भारतीय जनता के जीवन, संघर्ष और स्वप्नों के सच्चे चितेरे महान कथा-शिल्पी प्रेमचन्द के जन्मदिवस (31 जुलाई) के अवसर पर
“अगर स्वराज्य आने पर भी सम्पत्ति का यही प्रभुत्व रहे और पढ़ा-लिखा समाज यों ही स्वार्थान्ध बना रहे, तो मैं कहूँगी ऐसे स्वराज्य का न आना ही अच्छा। अंग्रेजी महाजनों की धनलोलुपता और शिक्षितों का सब हित ही आज हमें पीसे डाल रहा है। जिन बुराइयों को दूर करने के लिए आज हम प्राणों को हथेली पर लिये हुए हैं, उन्हीं बुराइयों को क्या प्रजा इसलिए सिर चढ़ायेगी कि वे विदेशी नहीं स्वदेशी हैं? कम से कम मेरे लिए तो स्वराज्य का अर्थ यह नहीं है कि जॉन की जगह गोविन्द बैठ जाये।”
– प्रेमचन्द (‘आहुति’ कहानी की नायिका)
“…इस तरह ज़बरदस्ती करने के लिए जो क़ानून चाहे बना लो। यहाँ कोई सरकार का हाथ पकड़ने वाला तो है ही नहीं। उसके सलाहकार भी तो सेठ-महाजन ही हैं।
…ये सभी नियम पूँजीपतियों के लाभ के लिए बनाये गये हैं और पूँजीपतियों को ही यह निश्चय करने का अधिकार दिया गया है कि उन नियमों का कहाँ व्यवहार करें। कुत्ते को खाल की रखवाली सौंपी गयी है।
– प्रेमचन्द (‘रंगभूमि’ उपन्यास का पात्र सूरदास)
मज़दूर बिगुल, जुलाई 2013














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