8 मार्च अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ‘‘मजदूर अधिकार रैली’’
8 मार्च अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर स्त्री मजदूर संगठन और करावल नगर मजदूर यूनियन ने करावल नगर इलाके में मजदूर अधिकार रैली का आयोजन किया। इस रैली में बादाम उद्योग, फ़ैक्टरी मजदूर व निर्माण मजदूर भी शामिल थे। रैली में करीब 200 मजदूरों, छात्रों व नौजवानों ने हिस्सा लिया। रैली की शुरूआत न्यू सभापुर के सरकारी स्कूल होते हुए करावल नगर औद्योगिक क्षेत्र में पहुँची। रैली में मजदूर महिलाओं ने गगनभेदी नारे लगाये जिसमें प्रमुख थे ‘ अब चलो नई शुरूआत करो! स्त्री मुक्ति की बात करो!!, ‘मजदूरों ने जान लिया है! हक लेना हैं ठान लिया हैं!!’
रैली के समापन सभा में स्त्री मजदूर संगठन की शिवानी ने सभा को सम्बोधिात करते हुए कहा कि आज ही के दिन 103 साल पहले दुनिया के कई देशों की मेहनतकश स्त्रियों की नेताओं ने एक सम्मेलन में फ़ैसला किया था कि हर साल 8 मार्च को ‘अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस’ मनाया जायेगा। यह दिन हर साल हमें हक़, इंसाफ़ और बराबरी की लड़ाई में फ़ौलादी इरादे के साथ शामिल होने की याद दिलाता है। पिछली सदी में दुनिया की औरतों ने संगठित होकर कई अहम हक़ हासिल किये। मजदूरों की हर लड़ाई में औरत भी कन्धे से कन्धा मिलाकर शामिल हुई। रूस-चीन आदि कई देशों में समाजवाद लाने में और भारत जैसे गुलाम देशों को आज़ाद कराने में औरतों की बड़ी हिस्सेदारी थी।
लेकिन गुज़रे बीस-पच्चीस वर्षों में ज़माने की हवा थोड़ी उल्टी चल रही है। अपने देश में और पूरी दुनिया में, लुटेरे कमेरों पर हावी हो गये हैं। लूट-खसोट का बोलाबाला है। मजदूरों ने लम्बी लड़ाई से जो हक़ हासिल किये थे वे सभी छीने जा रहे हैं। कानून बदले जा रहे हैं। पुलिस और फौज-फाटे से हक़ की हर आवाज़ दबा दी जा रही है। मजदूर औरत-मर्द बारह-चौदह घण्टे हाड़ गला कर भी दो जून रोटी, तन ढाँकने को कपड़े, सिर पर छत, दवा-इलाज और बच्चे की पढ़ाई का जुगाड़ नहीं कर पाते। दूसरी तरफ़ थैलीशाहों, अफ़सरों, नेताओं के भोग-विलास और धन-दौलत का बखान करने के लिए शब्द कम पड़ जायेंगे।
मेहनतकश औरतों की हालत तो नर्क से भी बदतर है। हमारी दिहाड़ी पुरुष मज़दूरों से भी कम होती है जबकि सबसे कठिन और महीन काम हमसे कराये जाते हैं। कानून सब किताबों में धरे रह जाते हैं और हमें कोई हक़ नहीं मिलता। कई फैक्ट्रियों में हमारे लिए अलग शौचालय तक नहीं होते, पालनाघर तो दूर की बात है। दमघोंटू माहौल में दस-दस, बारह-बारह घण्टे खटने के बाद, हर समय काम से हटा दिये जाने का डर। मैनेजरों, सुपरवाइज़रों, फोरमैनों की गन्दी बातों, गन्दी निगाहों और छेड़छाड़ का भी सामना करना पड़ता है। ग़रीबी से घर में जो नर्क का माहौल बना होता है, उसे भी हम औरतें ही सबसे ज़्यादा भुगतती हैं।
सभा में स्त्री मजदूर संगठन की टोली ने ‘अभी लड़ाई जारी हैं’ गीत प्रस्तुत किया। इसके बाद करावल नगर मजदूर यूनियन के नवीन ने सभा को सम्बोधिात करते हुए कहा कि अकेले दिल्ली और नोएडा में लाखों औरतें कारख़ानों में खट रही हैं। अगर हम एका बनाकर मुठ्टी तान दें तो हमारी आवाज़ भला कौन दबा सकता है? साथियो! बिना लड़े कुछ नहीं मिलता। मेहनतकशों के बूते ही यह समाज चलता है और उनमें औरतें भी शामिल हैं। ग़ुलामी की ज़िन्दगी तो मौत से भी बदतर होती है। हमें उठ खड़ा होना होगा। हमें अपने हक़, इंसाफ़ और बराबरी की लड़ाई की नयी शुरुआत करनी होगी। सबसे पहले हमें थैलीशाहों की चाकरी बजाने वाली सरकार को मजबूर करना होगा कि मज़दूरी की दर, काम के घण्टे, कारखानों में शौचालय, पालनाघर वगैरह के इन्तज़ाम और इलाज वगैरह से सम्बन्धित जो क़ानून पहले से मौजूद हैं, उन्हें वह सख़्ती से लागू करवाये। फिर हमें समान पगार, ठेका प्रथा के ख़ात्मे, गर्भावस्था और बच्चे के लालन-पालन के लिए छुट्टी के इन्तज़ाम, रहने के लिए घर, दवा-इलाज और बच्चों की शिक्षा के हक़ के लिए एक लम्बी, जुझारू लड़ाई लड़नी होगी। शाम को यूनियन द्वारा ‘‘मुम्बई हमारा शहर’’ फिल्म प्रदर्शित की गयी।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2013
















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