एक महान क्रान्तिकारी की आख़ि‍री लड़ाई और उसकी याद के आईने में हमारा समय

13 सितम्बर को यतीन्द्रनाथ दास की शहादत को 91 बरस हो गये। उनकी लड़ाई अंग्रेज़ों की जेल में राजनीतिक बन्दियों के अधिकारों के लिए थी। मगर जिस आज़ाद हिन्दुस्तान के लिए तिल-तिलकर भूख से मरने का रास्ता जतिन ने चुना था, क्या वह हमें मिला?
जतिन दास, भगतसिंह और उनके तमाम साथी आज होते तो जेलों में होते, और जेल के भीतर वैसे ही लड़ रहे होते। फ़र्क़ बस इतना होता कि टीवी चैनलों और अख़बारों के दफ़्तरों में बैठे दल्ले उन्हें अपराधी, ख़ून के प्यासे और देशद्रोही साबित कर चुके होते। जैसे आज भी देश की जेलों में क़ैद हज़ारों नागरिकों के साथ किया जा रहा है, जिनका गुनाह सिर्फ़ यह है कि उन्होंने चन्द लुटेरों के हक़ में करोड़ों-करोड़ आम लोगों की लूट और बर्बादी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी है, करोड़ों-करोड़ लोगों को धर्म और जाति के आधार पर दोयम दर्जे के नागरिक बना देने की साज़िशों का विरोध किया है, और हर ज़ोरो-ज़ुल्म के सामने डटकर खड़े होते रहे हैं।
जतिन दास की शहादत को आज याद करने का तभी कोई मतलब है जब आप इस “निज़ामे कोहना” के ख़िलाफ़ बोलने का हौसला रखते हों, वरना हर क्रान्तिकारी के शहादत दिवस पर ट्वीट करने वाले पाखण्डी नेताओं और हममें कोई फ़र्क़ नहीं रह जायेगा।
आइए, इस मौक़े पर यतीन्द्रनाथ दास के साथी और उनके अन्तिम दिनों के संघर्ष के भागीदार शिव वर्मा के शब्दों में इस महान क्रान्तिकारी की आख़ि‍री लड़ाई को और उन इन्क़लाबी नौजवानों के जीवट को जानने की कोशिश करते हैं।

(शिव वर्मा की पुस्तक ‘संस्मृतियाँ’ से साभार)

10 जुलाई, 1929 को जब पहले पहल हम लोग अदालत में एक साथ मिले तो भगतसिंह और बटुकेश्वरदत्त की भूख हड़ताल को एक महीने से ऊपर हो चुका था लेकिन सरकार टस से मस नहीं हो रही थी। कुछ साथियों ने प्रस्ताव किया कि बाक़ी लोग भी तुरन्त भूख हड़ताल का ऐलान कर दें। भगतसिंह और दास तत्काल भूख हड़ताल का ऐलान करने के पक्ष में नहीं थे। वे लोग भूख हड़ताल को एक राजनीतिक लड़ाई के रूप में लड़ना चाहते थे और इसलिए लड़ाई की ओर कोई भी क़दम उठाने से पहले वे आपस की बातचीत द्वारा उसके हर पहलू को अच्छी तरह तौल लेने के पक्ष में थे। इसके अतिरिक्त माँगपत्र के रूप में एक अच्छे राजनीतिक दस्तावेज़ द्वारा भूख हड़ताल के उद्देश्य को जनता तथा सरकार तक पहुँचाना भी आवश्यक था। इस बातचीत तथा माँग पत्र तैयार करने में तीन दिन बीत गये और 13 तारीख़ से भगतसिंह और दत्त की माँगों के समर्थन में दो-चार को छोड़कर बाक़ी सभी साथियों ने भूख हड़ताल आरम्भ कर दी।
हम लोगों में से यतीन्द्रनाथ दास को छोड़कर और किसी को भी अनशन का कोई अनुभव न था। दास ने किसी भी साथी द्वारा भावावेश में अनशन की घोषणा कर देने का विरोध किया। उन्होंने कहा, “इस हड़ताल का ऐलान कर हम लोग एक ऐसे लम्बे संघर्ष में उतर रहे हैं जो एक माने में रिवाल्वर या पिस्तौल की लड़ाई से कहीं कठिन है। अनशन द्वारा तिल-तिल कर अपने आपको खपा कर इंच-इंच मौत की ओर सरकने की अपेक्षा पुलिस की गोली का शिकार होकर या फाँसी पर झूलकर मर जाना आसान है। और एक बार अनशन के मैदान में उतर कर पीछे हटना क्रान्तिकारियों की प्रतिष्ठा को नीचे गिराना होगा। ऐसी स्थिति में संघर्ष में कूदकर पीछे हटने की अपेक्षा आरम्भ से ही उसमें न शरीक होना कहीं बेहतर होगा।”
उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ तक उनका सवाल है वे एक बार अनशन आरम्भ हो जाने पर उस समय तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक सरकार हमारे माँगपत्र को स्वीकार नहीं कर लेती। दूसरे साथियों को उन्होंने सलाह दी कि वे एक दिन का समय लेकर अपने आप को अच्छी तरह तौल लें और यदि किसी को अन्त तक चल पाने में अपने ऊपर पूरा भरोसा न हो तो वह किसी भी हालत में अनशन आरम्भ न करे। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि जो साथी अनशन में भाग नहीं लेंगे वे हमारे वैसे ही सम्मानित क्रान्तिकारी साथी रहेंगे जैसे दूसरे लोग।
पूर्व निर्णय के अनुसार, 13 जुलाई से हमारा ऐतिहासिक अनशन आरम्भ हुआ। हमारा फ़ैसला था कि अनशन के बीच बीमार पड़ने पर भी हम मुँह से किसी प्रकार की दवाइयाँ आदि नहीं लेंगे और शक्ति रहते अधिकारियों को बलपूर्वक दूध भी नहीं पिलाने देंगे।
आरम्भ में दस दिन तक प्रायः सभी साथी चलते-फिरते रहे और इस आशा से कि शायद कुछ लोग कमज़ोरी का शिकार होकर पीछे हट जायें, सरकार ने हमारी ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। जेल अधिकारी हमें डिगाने के उद्देश्य से अच्छे से अच्छा सुगन्धित खाना बनवा कर हमारी कोठरियों में सजाकर रखवाते। जैसे ही अधिकारीगण खाना, फल, दूध आदि रखकर पीठ फेरते वैसे ही अधिकांश साथी या तो उसे उठाकर बाहर फेंक देते या उसी समय उसे गन्दा कर देते। यतीन्द्रनाथ दास ही एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें इस बारे में अपने ऊपर पूरा विश्वास था और उन्होंने न तो कभी खाने को फेंका और न इसे गन्दा किया। उनकी कोठरी से अधिकारी रोज़ गिनकर अपनी रोटियाँ, फल आदि उठा ले जाते थे।
दस दिन बाद कुछ लोगों की हालत ख़राब होते देख सरकार द्वारा नियुक्त कई डॉक्टरों के दल ने आकर हमारा चार्ज ले लिया और ग्यारहवें दिन से बलपूर्वक दूध पिलाने का नाटक आरम्भ हो गया। आठ-दस चुने हुए तगड़े जवान आकर हम में से किसी एक को घेरते। वे पकड़कर उसे गिराने की कोशिश करते, साथी विरोध करता, शक्ति रहते उनसे लड़ता। एक बनाम आठ-दस की कुछ देर की कुश्ती में जब वह साथी क़ाबू में आ जाता तो वे लोग उसे दबा कर बैठ जाते। फिर डॉक्टर एक लम्बी रबड़ की नली नाक के रास्ते से पेट में घुसेड़ने की कोशिश करता। भूख हड़ताली खाँस कर, हबकी लेकर नली को पेट में जाने से रोकता। इस कसरत में कभी-कभी नली मुँह में आ जाती तो अनशनकर्ता उसे दाँतों से दबाकर पड़ जाता। उसके बाद सब्र की परीक्षा आरम्भ होती। अपनी बेबसी में कभी-कभी डॉक्टर धैर्य खो बैठता और नाराज़ होकर भुनभुनाता हुआ उसे छोड़कर दूसरे की कोठरी की ओर अपने दलबल के साथ चल देता। डॉक्टर हारता और उस साथी की विजय होती।
यतीन्द्रनाथ दास को उस कसरत का पहले का अनुभव था, अस्तु पहले ही दिन डॉक्टर को उनके सामने पराजित होना पड़ा। जिस डॉक्टर का उनसे पाला पड़ा था, वह लाहौर के किसी पागलख़ाने का इंचार्ज था और ज़बर्दस्ती दूध पिलाने की कला का विशेषज्ञ कहकर लाया गया था। पागलों के साथ रहते-रहते उसका अपना स्वभाव भी बहुत कुछ पागलों जैसा हो गया था। पागलों का संसर्ग और विशेषज्ञ होने का अहम् – इन दोनों ने मिलकर उसे क्रोधी भी बना दिया था। दास के हाथों पहले ही दिन की हार से वह बेहद चिढ़ गया और वहीं खड़े होकर सबके सामने दास को चुनौती देते हुए उसने कहा, “कल देखूँगा आप कैसे मेरे काम में बाधा डालते हैं।” उत्तर में दास ने मुस्कुरा भर दिया और वह लम्बे क़दम बढ़ाता दूसरे साथी की ओर चला गया।
तीसरे दिन, अर्थात् 26 जुलाई, 1929 को अन्य साथियों से फुरसत पाने के बाद उसने दास को सबसे अन्त में पकड़ा। वह उनसे फुरसत में निपटना चाहता था। कुश्ती और धरपकड़ का पहला अध्याय जब समाप्त हो गया और जवानों ने दास को पूरी तरह क़ाबू कर लिया तो उसने नाक से नली डाली जिससे दास ने मुँह से निकाल कर दाँतों से दबा लिया। डॉक्टर ने दूसरी नली उनकी दूसरी नाक में डालनी आरम्भ की। दास का दम घुटने लगा। फिर भी मुँह खोले बग़ैर वे दूसरी नली को भी पेट में जाने से रोकने का प्रयास करते रहे। दूसरी नली पेट में न जाकर उनके फेफड़ों में चली गयी। डॉक्टर जल्दी में था। वह अपनी विजय को हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। दम घुटने के कारण दास की आँखें उलट चुकी थीं लेकिन उनके चेहरे की ओर देखे बिना ही डॉक्टर ने लगभग एक सेर दूध उनके फेफड़ों में भर दिया और अपने विजयोल्लास में उन्हें छटपटाता छोड़कर चला गया।
यह घटना अस्पताल में हुई थी। उस समय दास के अतिरिक्त लगभग आधा दर्जन और साथी भी अस्पताल पहुँच चुके थे और वे सब एक ही बैरक में बन्द थे। दास को छटपटाते देख वह सब उनके पास पहुँच गये। दास के शरीर का तापक्रम तेज़ी से बढ़ रहा था। उन्हें रह-रहकर ज़ोर की खाँसी आ रही थी और वे साँस लेने में कठिनाई अनुभव कर रहे थे। उनकी यह हालत देखकर अन्य साथियों ने शोर मचाना आरम्भ किया। लगभग आधे घण्टे बाद डॉक्टरों का दल वापस आया। दास को देखकर उनके होश उड़ गये। उन्होंने उन्हें ज़मीन से उठा कर चारपाई पर डाला और जब उनके मुँह में दवाई डालने लगे तो अर्द्धमूर्छित अवस्था में भी दास में न जाने कहाँ की चेतना जाग उठी और उन्होंने कसकर मुँह बन्द करते हुए अँग्रेज़ी में कहा ‘नहीं’। हम लोगों में से जब कुछ साथियों ने दवा खाने का अनुरोध किया तो उस यंत्रणा के बीच भी उनके चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गयी। वे समझ गये कि साथियों के संकल्प पर ममता की विजय हुई है और उन्होंने हँसकर हमारा अनुरोध अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अन्त तक न तो इंजेक्शन ही लिया और न कोई दवा खायी। उनकी उस स्थिति में अब बल प्रयोग का कोई प्रश्न ही नहीं था। अस्तु डॉक्टरों को बाहरी उपचार (सीने पर लेप और मालिश आदि) पर ही सन्तोष करना पड़ा। दास को निमोनिया घोषित कर वे चले गये।
उक्त घटना के लगभग दो तीन घण्टे बाद उनकी खाँसी का क्रम कुछ ढीला पड़ा और कुछ स्वस्थ होने पर उन्होंने आँखें खोल दीं। हम सबको अपने चारों ओर देखकर एक बार फिर उनके चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गयी। बड़ी धीमी आवाज ़में जितेन्द्रनाथ सान्याल को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा, “अब मैं उनकी पकड़ में नहीं आ सकूँगा।”
उस दिन से तिल-तिल कर मौत की ओर सरकने का उनका क्रम आरम्भ हुआ। शहादत की ओर ले जाने वाले हर क्षण के साथ उनके शान्त और सौम्य चेहरे पर दृढ़ संकल्प की लकीरें गहरी होती गयीं।
कुछ ही दिनों में उनकी हालत ख़राब हो गयी। शरीर में विष फैल गया और आँखें मुँदी-मुँदी सी रहने लगीं। डॉक्टरों ने एनिमा देना चाहा किन्तु दास उसके लिए भी राज़ी न थे। कांग्रेस के नेताओं तथा डिफ़ेन्स कमेटी के सदस्यों का अनुरोध भी कुछ काम न आया। किसी ने सरकार को सुझाया कि शायद वे भगतसिंह की बात मान लें। इस पर केन्द्रीय कारागार से भगतसिंह को लाया गया। उसके एक बार अनुरोध करते ही दास ने एनिमा की स्वीकृति दे दी। इस पर जेल के एक उच्च अधिकारी ने दास से पूछा कि इसी बात के लिए आपने सबका अनुरोध ठुकरा दिया था तो फिर भगतसिंह के कहने पर आप कैसे मान गये? उत्तर में उन्होंने कहा, “श्रीमान जी, आप नहीं जानते भगतसिंह कितना बहादुर आदमी है। मैं उसकी बात कभी नहीं टाल सकता हूँ।”
इसी प्रकार एक अन्य अवसर पर भगतसिंह ने उनसे दवा पीने का अनुरोध किया तो उन्होंने कहा: “देखो भगतसिंह, मैं जानता हूँ कि मुझे अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हटना चाहिए, पर मैं तुम्हारा कहना भी नहीं टाल सकता। ख़ैर, अब आगे मुझसे कुछ मत माँगना।”
उनकी हालत ख़राब होते देख पहले तो सरकार ने उन्हें मेयो अस्पताल ले जाना चाहा। लेकिन दास द्वारा अस्पताल जाने से इन्कार कर देने पर उसने उन्हें ज़मानत पर रिहा करने का निश्चय कर लिया। ज़मानतदार के रूप में उसे बाहर कोई फ़र्ज़ी सेठ मिल गया था। अचानक अपनी रिहाई का समाचार सुनकर उन्होंने हम सब को अपने चारों ओर जमा कर लिया। “यह सब जाल है” उन्होंने कहा। “सरकार जानती है कि मैं बचूँगा नहीं। वह मेरी मृत्यु का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर लेना नहीं चाहती। वह मुझे जेल के फाटक से बाहर निकालकर मुझसे मुक्ति पाना चाहती है। मैं ऐसा नहीं होने दूँगा।” यह कहकर उन्होंने हम लोगों की ओर देखा। बोले, “मैं यहीं तुम लोगों के बीच रहकर लड़ते-लड़ते मरना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि शक्ति रहते तुम लोग मेरे यहाँ से हटाये जाने का विरोध करो।”
उस समय हमारे अनशन को डेढ़ महीने से अधिक हो चुका था और दो एक को छोड़कर प्रायः सभी साथी कमज़ोर हो जाने के कारण अस्पताल में ही थे। दास की बातों से उस कमज़ोरी की हालत में भी साथियों में न जाने कहाँ की शक्ति आ गयी। अस्पताल की बैरक का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया गया। फिर सबों ने अपनी-अपनी लोहे की चारपाईयाँ, मेज़ें, अलमारियाँ आदि खींच कर दरवाज़े पर भिड़ा दीं और सक्रिय विरोध के लिए तैयार हो गये। दास ने अपनी चारपाई पर लेटे-लेटे आँखें खोलकर चारों ओर देखा और कहा, “अब ठीक है।”
कुछ देर बाद ही जेल के अधिकारी अपने दल-बल के साथ दास को ले जानेे के लिए आये। मोर्चेबन्दी देखकर वे समझ गये कि आसार अच्छे नहीं हैं। शारीरिक दृष्टि से उस समय हममें से किसी की हालत ऐसी नहीं थी कि उसके ख़िलाफ़ बल प्रयोग किया जा सकता। दास ने बाहर खड़े सुपरिन्टेन्डेण्ट से कहला दिया कि उन्हें ज़मानत मंज़ूर नहीं है। टेलीफ़ोन खटके और नाटक आगे बढ़ने से रुक गया। बैरक की मोर्चेबन्दी तब हटी जब अंग्रेज़ सुपरिन्टेन्डेण्ट ने ईसा मसीह की शपथ लेकर विश्वास दिलाया कि वह दास को उनकी इच्छा के विरुद्ध ले जाने की कोशिश नहीं करेगा।
लगभग एक सप्ताह बाद एक दिन उन्होंने फिर सबको अपने चारों ओर जमा किया। जिनमें उठने-बैठने की शक्ति नहीं रह गयी थी उनकी चारपाइयाँ अपने पास करवा लीं। उनके छोटे भाई किरनदास को उनकी देखभाल के लिए उनके पास रहने की अनुमति मिल गयी थी। वे अपने लिए बिस्कुटों का एक पैकेट लाये थे। दास ने अपने हाथ से एक-एक बिस्कुट सब को दिया। बोले, “हम लोग अनशन नहीं तोड़ रहे हैं। यह हमारा अन्तिम सहभोज है – मेरे प्यार का एक प्रतीक मात्र।” सबने बिस्कुट खा लिया। फिर उन्होंने किरनदास से क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम का ‘बोलो वीर, चिर उन्नत मम शीर’ गाना सुना। उस रात काफ़ी देर तक सबको समेटकर वे बातें करते रहे। जो साथी वहाँ नहीं थे और कोठरियों में बन्द थे उन सबकी हालत के बारे में पूछा, वन्देमातरम सुना। वह बुझते दीये की आख़िरी चमक थी। उसके बाद उनकी हालत तेज़ी के साथ गिरने लगी। उनका बोलना बन्द हो गया, हाथों-पैरों मंे सूजन आ गयी, आँखें भी प्रायः बन्द-बन्द रहने लगीं। लेकिन उस हालत में भी वे हर बात का उत्तर सिर हिलाकर हाँ या ना में दे देते थे। उनकी दिमाग़ी चौकसी में अन्तिम समय तक किसी प्रकार की शिथिलता नहीं आयी।
महाप्रयाण की तैयारी में पहले उनके पैर का अँगूठा संज्ञाहीन हुआ फिर धीरे-धीरे उनके पैर और तब हाथ निश्चेष्ट हुए और फिर आँखों ने साथ छोड़ा। इस सबके बाद भी अन्त तक उनकी संकल्पशक्ति में किसी प्रकार की कमी नहीं आयी।
हालत बिगड़ती देखकर सरकार ने एक बार फिर जेल सुपरिन्टेन्डेण्ट मेजर ब्रिग्स द्वारा कहलाया कि सरकार उन्हें बिना शर्त रिहा करने और उन पर से षड्यंत्र केस की कार्रवाई उठा लेने को तैयार है। उत्तर में यतीन्द्रनाथ ने पूछा कि क्या सरकार ने हमारी माँगें मान ली हैं। और जब उन्हें पता चला कि सरकार अनशनकारियों की माँगों पर विचार किये बग़ैर ही उन्हें रिहा करने की बात कर रही है तो उन्होंने सरकार के सुझाव को मानने से साफ़ इन्कार कर दिया।
अनशन के तिरसठवें दिन 13 सितम्बर, 1929 को उनकी हालत ख़राब देखकर डॉक्टरों ने उन्हें इंजेेक्शन लगाना चाहा। उनका अनुमान था कि अचेतन अवस्था में दास को शायद पता ही न चल पायेगा कि उनके इंजेेक्शन लगाया जा रहा है। लेकिन जैसे ही उनका हाथ पकड़कर उसमें स्प्रिट मली गयी वैसे ही उन्होंने रुँधे गले से डरावनी आवाज़ में कहा ‘नो’ और उसके साथ ही डॉक्टरों का दल सहमकर पीछे हट गया। उस घटना के कुछ ही देर बाद उन्होंने सदा के लिए आँखें बन्द कर लीं।
उस दिन प्रातःकाल से ही अधिकारियों ने उन साथियों को भी जो कोठरियों में बन्द थे, लाकर अस्पताल में कर दिया था। सबों ने ख़ामोशी के साथ उनके चारों ओर खड़े होकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की, डॉक्टरों ने क़तार में खड़े होकर मस्तक झुकाया और जेल के अंग्रेज़ सुपरिन्टेन्डेण्ट ने टोपी उतार कर फ़ौजी सलाम से उनका सम्मान किया।
दास की हालत ख़राब है यह समाचार प्रातःकाल से ही लाहौर में आँधी की तरह फैलता जा रहा था और जेल के फाटक पर शव के अन्तिम दर्शनों के लिए सारा शहर उमड़कर जमा हो गया था। लाहौर में, लाहौर से कलकत्ते ले जाते समय मार्ग के स्टेशनों पर, और फिर कलकत्ते में दास के शव को जो सम्मान मिला वह देश के इतिहास में आज भी अद्वितीय है। मृत्यु के बाद सी.आर. दास, भगतसिंह, गांधी जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर और पण्डित नेहरू को छोड़कर शायद ही किसी दूसरे व्यक्ति को जनता का इतना आदर और सम्मान मिला हो।

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-सितम्बर 2020


 

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