अफ़वाहों का सहारा लिया जा रहा है और भाजपा के आईटी सेल के लोग व्हाट्सऐप और फे़सबुक से जमकर झूठ फैला रहे हैं। अब तो सब जानते हैं कि 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों में भाजपा के नेताओं और उनसे जुड़े लोगों ने कई साल पुराना पाकिस्तान का वीडियो दिखाकर जनता को भड़काया था। हैदराबाद में तो बजरंग दल के कार्यकर्ता हिन्दू मंदिरों में गोमांस फेंकते हुए पकड़े जा चुके हैं और कर्नाटक में इसी संगठन के लोगों को पाकिस्तान का झंडा फहराते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था।

संघी अब बड़े दंगे भड़काने के बजाय स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे दंगे कराने और साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की रणनीति पर काम कर रहें हैं जिससे राष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा शोर भी न मचे और चुनाव में फसल काटने लायक पर्याप्त नफ़रत भी फैलायी जा सके।

कहते हैं कि रावण अपने दस मुँहों से बोलता था। लेकिन रावण हर मुँह से एक ही बात बोलता था। मगर मोदी सरकार और उसके पीछे खड़े संघ परिवार के अनेक मुँह हैं और सब अलग-अलग बातें एक साथ बोलते रहते हैं। लोगों का ध्यान बँटाने और उन्हें अपने असली इरादों के बारे में पूरी तरह भ्रम में डालने का यह उनका पुराना आज़माया हुआ नुस्ख़ा है। चुनाव के पहले से ही यह खेल जारी था और सत्ता में आने के बाद और भी चतुराई के साथ खेला जा रहा है। एक ओर नरेन्द्र मोदी मेल-मिलाप की और झगड़े मिटाने की बातें करते हैं और अपने आप को उदारवादी और सबको साथ लेकर चलने वाला दिखाने के जुमले उछालते हैं, दूसरी ओर उन्हीं की सरकार और पार्टी के लोग साम्प्रदायिक विष फैलाने और धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के तरह-तरह के हथकण्डों में लगे हुए हैं। इतिहास, शिक्षा और संस्कृति के पूरे ढाँचे का जैसा भगवाकरण किया गया है और पुलिस, न्यायपालिका, चुनाव आयोग आदि संस्थाओं में जिस तरह से भगवा रंग में लोगों को भरा गया है, वह संघ परिवार के एजेण्डा को आगे बढ़ाने के काम आता रहेगा, चाहे ये सत्ता में रहें या न रहें। 

शहरों और गाँवों के मध्यवर्गीय और सम्पन्न लोगों में आधार बढ़ाने के साथ आर.एस.एस. बहुत व्यवस्थित ढंग से शहरों की मज़दूर बस्तियों में पैर पसार रहा है। वे जानते हैं कि आने वाले दिनों में मज़दूर वर्ग ही उसके ख़िलाफ़ सबसे मज़बूती से खड़ा होगा। इसीलिए वे अभी से उसके बीच अपना ज़हरीला प्रचार करने में लगे हैं। किसानी पृष्ठभूमि से उजड़कर आये, निराश-बेहाल असंगठित युवा मज़दूरों और लम्पट सर्वहारा की सामाजिक परतों के बीच फासिस्ट हमेशा से भरती करने में कामयाब रहते हैं। और यही काम वे हमारे यहाँ भी कर रहे हैं। शहरों में बेरोज़गार युवाओं की भरी आबादी उनके झूठे प्रचार का शिकार बन रही है।

मज़दूरों और मेहनतकशों को समझना होगा कि साम्प्रदायिक फासीवाद पूँजीपति वर्ग की सेवा करता है। साम्प्रदायिक फासीवाद की राजनीति झूठा प्रचार या दुष्प्रचार करके सबसे पहले एक नकली दुश्मन को खड़ा करती है ताकि मज़दूरों-मेहनकशों का शोषण करने वाले असली दुश्मन यानी पूँजीपति वर्ग को जनता के ग़ुस्से से बचाया जा सके। ये लोग न सिर्फ़ मज़दूरों के दुश्मन हैं बल्कि ये पूरे समाज के भी दुश्मन हैं। इनका मुक़ाबला करने के लिए मज़दूर वर्ग को न सिर्फ़ अपने वर्ग हितों की रक्षा के लिए संगठित होकर पूँजीपति वर्ग के ख़िलाफ़ सुनियोजित लम्बी लड़ाई की तैयारी करनी होगी, बल्कि साथ ही साथ महँगाई, बेरोज़गारी, महिलाओं की बराबरी तथा जाति और धर्म की कट्टरता के ख़िलाफ़ भी जनता को जागरूक करते हुए अपने जनवादी अधिकारों की लड़ाई को संगठित करना होगा।

उन्हें यह समझना होगा कि औद्योगिक कारपोरेट घराने और वित्त क्षेत्रा के मगरमच्छ नवउदारवाद की नीतियों को बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से चलाना चाहते हैं। इसके लिये एक निरंकुश सत्ता की ज़रूरत है। इसीलिए शासक वर्ग नरेन्द्र मोदी को सत्ता में लेकर आये हैं। धार्मिक कट्टरपंथी फासीवाद के वर्तमान उभार का कारण नरेन्द्र मोदी नहीं है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हिन्दुत्ववादी फासीवाद के आधुनिक संस्करण के उभार की जड़ें मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के असाध्य ढाँचागत संकट में हैं। इस पूँजीवादी संकट का एक क्रान्तिकारी समाधान हो सकता है और वह है, पूँजीवादी उत्पादन और विनिमय की तथा शासन की प्रणाली को ही जड़ से बदल देना। इस समाधान की दिशा में यदि समाज आगे नहीं बढ़ेगा तो पूँजीवादी संकट का फासीवादी समाधान ही सामने आयेगा जिसका अर्थ होगा, जनवादी प्रतिरोध की हर सीमित गुंजाइश को भी समाप्त करके मेहनतकश जनता पर पूँजी की नग्न-निरंकुश तानाशाही स्थापित करना। और फिलहाल यही विकल्प भारतीय पूँजीपति वर्ग ने चुन लिया है।

पूँजीवादी संकट का क्रान्तिकारी समाधान यदि अस्तित्व में नहीं आयेगा, तो लाज़िमी तौर पर उसका फासीवादी समाधान सामने आयेगा। क्रान्ति के लिए यदि मज़दूर वर्ग संगठित नहीं होगा तो जनता फासीवादी बर्बरता का कहर झेलने के लिए अभिशप्त होगी।

जहाँ तक संसदीय सुअरबाड़े में दशकों से लोट लगाते चुनावी वामपंथी भाँड़ों की बात है, उनकी स्थिति सर्वाधिक हास्यास्पद है। ये चुनावी वामपंथी आर.एस.एस.-भाजपा को हिन्दुत्ववादी फासीवादी कहते रहते हैं, पर गैरकांग्रेस-गैरभाजपा विकल्प बनाने की कोशिश में जिन दलों के साथ साम्प्रदायिकता-विरोधी सम्मेलन आदि करते रहते हैं और मोर्चा बनाने की हिकमतें लगाते रहते हैं, उनमें से अधिकांश कभी न कभी सत्ता की सेज पर भाजपा के साथ रात बिता चुके हैं। जब उनसे भाव नहीं मिलता तो तीन प्रमुख संशोधनवादी पार्टियाँ – भाकपा, माकपा, भाकपा (माले-लिबरेशन) आपस में ही मोर्चा बनाकर टीन की तलवार से फासिस्टों का मुक़ाबला करने की रणनीति बनाने लगती हैं। इन चुनावी वामपंथी खोमचेवालों से पूछा जाना चाहिए कि फासीवाद के विरोध की रणनीति के बारे में बीसवीं सदी के इतिहास की और मार्क्सवाद की शिक्षाएँ क्या हैं? क्या फासीवाद का मुक़ाबला सिर्फ़ संसद में बुर्जुआ दलों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाकर, या फिर कुछ सम्मेलन और अनुष्ठानिक कार्यक्रम करके किया जा सकता है? अगर ये बात-बहादुर मज़दूर वर्ग की पार्टी होने का दम भरते हैं (और इनके पास सीटू और एटक जैसी बड़ी राष्ट्रीय ट्रेड यूनियनें भी हैं) तो 1990 (आडवानी की रथयात्रा), 1992 (बाबरी मस्जिद ध्वंस), या 2002 (गुजरात नरसंहार) से लेकर अब तक हिन्दुत्ववादी फासीवाद के विरुद्ध व्यापक मेहनतकश जनता की जुझारू लामबन्दी के लिए इन्होंने क्या किया है? संघ परिवार का फासीवाद एक सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलन है और मेहनतकश जनता का जुझारू आन्दोलन ही इसका मुक़ाबला कर सकता है। लेकिन इन संशोधनवादी पार्टियों ने तो 70 वर्षों से मज़दूर वर्ग को केवल दुअन्नी-चवन्नी की अर्थवादी लड़ाइयों में उलझाकर उसकी चेतना को भ्रष्ट करने का ही काम किया है। इनकी ट्रेडयूनियनों के भ्रष्ट नौकरशाह नेताओं ने मज़दूरों की जनवादी चेतना को भी कुन्द बनाने का ही काम किया है। मज़दूर वर्ग की राजनीति के नाम पर मज़दूरों के ये ग़द्दार केवल पोलिंग बूथ का ही रास्ता दिखाते रहे हैं। ये नकली वामपंथी, जो हमेशा से पूँजीवादी व्यवस्था की दूसरी रक्षा पंक्ति का काम करते रहे हैं, उनका ‘’समाजवाद’’ आज गल रहे कोढ़ जितना घिनौना हो चुका है। संसदीय राजनीति से और आर्थिक लड़ाइयों से इतर वर्ग संघर्ष की राजनीति को तो ज़माने पहले ये लोग तिलांजलि दे चुके हैं। अब तो उनकी चर्चा तक से इनके कलेजे काँप उठते हैं।

प्रश्न केवल चुनावी राजनीति का है ही नहीं। पूँजीवादी संकट पूरे समाज में (क्रान्तिकारी शक्तियों की प्रभावी उपस्थिति के अभाव में) फासीवादी प्रवृत्तियों और संस्कृति के लिए अनुकूल ज़मीन तैयार कर रहा है। संघ परिवार अपने तमाम अनुषंगी संगठनों के सहारे बहुत व्यवस्थित ढंग से इस ज़मीन पर अपनी फसलें बो रहा है। वह व्यापारियों और शहरी मध्यवर्ग में ही नहीं, आदिवासियों से लेकर शहरी मज़दूरों की बस्तियों तक में पैठकर काम कर रहा है। इसका जवाब एक ही हो सकता है। क्रान्तिकारी शक्तियाँ चाहे जितनी कमज़ोर हों, उन्हें बुनियादी वर्गों, विशेषकर मज़दूर वर्ग के बीच राजनीतिक प्रचार-उद्वेलन, लामबंदी और संगठन के काम को तेज़ करना होगा। जैसाकि भगतसिंह ने कहा था, जनता की वर्गीय चेतना को उन्नत और संगठित करके ही साम्प्रदायिकता का मुक़ाबला किया जा सकता है।

बुर्जुआ मानवतावादी अपीलें और धर्मनिरपेक्षता का राग अलापना कभी भी साम्प्रदायिक फासीवाद का मुक़ाबला नहीं कर पाया है और न ही कर पायेगा। सर्वहारा वर्ग-चेतना की ज़मीन पर खड़ा होकर किया जाने वाला जुझारू और आक्रामक प्रचार ही इन विचारों के असर को तोड़ सकता है। हमें तमाम आर्थिक और सामाजिक दिक़्क़तों की असली जड़ को आम जनता के सामने नंगा करना होगा और साम्प्रदायिक प्रचार के पीछे के असली इरादे पर से सभी नकाब नोच डालने होंगे। साथ ही, ऐसा प्रचार करने वाले व्यक्तियों की असलियत को भी हमें जनता के बीच लाना होगा और बताना होगा कि उनका असली मकसद क्या है। धार्मिक कट्टरपन्थी फासीवाद का मुक़ाबला इसी ज़मीन पर खड़े होकर किया जा सकता है। वर्ग-निरपेक्ष धर्मनिरपेक्षता और ‘मज़हब नहीं सिखाता’ जैसी शेरो-शायरी का जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

हिटलर के प्रचार मन्त्री गोयबल्स ने एक बार कहा था कि यदि किसी झूठ को सौ बार दोहराओ तो वह सच बन जाता है। यही सारी दुनिया के फासिस्टों के प्रचार का मूलमंत्र है। आज मोदी की इस बात के लिए बड़ी तारीफ़ की जाती है कि वह मीडिया का कुशल इस्तेमाल करने में बहुत माहिर है। लेकिन यह तो तमाम फासिस्टों की ख़ूबी होती है। मोदी को ‘’विकास पुरुष’’ के बतौर पेश करने में लगे मीडिया को कभी यह नहीं दिखायी पड़ता कि गुजरात में मोदी के तीन बार के शासन में मज़दूरों और ग़रीबों की क्या हालत हुई। मेहनतकशों को ऐसे झूठे प्रचारों से भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। उन्हें यह समझ लेना होगा कि तेज़ विकास की राह पर देश को सरपट दौड़ाने के तमाम दावों का मतलब होता है मज़दूरों की लूट-खसोट में और बढ़ोत्तरी। ऐसे ‘विकास’ के रथ के पहिए हमेशा ही मेहनतकशों और ग़रीबों के ख़ून से लथपथ होते हैं। लेकिन इतिहास इस बात का भी गवाह है कि हर फासिस्ट तानाशाह को धूल में मिलाने का काम भी मज़दूर वर्ग की लौह मुट्ठी ने ही किया है!

हमें फासीवाद को विचारधारा और राजनीति में तो परास्त करना ही होगा, लेकिन साथ ही हमें उन्हें सड़क पर भी परास्त करना होगा। इसके लिए हमें मज़दूरों और नौजवानों के लड़ाकू और जुझारू संगठन बनाने होंगे। ग़ौरतलब है कि जर्मनी के कम्युनिस्टों ने फासीवादी गिरोहों से निपटने के लिए कारख़ाना ब्रिगेडें खड़ी की थीं, जो सड़क पर फासीवादी गुण्डों के हमलों का जवाब देने और उन्हें सबक सिखाने का काम कारगर तरीके से करती थीं। बाद में यह प्रयोग आगे नहीं बढ़ सका और फासीवादियों ने जर्मनी में अपनी सत्ता क़ायम कर ली। मज़दूर वर्ग का बड़ा हिस्सा वहाँ तब भी सामाजिक जनवादियों के प्रभाव में ही था और क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों की पकड़ उतनी मज़बूत नहीं हो पायी थी। लेकिन उस छोटे-से प्रयोग ने दिखा दिया था कि फासीवादी गुण्डों से सड़क पर ही निपटा जा सकता है। उनके साथ तर्क करने और वाद-विवाद करने की कोई गुंजाइश नहीं होती है। साम्प्रदायिक दंगों को रोकने और फासीवादी हमलों को रोकने के लिए ऐसे ही दस्ते छात्र और युवा मोर्चे पर भी बनाये जाने चाहिए। छात्रों-युवाओं को ऐसे हमलों से निपटने के लिए आत्मरक्षा और जनरक्षा हेतु शारीरिक प्रशिक्षण और मार्शल आर्ट्स का प्रशिक्षण देने का काम भी क्रान्तिकारी छात्र-युवा संगठनों को करना चाहिए। उन्हें स्पोर्ट्स क्लब, जिम, मनोरंजन क्लब आदि जैसी संस्थाएँ खड़ी करनी चाहिए, जहाँ राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण और तार्किकता व वैज्ञानिकता के प्रसार का काम भी किया जाये।

हम एक बार फिर मेहनतकश साथियों और आम नागरिकों से कहना चाहते हैं कि साम्प्रदायिक फासीवादियों के भड़काऊ बयानों से अपने ख़ून में उबाल लाने से पहले ख़ुद से पूछियेः क्या ऐसे दंगों में कभी सिंघल, तोगड़िया, ओवैसी, आज़म खाँ, मुलायमसिंह यादव, राज ठाकरे, आडवाणी या योगी-मोदी जैसे लोग मरते हैं? क्या कभी उनके बच्चों का क़त्ल होता है? क्या कभी उनके घर जलते हैं? हमारे लोगों की बेनाम लाशें सड़कों पर पड़ी धू-धू जलतीं हैं। सारे के सारे धार्मिक कट्टरपन्थी तो भड़काऊ बयान देकर अपनी ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा, पुलिस और गाड़ियों के रेले के साथ अपने महलों में वापस लौट जाते हैं। और हम उनके झाँसे में आकर अपने ही वर्ग भाइयों से लड़ते हैं। इसलिए, धार्मिक जुनूनी प्रचार की झोंक में बहने के बजाय इसकी असलियत को समझिये और अपनी ज़िन्दगी को बदलने की असली लड़ाई में लगने के बारे में सोचिये। सभी मेहनतकशों की एकता इसकी पहली शर्त है!

मज़दूर बिगुल, सितम्‍बर-अक्‍टूबर-नवम्‍बर 2018


 

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