मारुति सुज़ुकी मज़दूर आन्दोलन के इस निर्णायक चरण में आगे बढ़ने के लिए भीतर मौजूद विजातीय रुझानों और विघटनकारी ताक़तों से छुटकारा पाना होगा

अभिनव

पिछले अंक में हमने लिखा था कि मारुति सुज़ुकी मज़दूरों का शानदार संघर्ष एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। इस समय या तो मारुति सुज़ुकी वर्कर्स यूनियन अपनी ताक़त पर भरोसा करते हुए इस संघर्ष को एक अगले चरण में ले जा सकती है, जो कि हमारी राय में एक जगह डेरा डालकर प्रदर्शन शुरू करने के रूप में ही सम्भव है, या फिर यह आन्दोलन अब समाप्ति की ओर आगे बढ़ेगा। दूसरी बात जो हमने पिछले मारुति सुज़ुकी मज़दूर संघर्ष के अपडेट में कही थी वह यह थी कि रोहतक के प्रदर्शन के बाद भूपिन्दर हुड्डा की सरकार ने मारुति सुज़ुकी वर्कर्स यूनियन के प्रतिनिधि मण्डल से मिलने के लिए जो समय दिया था, उसे 13 फरवरी से बढ़ाकर 21 फरवरी कर दिया था। मिलने का समय आगे करने के पीछे हुड्डा सरकार की रणनीति यह थी कि मज़दूरों को इन्तज़ार करा-करा कर थका दिया जाय। हमने पिछले अंक में लिखा था कि 21 तारीख़ को अगर हुड्डा मुलाकात करता भी है, तो वह कम्पनी और प्रबन्धन के पक्ष में ही बोलेगा और ज़्यादा सम्भावना इस बात की है कि मारुति मज़दूरों की कोई माँग मानने की बजाय वह धमकाने और डराने की कोशिश करेगा। हमारी यह चेतावनी वास्तविक घटनाओं ने शब्दशः सही सिद्ध की है। हमने पिछले अंक में अपनी राय रखते हुए कहा था कि अब मारुति सुज़ुकी मज़दूर आन्दोलन में निर्णायक क़दम, यानी कि एक जगह डेरा डालकर अनशन शुरू करके उसे ज़रूरत पड़ने पर मज़दूर सत्याग्रह तक ले जाने का क़दम, उठाने का वक्त आ गया है, बल्कि यह कहना चाहिए कि इस क़दम को उठाने में अब नेतृत्व ख़तरनाक देरी कर रहा है। क़ायदे से एक जगह पर डेरा डालकर अपनी माँगों को लेकर अनशन करने का क़दम 9 दिसम्बर को दिल्ली में हुए ऑटो वर्कर्स सम्मेलन के बाद ही सरकार को और कम्पनी को आखि़री अल्टीमेटम देकर उठा लिया जाना चाहिए था। इसका कारण यह है कि उस समय मज़दूरों का जोश बुलन्दी पर था और उस समय ही अगर निर्णायक क़दम उठाया जाता तो वह ज़्यादा प्रभावी सिद्ध हुआ होता।

निर्णायक संघर्ष के फ़ैसले पर सभी आन्दोलनरत साथियों को बधाई और साथ ही कुछ ज़रूरी सवाल…

‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ लगातार अपने सुझाव यूनियन की नेतृत्वकारी समिति को पहुँचाता रहा है और यह सुझाव देता रहा है कि अब यूनियन स्वयं अपनी ताक़त पर भरोसा करे और एक जगह डेरा डालकर बैठने के लिए सभी आन्दोलनरत साथियों का आह्वान करे। 21 फरवरी को हुड्डा से वार्ता असफल होने का बाद अब एम.एस.डब्ल्यू.यू. के नेतृत्व के साथी भी इस नतीजे पर पहुँच चुके हैं। हम यूनियन के नेतृत्व के साथियों को इस निर्णय पर बधाई देते हैं। निश्चित तौर पर, इन्तज़ार करने और एक जगह से दूसरी जगह एक-एक दिन का प्रदर्शन करते हुए मज़दूरों के बीच भी एक थकान आयी है। ऐसे में, हम मारुति सुज़ुकी के सभी आन्दोलनरत मज़दूर साथियों का आह्वान करेंगे कि एक बार फिर से उठ खड़े हों, कमर कसें और एक आखि़री निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार हो जायें। ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ हर क़दम पर मारुति सुज़ुकी मज़दूरों के आन्दोलन में अगली कतारों में मौजूद रहा है और पूरी ताक़त के साथ शामिल रहा है, और हम आपको पूरी शिद्दत के साथ भरोसा दिलाना चाहते हैं कि आगे भी ऐसा ही होगा।

हमने पिछले अंक में लिखा था कि हमारी स्पष्ट राय है कि निर्णायक अनशन की शुरुआत करने के लिए सबसे उपयुक्त जगह दिल्ली है। दिल्ली में डेरा डालकर अपने आन्दोलन के अगले चरण की शुरुआत करने के कई फ़ायदे थे जो कि हरियाणा की सरकार और मारुति सुज़ुकी कम्पनी पर अधिकतम सम्भव दबाव बना सकते थे, जिससे कि मज़दूरों की माँगें पूरी होने की ज़्यादा गुंजाइश थी। मिसाल के तौर पर, मारुति सुज़ुकी के मज़दूर अगर गुड़गाँव में अपने डेरे की शुरुआत करते हैं, तो मीडिया कवरेज मिलनी मुश्किल है। स्थानीय अखबारों को छोड़ दिया जाय तो शायद ही कोई अच्छी मीडिया कवरेज मिल पाये। अभी हमारे आन्दोलन की जो हालत है, उसमें हम केवल अपनी जुटान करने की ताक़त के आधार पर नहीं जीत सकते हैं। यह हर आन्दोलनरत मारुति सुज़ुकी मज़दूर जानता है। ऐसे में हमें अपनी अगली चाल इस आधार पर तय करनी चाहिए थी, कि ऐसा कौन सा रास्ता हो सकता है, ऐसा कौन सा टैक्टिकल क़दम हो सकता है, जो कि कम्पनी और ख़ास तौर पर हरियाणा की सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव निर्मित करे? ऐसा क़दम एक ही हो सकता था-दिल्ली के जन्तर-मन्तर जैसी किसी जगह पर सैकड़ों मारुति मज़दूर जुटते और अपना डेरा डाल देते। लेकिन यूनियन का नेतृत्व यह फ़ैसला नहीं ले पाया और अन्ततः गुड़गाँव में ही यह प्रदर्शन शुरू करने का फ़ैसला किया गया है। हमारा स्पष्ट मानना है कि दिल्ली में बैठना हमारे लिए कहीं ज़्यादा सफलतापूर्ण क़दम होता। लेकिन यूनियन कहीं पर भी निर्णायक संघर्ष करने का फ़ैसला करती है, तो ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ और ‘मज़दूर बिगुल’ उसके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़ा होगा। इस क़दम का प्रस्ताव हम लम्बे समय से रखते आ रहे हैं।

लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि अभी तक आन्दोलन में सही समय पर सही फ़ैसला न ले पाने की जो ग़लतियाँ होती रही हैं, उनके लिए कौन-सी बातें ज़िम्मेदार हैं। मिसाल के तौर पर, ऑटो वर्कर्स सम्मेलन के दौरान आन्दोलन के भीतर मौजूद कुछ ताक़तों और संगठनों ने पूरा प्रयास किया कि मज़दूर जन्तर-मन्तर तक रैली न निकाल पायें। कुछ संगठन जो अपने आपको आन्दोलन का मित्र बताते हैं, वे रैली को रद्द करने की कोशिशें कर रहे थे। इसके लिए नेतृत्व के साथियों को गुमराह करने के सभी प्रयास किये जा रहे थे। सभी मज़दूर चाहते थे कि रैली निकाली जाय। हरेक मारुति सुज़ुकी मज़दूर की यही माँग थी कि अम्बेडकर भवन के भीतर अगर सम्मेलन करके हम वापस गुड़गाँव चले गये तो इससे कुछ नहीं हासिल होगा। वैसे भी इस ऑटो वर्कर्स सम्मेलन में अन्य कारख़ानों के मज़दूर तो दूर, मारुति सुज़ुकी के आन्दोलनकारी साथी भी कम संख्या में आये थे। इसका कारण ही यही था कि दिल्ली में सीधे जन्तर-मन्तर पर पूरी दुनिया और मीडिया के सामने अपना प्रदर्शन करने की बजाय, एक संस्थान की चहारदीवारी के भीतर सम्मेलन करने का निर्णय लिया गया था और कई साथी पहले से ही यह कह रहे थे कि अगर जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन की बजाय सम्मेलन होगा तो वे दिल्ली नहीं जायेंगे। और ऐसा ही हुआ। अन्त में, पूर्वी दिल्ली से आयी कुछ यूनियनों और ‘दिल्ली मेट्रो रेल कामगार यूनियन’ के जत्थों के बूते ऑटो वर्कर सम्मेलन में लोगों की संख्या सम्मानजनक हो पायी। इस सम्मेलन के काफी पहले से ही ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ अपने लिखित सुझाव-पत्र देते हुए यूनियन के नेतृत्व को बता चुका था कि अम्बेडकर भवन में सम्मेलन करने का कोई फ़ायदा नहीं होगा; यह संघर्ष को भवनों में होने वाले सम्मेलनों में ले जाने का वक्त नहीं है; यह संघर्ष को सड़कों पर उतारने का वक्त है। लेकिन कानाफूसी और कुत्साप्रचार की राजनीति करने वाले कुछ संगठनों के प्रभाव में नेतृत्व के साथी जन्तर-मन्तर पर जाने का निर्णय नहीं ले रहे थे। यह तो मज़दूरों का नीचे से दबाव था, जिसके कारण अन्ततः अम्बेडकर भवन से जन्तर-मन्तर तक की लम्बी मज़दूर रैली निकली, जिसका कि बहुत अच्छा असर हुआ, हालाँकि कानाफूसी और कुत्साप्रचार की राजनीति करने वाले संगठनों ने इसे रोकने के लिए हर सम्भव कोशिश की।

इसके बाद, रोहतक की रैली के पहले भी ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ ने एक सुझाव पत्र यूनियन के नेतृत्व को सौंपकर कहा कि हम पहले ही हरियाणा सरकार के तमाम मन्त्रियों से लेकर मुख्यमन्त्री तक अपने ज्ञापन आदि पहुँचा चुके हैं, और वह हमारी बात सुनने की बजाय मारुति सुज़ुकी कम्पनी के दलाल के रूप में काम कर रहे हैं। ऊपर से, हमारी इतनी ताक़त नहीं है कि हम अपने संख्याबल के बूते हरियाणा सरकार को अपनी माँगें मानने या सुनने के लिए भी मजबूर कर पायें। ऐसे में, हमें सही रणनीति अपनाते हुए ऐसी जगह पर चोट करनी चाहिए जिससे कि सरकार और कम्पनी दोनों पर राजनीतिक दबाव निर्मित हो, और वह हमारी माँगें सुनने के लिए बातचीत की टेबल पर आये। इसके लिए हम जितनी ताक़त रोहतक के लिए जुटान करने में ख़र्च कर रहे हैं, अगर उतनी ताक़त दिल्ली में डेरा डालने के लिए करते तो अब तक शायद हमारी कुछ माँगों पर सुनवाई होने की सम्भावना पैदा हो गयी होती। हमने उस समय भी चेताया था कि हुड्डा कोई बात नहीं सुनेगा और कम्पनी की जुबान बोलेगा। हुआ भी यही। 21 फरवरी की वार्ता में तो हुड्डा ने यहाँ तक कहा कि दोबारा रोहतक में नज़र आये तो वह मज़दूरों को जेल में डाल देगा! इसी से क्या हरियाणा सरकार का पूरा रुख़ नहीं पता चल जाता? ऐसे में गुड़गाँव में बैठकर क्या हासिल होगा? जब तक पूरे देश के सामने और जनता के सामने मीडिया के ज़रिये मारुति सुज़ुकी मज़दूरों का अपने परिवारों के साथ किया जाने वाला अनशन नहीं प्रस्तुत होगा, तो क्या कम्पनी और हरियाणा सरकार पर कोई दबाव बन सकता है? क्या हरियाणा में किसी भी जगह पर इतनी तादाद में जुटान करने में हम आज सक्षम हैं कि हम हरियाणा की सरकार या कम्पनी को झुका दें? ये कुछ ज़रूरी सोचने के मुद्दे हैं!

आन्दोलन के भीतर मौजूद विजातीय रुझानों से छुटकारा पाये बग़ैर आगे नहीं बढ़ सकते हम!

इन सारी चीज़ों के बावजूद भी हम दिल्ली में बैठने का निर्णय नहीं ले पा रहे हैं, तो इसके पीछे ऐसे ही कानाफूसी और कुत्साप्रचार की राजनीति करने वाले संगठनों का हाथ है। इसका कारण यह है कि दिल्ली में इन कुत्साप्रचारक संगठनों की कोई ताक़त नहीं है। अगर मारुति के मज़दूर दिल्ली में डेरा डालते हैं, तो इन्हें भय है कि इनकी कलई खुल जायेगी और मारुति सुज़ुकी मज़दूर आन्दोलन पर इनका प्रभाव कम हो जायेगा। अपने सांगठनिक हितों की ख़ातिर ये आन्दोलन को ग़लत दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं।यही वे विजातीय और भितरघाती ताक़तें हैं, जिनके बारे में हम आज मारुति सुज़ुकी के मज़दूर साथियों से कुछ शब्द कहना चाहते हैं। हम यहाँ पर इन ताक़तों के काम करने के कुछ तरीक़ों का ज़िक्र करेंगे। इन विजातीय प्रवृत्तियों के वाहक संगठनों के काम करने के कुछ ख़ास तौर-तरीक़े हैं, जिनसे आप इनकी पहचान कर सकते हैं, जो इस प्रकार से हैं:

1. ऐसे संगठनों के लोग आन्दोलन में सक्रिय समूची मज़दूर आबादी के सामने कभी भी अपनी राजनीतिक सोच और आन्दोलन की भावी योजना के बारे में अपने प्रस्तावों को नहीं रखते हैं। वास्तव में, इन संगठनों की आन्दोलनरत मज़दूरों की व्यापक आबादी में कोई पकड़ नहीं होती। ये मज़दूर साथियों के बीच संघर्ष की सही योजना पर एकराय बनाने और उस पर खुली चर्चा करने की बजाय, यूनियन के नेतृत्व के लोगों से निजी रिश्ते बनाने की राजनीति करते हैं। इसका कारण यह है कि इनके पास आन्दोलन को लेकर कोई भावी योजना होती ही नहीं है।

2. यह निजी प्रभाव यूनियन के नेतृत्व पर स्थापित करने के लिए किसी उम्रदराज़, दिखने में तजुरबेकार, रहस्यमय-से व्यक्ति को भेजा जाता है! यह व्यक्ति अपनी उम्र, नकली तजुरबे और रहस्यावरण का इस्तेमाल करके यूनियन के नेतृत्व के कुछ निश्चित लोगों पर अपना प्रभाव बनाने का प्रयास करते हैं। इस निजी प्रभाव को स्थापित करने के लिए ये संगठन किसी भी प्रदर्शन या बड़ी मीटिंग के दौरान सभी मज़दूरों के सामने आन्दोलन के बारे में अपनी राय नहीं रखते। ये बन्द कमरों में नेतृत्व के लोगों के बीच कानाफूसी और साँयफुस्स की राजनीति करते हैं।

3. इसके साथ ही प्रभाव स्थापित करने के लिए इन संगठनों की एक और दिलचस्प रणनीति होती है। ये संगठन यूनियन के नेतृत्व के कुछ साथियों को भारत-भ्रमण कराते हैं, हालाँकि इससे मारुति सुज़ुकी मज़दूरों के आन्दोलन को कोई लाभ नहीं मिलता है। मिसाल के तौर पर, कोलकाता, मुम्बई, जयपुर आदि जैसी जगहों पर नेतृत्व के साथियों को ले जाकर उनका व्याख्यान आयोजित करवाया जाता है, जिससे कि नेतृत्व के वे साथी इन संगठनों के मुरीद बन जायें। नेतृत्व के साथियों पर प्रभाव स्थापित करने के लिए एक प्रकार से आन्दोलन में ‘लाइम लाइट’ में आने (चेहरा चमकाने) की विजातीय मानसिकता को खाद-पानी दिया जाता है। इसके लिए भी इन संगठनों के पास स्वयं अपनी ताक़त इन शहरों में नहीं होती। ऐसे संगठन मुम्बई या जयपुर जैसी जगहों पर अन्य संगठनों से मोर्चा बनाकर ऐसे व्याख्यान आयोजित करवाते हैं। हम सभी जानते हैं कि इससे हमारे आन्दोलन को कुछ नहीं मिलता है। नेतृत्व के साथियों को वही समय अपने क्षेत्र में रहकर मज़दूरों के बीच मिलने-जुलने और उनकी हौसला-अफज़ाई में देना चाहिए। लेकिन इन संगठनों ने यह बात फैला रखी है कि देश के तमाम राज्यों के तमाम शहरों में अगर अन्य संगठन हमारे पक्ष में प्रदर्शन करेंगे तो इससे मारुति मज़दूरों के आन्दोलन को मदद मिलेगी। पहली बात तो यह है कि अगर एम.एस.डब्ल्यू.यू. के नेतृत्व के साथियों का व्याख्यान टूर आयोजित न भी किया जाय, तो भी मारुति सुज़ुकी आन्दोलन का समर्थन करने वाले सभी संगठन हमारे आन्दोलन के पक्ष में प्रदर्शन करेंगे। ऐसा हो भी चुका है। लेकिन इन संगठनों का पूरा प्रयास यह होता है कि देश-भ्रमण कराकर नेतृत्व पर अपना प्रभाव स्थापित किया जाय। इस चीज़ से आन्दोलन को अभी तक नुकसान ही हुआ है। हम सभी संघर्षरत साथियों से आग्रह करेंगे कि इस बात को समझें।

4. इन साँयफुस्स की राजनीति करने वाले संगठनों का सबसे ख़तरनाक काम यह होता है कि आन्दोलन में पूरी ताक़त के साथ सक्रिय अन्य संगठनों के खि़लाफ़ चोरी-चोरी कुत्साप्रचार करते हैं और अफ़वाहें फैलाते हैं। ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ के ख़िलाफ़ भी गुपचुप तरीक़े से ऐसे कुत्साप्रचार और अफ़वाहें फैलाने के अभियान चलाये गये; यह कुत्साप्रचार किया गया कि ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ के लोग तो किताबें छापते हैं (हालाँकि मज़दूरों के राजनीतिक शिक्षण और आन्दोलन से जुड़ी किताबें छापना तो किसी भी क्रान्तिकारी संगठन का एक ज़रूरी काम होता है, इसमें ग़लत क्या है!), इनके संगठन में परिवारवाद है, वगैरह-वगैरह। पहली बात तो यह कि मारुति सुज़ुकी के पूरे आन्दोलन में जो मज़दूर साथी मौजूद रहे हैं, वे जानते हैं कि ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ कोई मध्यवर्गीय, “वामपंथी” दाढ़ीधारी बुद्धिजीवियों का संगठन नहीं है, बल्कि यह इक़लाबी मज़दूरों का संगठन है। जो भी साथी 9 दिसम्बर को ऑटो वर्कर्स सम्मेलन और जन्तर-मन्तर मार्च में शामिल हुए थे, वे सभी इस बात को देख चुके हैं और इसे अच्छी तरह से समझते हैं।दूसरी बात यह कि ऐसे घटिया आरोपों का जवाब देना हम अपनी गरिमा के ख़िलाफ़ समझते हैं। तीसरी बात यह है कि जिनके पास सीधे राजनीतिक चर्चा करने और सीधे विचारों का संघर्ष चलाने की ताक़त नहीं होती है और अपनी कोई राजनीतिक सोच नहीं होती है, वे ही कुत्साप्रचार की राजनीति करते हैं। ऐसे संगठन अपने संकीर्ण सांगठनिक हितों के लिए आन्दोलन को नुकसान पहुँचा सकते हैं, और इनसे सावधान रहना चाहिए।

5. कुत्साप्रचार और अफ़वाहें फैलाने, बन्द कमरों में यूनियन नेतृत्व के साथियों के कान में साँयफुस्स करने वाले, सफेद दाढ़ी दिखाकर अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयास करने वाले ये संगठन कभी भी खुले मंच पर सभी मज़दूरों के सामने अपनी पूरी सोच नहीं रखते। ये कभी यह नहीं बताते कि मारुति सुज़ुकी मज़दूर आन्दोलन को आगे कौन-सा रास्ता अपनाना चाहिए। क्योंकि इन्हें कुत्साप्रचार की राजनीति और कानाफूसी की राजनीति के अलावा और कोई राजनीति आती ही नहीं है। ये कूटनीति और दाँवपेंच में ही अपना सारा दिमाग़ ख़र्च कर देते हैं। इनके दिमाग़ में आन्दोलन की सफलता नहीं होती, बल्कि यह चिन्ता रहती है कि आन्दोलन के नेतृत्वकारी लोगों को किस तरह से अपने प्रभाव में लाया जाये, इसके लिए चाहे आन्दोलन को नुकसान ही क्यों न पहुँचाना पड़े! और इसी के लिए नेतृत्व और मज़दूरों के सामने आन्दोलन की भावी योजना का प्रस्ताव रखने के बजाय, कोलकाता, मुम्बई, जयपुर आदि की व्याख्यान यात्राएँ आयोजित करवायी जाती हैं!

6. इन कुत्साप्रचारक और दाँवपेंच की राजनीति करने वाले संगठनों की आख़िरी ख़ासियत यह है कि ये कभी भी केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों पर खुलकर मदद करने का दबाव बनाने के लिए उनकी आलोचना नहीं रखते। ये संगठन कभी भी किसी मंच से खुलकर केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के सामने यह प्रस्ताव नहीं रखते कि वे मारुति सुज़ुकी मज़दूर आन्दोलन की मदद करें; अपने कारख़ानों में टूल डाउन करवायें, या एक दिन की प्रतीकात्मक हड़तालें करवायें; उल्टे ये संगठन सही ताक़तों के ख़िलाफ़ केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के पुछल्ले बन जाते हैं! उनके बीच एक पूर्ण सामंजस्य का सम्बन्ध है। न तो केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों की समिति इन कानाफूसीवादी संगठनों की कोई आलोचना या उन पर टिप्पणियाँ करती है, और न ही ये संगठन केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के बारे में अपनी कोई आलोचनात्मक राय रखते हैं, ताकि उन पर हमारी मदद करने का दबाव बने। क्या इस समझौतापरस्त और मौकापरस्त रुझान से हमारे आन्दोलन को नुकसान नहीं पहुँच रहा है?

आन्दोलन के इस निर्णायक दौर में सफलता की एक ज़रूरी पूर्वशर्त

साथियो, हमारा मानना है कि ऐसे संगठनों से हमें सावधान रहना चाहिए, जो खुलकर सभी आन्दोलनरत साथियों के बीच अपने विचार नहीं रखते; यह नहीं बताते कि संघर्ष के आगे का रास्ता क्या हो; सभी मज़दूरों के बीच खुलकर अपनी बात रखने की बजाय यूनियन नेतृत्व को बन्द कमरों में कानाफूसी के ज़रिये अपने प्रभाव में लाने का प्रयास करते हैं; आन्दोलन में सक्रिय ईमानदार संगठनों (जो कि हमेशा पूरी ताक़त के साथ आपके आन्दोलन में उपस्थित हुए हैं) के ख़िलाफ़ कुत्साप्रचार करते हैं; अपनी राजनीतिक सोच और योजना के आधार पर बात करने की बजाय, दाढ़ी और नकली ज्ञान दिखाकर अपनी सोच को स्थापित करना चाहते हैं; और साथ ही, मज़दूर आन्दोलन के भीतर ‘लाइम लाइट’ में आने की मानसिकता को बढ़ावा देकर आन्दोलन को नुकसान पहुँचाते हैं। ऐसे संगठनों के बारे में ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ लगातार सभी साथियों को आगाह करता रहा है। हमारा मानना है कि ऐसी ताक़तें आन्दोलन में विघटन और फूट पैदा करती हैं और इनकी निगाह में यह बात नहीं होती कि मारुति सुज़ुकी मज़दूर आन्दोलन को सफलता के मुकाम तक कैसे पहुँचाया जाय; इनकी निगाह में सिर्फ़ यह होता है कि अपने नेतृत्व का सिक्का कैसे चमकाया जाय।

हमारा मानना है कि जब तक ऐसे संगठनों के छलावों से हम मुक्त नहीं होते, तब तक हम अपने आन्दोलन में बार-बार सही समय पर सही फ़ैसला न ले पाने की भूल करते रहेंगे। इन संगठनों की अभी तक के आन्दोलन के इतिहास में यही भूमिका रही है, कि वे संघर्ष को सही दिशा में जाने से रोकते हैं। हम ऊपर इस बात का उदाहरण दे चुके हैं कि ऑटो वर्कर सम्मेलन के दौरान जन्तर-मन्तर की रैली को रोकने के लिए इन संगठनों द्वारा कितने प्रयास किये गये थे। उसी प्रकार, इन संगठनों ने दिल्ली में प्रदर्शन को रोकने के लिए भी हर सम्भव प्रयास किया है और तमाम लोगों को इस बात पर सहमत करने का प्रयास किया है कि दिल्ली में प्रदर्शन करने का कोई लाभ नहीं होगा। जबकि हम अभी तक के अनुभव से जानते हैं कि हमने दिल्ली में मात्र दो बार प्रदर्शन किये और वे भी सिर्फ एक-एक दिन के, और उनमें से एक प्रदर्शन के बाद ही दीपेन्द्र हुड्डा ने बातचीत करने के लिए हमारे नेतृत्व के साथी को बुलवा लिया था। अगर एक दिन के प्रदर्शन का यह असर हो सकता है, तो दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर डेरा डालकर अनशन करने का क्या असर हो सकता था, यह समझा जा सकता है। जन्तर-मन्तर से जबरन हटाये जाने की भी कोई सम्भावना नहीं है, और मीडिया कवरेज के ज़रिये हमारी बात भी पूरे देश में पहुँच सकती थी। इसके ज़रिये सरकार और कम्पनी पर जो राजनीतिक दबाव बनेगा, उससे हमारे संघर्ष को कम-से-कम आंशिक सफलता मिलने की गुंजाइश पैदा हो सकती है। लेकिन इन संगठनों के लिए मारुति सुज़ुकी मज़दूर आन्दोलन का दिल्ली की सड़कों पर पहुँचना नुकसानदेह है। क्योंकि वहाँ इन्हें डर है कि आन्दोलन और नेतृत्व पर से उनका प्रभाव ख़त्म हो जायेगा।

आप देख सकते हैं कि ये संगठन आन्दोलन की सफलता को लेकर चिन्तित नहीं हैं, बल्कि अपने संकीर्ण सांगठनिक हितों को लेकर चिन्तित हैं। ऐसे में, जब तक हम ऐसी विजातीय प्रवृत्तियों से छुटकारा नहीं पायेंगे, तब तक आन्दोलन के आगे बढ़ने में बहुत सी मुश्किलें रहेंगी।

निष्कर्ष

एक तो हम पहले ही निर्णायक क़दम उठाने में देर कर चुके हैं, और अगर ऐसे में हमारे बीच इस प्रकार की विजातीय राजनीति करने वाली ताक़तें मौजूद रहेंगी, तो निश्चित तौर पर हमें भविष्य में इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ ऐसी राजनीति की भर्त्सना करता है और यह आह्वान करता है कि आन्दोलन के भीतर कुत्साप्रचार और अफ़वाह की राजनीति को बन्द कर सभी मज़दूरों के सामने खुली राजनीतिक चर्चा की संस्कृति को बहाल किया जाय।

एम.एस.डब्ल्यू.यू. ने जहाँ पर भी डेरा डालने का निश्चय किया है, ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ हर क़दम पर उसके साथ मौजूद रहेगा और अपनी ताक़त के अनुसार हर सम्भव सहायता करेगा। हमें पहले ही बहुत देर हो चुकी है, जिससे कि हमारी शक्ति और ऊर्जा कुछ क्षरित हुई है। अब हमें फिर से कमर कसकर उठ खड़े होना होगा। यह हमारे संघर्ष का निर्णायक दौर है, और एक बार पूरी ताक़त से धक्का लगाने का वक्त आ गया है। हमारा विचार है कि इसके लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी जानी चाहिए और हरेक आन्दोलनकारी मज़दूर को परिवार समेत प्रदर्शन में गोलबन्द करने का प्रयास करना चाहिए। अगर हम एक बार फिर आन्दोलन में ऊर्जा और उत्साह भरने और साथियों को एक बार फिर से पूरी ताक़त और प्रतिबद्धता से सड़क पर उतारने में सक्षम हो पाये तो निश्चित तौर पर हम अपने लक्ष्य के कुछ और नज़दीक पहुँच जायेंगे। इंक़लाब-ज़िन्दाबाद! संघर्ष ज़िन्दाबाद!

(8 मार्च, 2013)

 

मज़दूर बिगुलमार्च  2013

 


 

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