ग़द्दार भितरघातियों के विरुद्ध गोरखपुर के मज़दूरों का क़ामयाब संघर्ष

विशेष संवाददाता

बरगदवा औद्योगिक क्षेत्र, गोरखपुर के मज़दूरों ने पिछले दिनों एक ऐसा लम्बा संघर्ष चलाया जिससे उन्हें बहुत ज़रूरी सबक सीखने को मिले। अभी तक तो मज़दूर केवल कारख़ानेदारों और प्रशासन तथा पूँजीवादी नेताओं से ही दो-दो हाथ कर रहे थे लेकिन पहली बार उन्होंने एक ऐसे दुश्मन के ख़िलाफ़ सफलतापूर्वक संघर्ष चलाया जो उनके बीच से ही पैदा हुआ था।

लम्बे संघर्ष के बाद बरगदवा के मज़दूरों ने ‘टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन’ नाम से अपनी क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियन गठित की थी जिसकी कई कारख़ानों में इकाइयाँ हैं। आर्थिक संघर्षों के साथ-साथ यूनियन ने मज़दूरों के बीच लगातार राजनीतिक शिक्षा और प्रचार का काम जारी रखा था। गोरखपुर के उद्योगपतियों की निगाह में यूनियन लगातार खटक रही थी और वे किसी न किसी तरह इसे कमज़ोर करने की तीन-तिकड़म करने में लगे हुए थे। उनका हर हथकण्डा नाकाम रहा पर आख़िरकार कुछ समय तक उनके हाथ एक ऐसा हथियार लग गया जिससे मज़दूर आन्दोलन अतीत में भी बार-बार चोट खाता रहा है। यह हथियार था भितरघात का हथियार। मगर मज़दूरों ने अपनी एकता और राजनीतिक दृढ़ता की बदौलत इस चाल को भी नाकाम कर दिया। 20 फ़रवरी से 19 मार्च 2011 तक चले इस संघर्ष में मज़दूरों ने पिछले दो वर्षों के दौरान जमा हुई गन्दगी से एक हद तक मुक्ति पायी है।

ट्रेडयूनियनवाद, संकीर्णतावाद, ग़ैर-जनवाद की यह गन्दगी तीन मज़दूर प्रतिनिधियों पंकज, समरनाथ और विनोद पाण्डेय के रूप में अंकुर उद्योग में पैदा हुई थी। यूँ तो इन तीनों के आचार-विचार, व्यवहार में पिछले एक साल से गम्भीर परिवर्तन देखने में आ रहे थे, लेकिन ख़ास तौर पर पिछले छह-सात महीनों के दौरान स्थितियाँ काफ़ी बिगड़ गयी थीं। इन्होंने अन्य मज़दूर प्रतिनिधियों को निष्क्रिय घोषित करते हुए पूरी की पूरी कमेटी व्यवस्था को ही किनारे लगा दिया था। गेट मीटिंगों में मज़दूरों को डाँट-डपट कर चुप करा देना, गाली-गलौज, धमकाना और इस तरह अपनी सत्ता की दहशत कायम करना इनकी कार्यशैली बन चुकी थी। इनकी जीवनशैली भी तेजी से बदल रही थी। मज़दूरों से दारू, मुर्गा, पार्टियों की माँग करना, कार्ड बनवाने के लिए घूस लेना जैसे काम भी इन्होंने शुरू कर दिये थे। इनके आचरण पर जब कभी इनसे बात करने की कोशिश की गयी तो इन्हें बेहद ख़राब लगता और उल्टे ये बिगुल मज़दूर कार्यकर्ताओं को नसीहत देते कि छोटी-छोटी बातों को मुद्दा न बनाया जाये। झूठी मान-सम्मान-प्रतिष्ठा की भूख इनमें इतनी ज़्यादा जाग गयी थी कि ये लोग रातो-रात बड़े दबंग नेता बनने का सपना देखने लगे। बिगुल टीम को अपनी राह का रोड़ा जान इन्होंने अन्य दलाल नेताओं से सम्पर्क साधा और उन्हें कम्पनी में घुसाने की कोशिश की। लेकिन आम मज़दूरों के खतरा भाँप लेने से कुछ वक़्त के लिए ये तीनों चुप लगा गये। इन्हें यह समझ आ गया था कि जब तक बिगुल मज़दूर कार्यकर्ता रहेंगे तब तक इनकी दाल गलने वाली नहीं है। आगे के पूरे घटनाक्रम से यह बात सिद्ध भी हो गयी। इन्होंने बहुत सोच-विचार कर षड्यन्त्र रचने का काम किया। इन्होंने सबसे पहले यह भ्रम फैलाना शुरू किया कि यूनियन का सारा फण्ड बिगुल मज़दूर कार्यकर्ताओं द्वारा ख़र्च किया जाता है। जबकि सच्चाई यह थी कि यूनियन की कम्पनी इकाइयों के फण्ड का सारा पैसा और हिसाब-किताब पहले भी और आज भी यूनियन के कम्पनी कोषाध्यक्षों के पास रहता है। अपने इस दुष्प्रचार के आधार पर इन्होंने कुछ मज़दूरों का समर्थन हासिल कर लिया था। (हालाँकि जल्दी ही इनका झूठ साबित हो गया और पता चला कि स्वयं इन्होंने चन्दे का एक लाख चौवन हज़ार रुपये डकार लिया है)। इतना ही नहीं माँगपत्रक आन्दोलन के बारे में तरह-तरह का डर-भय पैदा कर मज़दूरों और बिगुल कार्यकर्ताओं के बीच खाई बनाने की कोशिश की गयी। इन्होंने अपने षड्यन्त्र को अमली जामा पहनाने के लिए 20 फ़रवरी 2011 को फर्टिलाइज़र ग्राउण्ड में एक मीटिंग बुलवायी। इस मीटिंग में एक वकील को भी गुपचुप तरीके से बुलवाया गया जिसकी जानकारी आम मज़दूरों को तो दूर कार्यकारिणी तक को नहीं दी गयी। वैसे इन तीनों का बेशर्म तर्क था कि मीटिंग केवल बिगुल कार्यकर्ताओं से बात करने के लिए बुलायी गयी थी लेकिन ये लोग अन्य फ़ैक्टरी मज़दूर प्रतिनिधियों को भी जगह-जगह अपने दुष्प्रभाव में लेने की लगातार कोशिश में लगे थे। मज़ेदार बात तब रही जब मज़दूरों को यह पता चला कि एक दलाल वकील जो पहले भी कई आन्दोलनों को बेचने का काम कर चुका था, इनका प्रमुख सलाहकार बना हुआ है।

20 फ़रवरी की मीटिंग में जिन सवालों को उछाला गया उन पर ग़ौर करना हम सभी के लिए शिक्षाप्रद होगा।

पहला सवाल – “बिगुल वाले कहाँ से आये? ये क्या करना चाहते हैं?” सभी मज़दूर जानते हैं कि ये सवाल दो साल पुराने हैं जिन्हें यहाँ के उद्योगपतियों के संगठन, एक भूतपूर्व मेयर, सदर सांसद, डीएलसी तथा प्रशासन ने मज़दूरों के आन्दोलन को बदनाम और कमज़ोर करने के लिए उछाला था? क्या कारण है कि शैतानों की यह तिकड़ी दो साल बाद ठीक उन्हीं-उन्हीं सवालों को उठा रही है। वैसे ये मज़दूरों को जितना मूर्ख समझते है, मज़दूर इनके अनुमान से कई ज़्यादा समझदार हैं। आज स्वयं अंकुर के मज़दूर इनसे पूछ रहे हैं कि दो साल तक तुम्हारे सवाल कहाँ थे? और क्या वजह है कि जैसे ही माँगपत्रक आन्दोलन के फण्ड का हिसाब माँगा गया और सभी पैसा जमा करने को कहा गया वैसे ही तुम्हारे सवाल उठने लगे।

दूसरा सवाल – “आन्दोलन से कारख़ाने बन्द हो जायेंगे।” यह नारा भी चैम्बर ऑफ़ इण्डस्ट्रीज़ तथा सभी मज़दूर विरोधी ताक़तों का सर्वप्रिय नारा है और इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं कि ग़द्दारों की यह तिकड़ी आज मज़दूरों की आगे बढ़ती हुई ताकत को रोकने के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहती है। अगर आन्दोलन से कारख़ाना बन्द होता तो पवन बथवाल का कारखाना आज भी क्यों और कैसे चल रहा है? हक़ीकत में होता यह है कि जहाँ मज़दूर जागरूक और संगठित होने लगते हैं वहाँ पूँजीपति अपने कारख़ाने दूसरे इलाक़ों में ले जाने की तैयारियाँ करने लगते हैं। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यूनियन या अन्य प्रकार के मज़दूर संगठन न बनाये जायें बल्कि इससे यही नतीजा निकलता है कि केवल कुछ फैक्ट्रियों या कुछ इलाक़ों में मज़दूर संगठन बनाने से काम नहीं चलेगा बल्कि मज़दूरों को पूरे देश के पैमाने पर संगठन बनाने का काम करना होगा। इतना ही नहीं उन्हें शहर और गाँव के ग़रीबों, निम्न मध्यवर्ग तथा उजड़ते किसानों को भी अपने साथ लेना होगा। इस तरह मज़दूर आन्दोलन को ट्रेड यूनियनों की चारदीवारी से बाहर निकलकर पूरे जनता के आन्दोलन से अपने आप को जोड़ना होगा और सभी दमित, शोषित, उत्पीड़ित तबकों के संघर्षों से अपने आप को जोड़ लेना होगा। लेकिन दो कौड़ी के पंकज जैसे दलाल ग़द्दार इस सच्चाई को समझने में हमेशा से असमर्थ थे। इन जैसे लोगों को लगता है कि कुछ चीज़ों को छोड़कर हमें ज़्यादातर चीजें मिल चुकी हैं। अब हमें बस अपने मालिक और उसकी फ़ैक्टरी पर ध्यान देना चाहिए। मज़दूरों का राज कभी नहीं आ सकता। मज़दूर भेड़ होते हैं और उनमें अक़्ल की कमी होती है। ये वो सारी बाते हैं जिन्हें ये तीनों आम सभाओं से लेकर गेट मीटिंगों में लगातार बोलते रहे हैं और यही कारण है कि इन लोगों ने मज़दूरों के सबसे व्यापक, सबसे बड़े और सबसे पवित्र लक्ष्य मज़दूर इंकलाब से जुड़ने के बजाय दलाली और ग़द्दारी की राह पकड़ ली।

तीसरा सवाल – “बिगुल के कार्यकर्ता नास्तिक हैं।” एक आम मज़दूर भी यह जानते हैं कि पंकज ने अपने दो अन्य ग़द्दार साथियों को बचाने के लिए सबके सामने मन्दिर में झूठी कसम उठायी। समरनाथ ने चन्दा घोटाले पर पर्दा डालने के लिए शिवरात्रि आयोजन का प्रस्ताव किया और जिस दिन हिसाब देने के लिए बुलाया गया उस दिन अपने पिताजी के गम्भीर रूप से बीमार होने की बात कहकर इलाक़े से ही ग़ायब हो गया। बाद में समरनाथ के पिताजी ने स्वयं बताया, जब वे घर का सामान लेने के लिए कोइरी टोला आये थे, कि मैं एकदम स्वस्थ हूँ और मुझे कुछ नहीं हुआ था। असल में इनका एक ही ईश्वर है और वह है रुपया और कारख़ानेदार की कृपादृष्टि। वैसे भी हम यह बता दें कि नास्तिक या आस्तिक होना पूरी तरह व्यक्तिगत आज़ादी का सवाल है। बिगुल मज़दूर कार्यकर्ताओं ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि शिवरात्रि का त्योहार मनाने के लिए मज़दूर अलग से आयोजन समिति बना लें। यूनियन के मंच का इस्तेमाल किसी भी किस्म के धार्मिक, जातीय अथवा इस क़िस्म के अन्य आयोजनों के लिए करना भविष्य में मज़दूरों के संगठन के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ तैयार कर सकता है। आम मज़दूर भी अब यह समझ रहे हैं कि घोटाले और ग़द्दारी के काम को सफलतापूर्वक अपने अंजाम तक पहुँचाने के लिए इन्होंने ईश्वर को ढाल की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की।

अपनी हरकतों से मज़दूरों के बीच उनकी असलियत पूरी तरह उजागर हो गयी। सभी मज़दूरों की आम सभा बुलाकर उनका भण्डाफोड़ किया गया। जो कुछ मज़दूर उनके झूठे प्रचार के प्रभाव में आ गये थे वे भी उनकी सच्चाई सामने आने के बाद उनसे अलग हो गये। यूनियन से मज़दूरों ने माँग की कि अवैध वसूली, गुण्डागर्दी और मज़दूरों के पैसे का गबन करने वाले इन तीनों ग़द्दारों को कारख़ाने से बाहर किया जाये। मालिक भला इसे क्यों मानता? आख़िर ये तिकड़ी उन्हीं पूँजीपतियों के इशारों पर ही तो नाच रही थी। लेकिन मज़दूरों के भारी दबाव और इस माँग को लेकर की गयी हड़ताल के बाद आख़िर 19 मार्च को उसे झुकना पड़ा और इन तीनों को बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा।

मज़दूर आन्दोलन में इस क़िस्म का भितरघात कोई नयी बात नहीं है। यह पहले भी होता रहा है और आगे भी इसकी सम्भावनाएँ बनी रहेंगी। दरअसल आम मज़दूरों का दब्बूपन और संकीर्ण स्वार्थों में डूबे रहना ऐसे ग़द्दारों के लिए अनुकूल हालात पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। कई मज़दूरों में यह मनोवृत्ति काम करती है कि संगठन और आन्दोलन का काम नेताओं की ज़िम्मेदारी है। कभी-कभी वे नेताओं को ऐसे मोहरों की तरह देखने लगते है जिन्हें लड़ाकर मालिकों से ज़्यादा से ज़्यादा सुविधाएँ हासिल की जा सकें। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अर्थव्यवस्था, राजनीति, इतिहास और मज़दूर आन्दोलन के अनुभवों की जानकारी न होने के कारण मज़दूरों को उन सम्बन्धों को समझने में कठिनाई होती होती है जो कि कारख़ानेदार, स्थानीय प्रशासन, नेताशाही  तथा सरकारों के बीच परदे के पीछे काम कर रहे होते हैं। उन्हें लगता है कि यूनियन बना लेने मात्र से ही उनके सारे कष्ट मिट जायेंगे। लेकिन हक़ीकत इसके ठीक उलट है। जैसे ही मज़दूर ट्रेड यूनियन में क्रान्तिकारी ढंग से संगठित होने का शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त करने लगते हैं वैसे ही कारख़ानेदार तथा सभी मज़दूर विरोधी ताक़तें सबसे पहले उन्हें पतित तथा भ्रष्ट करने का काम करने में जुट जाती हैं। असफल हो जाने पर वे अन्य तरीकों से उनके संगठन को तोड़ने की योजनाएँ बनाने लगते हैं। आज बरगदवा के मज़दूरों के साथ भी यही हो रहा है। भविष्य इस पर निर्भर है कि व्यापक मज़दूर आबादी अपनी मुक्ति की विचारधारा को किस हद तक समझ पाती है।­­­­­­­

 

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2011

 


 

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