आपस की बात

एकजुट संघर्ष से ही हासिल होगी बेहतर ज़िन्‍दगी

विश्वनाथ,  लुधियाना

क़ानून गया तेल लेने, यहाँ तो सिर्फ़ मालिकों की चलती है  यह लेख मैंने बिगुल के मार्च अंक में पढ़ा था। यह बात सिर्फ़ समयपुर, लिबासपुर, यादवनगर के इलाक़े  पर ही लागू नहीं होती बल्कि जहाँ-जहाँ भी कारख़ाने लगे हुए हैं वहाँ-वहाँ मालिकों की ही मर्ज़ी से काम चलता है। ऐसे ही लुधियाना के पावरलूम मज़दूरों को मालिकों की मनमर्ज़ी का सामना करना पड़ रहा है। पिछले कई वर्षों से मैं मज़दूर बिगुल पढ़ रहा हूँ। और भी बहुत सारे मज़दूर यह अख़बार पढ़ते हैं। मज़दूरों में यह चेतना आयी है कि इन मालिकों को अगर झुकाना है को एक अपना संगठन बनाना पड़ेगा। हम मज़दूरों ने इस बात को समझकर सन 2010 में टेक्सटाइल मज़दूर यूनियन का गठन किया। न्यू शक्तिनगर, गौशाला, माधोपुरी, कशमीर नगर, टिब्बा रोड, गीता नगर, महावीर कालोनी, हीरा नगर, मोतीनगर, कृपाल नगर, सैनिक कालोनी, भगतसिंह नगर, और मेहरबान के हम मज़दूरों ने आवाज़ उठायी और एक न्यायपूर्ण संघर्ष लड़ा और जीता भी। पिछले करीब 20 वर्षों से हम मज़दूरों को मालिकों की मर्ज़ी से काम करना पड़ता था और मालिक जब चाहे काम पर रखते थे और जब मर्ज़ी आये तो काम से निकाल देते थे। गाली-गलौज और मार-पीट आम बात थी। अब एकता बनाकर हम मज़दूर मालिकों के सामने अपने हक़ की बात सर ऊँचा उठाकर करते हैं। अगर हम पूरे देश और पूरी दुनिया के मज़दूर मिलकर एक हो जाएँ तो देश-दुनिया के सारे मालिकों को झुका सकते हैं। जहाँ-जहाँ हम मज़दूर अपनी वर्ग एकता की ज़रूरत को पहचानेंगे और इसे हासिल करेंगे तो हम मज़दूर अपना हक़ और अधिकार ले सकेंगे। हम सब मज़दूर मेहनतकश लोग पूरी दुनिया को चलाते हैं। सुई से लेकर उड़ने वाले जहाज़ तक हम मज़दूर बनाते हैं। जब हम मज़दूर हर चीज़ बनाते हैं तो ये पैसे वाले लोग क़ानून बनाने वाले और क़ानून लागू करने वाले कौन होते हैं। अगर हम मज़दूर और मेहनतकश अपने हालात को बदलने के लिए संघर्ष नहीं करेंगे तो ये लोग मज़दूरों की अगली पीढ़ी को रोम के ग़ुलामों की तरह पैरों में जंजीर बाँध के काम करायेंगे। हमें कार्ल मार्क्‍स  के इस नारे पर अमल करना होगा ‘दुनिया के मज़दूरो, एक हो! ‘

बिगुल लगातार छापते रहिये

होरी लाल, ताना मास्टर, गणेश वीविंग फ़ैक्‍ट्री, कशमीर नगर, लुधियाना

मैं होरी लाल लुधियाना की एक पावरलूम फ़ैक्टरी में ताना मास्टर हूँ। मुझे बिगुल पढ़ना अच्छा लगता है। बिगुल मज़दूरों की चेतना जगाने का काम कर रहा है। इसे लगातार छापते रहिये। मुझसे जो सहयोग हो सकेगा ज़रूर दूँगा। मुझे इसमें थोड़ी कमी यह लगती है कि किसी-किसी लेख में लेखक का नाम नहीं दिया जाता है, इसमें सुधार की कृपा करें।

बिगुल के लेख अच्छे लगते हैं

विशाल,  लुधियाना

मैं बिगुल का नियमित पाठक हूँ। मुझे बिगुल के लेख बहुत अच्छे लगते हैं। यह अखबार बहुत सराहनीय काम कर रहा है। बिगुल में छपा ”28 फ़रवरी की हड़ताल एक और देशव्यापी तमाशा” बहुत सही लगा। नक़ली कम्युनिस्टों के असली चरित्र के बारे में बिलकुल सच बताया गया है। मज़दूर इतिहास के बारे में और कार्ल मार्क्‍स द्वारा लिखित मज़दूरों के अपने श्रम से अलगाव के बारे में लेख मुझे काफ़ी अच्छे लगे।

माकपा के विचारधारात्मक दस्तावेज़ का सटीक विश्लेषण

अमर ज्योति,  अलीगढ़

मज़दूर बिगुल के मई अंक में माकपा के विचारधारात्मक दस्तावेज़ का सटीक, सुसंगत और वैज्ञानिक नज़रिये से किया गया विश्लेषण प्रभावित करता है। क्यूबा की पार्टी और सरकार के बारे में आपके नज़रिये से एक विस्तृत आलेख की अपेक्षा है।

 श्याम सोनार,  मुम्बई

मज़दूर बिगुल काफ़ी अच्छा है। कामगार लोगों के बारे में रिपोर्ट सटीक वस्तुस्थिति दर्शाती है। मारुति कम्पनी के विरोध वाला आन्दोलन या और बाकी कामगारों के जो आन्दोलन चल रहे हैं, उनका जो विश्लेषण दिया गया है वह सही है। उनमें व्यवस्था परिवर्तन को सामने रखकर जिस तरह से आन्दोलन करना चाहिये था वो नहीं हुआ। ये बात सही है।

यह कैसा ज्योतिषी, यह कैसा प्रेम?

 ईमान बहादुर, लुधियाना से एक मज़दूर

एक टीवी चैनल ‘कलर्स’ पर एक प्रोग्राम आता है जिसको असल घटनाओं पर आधारित बताया जाता है। उसमें एक कहानी दिखायी गयी। एक लड़का और एक लड़की जो आपस में प्रेम करते हैं। दोनों ज्योतिषी के पास जाते हैं जिससे वे अपनी शादी के बारे में जानना चाहते हैं। ज्योतिषी बताता है कि लड़के पर शनि ग्रह हावी है इसलिए यह जिस पहली लड़की से शादी करेगा वो मर जायेगी। उसने यह भी बताया कि दूसरी शादी सफल होगी। दोनों ने आपस में सलाह की कि लड़का पहले किसी और से शादी करेगा और जब वो पहली बीवी मर जायेगी तब वे आपस में शादी कर लेंगे।

मैं सोच रहा हूँ कि इनका यह कैसा प्रेम है जिसके लिए ये अपने लिए किसी और बेगुनाह की ज़िन्दगी लेने पर तैयार हो गये। इस प्रेम में ज़रा भी सच्चाई नहीं है। दूसरी बात यह कि ज्योतिषी ने भी झूठ बोला था। शादी के बाद दूसरी लड़की की मौत नहीं हुई। लोग ज्योतिषियों के चक्करों में फँसे हुए हैं और अपना नुकसान करवा रहे हैं। –

मालिक से लड़ना है तो पहले अपनेआप से लड़ना होगा

विमलेश, बादली इण्डस्ट्रियल एरिया, दिल्ली

बिगुल में मालिकों के शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए मज़दूरों को जगाया जाता है। लेकिन मज़दूर अपने अन्दर की कमज़ोरी से जब तक नहीं लड़ेगा तब तक बाहरी दुश्मन से भला कैसे लड़ेगा? आपस में इतनी फूट है, सोच में पिछड़ापन है, छोटे-छोटे लालच में पड़कर अपने भाई के पीठ में छुरा मारने का रिवाज़ है, तो मालिक जीतेगा नहीं? इस पर सोचो, भाई लोगो।

फ़ैक्‍ट्री में यूनियन बनाने की बात कौन कर रहा है, इसके बारे में मालिक को ख़बर कौन देता है? मज़दूर! आज कौन मज़दूर लेट हो गया, किसका प्रोडक्शन थोड़ा डाउन रहा, कौन ज़रा गरम मिजाज का है होशियार रहियेगा, ये सारी बातें मालिक के कान में कौन डालता है? मज़दूर! बदले में इनको मिलता क्या है? कभी 100-200 रुपये का इनाम तो कभी एक अद्धा। जो इतने के लिए अपने भाइयों से गद्दारी करे क्या वह मज़दूर कहलाने लायक भी है?

 

मज़दूर बिगुल, जून 2012

 


 

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