मेहनतकश जनता के सच्चे लेखक मक्सिम गोर्की के स्मृति दिवस पर एक साहित्यिक परिचय

– राजकुमार

दुनिया में ऐसे लेखकों की कमी नहीं, जिन्हें पढ़ाई-लिखाई का मौक़ा मिला, पुस्तकालय मिला, शान्त वातावरण मिला, जिसमें उन्होंने अपनी लेखनी की धार तेज़ की। लेकिन बिरले ही ऐसे लोग होंगे जो समाज के रसातल से उठकर आम-जन के सच्चे लेखक बने। मक्सिम गोर्की ऐसे ही लेखक थे।
मक्सिम गोर्की (28 मार्च 1868 – 18 जून 1936) को पूरी दुनिया में महान लेखक और समाजवादी यथार्थवाद के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है। रूस में ज़ारशाही के दौरान 1907 में हुई असफल क्रान्ति से लेकर 1917 में हुई अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति और उसके बाद के समाजवादी निर्माण तक के लम्बे दौर में मक्सिम गोर्की ने अपनी कहानियों, नाटकों, लेखों और उपन्यासों के माध्यम से हर क़दम पर जनता को अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा दी। वह अपने समय में दबी-कुचली जनता के आत्मिक जीवन के भावों की आवाज बनकर उभरे। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से लेकर अक्टूबर क्रान्ति के बाद लगभग 40 वर्षों के दौरान गोर्की अपनी कलम से रूसी साहित्य और जनता में बदलाव के लिए एक नई ऊर्जा का संचार करते रहे। साथ ही उनका सारा सृजन भी जनता के जीवन और संघर्षों से करीब से जुड़ा रहा।
समाज के दबे कुचले वर्गों से बचपन से ही जीवन्त सम्पर्क में रहने वाले गोर्की के लेखन को उनके जीवन और उस समय के रूसी समाज के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि उनके साहित्यिक सृजन का स्रोत क्या था। गोर्की के माता-पिता बचपन में नहीं रहे थे और उनका बचपन अपनी नानी के यहाँ बीता जहाँ उन्हें एक रूसी मध्यवर्गीय पारिवारिक माहौल मिला। नानी की मृत्यु के बाद सम्पत्ति को लेकर परिवार में लड़ाई-झगड़े होने लगे जिसके बाद गोर्की ने 13 साल की उम्र में घर छोड़ दिया और कई जगह काम बदलते हुए रूस के कई हिस्सों में घूमते रहे। इस दौरान उन्हें समाज को और करीब से देखने का मौका मिला और वह कई प्रकार के लोगों के सम्पर्क में आये। इस तरह गोर्की बचपन से ही एक मज़दूर के रूप में पले-बढ़े और घरों में काम करने से लेकर बेकरी के कारखानों, जहाज़ों, नमक के कारख़ानों और खेतों में खटने सहित तरह-तरह के कामों में उनका बचपन मेहनत और संघर्ष करते हुए बीता।
आने वाले समय में बचपन के ये अनुभव ही उनकी साहित्यिक रचनाओं का आधार बने और वह जनता के मुक्ति संघर्ष का हिस्सा बनकर उभरे। अपने पूरे साहित्यिक सृजन में गोर्की ने रूसी जीवन की कड़वी सच्चाई का यथार्थवादी चित्रण किसी व्यक्ति के दृष्टिकोण से नहीं किया है, बल्कि वह उन परिस्थितियों को बदलने के लिए एक प्रेरणास्रोत की तरह पाठक के सामने उपस्थित होते हैं। गोर्की के शब्दों में, “सत्य दया से अधिक महत्व रखता है। और आज मैं अपनी नहीं, वरन् दम घोंटनेवाले उस भयंकर वातावरण की कहानी लिखने बैठा हूँ, जिसमें साधारण रूसी जनता रहा करती थी और आज भी रहती है।” “पुरानी दुनिया अवश्य ही जानलेवा रोग से ग्रस्त है और हमें उस संसार से शीघ्रातिशीघ्र पिण्ड छुड़ा लेना चाहिये ताकि उसकी विषैली हवा कहीं हमें न लग जाये।”
बचपन में समय-समय पर गोर्की का परिचय उस समय के रूस में जारशाही निरंकुशता एवं दमन उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष करने वाले क्रान्तिकारियों से होता रहा, जिनके जीवन का उनके ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा, “उन अनगिनत लोगों में से पहले व्यक्ति से मेरी मित्रता का अन्त हुआ, जो देश के सर्वश्रेष्ठ सपूत होते हुए भी अपने ही वतन में अजनबी से हैं..”। इन लोगों के सम्पर्क ने गोर्की को किताबों से परिचित कराया। गोर्की की जीवन परिस्थितियों ने उन्हें किसी स्कूल या विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने का कोई अवसर नहीं दिया, लेकिन उन्होंने स्वाध्याय और जनता से जुड़े रहकर प्राप्त अनुभव को अपनी शिक्षा का केन्द्र बनाया। गोर्की के शब्दों में, “मैं अपनी उपमा मधुमक्खी के छत्ते से दे सकता हूँ, जिसमें देश के अगणित साधारण प्राणियों ने अपने ज्ञान और दर्शन का मधु लाकर संचित किया है। सबों की बहुमूल्य देन से मेरे चरित्र का विकास हुआ। अक्सर देने वाले ने गन्दा और कड़वा मधु दिया, फिर भी था तो वह ज्ञान-मधु ही।”
गोर्की अपने बचपन में ही ज़ारशाही काल में रूसी जनता की ग़रीबी और उत्पीड़न को देख चुके थे और इस सच्चाई से अवगत हो चुके थे कि किस तरह उस समाज में एक बड़े हिस्से को दबे-कुचले तबकों के रूप में रहने और जानवरों की तरह जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर किया गया था, “मैं उनके बीच अपने आप को जलते अंगारों में डाल दिये गये जलते लोहे के टुकड़े की तरह महसूस करता था – हर रोज़ मुझे अनेक तीखे अनुभव प्राप्त होते। मानव अपनी सम्पूर्ण नग्नता के साथ सामने आता था – स्वार्थ और लोभ का पुतला बनकर। जीवन के प्रति उनका क्रोध, दुनिया की हर चीज के प्रति उनका उपहासजनक शत्रुता का भाव और साथ ही अपने प्रति उनका फक्कड़पन -”
अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में ही गोर्की का परिचय तोलस्तोय और चेखव जैसे रूस के महान यथार्थवादी लेखकों से हुआ। गोर्की शुरुआती दिनों से ही क्रान्तिकारी आन्दोलनों से जुड़े रहे। बाद में कम्युनिस्ट पार्टी बोल्शेविक में शामिल होकर जनता के संघर्षों में काफ़ी करीब से जुड़ गये और इसी दौरान उन्होंने पार्टी में शामिल मज़दूरों और क्रान्तिकारियों के जीवन और संघर्ष पर आधारित अपना विश्व प्रसिद्ध उपन्यास ‘माँ’ (1906) लिखा जिसके बारे में लेनिन ने कहा था कि इसे पढ़कर उन सभी मजदूरों को क्रान्ति के उद्देश्यों को समझने में मदद मिलेगी जो स्वतःस्फूर्त ढंग से आन्दोलन में शामिल हो गये हैं।
आज भी, जबकि पूरी दुनिया के मजदूर आन्दोलन ठहराव के शिकार हैं और प्रगति पर गतिरोध की स्थिति हावी है, ऐसे में गोर्की के उपन्यास और कहानियाँ पूरी दुनिया की जनता के संघर्षों के लिए अत्यन्त प्रासंगिक हैं। आज भी उनकी रचनाएँ पूरी दुनिया की मेहनतकश जनता को एक समतावादी समाज के निर्माण के लिए उठ खड़े होने और परिस्थितियों को बदल डालने के लिए संघर्ष करने, क्रन्तिकारी इच्छाशक्ति पैदा करने और सर्वहारा वर्ग चेतना को विकसित करने की प्रेरणा देती हैं। गोर्की का साहित्य हमारे मन में वर्तमान समाज में जनता की बदहाल परिस्थितियों के प्रति नफ़रत ही नहीं बल्कि उन परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष करने और उन्हें बदलने की इच्छा भी पैदा करता है।
गोर्की के उपन्यास ‘माँ’ में एक मज़दूर कहता है, “क्या हम सिर्फ़ यह सोचते हैं कि हमारा पेट भरा रहे? बिल्कुल नहीं” “हमें उन लोगों को जो हमारी गर्दन पर सवार हैं और हमारी आँखों पर पट्टियाँ बाँधे हुए हैं, यह जता देना चाहिए कि हम सब कुछ देखते हैं। हम न तो बेवकूफ़ हैं और न जानवर कि पेट भरने के अलावा और किसी बात की हमें चिन्ता ही न हो। हम इंसानों का सा जीवन बिताना चाहते हैं! हमें यह साबित कर देना चाहिए कि उन्होंने हमारे ऊपर ख़ून-पसीना एक करने का जो जीवन थोप रखा है, वह हमें बुद्धि में उनसे बढ़कर होने से रोक नहीं सकता!”
गोर्की ने रूस की दलित-उत्पीड़ित जनता का जीवन जितने क़रीब से देखा था उतने ही स्पष्ट रूप से उसको अपने साहित्य में चित्रित किया और व्यापक जनसमुदाय को शिक्षित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। अपने आत्मकथात्मक उपन्यास में गोर्की ने लिखा है, “दुनिया में अन्य कोई चीज़ आदमी को इतने भयानक रूप से पंगु नहीं बनाती जितना कि सहना और परिस्थितियों की बाध्यता स्वीकार कर उनके सामने सिर झुकाना।” गोर्की ने अपनी कहानियों, नाटकों, उपन्यासों और लेखों के माध्यम से समाज को सिर्फ़ चित्रित ही नहीं किया बल्कि उन्हें एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
अपने उपन्यास ‘जीवन की राहों पर’ में वे कहते हैं: “क्या यह ज़रूरी है कि इस हद तक घिनौनी बातों का वर्णन किया जाये? हाँ, यह ज़रूरी है! यह इसलिए ज़रूरी है श्रीमान, कि आप धोखे में न रहें, कहीं यह न समझने लगें कि इस तरह की बातें केवल बीते ज़माने में हुआ करती थीं! आज भी आप मनगढ़न्त और काल्पनिक भयानकताओं में रस लेते हैं, सुन्दर ढंग से लिखी भयानक कहानियाँ और क़िस्से पढ़ने में आपको आनन्द आता है। रोंगटे खड़े कर देने वाली कल्पनाओं से अपने हृदय को सनसनाने और गुदगुदाने से आप जरा भी परहेज़ नहीं करते। लेकिन मैं सच्ची भयानकताओं से परिचित हूँ, आये दिन के जीवन की भयानकताओं से, और यह मेरा अवंचनीय अधिकार है कि इनका वर्णन करके आपके हृदयों को मैं कुरेदूँ, उनमें चुभन पैदा करूँ ताकि आपको ठीक-ठीक पता चल जाये कि किस दुनिया में और किस तरह का आप जीवन बिताते हैं। कमीना और गन्दगी से भरा घिनौना जीवन है यह जो हम सब बिताते हैं। यही असल बात है! मैं मानव-जाति से प्रेम करता हूँ और चाहता हूँ कि उसे किसी भी तरह से दुःख न पहुँचाऊँ, परन्तु इसके लिए न तो हमें भावुकता का दामन पकड़ना चाहिए और न ही चमकीले शब्द-जाल और खूबसूरत झूठ की टट्टी खड़ी करके जीवन के भयानक सत्य को हमें छिपाना चाहिए! ज़रूरी है कि हम जीवन की ओर मुँह करें और हमारे हृदय तथा मस्तिष्क में जो कुछ भी शुभ और मानवीय है, उसे जीवन में उँड़ेल दें।”
भौतिकवादी होने के नाते गोर्की मनुष्यों के स्वभाव के लिए परिस्थितियों को ज़िम्मेदार मानते थे और इसलिए वह जीवन की भौतिक परिस्थितियों को बदलने पर जोर देते थे, “रूसी अपनी ग़रीबी और नीरसता के कारण ऐसा करते हैं। व्यथा और रंज उनके मनबहलाव के साधन हैं।” “जब जीवन की धारा एकरस बहती है तो विपत्ति भी मन बहलाने का साधन बन जाती है। घर में आग लग जाना भी नवीनता का रस प्रदान करता है।”
गोर्की ने अपने समय के सामाजिक जीवन की आलोचना के साथ ही वर्ग समाज में चौतरफ़ा मची होड़ में लगे मनुष्यों के व्यक्तित्व के विघटन पर भी पैनी नज़र डाली। उनका मानना था कि जब तक मेहनत करने वालों की मेहनत को कुछ परजीवी हड़पते रहेंगे तब तक समाज में शान्ति नहीं हो सकती। अपने एक लेख में वे कहते हैं: “समूचे वातावरण में एक-दूसरे को भक्षण करने की एक अराजक प्रक्रिया निरन्तर लागू है; सभी मनुष्य एक दूसरे के दुश्मन हैं; अपना-अपना पेट भरने की इस गन्दी लड़ाई में भाग लेने वाला हर आदमी सिर्फ़ अपनी ही सोचता है और अपने चारो ओर सन्देह की दृष्टि से देखता है, ताकि पड़ोसी कहीं उसका गला न धर दबोचें। थकाने वाली इस पाशविक लड़ाई के भँवर में फँसकर बुद्धि की श्रेष्ठतम शक्तियाँ दूसरों से अपनी रक्षा करने में ही नष्ट हो जाती हैं, मानव अनुभव की वह उपलब्धि जिसे “मैं” कहते हैं, एक अँधेरा तहखाना बन जाती है जिसके अन्दर अनुभव को और अधिक समृद्ध न करने और पुराने अनुभव को तहखाने की दम घोंटनेवाली कोठरियों में बन्द रखने की क्षुद्र प्रवृत्तियाँ हावी रहती हैं। भरे पेट के अलावा आदमी को और क्या चाहिए? इस लक्ष्य को पाने के लिए मनुष्य अपने उच्चादर्शों से फिसलकर गिर गया है और ज़ख्मी होकर आँखें फाड़े, पीड़ा से चीखता और कराहता नीचे पड़ा है।”
पूँजीवादी समाज की संस्कृति से रोम-रोम से नफ़रत करने वाले गोर्की का कहना था, “पूँजीवादी समाज में कुल मिलाकर मनुष्य अपनी अद्भुत सामर्थ्य को निरर्थक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बर्बाद करता है। अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए उसे गली में हाथों के बल चलना पड़ता है, द्रुतगति के ऐसे रिकार्ड स्थापित करने पड़ते हैं जिनका कुछ कम या कुछ भी व्यावहारिक मूल्य नहीं होता, एक ही वक्त में बीसियों लोगों के साथ शतरंज के मैच खेलने, अद्भुत कलाबाज़ियाँ खाने और काव्य-रचना के झूठे चमत्कार प्रदर्शित करने पड़ते हैं, और साधारणतया हर प्रकार की ऐसी बेसिरपैर की हरकतें करनी पड़ती हैं जिनसे उकताए तथा ऊबे हुए लोगों को पुलकित किया जा सके।”
जनता के मुक्तिसंघर्ष में पूरा विश्वास रखने वाले और एक क्रान्तिकारी के रूप में उस संघर्ष में शामिल रहते हुए जीवन के प्रति गोर्की का दृष्टिकोण आशावाद और जनता में दृढ़ विश्वास से भरा हुआ था, “हमारे जीवन की यही विलक्षणता नहीं है कि वह बर्बरता और पाशविकता की मोटी तह में लिपटा हुआ है, बल्कि यह कि इस तह के नीचे से आलोकमय, सबल, सृजनात्मक और भलाई की शक्तियाँ विजयी होकर बाहर आ रही हैं और यह दृढ़ आशा पैदा कर रही हैं कि वह दिन दूर नहीं, जब हमारे देश की जनता के जीवन में सौन्दर्य एवं आलोकपूर्ण मानवता का सूर्य उगेगा और अवश्य उगेगा।”
गोर्की का पूरा जीवन और उनका साहित्यिक कार्य पूरी दुनिया के मज़दूरों के लिए प्रेरणास्रोत है, और अन्याय के विरुद्ध कदम-कदम पर हमें संघर्ष करने के लिए प्रोत्साहित करता है। अक्टूबर क्रान्ति के बाद सोवियत यूनियन में गोर्की अपने अन्तिम दिनों तक समाजवादी खेमे के अनेक युवा लेखकों का जोश के साथ नेतृत्व कर रहे थे। ‘अग्नि-दीक्षा’ उपन्यास के लेखक निकोलाई आस्त्रोवस्की ने 1936 में गोर्की के बारे में लिखा, “हमारी टुकड़ी का कमाण्डर ऊँचे कद का, सफ़ेद बालों वाला कमाण्डर – प्रसिद्ध और सम्मानप्राप्त, अपनी कला में सिद्धहस्त अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए, धीरे से बड़े गम्भीर लहजे़ में कहता है: ‘इन घिसटनेवालों का क्या करूँ? पीछे कहीं बैठे नाश्ता कर रहे होंगे – अगले दस्ते से कहीं 50 मील पीछे होंगे। उनकी पाकशाला पीछे कहीं दलदल में धँस गई है। मेरे सफ़ेद बालों को ये लज्जित कर रहे हैं।’ यह मज़ाक है ज़रूर, मगर एक कड़वा मज़ाक, इसमें सचाई कम नहीं।”
अन्त में गोर्की के ही शब्दों में, “मेरे लिए मानव से परे विचारों का कोई अस्तित्व नहीं है। मेरे नज़दीक मानव तथा एकमात्र मानव ही सभी वस्तुओं और सभी विचारों का निर्माता है। चमत्कार वही करता है और वही प्रकृति की सभी भावी शक्तियों का स्वामी है। हमारे इस संसार में जो कुछ अति सुन्दर है उनका निर्माण मानव श्रम, और उसके कुशल हाथों ने किया है। हमारे सभी भाव और विचार श्रम की प्रक्रिया में उत्पन्न होते हैं और यह ऐसी बात है, जिसकी कला, विज्ञान तथा तकनीक का इतिहास पुष्टि करता है। विचार तथ्य के पीछे चलता है। मैं मानव को इसलिए प्रणाम करता हूँ कि इस संसार में कोई ऐसी चीज नहीं दिखाई देती जो उसके विवेक, उसकी कल्पनाशक्ति, उसके अनुमान का साकार रूप न हो।”
“यदि “पावन” वस्तु की चर्चा आवश्यक ही है, तो वह है अपने आप से मानव का असन्तोष, उसकी यह आकाँक्षा कि वह जैसा है उससे बेहतर बने। ज़िन्दगी की सारी गन्दगी के प्रति जिसे उसने स्वयं जन्म दिया है, उसकी घृणा को मैं पवित्र मानता हूँ। ईष्या, धनलिप्सा, अपराध, रोग, युद्ध तथा संसार में लोगों के बीच शत्रुता का अन्त करने की उसकी इच्छा और उसके श्रम को पवित्र मानता हूँ।”
गोर्की ने अपने जीवन और लेखन से सिद्ध कर दिया कि दर्शन और साहित्य विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में पढ़े-लिखे विद्वानों की बपौती नहीं है बल्कि सच्चा साहित्य आम जनता के जीवन और लड़ाई में शामिल होकर ही लिखा जा सकता है। उन्होंने अपने अनुभव से यह जाना कि अपढ़, अज्ञानी कहे जाने वाले लोग ही पूरी दुनिया के वैभव के असली हक़दार हैं। आज एक बार फिर साहित्य आम जन से दूर होकर महफ़िलों, गोष्ठियों यहाँ तक कि सिर्फ़ लिखने वालों तक सीमित होकर रह गया है। आज लेखक एक बार फिर समाज से विमुख होकर साहित्य को आम लोगों की ज़िन्दगी की चौहद्दी से बाहर कर रहा है। गोर्की जैसे लेखकों की अनमोल विरासत अगर तमाम पाठकों तक पहुँचेगी, तो यह हमारे साहित्य और समाज दोनों को नयी ऊष्मा से भर देगा।

मज़दूर बिगुल, जून 2021


 

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