बादली औद्योगिक क्षेत्र में मज़दूरों की नारकीय ज़िन्दगी की तीन तस्वीरें

आनन्द, बादली, दिल्ली

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के बादली गाँव में एक जूता फ़ैक्ट्री में काम करने वाले अशोक कुमार की फ़ैक्ट्री में काम के दौरान 4 जनवरी 2011 को मौत हो गयी। वह रोज़ की तरह सुबह 9 बजे काम पर गया था। दोपहर में कम्पनी से पत्नी के पास फोन करके पूछा गया कि अशोक के पिता कहाँ हैं, मगर उसे कुछ बताया नहीं गया। बाद में पत्नी को पता लगा कि अशोक रोहिणी के अम्बेडकर अस्पताल में भरती है। उसी दिन शाम को अशोक की मौत हो गयी।

मुंगेर, बिहार का रहने वाला अशोक पिछले 5 साल से इस फ़ैक्ट्री में काम कर रहा था। उसकी मौत के बाद मालिक अमित ने अशोक की पत्नी से कहा कि तुम्हारे बच्चों को स्कूल में दाखिल दिलाउंगा और तुम्हें उचित मुआवज़ा भी दिया जायेगा। तुम्हें कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है, अशोक का क्रिया-कर्म कर दो। घरवाले मालिक की बातों में आ गये और किसी को कुछ नहीं बताया। बाद में जब अशोक की पत्नी मुआवज़ा लेने गयी तो मालिक ने उसे दुत्कारते हुए भगा दिया और कहा कि कोई भी ज़हर खाकर मर जाये तो क्या मैं सबको मुआवज़ा देते हुए घूमूँगा? उसने धमकी भी दी कि आज के बाद इधर फिर नज़र नहीं आना।

इसी इलाक़े में बादली इंडस्ट्रियल एरिया की एम-15 स्थित प्रेस्टिज केबल इंडस्ट्रीज़ में एक भारी मोटर हटाते समय मशीन हाथ पर गिरने से राजकुमार नाम के नौजवान मज़दूर की दो उँगलियों में गहरी चोट आयी। बस उँगलियाँ अलग होने से किसी तरह बच गयीं। मालिक आशीष अग्रवाल ने 60 रुपये खर्च करके पट्टी करवा दी, बड़ा एहसान जताते हुए एक दिन की छुट्टी भी दे दी और कहा कि परसों से काम पर आ जाना। एक दिन बाद आकर राजकुमार ने कहा कि बाबूजी अभी बहुत दर्द हो रहा है, कम से कम 5-6 दिन लग जायेंगे, दवा कराने के पैसे दे दीजिये। मैनेजर ने उसे डपटते हुए कहा, तेरी रोज-रोज दवा कराने का ठेका लिया है क्या? काम करना है तो कर वरना भाग यहाँ से। राजकुमार को गाँव से आये अभी महीना भी नहीं हुआ था, पास में कुछ भी नहीं था, इसलिए चुप लगाकर काम करने लगा। ज़ख़्म अभी ताज़ा था और दर्द बहुत था इसलिए ठीक से काम नहीं कर पा रहा था। मगर मालिक के वफ़ादार कुत्तों में से एक सुपरवाइज़र ने उसे कामचोर कहकर गालियाँ देनी शुरू कर दीं। विरोध करने पर उसे धक्के मारकर बाहर कर दिया और बोला कि दस तारीख को आकर पैसे ले जाना।

इसी फ़ैक्ट्री की एक और घटना आपको बताते हैं। यहाँ दो डिपार्टमेंट हैं – रबड़ डिपार्टमेंट और पीवीसी डिपार्टमेंट जिनमें 70-80 मज़दूर काम करते हैं। इनमें से किसी के पास जॉब कार्ड, ई-एस-आई- कार्ड नहीं हैं, फण्ड का तो नाम भी नहीं सुना। 8 घण्टे काम के 2200 से लेकर 3500 रुपये मिलते हैं, 4-5 घण्टे ओवरटाइम करना ज़रूरी है लेकिन उसके पैसे सिंगल रेट से ही मिलते हैं। बोनस के रूप में बात-बात पर गाली-गलौच, डाँट और कभी-कभी मार भी सहनी पड़ती है। मालिक अपने किराये के टट्टुओं से फ़ैक्ट्री के अन्दर मज़दूरों को आतंकित करके रखता है। पिछले दिनों उसने एक नया नियम बना दिया कि कोई भी मज़दूर फ़ैक्ट्री से बाहर नहीं निकलेगा। कुछ मज़दूरों ने विरोध किया कि हम लोग तो सिर्फ़ लंच के लिए बाहर निकलते हैं। मालिक ने सबको दफ़्तर में बुलाया और डर पैदा करने के लिए एक मज़दूर को खड़े-खड़े नौकरी से बाहर कर दिया। बाकी मज़दूर भी चुप लगा गये।

मज़दूर साथियो, ये तो चन्द झलकियाँ हैं। ऐसी न जाने कितनी घटनाएँ रोज़ हर फ़ैक्ट्री इलाक़े में घटती रहती हैं। जब तक हम चुपचाप सहते रहेंगे और आपस में बँटे रहेंगे तबतक ये लुटेरे मालिक हमें इसी तरह कीड़ा-मकोड़ा समझकर कुचलते रहेंगे।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2011

 


 

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