भारतीय राज्यसत्ता द्वारा बस्तर में क़त्लेआम जारी…
नक्सलवाद बहाना है, जनता ही निशाना है!

– अनन्त

राज्यसत्ता द्वारा छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में पिछले दो दशक से जारी बर्बर खूनी दमन में एक नया अध्याय बीते 17 मई को जोड़ा गया। उस दिन सुकमा जिले के सिलगर गाँव के पास नव स्थापित शिविर के ख़िलाफ़ शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों के ऊपर सुरक्षा बलों ने अन्धाधुन्ध गोलीबारी की, जिसमें आधिकारिक तौर पर 3 लोग मारे गये और 16 ज़ख़्मी हुए। मारे गये ग्रामीणों की पहचान तीमापुरा के उईका पांडु, गुंडम के भीमा उर्सम और सुडवा गाँव के कवासी वागा के रूप में हुई है। उईका पांडु उर्फ मुरली महज 16-17 वर्ष का नाबालिग किशोर था; हालाँकि स्थानीय पुलिस किसी भी नाबालिग के हताहत होने के तथ्य को सिरे से झुठला रही है। किन्तु स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कुल मरने वालों की संख्या 9 है, जिसमें 6 लोग लापता हैं; तथा ज़ख़्मी लोगों की संख्या क़रीब 40 है, जिसमें 3 लोग गोली लगने तथा बाकी लाठीचार्ज, भगदड़ व अन्य कारणों की वजह से ज़ख़्मी हुए। पूनम सोमिली नामक एक गर्भवती महिला उस दिन की घटना में आयी चोट के कारण बाद में मारी गयीं।
यह घटना इस क्षेत्र में बीते दो दशक से अधिक समय से जारी भयंकर बर्बर राजकीय हिंसा का ताज़ा उदहारण मात्र है। सिलगर सुकमा जिले में बीजापुर और सुकमा जिले के बोर्डर के पास स्थित है। यह दक्षिण बस्तर में, सघन विशाल जंगली इलाके से गुज़रने वाली 90 किमी लम्बी बासागुड़ा-जगरगुंडा की महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना में एक पड़ाव है, जो सदियों से बसे आदिवासी गाँवों को, घने जंगल को, उजाड़कर बनाया जा रहा है। इस सड़क के किनारे जगह-जगह पर सुरक्षा बलों के नए शिविर खड़े किये जा रहे हैं। ऐसा ही एक शिविर 12 मई की रात लगभग 3 बजे चोरी-छिपे सिलगर में स्थापित किया गया। सिलगर गाँव के बाशिन्दों को इस बाबत कोई भनक तक नहीं थी। अगले दिन सिलगर में साप्ताहिक हाट के लिए पड़ोसी गाँव से आये लोगों ने उन्हें नए स्थापित शिविर के बारे में बताया।
यह इलाका ‘पाँचवें अनुसूचित क्षेत्र’ में पड़ता है, जहाँ विकास परियोजनाओं को ग्राम परिषद से अनुमोदन की आवश्यकता होती है। आम ग्रामीणों तथा ग्राम परिषद से अनुमोदन तो दूर शिविर की स्थापना बिना उनकी जानकारी के की गयी। ग्राम पंचायत से अनुमति लेने का काम काग़ज़ों पर “फ़र्जी ग्राम सभा” बनाकर लिया गया। नए शिविर की जानकारी मिलते ही क़रीब चालीस-पचास ग्रामीण इस बाबत जानने तथा अपना विरोध दर्ज़ कराने पहुँचे। उनकी बात सुननी तो दूर, बल प्रयोग के जिस मक़सद से शिविर स्थापित किया गया था, उसकी शुरुआत कर दी गयी। जानकारी लेने और विरोध दर्ज कराने पहुँचे लोगों पर प्रशासन द्वारा लाठीचार्ज किया गया, जिसमें 24 लोग घायल हो गये। उस घटना के अगले दिन से लोग बड़ी संख्या में कैम्प के ख़िलाफ़ प्रदर्शन पर बैठ गये। आसपास की पाँच ग्राम पंचायतों से क़रीब एक हज़ार लोग कैम्प को निरस्त करने की माँग को लेकर धरने पर बैठ गये। पुलिस तथा सुरक्षा बलों ने पहले ही दिन से प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग करने का काम शुरू किया। 14 से 16 मई तक, बड़ी संख्या में महिलाएँ और पुरुष सिलगर और पड़ोसी गाँवों से शिविर के पास सड़क पर इकट्ठा होते रहे। इस दौरान पुलिस हर दिन प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए लाठी, आँसू गैस या मिर्ची पटाका का इस्तेमाल कर रही थी। इन दिनों दर्जनों प्रदर्शनकारी मामूली रूप से घायल हुए और स्थानीय इलाज के लिए अपने गाँव लौट गये। 17 को सुरक्षाबलों ने एसपी, बीजापुर और आईजी बस्तर के आदेश पर प्रदर्शनकारियों को सड़क पर दो तरफ़ से घेरकर उनपर अन्धाधुन्ध गोलियाँ बरसा दीं। उस रोज़ आज़ादी के बाद के जनरल डायरों की फ़ेहरिस्त में कुछ और नाम जुड़ गये।
गोदी मीडिया इस घटना को नक्सलियों और सुरक्षा बलों के मुठभेड़ के तौर पर पेश कर रहा है। जबकि, सच्चाई दिन के उजाले की तरह साफ है कि वहाँ राज्यसत्ता द्वारा शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निहत्थे प्रदर्शनकारियों के ऊपर हमला किया गया था। पुलिस की बेदम कहानी कहती है कि 17 तारीख को आये प्रदर्शनकारी पिछले दो रोज़ के शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकारी नहीं थे, बल्कि 3000 लोगों की एक नयी भीड़ थी, जिसमें से कई हथियारबन्द थे, और उन्होंने शिविर को फूँकने के मकसद से हमला किया था। जिसके बाद बचाव के तौर पर पुलिसबल द्वारा गोलीबारी की गयी, जिसमें मारे गये तीनों मृतक माओवादी हमदर्द थे। शिविर सड़क के बगल में, कुछ सौ मीटर के फ़ासले पर, स्थापित किया गया है। सड़क और शिविर के बीच में कँटीले तारों की दो पंक्तियाँ हैं और शिविर के बाहर दो बख़्तरबन्द वाहन खड़े किये गये हैं। शिविर के अन्दर-बाहर आधुनिक हथियारों से लैस सुरक्षा बल भारी संख्या में उपस्थित है। ऐसे में भीड़ द्वारा आगज़नी के प्रयास की पुलिसिया कहानी कोरी गपबाज़ी से अधिक कुछ नहीं है।
बस्तर क्षेत्र में पिछले दो वर्षों में केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल के नये शिविरों की स्थापना और उनके ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन आम परिघटना है। किन्तु ये विरोध प्रदर्शन बिरले ही मुख्यधारा की मीडिया में अपना स्थान बना पाते हैं, और देश के बाकी हिस्सों तक इसकी जानकारी पहुँच पाती है। नतीजतन सत्ता बड़ी आसानी से इन प्रदर्शनों का बर्बर दमन कर नये शिविरों को स्थापित करती रहती है। मौजूदा विरोध प्रदर्शन के बावजूद सरकार “ख़तरे” का हवाला देकर सुरक्षा बलों के और नये शिविरों को स्थापित करने की योजना बना रही है।
राज्यसत्ता द्वारा वहाँ पर बच्चों, नौजवानों, महिलाओं, गरीबों, आदिवासियों के ऊपर ज़ुल्म की इन्तिहा जारी है। यौन उत्पीड़न, फ़र्ज़ी मुठभेड़ों, झूठे मामलों में फँसाना, पिटाई आदि को उनके जीवन का आम हिस्सा बना दिया गया है। ऐसी ढेरों वारदात को अंजाम दिया गया जिनका कहीं कोई ज़िक्र तक नहीं है। निहत्थे लोगों का क़त्लेआम बेहद आम है, किसी की भी हत्या के बाद सुरक्षाबलों को केवल उन्हें “नक्सलवादी” का ठप्पा लगाना होता है। 17 मई की घटना के महज़ पाँच रोज़ बाद ही एक अन्य घटना में नये बने एक सुरक्षा शिविर के पास एक अन्य निहत्थे मिडियम मासा की पुलिस गोलीबारी में मौत हो गयी। स्थानीय लोगों के अनुसार, मासा दो अन्य लोगों के साथ तोलेवर्ती गाँव में आम इकट्ठा कर रहा था, और सीआरपीएफ़ के जवानों के पहुँचने पर उसकी कथित तौर पर गोली मारकर हत्या कर दी गयी।
“नक्सलवाद से निपटने” के नाम पर स्थापित किये जा रहे इन शिविरों का असल निशाना वहाँ की आम मेहनतकश ग़रीब आबादी है। इन शिविरों ने आदिवासी बहुल बस्तर इलाके में आम जनता के ऊपर ज़ुल्म और बर्बरता की नयी इबारतें लिखी हैं। बीते दो दशक में चाहे केन्द्र में कांग्रेस-नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन या भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन क़ाबिज़ हो, दमन और हत्याओं का सिलसिला रुका नहीं है। रमण सिंह सरकार ने आदिवासियों के दमन का काम जहाँ पर छोड़ा था, कांग्रेसी भूपेश बघेल की सरकार उसे वहीं से आगे बढ़ा रही है। 2018 के बाद से आदिवासियों की ज़मीनों पर स्थानीय आबादी के दमन के लिए नित नये शिविरों को बनाया जा रहा है। केन्द्र में कांग्रेस और राज्य में भाजपा सरकार की जोड़ी ने पहले सलवा जुडूम तथा ग्रीन हंट जैसी भयंकर दमनकारी मुहिम को अंजाम दिया और अब केन्द्र में सत्तासीन फ़ासीवादी सरकार तथा राज्य की कांग्रेसी सरकार गुप-चुप किन्तु व्यवस्थित तरीके से दमन और क़त्लेआम को अंजाम दे रही हैं। कुकुरमुत्तों की तरह बनाये जा रहे नये सीआरपीएफ़ शिविर तथा जंगल के बीचों बीच बनायी जा रही महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना उसी का हिस्


 

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