भारत में विदेशी कौन माना जायेगा?

सवाल : भारत में विदेशी कौन माना जायेगा?
जवाब : जो एनआरसी में अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पायेगा।

सवाल : नागरिकता कौन साबित नहीं कर पायेगा?
जवाब : जिसके पास उसे साबित करने के लिए दस्तावेज़ नहीं होंगे।

सवाल : दस्तावेज़ किसके पास नहीं होंगे?
जवाब : जो पढ़ा-लिखा नहीं है, भूमिहीन है, मज़दूर है, जिसके पास रहने के लिए घर नहीं है, जो रोज़ी-रोटी के लिए गाँवों से पलायन कर शहरों में झुग्गियोंमें रहता है, जो अपने काग़ज़ात सँभाल कर रखने की क्षमता नहीं रखता, जो फ़र्ज़ी काग़ज़ात नहीं बनवा सकता।

सवाल : ये कौन लोग हैं?
जवाब : सभी वर्ग के ग़रीब, अनपढ़, आदिवासी, दलित, अति पिछड़े।

सवाल : जो विदेशी घोषित होगा उसका क्या होगा?
जवाब : पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान या बंगलादेश से आये हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी को नागरिकता दी जायेगी लेकिन मुसलमानों को नागरिकता नहीं दी जायेगी।

सवाल : मुसलमानों और उन ग़ैर-मुस्लिमों को कहाँ भेजा जायेगा जो पाकिस्तान, बंगलादेश या अफ़ग़ानिस्तान के उक्त अल्पसंख्यक नहीं हैं?
जवाब : कहीं नहीं, बस उन्हें डिटेंशन कैम्पों में रखा जायेगा क्योंकि कोई देश उन्हें लेने के लिए राज़ी नहीं होगा और उनको कोई अधिकार प्राप्त नहीं होंगे।

सवाल : क्या सरकार ने किसी देश से उसके नागरिकों के भारत में घुसपैठ के बारे में बात की है?
जवाब : नहीं, बल्कि बंगलादेश की प्रधानमंत्री को आश्वस्त किया गया है कि एनआरसी से उन्हें चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है।

सवाल : लेकिन अमित शाह तो बार-बार कहते हैं कि हिन्दुओं को चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है?
जवाब : जो हिन्दू एनआरसी में अपना नाम शामिल नहीं करा पायेंगे उनके लिए एक ही रास्ता होगा कि वे लिखित दें कि वे पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान या बंगलादेश के नागरिक थे और धार्मिक उत्पीड़न के चलते पलायन कर भारत आ गये।

सवाल : अगर अनागरिक घोषित किये गये उन ग़ैर-मुस्लिमों की संख्या उन देशों में बसने वाले अल्पसंख्यकों से अधिक हुई तो?
जवाब : सरकार जाने, हो सकता है उन्हें भी उन लोगों को भी डिटेंशन कैम्पों में डाल दिया जाये।

सवाल : मतलब?
जवाब : मतलब यह कि उन तीन देशों में हिन्दू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी की जितनी संख्या थी उनमें जो वहाँ रह गये उनकी संख्या घटाने के बाद जो संख्या बचेगी, माना जायेगा कि सब भारत में घुसपैठ कर गये। अगर उससे अधिक लोग अनागरिक साबित होते हैं तो हो सकता है किसी अन्य देश के माने जायें और हो सकता है कि वे भी डिटेंशन कैम्पों में रहें।

सवाल : इस तरह नागरिकता पाने वालों की हैसियत क्या बनेगी?
जवाब : डिटेंशन कैम्प में जाने का दंश झेलने के बजाय अपमान का घूँट पीकर नागरिकता स्वीकार करनी पड़ेगी।

सवाल : जिन समाज के लोगों को आरक्षण समेत कई सुविधाएँ और अधिकार प्राप्त हैं, नये नागरिक के बतौर उनका क्या होगा?
जवाब : सरकार की कृपा का इन्तज़ार, कुछ मिला तो ठीक, नहीं तो…।

सवाल : लेकिन सरकार में मंत्री, संतरी, सत्ता दल के नेता कार्यकर्ता सब तो केवल यही कह रहे हैं कि मुसलमानों को चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है?
जवाब : उन्होंने तो संसद में उन देशों के अल्पसंख्यकों के आँकड़े तक ग़लत पेश किये हैं। मुसलमान हों या गै़र-मुस्लिम, मन कहे तो भरोसा कर लें।

– मसीहुद्दीन संजरी
(फ़ेसबुक पोस्ट से साभार)

मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2019


 

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