ज्योति बसु (1914-2010) के निधन के अवसर पर
ज्योति बसु और संसदीय वामपन्थी राजनीति की आधी सदी

 दीपायन बोस

ज्योति बसु नहीं रहे। विगत 17 जनवरी 2010 को 96 वर्ष का लम्बा जीवन जीने के बाद कलकत्ता के एक अस्पताल में उन्होंने अन्तिम साँस ली। निधन के दिन से लेकर अन्तिम यात्रा (उन्होंने अपना शरीर मेडिकल रिसर्च के लिए दान कर दिया था) तक बुर्जुआ राजनीतिक हलकों में उन्हें उसी सम्मान के साथ याद किया गया और श्रध्दांजलि दी गयी, जितना सम्मान आजादी के बाद देश के शीर्षस्थ बुर्जुआ नेताओं को दिया जाता रहा है।

jyoti_basu

माकपा, भाकपा, आर.एस.पी., फॉरवर्ड ब्लॉक आदि रंग-बिरंगी चुनावी वामपन्थी पार्टियों के नेताओं के अतिरिक्त प्रधानमन्त्री और सोनिया गाँधी से लेकर सभी बुर्जुआ दलों के नेताओं ने कलकत्ता पहुँचकर ज्योति बसु को श्रध्दांजलि दी। कई पूँजीपतियों ने बंगाल में पूँजी लगाने में उनके सहयोग को भावविह्नल होकर याद किया। टाटा, बिड़ला, जैन आदि सभी छोटे-बड़े पूँजीपति घरानों के छोटे-बड़े अंग्रेजी-हिन्दी अख़बारों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए स्मृति लेख लिखे। कुछ टुटपूँजिया टिप्पणीकारों ने आश्चर्य प्रकट किया कि इतना भलेमानस आदमी कम्युनिस्ट क्यों और कैसे था? किसी ने लिखा कि वे भले आदमी पहले थे और कम्युनिस्ट बाद में। समझदार बुर्जुआ टिप्पणीकारों ने ऐसी बातें नहीं की। वे जानते हैं कि ज्योति बसु जैसे संसदीय कम्युनिस्टों की इस व्यवस्था को कितनी ज़रूरत होती है! यदि उनके ऊपर ”कम्युनिस्ट” का लेबल ही नहीं रहेगा, तो वे पूँजीवादी व्यवस्था के लिए उतने उपयोगी भी नहीं रहे जायेंगे।

ज्योति बसु बेशक संसदीय वामपन्थ के महारथी थे। वे एक कुशल राजनेता और प्रशासक थे। संसदीय वामपन्थी बुर्जुआ जनवादी व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा-पंक्ति की भूमिका निभाता है। वह कथनी और करनी से मजदूर वर्ग को इस बात का कायल करता है कि चुनाव जीतकर दबाव बनाकर तथा हड़तालों एवं आन्दोलनों के द्वारा वेतन आदि सुविधाएँ क्रमश: बढ़ाते जाते हुए मजदूर वर्ग अपनी ख़ुशहाली हासिल कर सकता है, अत: आज की दुनिया में बलपूर्वक राज्यक्रान्ति करने की,यानी बुर्जुआ राज्यसत्ता का धवंस करके सर्वहारा राज्यसत्ता कायम करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। पैबन्दसाजी से ही काम चल जायेगा। शान्तिपूर्ण संक्रमण से समाजवाद आ जायेगा। वे मजदूर वर्ग को सलाह देते हैं कि वे मन लगाकर उत्पादन बढ़ायें, उत्पादन बढ़ेगा, तो पूँजीपति उनकी तनख्वाहें भी कुछ बढ़ा देंगे। बर्नस्टीन, काउत्स्की, टीटो, अल ब्राउडर, ख्रुश्चेव, देघ सियाओ-पिघ – संशोधनवाद के सभी दिग्गजों की भाषाएँ भले अलग-अलग रही हों, लेकिन उनकी नसीहतों का निचोड़ यही रहा है – वर्ग-संघर्ष नहीं वर्ग सहयोग, क्रान्ति नहीं सुधार और शान्तिपूर्ण बदलाव। इसीलिए लेनिन ने संशोधनवाद को पूँजीवादी व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति की संज्ञा दी थी। इस दूसरी सुरक्षा पंक्ति के ज्योति बसु जैसे कद्दावर सेनानी की मृत्यु पर पूँजीवादी व्यवस्था के अग्रणी पंक्ति के थिंक टैंकों और नेताओं का शोक विह्नल होना स्वाभाविक था।

ज्योति बसु एक ‘भद्रलोक’ (जेण्टलमैन) कम्युनिस्ट थे – शालीन, नफीस, सुसंस्कृत। वे क्रान्ति और संघर्ष की वे बातें नहीं करते थे, जो खाते-पीते ”जेण्टलमैन”सुधारवादी मध्‍यवर्ग को भाती नहीं। ज्योति बसु की जीवन-शैली, कार्य-शैली उनकी राजनीति के सर्वथा अनुरूप थी। इसलिए ”सामाजिक अशान्ति” से भयाकुल रहने वाले मध्‍यवर्ग के उन लोगों को और (आदतों एवं जीवनशैली में मध्‍यवर्ग बन चुके) सफेदपोश कुलीन मजदूरों को वे काफी भाते थे। जो दयालु, करुणामय और”शान्तिप्रिय” मध्‍यवर्गीय भलेमानस पूँजीवादी व्यवस्था को आमूल रूप से बदल डालने के ”ख़तरनाक और जोखिम भरे झंझट” से दूर रहकर इसी व्यवस्था को सुधारकर ग़रीब-ग़ुरबा की ज़िन्दगी में भी बेहतरी लाने के भ्रम में जीते हैं और ऐसा भ्रम पैदा करते हैं, जो लोग पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली के क्षुद्र रहस्य और पूँजीवादी राजनीतिक तन्त्र के अपरिवर्तनीय वर्ग-चरित्र को समझे बिना यह सोचते रहते हैं कि यदि नेता भ्रष्टाचारी न हों और नौकरशाही-लालफीताशाही न हो तो सबकुछ ठीक हो जायेगा, ऐसे भोले-भाले, नेकनीयत मध्‍यवर्ग के लोगों को भी ज्योति बसु, नम्बूदिरिपाद, सुन्दरैया जैसे व्यक्तित्व बहुत भाते हैं। यह भी सामाजिक जनवाद या संशोधनवादी राजनीति की एक सफलता है।

ज्योति बसु सादगी भरा, लेकिन उच्च मध्‍यवर्गीय कुलीन जीवन जीते थे, लेकिन उनपर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया जा सकता। उनसे भी अधिक सादा जीवन माकपा के गोपालन, सुन्दरैया, नम्बूदिरिपाद, हरेकृष्ण कोन्नार, प्रमोद दासगुप्ता जैसे नेताओं का था। पर बुनियादी सवाल किसी नेता के सादगी और ईमानदारी भरे निजी जीवन का नहीं है। बुनियादी सवाल यह भी नहीं है कि वह नेता समाजवाद और कम्युनिज्म की बातें करता है। बुनियादी सवाल यह है कि क्या समाजवाद और कम्युनिज्म की उसकी बातों का वैज्ञानिक आधार है, क्या उसकी नीतियाँ एवं व्यवहार अमली तौर पर मजदूर वर्ग को उसकी मुक्ति की निर्णायक लड़ाई की दिशा में आगे बढ़ाते हैं? सादा जीवन गाँधी का भी था और अपने बुर्जुआ मानवतावादी सिध्दान्तों पर उनकी निजी निष्ठा पर भी सन्देह नहीं किया जा सकता। उनके मानवतावादी यूटोपिया ने करोड़ों आम जनों को जागृत-सक्रिय किया, लेकिन उस यूटोपिया को अमल में लाने की हर प्रकार की कोशिश की अन्तिम परिणति पूँजीवादी सामाजिक-आर्थिक ढाँचे की स्थापना के रूप में ही सामने आनी थी। कहने का मतलब यह कि बुनियादी प्रश्न किसी के ईमानदार नैतिक जीवन और उसकी यूटोपियाई निजी निष्ठाओं का नहीं, बल्कि उसकी विचारधारात्मक-राजनीतिक वर्ग-अवस्थिति का होता है। एक सच्चा और ईमानदार व्यक्ति यदि बुर्जुआ राजनीति के दायरे में ही काम करता है, तो वह वस्तुगत रूप से बुर्जुआ वर्ग की ही सेवा करेगा और उसकी अच्छी छवि बुर्जुआ व्यवस्था के प्रति लोगों का विभ्रम मजबूत बनाने में मददगार ही बनेगी। लेकिन चूँकि हमारे सामाजिक व्यवहार से ही हमारी चेतना निर्मित-अनुकूलित होती है, इसलिए एक ग़लत राजनीति को वस्तुगत तौर पर लागू करने वाले लोग कालान्तर में सचेतन तौर पर भी ग़लत हो जाते हैं और निजी जीवन के स्तर पर भी ढोंग-पाखण्ड, झूठ-फरेब और भ्रष्टाचार से लबरेज हो जाते हैं। संशोधनवादी पार्टियों के बहुतेरे पुराने नेता व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्ट-पतित नहीं, बल्कि भद्र नागरिक थे। आज यह बात नहीं कही जा सकती। इन पार्टियों में ऊपर यदि भ्रष्ट-पतित लोगों की भरमार है, तो नीचे कतारों में गली के गुण्डे-लफंगे तक घुस गये हैं। इनका यह सामाजिक चारित्रिक पतन सामाजिक जनवाद/संशोधनवाद/संसदीय वामपन्थ के क्रमिक राजनीतिक पतन-विघटन की ही एक परिणति है, एक अभिव्यक्ति है और एक प्रतिबिम्ब है। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों में नकली समाजवाद का झण्डा (ख्रुश्चेव काल से सोवियत संघ ही संशोधनवादियों का मक्का था) 1990 में गिर गया। फिर चीन में 1976 में माओ की मृत्यु के बाद देघपन्थी संशोधनवाद की जो सत्ता कायम हुई थी, उसका ”बाजार समाजवाद” अब सरेबाजार अलफ नंगा खड़ा अपनी पूँजीवादी असलियत की नुमाइश कर रहा है। ऐसी सूरत में, दुनिया भर की रंग-बिरंगी ख्रुश्चेवी संशोधनवादी पार्टियों ने ज्यादा खुले तौर पर पूँजीवादी संसदीय राजनीति और अर्थवादी राजनीति की चौहद्दी को स्वीकार कर लिया है। अब उनका बात-व्यवहार एकदम खुले तौर पर (सारतत्व तो पहले से ही एक था) वैसा ही हो गया है जैसा कि 1910 के दशक में मार्क्‍सवाद से विपथगमन करने वाली काउत्सकीपन्थी सामाजिक जनवादी पार्टियों का रहा है। यूरोप से लेकर कई लातिन अमेरिकी देशों तक में लेबर पार्टियों और सोशलिस्ट पार्टियों का आचरण दक्षिणपन्थी बुर्जुआ पार्टियों जैसा हो गया है तथा ख्रुश्चेवी कम्युनिस्ट पार्टियों का आचरण लेबर और सोशलिस्ट पार्टियों जैसा हो गया है। भारत में कुछ पुराने समाजवादी फासिस्ट भाजपा के साथ गाँठ जोड़ सरकारें चला रहे हैं, कुछ धनी किसानों-कुलकों की राजनीति कर रहे हैं तो कुछ अलग-अलग बुर्जुआ पार्टियों में घुल-मिल गये हैं। जो ख्रुश्चेवी और देघपन्थी संशोधनवादी पार्टियाँ हैं, वे भूमण्डलीकरण की पूरी राजनीति एवं अर्थनीति को स्वीकारते हुए बस उसे कुछ ”मानवीय चेहरा” देने की बात करती हैं तथा सरपट उदारीकरण-निजीकरण की राह में कुछ स्पीड-ब्रेकर्स लगाने की बात करती हैं, ताकि मेहनतकश अवाम का पूँजीवादी व्यवस्था और संसदीय राजनीति के प्रति भरम बने रहे तथा निर्बाध उदारीकरण-निजीकरण की भयंकर सामाजिक परिणतियाँ (बेशुमार छँटनी, बेरोजगारी, विस्थापन, मजदूरों के रहे-सहे अधिकारों एवं सामाजिक सुरक्षा का भी अपहरण, धनी-ग़रीब की बढ़ती खाई आदि) किसी क्रान्तिकारी तूफान के उभार के लिए जरूरी सामाजिक दबाव न पैदा कर दें। इस तरह, अपनी छद्म वामपन्थी जुमलेबाजी को छोड़ देने और बुर्जुआ चेहरे से नकाब थोड़ा हटा देने के बावजूद, पूरी दुनिया की ही तरह, भारत की संशोधनवादी वामपन्थी पार्टियाँ अभी भी इस व्यवस्था की वफादार सुरक्षा पंक्ति की, सामाजिक ताप पर ठण्डा पानी डालते रहने वाले पुफहारे की तथा जनाक्रोश के दाब को कम करने वाले सेफ्टीवॉल्व की भूमिका अत्यन्त कुशलतापूर्वक निभा रही हैं। उनके ”कम्युनिज्म” को लेकर जनता को कोई भ्रम नहीं रह गया है और इस मायने में उनकी एक भूमिका (भ्रमोत्पादक की भूमिका) तो समाप्त हो चुकी है, लेकिन ”वाम” सुधारवादी राजनीतिक शक्ति के रूप में पूँजीवाद की दूसरी सुरक्षा-पंक्ति के रूप में उनकी भूमिका अभी भी कायम है। नवउदारवाद की राजनीतिक चौहद्दी को कमोबेश खुलकर स्वीकारने के बाद, उनका सामाजिक आधार और वोटबैंक सिकुड़ता जा रहा है, पर पूँजीवाद के लिए उनकी उपयोगिता अभी भी कायम है। किसी सशक्त, एकजुट क्रान्तिकारी विकल्प की अनुपस्थिति से आम जनता में जो निराशा है, उसके कारण वह सोचती है कि चलो, तबतक संसदीय वामपन्थी जो भी दो-चार आने की राहत दिला देते हैं, वही सही, क्योंकि क्रान्ति तो अभी काफी दूर की बात है (या कि अब सम्भव नहीं है)। यानी आज भी संशोधनवाद जनता को अपने ऊपर पूँजीवाद को शासन करने की स्वीकृति देने के लिए तैयार करने का कार्य करता रहता है। इसे ही राजनीतिक वर्चस्व को स्वीकार करना कहते हैं।

ज्योति बसु इसी संशोधनवादी वाम राजनीति के एक महारथी थे। उनके जाने का दुख उनके संसदीय वामपन्थी साथी-सँघातियों को तो है ही, पूँजीवाद के कट्टर हिमायतियों, बुर्जुआ थिंक टैंकों और रणनीतिकारों को भी है और सुधारवादी मानस वाले मध्‍यवर्गीय प्रगतिशीलों को भी। ज्योति बसु पुरानी पीढ़ी के संशोधनवादी थे। बुध्ददेव, सीताराम येचुरी, नीलोत्पल बसु और विजयन मार्का नये जमाने वालों के मुकाबले वे ज्यादा खाँटी और पुराने ”कम्युनिस्टी” रंग ढंग वाले दिखते थे। पहले कभी गोपालन, सुन्दरैया, प्रमोद दासगुप्त, जैसों के मुकाबले ज्योति बसु ही ”मॉडर्न” माने जाते थे। मज़ाक में लोग उन्हें ”पार्टी का उत्तम कुमार” भी कहते थे। ज्योति बसु संसदीय वामपन्थ की अधोमुखी यात्रा के कई दौरों के साक्षी थे। तीन दशक पहले तक पार्टी में उन्हें सिध्दान्तकार और संगठनकर्ता का दर्जा, देश स्तर पर तो दूर, बंगाल स्तर पर भी हासिल नहीं था। बासवपुनैया, प्रमोद दासगुप्त, सुन्दरैया आदि की यह छवि थी। ज्योति बसु चुनावी राजनीति के स्टार थे, एक दक्ष राजनेता (स्टेट्समैन), कूटनीतिज्ञ (डिप्लोमैट) और प्रशासक थे। पंजाब के ”जत्थेदार कॉमरेड” हरकिशन सिंह सुरजीत घनघोर व्यवहारवादी (प्रैग्मेटिक) और जोड़तोड़ में माहिर-तिकड़मी राजनीतिज्ञ थे।

ज्योति बसु का जन्म 1914 में बंगाल के एक उच्च मध्‍यवर्गीय कुलीन परिवार में हुआ था। 1935 में वे बैरिस्टरी की पढ़ाई करने लंदन गये। इस दौरान वे प्राय: लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जाकर प्रख्यात सामाजिक जनवादी विद्वान हेराल्ड लास्की के भाषण सुनते थे। लास्की के विचारों ने ही उनके भीतर समाजवादी रुझान पैदा किया। 1937 में वे राष्ट्रवादी छात्रों के साथ ‘इण्डिया लीग’ और ‘लंदन मजलिस’ संस्थाओं में सक्रिय रहे। नेहरू, सुभाष और अन्य भारतीय नेताओं को लेबर पार्टी के नेताओं और समाजवादी नेताओं से मिलवाने का काम भी उन्होंने किया। इसी बीच 1939 में वे रजनी पाम दत्त के सम्पर्क में आये, जो ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के एक शीर्ष नेता थे। कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल की भारत और उपनिवेश- विषयक नीतियों की व्याख्या करते हुए वे भारत और ब्रिटेन के पार्टी मुखपत्रों में लेख लिखा करते थे और प्राय: उनमें अपनी ओर से कुछ संशोधनवादी छौंक-बघार लगा दिया करते थे। वे एक अभिजात कम्युनिस्ट थे, जिनकी संशोधनवादी रुझानें उस समय भी थीं, जब ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी का रंग अभी बदला नहीं था। बाद में संशोधनवाद की ओर पार्टी को धकेलने में उनकी अग्रणी भूमिका रही थी। तो ऐसे व्यक्ति थे ज्योति बसु के राजनीतिक पथप्रदर्शक। दरअसल अपनी पीढ़ी के बहुतेरे उच्च मध्‍यवर्गीय युवाओं की तरह ज्योति बसु भी एक रैडिकल राष्ट्रवादी थे जिन्हें समाजवाद के नारे आकृष्ट तो करते थे, लेकिन कम्युनिज्म की क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु को वे कभी भी आत्मसात नहीं कर पाये। चूँकि कम्युनिस्ट पार्टी भी उस समय अभी समाजवाद के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मुक्ति के लिए और जनवादी क्रान्ति के लिए लड़ रही थी, इसलिए बहुतेरे ऐसे रैडिकल जनवादी राष्ट्रवादी युवा उस समय पार्टी में शामिल हो रहे थे, जिन्हें कांग्रेस की समझौतापरस्ती की राजनीति रास नहीं आ रही थी। बहरहाल, युवा ज्योति बाबू में तब नौजवानी का जोश, कुर्बानी का जज्बा और आदर्शवाद की भावना तो थी ही। स्वदेश-वापसी के बाद, वकालत करने के बजाय उन्होंने पेशेवर क्रान्तिकारी का जीवन चुना और मजदूरों के बीच काम करने लगे। ग़ौरतलब है कि यह भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का वह दौर था जब पी.सी. जोशी के नेतृत्व में दक्षिणपन्थी भटकाव पार्टी पर हावी था। 1941 में ज्योति बसु ने बंगाल-असम रेलवे के मजदूरों के बीच काम किया और उनके यूनियन सेक्रेटरी भी रहे। कुछ समय तक उन्होंने बंदरगाह और गोदी मजदूरों के बीच भी काम किया।

कम्युनिस्ट पार्टी कानूनी घोषित की जाने के बाद 1943 में जब उसकी पहली कांग्रेस हुई तो उसमें ज्योति बसु प्रान्तीय संगठनकर्ता चुने गये। फिर चौथे राज्य सम्मेलन में उन्हें राज्य कमेटी में चुना गया। 1946 से देश एक ऐसे संक्रमण काल से गुजरने लगा था, जिसमें प्रचुर क्रान्तिकारी सम्भावनाएँ निहित थीं। नौसेना विद्रोह, देशव्यापी मजदूर हड़तालें, तेलंगाना-तेभागा-पुनप्रा वायलार के किसान संघर्ष – इन ऐतिहासिक घटनाओं ने अगले तीन-चार वर्षों के दौरान पूरे देश को हिला रखा था। अपनी विचारधारात्मक कमजोरी, नेतृत्व में एकजुटता के अभाव और ढीले-ढाले सांगठनिक ढाँचे के कारण पार्टी इस निर्णायक घड़ी में पहल अपने हाथ में लेने में पूरी तरह विफल रही (ऐसे अवसर वह पहले भी गँवा चुकी थी)। राष्ट्रीय आन्दोलन को नेतृत्व देने वाला बुर्जुआ वर्ग जनता की आकांक्षाओं के साथ विश्वासघात करते हुए साम्राज्यवादियों के साथ समझौते के साथ बुर्जुआ शासन की पूर्वपीठिका तैयार कर रहा था। बेशुमार साम्प्रदायिक ख़ून-ख़राबे के बाद देश का विभाजन हो रहा था। ऐसी राजनीतिक आजादी मिल रही थी जो अधूरी और खण्डित थी। साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद के बजाय उसके आर्थिक हितों की सुरक्षा की गारण्टी दी जा रही थी। रैडिकल भूमि सुधार के मामले में भी कांग्रेस के विश्वासघात के संकेत मिल चुके थे। सार्विक मताधिकार के आधार पर चुने जाने के बजाय महज 12 फीसदी आबादी द्वारा चुनी गयी संविधान सभा अत्यन्त सीमित जनवादी अधिकार देने वाला (और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें भी छीन लेने के इन्तजामों से लैस) वाग्जालों से भरा संविधान बना रही थी।

इस संक्रमण काल में कम्युनिस्ट पार्टी कन्फ्यूज थी, अनिर्णय का शिकार थी। रही-सही कसर रणदिवे की ”वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन ने पूरी कर दी। नेहरू की भेजी हुई भारतीय फौजों ने तेलंगाना किसान संघर्ष को कुचल दिया। लम्बी कमजोरियों और भूल-ग़लतियों के सिलसिले ने पार्टी को उसकी तार्किक परिणति तक पहुँचा दिया। तेलंगाना पराजय के बाद पार्टी पूरी तरह से संशोधनवादी हो गयी। चुनावी वामपन्थ का जमाना आ गया। ज्योति बसु इस दौरान क्या कर रहे थे! किसान संघर्षों और जुझारू मजदूर आन्दोलन को क्रान्तिकारी दिशा देने की किसी कोशिश के बजाय, पार्टी के निर्णय का पालन करते हुए उन्होंने 1946 की प्रान्तीय विधायिका का चुनाव लड़ा, रेलवे कांस्टीच्युएंसी से (सीमित मताधिकार के आधार पर), और विजयी रहे। उसी वर्ष भीषण साम्प्रदायिक दंगों के दौरान गाँधीजी जब बंगाल गये तो ज्योति बसु उनसे मिले और उनकी सलाह से एक शान्ति कमेटी बनायी और शान्ति मार्च निकाला। तेलंगाना किसान संघर्ष को लेकर पार्टी में जो कई लाइनों का संघर्ष था, उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी। 1952 में जब पहले आम चुनाव हुए, तब वे बंगाल विधानसभा के सदस्य चुने गये और विधान चन्द्र राय की कांग्रेसी सरकार के शासनकाल के दौरान विपक्ष के नेता रहे। तबसे लेकर, सन् 2000 तक, 1972-77 की समयावधि को छोड़कर ज्योति बसु लगातार बंगाल की विधानसभा के लिए चुने जाते रहे। संसदीय राजनीति ही आधी शताब्दी तक उनका कार्यक्षेत्र बनी रही। 1951 में वे पार्टी के बांग्ला मुखपत्र’स्वाधीनता’ के सम्पादक-मण्डल के अध्‍यक्ष चुने गये। 1953 में वे राज्य कमेटी के सचिव चुने गये। 1954 की मदुरै पार्टी कांग्रेस में वे केन्द्रीय कमेटी में और फिर पालघाट कांग्रेस में सेक्रेटेरियट में चुने गये। 1958 में अमृतसर की जिस विशेष कांग्रेस ने सोवियत पार्टी की बीसवीं कांग्रेस की ख्रुश्चेवी संशोधनवादी लाइन को सर्वसम्मति से स्वीकार किया था, उसी कांग्रेस में ज्योति बसु राष्ट्रीय परिषद में चुने गये थे। 1964 में जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का भाकपा और माकपा में विभाजन हुआ, तो यह संशोधनवाद और क्रान्तिकारी कम्युनिज्म के बीच का विभाजन नहीं था। वह विभाजन वस्तुत: संशोधनवाद और नवसंशोधनवाद के बीच था, नरमपन्थी संसदीय वामपन्थ और गरमपन्थी संसदीय वामपन्थ के बीच था, अर्थवाद और जुझारू अर्थवाद के बीच था। डांगे-राजेश्वर राव गुट (भाकपा) ख्रुश्चेवी संशोधनवाद का पूर्ण समर्थक था और नेहरूवादी ”समाजवाद” को प्रगतिशील राष्ट्रीय बुर्जुआ की नीति मानकर कांग्रेस का पुछल्ला बनने को तैयार था। विरोधी गुट (माकपा) ज्यादा शातिर संशोधनवादी था। माकपा नेतृत्व ख्रुश्चेवी संशोधनवाद की आलोचना करता था, लेकिन साथ ही चीन की पार्टी को भी अतिवाद का शिकार मानता था। सत्तारूढ़ सोवियत पार्टी को वह संशोधनवादी, लेकिन राज्य को समाजवादी मानता था। इस तर्क से कालान्तर में राज्य का समाजवादी चरित्र भी समाप्त हो जाना चाहिए था, पर इसके उलट, माकपा ने कुछ ही वर्षों बाद सोवियत पार्टी को भी बिरादर पार्टी मानना शुरू कर दिया। माकपा नेतृत्व नेहरू सरकार को साम्राज्यवाद का जूनियर पार्टनर बन चुके इजारेदार पूँजीपति वर्ग का प्रतिनिधि मानकर उनके विरुद्ध राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चा बनाकर संघर्ष करने की बात करता था।

माकपा का चरित्र हालाँकि उसकी संसदीय राजनीति ने बाद में एकदम नंगा कर दिया, लेकिन 1964 में अपने गरम तेवर दिखाकर क्रान्तिकारी कतारों के बड़े हिस्से को अपने साथ लेने में वह सफल हो गयी। पार्टी संगठन के लेनिनवादी उसूलों के हिसाब से देखें तो माकपा का संशोधनवादी चरित्र 1964 से ही एकदम साफ था। 1951 से जारी पार्टी के एकदम खुले, कानूनी, संसदीय चरित्र और कार्यप्रणाली को माकपा ने यथावत् जारी रखा। पार्टी सदस्यता की प्रकृति रूस के मेंशेविकों से भी गयी-गुजरी थी। अमृतसर कांग्रेस में पार्टी संविधान में किये गये बदलाव को 1964 में यथावत् कायम रखा गया। पार्टी के लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम के हिसाब से दीर्घकालिक लोकयुद्ध ही क्रान्ति का मार्ग हो सकता था, पर इसके उल्लेख से बचकर पार्टी कार्यक्रम में छलपूर्ण भाषा में ”संसदीय और ग़ैर-संसदीय रास्ते” का उल्लेख किया गया। कोई भी क्रान्तिकारी पार्टी बुर्जुआ संसदीय चुनावों का महज रणकौशल के रूप में इस्तेमाल करती है। संसदीय मार्ग को ग़ैर-संसदीय मार्ग के समकक्ष रखना अपने आप में संशोधनवाद है। 1967 में और 1969 में माकपा यही कहती थी कि वह संसद-विधानसभा का इस्तेमाल रणकौशल (टैक्टिक्स) के रूप में ही करती है। लेकिन 33 वर्षों तक बुर्जुआ व्यवस्था के अन्तर्गत बंगाल में शासन करते हुए (इनमें से 23 वर्षों तक ज्योति बसु के मुख्यमन्त्रित्व में) उसने बुर्जुआ नीतियों को भरपूर वफादारी के साथ लागू किया है और वर्ग संघर्ष की तैयारी के लिए चुनावों के टैक्टिकल इस्तेमाल के बजाय हर जनान्दोलन को कुचलने के लिए राज्यतन्त्र का बर्बर इस्तेमाल किया है। ज्योति बसु को इस साफगोई के लिए सराहा जाना चाहिए कि 1977 से 1990 के बीच दो-तीन बार उन्होंने कहा था कि ‘हम पूँजीवाद के अन्दर एक राज्य में सरकार चला रहे हैं, समाजवाद नहीं ला रहे हैं।’ माकपा पिछले दो-तीन दशकों से चुनाव के’टैक्टिकल इस्तेमाल’ वाला जुमला भूले से भी नहीं दुहराती। अब वह न केवल ख्रुश्चेवी शान्तिपूर्ण संक्रमण के सिध्दान्त को पूरी तरह से मौन स्वीकृति दे चुकी है और उसके और भाकपा के बीच व्यवहारत: कोई अन्तर नहीं रह गया है, बल्कि उसका आचरण एक निहायत भ्रष्ट एवं पतित सामाजिक जनवादी पार्टी जैसा ही है। भ्रष्टाचार का दीमक उसमें अन्दर तक पैठ चुका है (हालाँकि अन्य बुर्जुआ पार्टियों से फिर भी काफी कम है) और बंगाल में राज्य मशीनरी के साथ माकपाई गुण्डाें-मस्तानों के समानान्तर तन्त्र की मौजूदगी ने सोशल फासिस्ट दमन का माहौल बना रखा है।

जब माकपा-भाकपा का बँटवारा हो रहा था तो कुछ मध्‍यमार्गी भी थे जो बीच में डोल रहे थे। फिर इनमें से कुछ भाकपा में गये कुछ माकपा में। जैसे, भूपेश गुप्त भाकपा में गये, ज्योति बसु माकपा में। ज्योति बसु शुरू से ही एक घुटे-घुटाये संसदीय वामपन्थी थे। 1967 में नक्सलबाड़ी किसान उभार के बाद एक नये धा्रुवीकरण की शुरुआत हुई। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कतारें भारी तादाद में माकपा से निकलकर नक्सलबाड़ी के झण्डे तले इकट्ठा होने लगीं। नक्सलबाड़ी पहले एक क्रान्तिकारी जनसंघर्ष के रूप में पूफटा लेकिन 1969 आते-आते उसपर चारु मजुमदार की ”वामपन्थी” आतंकवादी लाइन हावी हो गयी और फिर इसी लाइन पर भाकपा (मा.ले.) का निर्माण हुआ। जो लोग आतंकवादी लाइन के विरोधी थे, वे भी राष्ट्रीय परिस्थितियों और कार्यक्रम की ग़लत समझ के कारण कोई क्रान्तिकारी विकल्प नहीं दे सके और यह पूरी धारा बिखराव का शिकार हो गयी। लेकिन 1967-68 में तो नक्सलबाड़ी उभार ने माकपा के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया था।

1967 में बंगाल में संयुक्त मोर्चे की जो सरकार बनी थी, उसमें माकपा शामिल थी। ज्योति बसु उप-मुख्यमन्त्री तथा वित्त और परिवहन के मन्त्री थे। माकपा ने सरकार से बाहर आकर नक्सलबाड़ी किसान उभार को समर्थन देने के बजाय, पहले तो वहाँ के स्थानीय पार्टी नेताओं एवं कतारों को समझाने-बुझाने का प्रयास किया। फिर सभी को पार्टी से बाहर किया गया और राज्य की सशस्त्र पुलिस मशीनरी और (राज्य सरकार की अनुमति से) केन्द्रीय सशस्त्र बलों का इस्तेमाल करके नक्सलबाड़ी आन्दोलन को बेरहमी से कुचल दिया गया। इसमें ज्योति बसु की उप-मुख्यमन्त्री के रूप में अहम भूमिका थी। इस समय तक आन्दोलन पूरे देश में फैल चुका था। हर राज्य में माकपा टूट रही थी। मा-ले पार्टी के गठन की प्रक्रिया शुरू हो रही थी। माकपा नेतृत्व ने सभी नक्सलबाड़ी समर्थकों को पार्टी से निकाल बाहर किया। 1969 में प. बंगाल में पुन: संयुक्त मोर्चे की जो सरकार बनी, उसमें भी ज्योति बसु उप-मुख्यमन्त्री थे और साथ ही गृह, पुलिस और सामान्य प्रशासन विभाग भी उन्हीं के पास था। इस समय नक्सलबाड़ी तो कुचला जा चुका था, पर बंगाल के कई इलाके धधक रहे थे। ”वामपन्थी” आतंकवादी कार्रवाइयाँ भी शुरू हो चुकी थीं। ज्योति बसु ने इस बार प्रतिरोध को कुचलने के लिए पुलिस मशीनरी का बर्बर और बेधड़क इस्तेमाल किया। 1972 के चुनावों में जबर्दस्त धाँधली के बाद बंगाल में कांग्रेस की सरकार बनी। सिध्दार्थ शंकर रे मुख्यमन्त्री बने। पूरे देश में तो आपातकाल जून 1975 में लगा, लेकिन बंगाल में नक्सलवादियों के दमन के नाम पर यन्त्रणा, फर्जी मुठभेड़ों के जरिये फासिस्ट पुलिस राज्य सिध्दार्थ शंकर रे ने 1972 में ही कायम कर दिया था। माकपा ने1972 से 1977 तक विधानसभा का बहिष्कार किया। 1977 में आपातकाल हटने के बाद केन्द्र में जनता पार्टी शासन स्थापित हुआ और बंगाल में वाम मोर्चे का शासन कायम हुआ जो आज तक जारी है। ज्योति बसु मुख्यमन्त्री बने और 2000 तक इस पद पर रहते हुए एक कीर्तिमान स्थापित किया। यह इतिहास का स्मरणीय तथ्य है कि सिध्दार्थ शंकर रे के शासनकाल के पहले, गृह एवं पुलिस मन्त्रालय सँभालते हुए नक्सलवाद के दमन के नाम पर पुलिस राज्य कायम करने का काम ज्योति बसु ने भी किया था।

1977 में ज्योति बसु ने जब बंगाल का मुख्यमंत्रित्व सँभाला उस समय उनके सामने नक्सलबाड़ी की चुनौती नहीं थी। लेकिन नक्सलबाड़ी की एक नसीहत सामने थी, जिसपर सभी बुर्जुआ अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और संशोधनवादी सहमत थे। सबकी कमोबेश एक ही राय थी और वह यह कि यदि नक्सलबाड़ी जैसे विस्फोटों से और उसके ”सम्भावित” भयावह नतीजों से बचना है तो बुर्जुआ भूमि सुधारों की गति थोड़ी और तेज करनी होगी। ज्योति बसु ने इसी काम को ‘आपरेशन बर्गा’ के रूप में अंजाम दिया। आज माकपाई झाल-करताल लेकर ‘ऑपरेशन बर्गा’ का कीर्तन करते हैं। ‘ऑपरेशन बर्गा’ कोई क्रान्तिकारी भूमि सुधार नहीं था। वह ”ऊपर से किया गया,” प्रशियाई टाइप, स्तॉलिपिन सुधार टाइप, मरियल बुर्जुआ भूमि सुधार कार्यक्रम था, जिसने आंशिक तौर पर भूमि के मालिकाने के सवाल को हल करके बंगाल की खेती में क्रमिक पूँजीवादी विकास की जमीन तैयार की और वहाँ कुलकों-पूँजीवादी किसानों के पैदा होने का आधार बनाया। ऐसे भूमि सुधार बहुतेरे अन्य प्रान्तों में हो चुके थे। बंगाल पीछे छूटा हुआ था। यदि रैडिकल चरित्र की ही बात की जाये तो छठे दशक के शुरू में ही, अपने पहले शासनकाल के दौरान शेख़ अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर में ज्यादा रैडिकल बुर्जुआ भूमि-सुधार कार्यक्रम लागू किया था।

1977 तक भारत का पूँजीवाद काफी मजबूत हो चुका था और कृषि के पूँजीवादीकरण की प्रक्रिया को तेज करके, रहे-सहे अर्ध्द-सामन्ती अवशेषों को समाप्त करके एक व्यापक राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करना उसकी जरूरत थी। ज्योति बसु ने ‘ऑपरेशन बर्गा’ के द्वारा पूँजीवादी भूमि-सुधार के इसी कार्यक्रम को कुशलतापूर्वक लागू किया और भारतीय पूँजीवाद की ऐतिहासिक सेवा की। ‘ऑपरेशन बर्गा’ ने काश्तकार किसानों को आंशिक मालिकाना हक देकर पूँजीवादी खेती के विकास के साथ ही इन नये छोटे-बड़े मालिक किसानों में माकपा का नया सामाजिक आधार और वोट बैंक तैयार किया। गाँवों में जो बड़े मालिक किसानों का ताकतवर हिस्सा पैदा हुआ, उसे राजनीतिक सत्ता में (आर्थिक ताकत के अनुरूप) भागीदारी भी चाहिए थी। यह उसे एक ओर माकपा पार्टी तन्त्र के स्थानीय मनसबदार के रूप में हासिल हुआ (बंगाल में माकपा की पार्टी मशीनरी प्रशासन मशीनरी के साथ मिलकर काम करती है) और दूसरी ओर पंचायती राज ने उसे लूटने-खाने और शासन करने का मौका दिया। पूँजीवादी पंचायती राज का ‘ट्रेण्ड-सेटर’ प्रयोग वास्तव में ज्योति बसु ने किया था जिसे राजीव गाँधी शासन काल के दौरान कांग्रेस ने अपना लिया था (हालाँकि उतने प्रभावी ढंग वह इसे लागू नहीं कर पायी)।

बंगाल के गाँवों में पूँजीवादी विकास का सिलसिला जब कुछ और आगे बढ़ा तो जो छोटे मालिक किसान पूँजीवादी शोषण का शिकार हो रहे थे, उनका धीरे-धीरे माकपा व वाम मोर्चा से मोहभंग होने लगा। माकपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं (जो प्राय: नवधनिक कुलक या ग्रामीण मध्‍यवर्ग के लोग थे) की गुण्डागर्दी और भ्रष्टाचार ने इसमें विशेष भूमिका निभायी। उधर नवधनिक कुलकों का एक हिस्सा भी लूट के माल और स्थानीय सत्ता के बँटवारे के बढ़ते अन्तरविरोधों के चलते माकपा से दूर हटा। गाँवों में इन्हीं के बीच तृणमूल कांग्रेस ने (और कहीं-कहीं कांग्रेस ने भी) अपना नया वोट बैंक तैयार किया है।

वर्ष 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार की विभिन्न सुधारवादी कार्रवाइयों ने नगरों-महानगरों में मध्‍य वर्ग को विशेष तौर पर अपनी ओर खींचा। संगठित मजदूरों को भी शुरू में कुछ आर्थिक लाभ मिले। सबसे बड़ी बात यह थी सिध्दार्थ शंकर रे के काले आतंक राज को भूलने और कांग्रेस को माफ करने के लिए मध्‍यवर्ग और मजदूर कत्तई तैयार नहीं थे। यही कारण था कि जब ज्योति बसु सरकार के बुर्जुआ सुधारों का ‘स्कोप’ समाप्त हो गया, शासन-प्रशासन में बढ़ता भ्रष्टाचार साफ दीखने लगा और माकपा के स्थानीय नेताओं की दादागिरी भी बढ़ने लगी, तब भी बंगाल की जनता – विशेषकर शहरी मध्‍य वर्ग और औद्योगिक मजदूर उसे मजबूरी का विकल्प मानते रहे। बंगाल के शहरों में जनवादी चेतना अधिक रही है और सिध्दार्थ शंकर रे के शासनकाल को याद करके बंगाल की जनता सोचती रही कि जनवादी अधिकारों के नजरिये से माकपा शासन को बनाये रखना उसकी विवशता है।

इस बीच ज्योति बसु, माकपा और वाम मोर्चे का सामाजिक जनवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा होता चला गया। भद्रपुरुष ज्योति बाबू बार-बार मजदूरों को हड़तालों से दूर रहने और उत्पादन बढ़ाने की राय देने लगे, जबकि मजदूरों की हालत लगातार बद से बदतर होती जा रही थी। ज्योति बसु विदेशी पूँजी को आमन्त्रित करने के लिए बार-बार पश्चिमी देशों की यात्रा पर निकलने लगे (कभी छुट्टियाँ बिताने तो कभी आर्थिक-तकनीकी मदद के लिए 1990 तक रूस और पूर्वी यूरोप तो जाते ही रहते थे)। देशी पूँजीपतियों को पूँजी-निवेश के लिए पलक-पाँवड़े बिछाकर आमन्त्रित किया जाने लगा। देश के तमाम बड़े पूँजीपति (विदेशी कम्पनियाँ भी) पूँजी निवेश के लिए बंगाल के परिवेश को अनुकूल बताने लगे। दिक्कत अब उन्हें हड़तालों से नहीं थी, बल्कि माकपा के उन ट्रेड यूनियन क्षत्रपों से थी जो मजदूरों से वसूली करने के साथ ही मालिकों से भी कभी-कभी कुछ ज्यादा दबाव बनाकर वसूली करने लगते थे।

जब 1991 से नरसिंह राव की सरकार ने उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की शुरुआत की तो माकपा देश स्तर पर तो उसका विरोध कर रही थी, लेकिन बंगाल में ज्योति बसु की सरकार उन्हीं नीतियों को लागू कर रही थी। चीन का ”बाज़ार समाजवाद” माकपा को नवउदारवादी लहर में बहने का तर्क दे रहा था, दूसरी ओर उदारीकरण-लहर को कुछ ”मानवीय चेहरा” देने मात्र की सिफारिश करते हुए माकपा ‘सेफ्टी वॉल्व’ का और पैबन्दसाजी का अपना पुराना सामाजिक जनवादी दायित्व भी निभा रही थी। गत् शताब्दी के अन्तिम दशक के उत्तरार्ध्द तक माकपा की नीतियों से मजदूर वर्ग और शहरी निम्न मध्‍यवर्ग को अब आंशिक सुधार की भी उम्मीद नहीं रह गयी थी। पूँजी निवेश से रोजगार पैदा होने की उम्मीदें मिट्टी में मिल चुकी थीं। कलकत्ता के औद्योगिक मजदूरों की स्थिति अन्य औद्योगिक केन्द्रों से भी बदतर थी।

माकपा ने मुहल्ले-मुहल्ले तक, मजदूर बस्तियों से लेकर दुर्गापूजा समितियों तक अपने मस्तान नुमा कार्यकर्ताओं का ऐसा नेटवर्क तैयार कर लिया था कि अस्पताल में भरती होने से लेकर स्कूल में एडमिशन तक का काम उनके बिना नहीं हो सकता था। माकपा प्रभुत्व वाली मजदूर यूनियनों और छात्र यूनियनों के प्रभाव क्षेत्र में राजनीतिक पैठ की किसी कोशिश को गुण्डागर्दी से दबा दिया जाता था। इसी प्रकार का माफिया तन्त्र गाँवों में पार्टी दफ्तरों और पंचायती राज संस्थाओं के इर्द-गिर्द निर्मित हो चुका था। यह सब कुछ ज्योति बसु के ही शासनकाल के दौरान हुआ था। इसके बावजूद विशेषकर पिछले दो या तीन चुनावों में वाममोर्चा यदि जीता तो उसका मुख्य कारण था सी.पी.एम. के पार्टी माफिया तन्त्र का आतंककारी, प्रभावी नेटवर्क और किसी कारगर बुर्जुआ चुनावी विकल्प का अभाव। तृणमूल ने एक हद तक स्वयं वैसा ही नेटवर्क खड़ा करके (लोहे को लोहे से काटने की नीति अपनाकर), गाँवों में मालिक किसानों के प्रतिस्पर्ध्दी गुटों और माकपा से निराश ग़रीब किसानों को साथ लेकर तथा कांग्रेस के साथ मोर्चा बनाकर जब प्रभावी चुनौती पेश की है तो प्रबुद्ध शहरी मध्‍यवर्ग का बड़ा हिस्सा भी इधर आकृष्ट हुआ है। सिंगूर और नन्दीग्राम ने माकपा की मिट्टी और अधिक पलीद करने का काम किया है। चुनावी राजनीति के दायरे में पहली बार माकपा के सितारे गर्दिश में नजर आ रहे हैं। इस दायरे के बाहर क्रान्तिकारी विकल्प की तलाश करते हुए मेहनतकश ग्रामीण आबादी का सबसे तबाह हिस्सा और रैडिकल शहरी युवाओं का एक हिस्सा ”वामपन्थी” दुस्साहसवादी राजनीति की ओर मुड़ा है। तीसरी ओर, औद्योगिक मजदूरों और रैडिकल छात्रों-युवाओं का एक हिस्सा क्रान्तिकारी जन राजनीति की नयी दिशा और नये रूपों के सन्धान की ओर उन्मुख हुआ है। बंगाल की राजनीति आज एक मोड़ पर खड़ी है। आगे बदला हुआ परिदृश्य चाहे जैसा भी हो, इतना तय है कि माकपा के ”सुनहरे दिन” अब बीत चुके हैं।

सच पूछें, तो इस पराभव की शुरुआत तो ज्योति बसु के शासन काल के दौरान ही हो चुकी थी। यूँ तो स्वास्थ्य कारणों से 2000 में उन्होंने मुख्यमन्त्री पद छोड़ा था, लेकिन इज्ज़त बचाकर निकल लेने के लिए, ससम्मान मंच से विदा होने के लिए, उन्होंने बिल्कुल सही समय का चुनाव किया था। व्यक्तिगत तौर पर एक कसक रह गयी थी – 1996 में वी.पी. सिंह द्वारा प्रस्ताव रखने के बावजूद माकपा ने उन्हें देश का प्रधानमन्त्री बनने से रोक दिया था। इसके पहले 1989 में भी अरुण नेहरू और चन्द्रशेखर ने वी.पी. सिंह की जगह उन्हें प्रधानमन्त्री बनने का प्रस्ताव रखा था, पर तब वे खुद ही नहीं चाहते थे। 1996 में उनका कैल्कुलेशन यह था कि यदि वे प्रधानमन्त्री बन जायेंगे तो अन्य बुर्जुआ पार्टियाँ बहुत दिनों तक तो सरकार चलने नहीं देंगी। इस तरह मरने से पहले प्रधानमन्त्री बनने की उनकी निजी साध भी पूरी हो जायेगी और सत्ताच्युत होने के बाद यह कहकर ”शहीद” बनने का मौका मिल जायेगा कि जनहित की नीतियाँ लागू करते ही साम्राज्यवादियों-पूँजीपतियों और बुर्जुआ पार्टियों ने उनकी सरकार गिरा दी। पार्टी में प्रकाश करात के हावी गुट का कैल्कुलेशन यह था कि केन्द्र स्तर पर यदि दो-ढाई वर्षों तक भी सरकार चलती रही तो नवउदारवादी नीतियों को लागू करने के चलते माकपा की लँगोटी उतर जायेगी और बची-खुची इज्ज़त भी नीलाम हो जायेगी। अब इनमें से कौन ज्यादा सही सोच रहा था, यह अटकल लगाना हमारा काम नहीं है। जो भी हो, पूँजीवादी संसदीय जनवाद की इतनी सेवा करने के बावजूद ज्योति बसु को यदि प्रधानमन्त्री बनने की साध लिये-लिये इस दुनिया से जाना पड़ा, यदि अपने ही ”कामरेडों” ने किये-दिये पर पानी फेर दिया, तो वे कर भी क्या सकते थे! ज्यादा से ज्यादा भड़ास निकाल सकते थे और 1996 के पार्टी के निर्णय को ”ऐतिहासिक भूल” बताकर उन्होंने यही किया था।

ज्योति बसु प्रधानमन्त्री भले ही नहीं बन सके, उन्हें उनके अवदानों के लिए न केवल अपने संसदीय वामपन्थी साथियों से, बल्कि बुर्जुआ नेताओं, विचारकों और बुध्दिजीवियों से तथा बुर्जुआ मीडिया से भरपूर सम्मान मिला। उनके निधन पर सभी ने शोकविह्नल होकर उन्हें याद किया। क्रान्तिकारी उथल-पुथल के तूफानों से डरने वाले, भलेमानस मध्‍यवर्ग के बहुतेरे शान्तिवादी, पैबन्दवादी, करुणामय हृदय वाले बुध्दिजीवियों ने भी पुरानी पीढ़ी के इस संसदीय वामपन्थी महारथी को भावुक होकर श्रध्दांजलि दी।

 

बिगुल, जनवरी-फरवरी 2010

 


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments