‘बच्चों का कारख़ाना’

– गीतिका

पूँजीवाद अपने जन्मकाल से ही हर चीज़ को बिकाऊ माल में तब्दील करने की फ़‍िराक में रहता है। इंसानी रिश्‍ते-नाते और भावनाएँ तक ख़रीदफ़रोख्‍़त की चीज़ बन जाती हैं। लेकिन अब मुनाफ़े की अन्धी हवस में पूँजीवाद इतना गिर चुका है कि वह बच्चा पैदा करने की एक फ़ैक्टरी तक खोलने लगा है जिसमें महिलाओं और बच्चों की ख़रीदफ़रोख्‍़त होती है। नाइजीरिया के दक्षिणी-पश्चिमी राज्य आगन में ऐसी ही एक ‘बेबी फैक्ट्री’ हाल में पकड़ी गयी। वहाँ एक प्राइवेट मेडिकल क्लीनिक पर छापा मारकर जब पुलिस ने 13 लोगों को मुक्त कराया, तब यह घटना सामने आयी। इनमें 6 गर्भवती औरतें और एक बच्चा भी था।

बेहद ग़रीबी की शिकार कुछ गर्भवती स्त्रियाँ यहाँ अपने बच्चों को बेचने के लिए पेश करती थीं जिन्हें पैसेवाले नि:सन्तान लोग ख़रीद कर ले जाते थे। मगर अनेक स्त्रियों को यहाँ पर उनकी इच्छा के विरुद्ध बन्धक बनाकर रखा जाता था। उनको गर्भवती करने के लिए पुरुष किराये पर लिये जाते थे और उन महिलाओं का बलात्कार किया जाता था। बाद में उनके बच्चे अमीरों को ऊँचे दामों पर बेच दिये जाते थे।

इस तरह के घिनौने कारोबार सिर्फ़ अफ्रीका में ही नहीं होते। औरतों और बच्चों की ख़रीदफ़रोख्‍़त के क़‍िस्‍म-क़‍िस्‍म के तरीके दुनियाभर में देखे जा सकते हैं। ऐसे कारोबारों से एक बार फिर साबित होता है कि अब पूँजीवाद का एक-एक दिन मनुष्‍यता पर बोझ होता जा रहा है। जो व्यवस्था मुनाफ़े की सनक में स्त्रियों की कोख और बच्चों तक को माल में तब्दील करने में संकोच नहीं करती उससे कोई उम्मीद करना हद दर्जे का भोलापन या बेवकूफ़ी होगी। ऐसी व्यवस्था को मौत की नींद सुलाकर ही आने वाली पीढ़ि‍यों की बेहतर ज़‍िन्दगी की कल्पना की जा सकती है।

मज़दूर बिगुल, मार्च 2020