बेकारी के आलम में

शिवानन्द

काम की तलाश करते हुए मैं गुड़गाँव के उद्योग विहार में शनि मन्दिर के पास वाले लेबर चौक पर जाकर खड़ा हो गया। लेबर चौक पर बड़ी बुरी हालत थी। जैसे ही कोई पार्टी आती, मज़दूर उस पर ऐसे झपटते जैसे गुड़ पर चींटे झपटते हैं। काम पाने की बदहवासी में मज़दूर एक-दूसरे से गाली-गलौच की जिस ज़ुबान में बात करते हैं उसे साफ़-सुथरी भाषा में नहीं लिखा जा सकता। लगभग हर लेबर चौक पर यह नज़ारा दिख जाता है और काम पाने के लिए मज़दूरों की यह बदहवासी देखकर मज़दूरों को ले जाने वाली पार्टियाँ गिरगिट की तरह रंग बदलकर कम से कम मज़दूरी पर काम करने वाले लेबर ले जाती हैं। और कोई चारा नहीं होने से, मज़दूर भी 300 रुपये की जगह 150 रुपये तक में काम करने को राज़ी हो जाते हैं और वो भी मालिक की शर्तों पर।

यहाँ के लोकल मालिक लोग पूरी गुण्डागर्दी के साथ सिर पर चढ़कर काम कराते हैं और कभी-कभी तो बिना पैसे दिये ही, गाली देकर भगा देते हैं। वे जानते हैं कि ”ये साले यू.पी. वाले और बिहारी हमारा क्या बिगाड़ लेंगे।” यहाँ के मकानमालिक, दूकानदार और गाँव वालों के लुटेरू गँठजोड़ की वज़ह से अधिकतर मज़दूर आतंकित रहते हैं। मज़दूर किसी से ज्यादा मेल-जोल नहीं रखते और बस अपने काम से मतलब रखते हैं।

कापसहेड़ा, डुण्डाहेड़ा, मौलाहेड़ा, गुड़गाँव — ये सभी पहले गाँव थे, पर जब से यहाँ फैक्टरियाँ लगनी शुरू हुईं तो यहाँ के लोगों की चाँदी हो गयी। जिस किसान के पास एक बीघा ज़मीन थी उसे भी लाखों रुपये का मुआवज़ा मिला। इन रुपयों से इन्होंने 8-10 वर्गफुट के कमरे बनवाये, दूकानें खोलीं और यह नियम बना दिया कि जो मज़दूर जिस मकान में रहेगा वह वहीं से राशन लेगा, वरना वहाँ नहीं रहेगा। इस तरह पहले के छोटे किसान भी आज लुटेरों की जमात में शामिल हो गये हैं। यहाँ की स्थानीय आबादी की शानो-शौकत का खर्च भी परदेशी मज़दूर ही उठाते हैं। इन जगहों पर अब भी खाप-पंचायतें लगती हैं। बुज़ुर्ग लोग दिन भर यूँ ही बैठे हुक्का पीते रहते हैं। बाहर से आये लोगों के साथ गाली-गलौज करना या मामूली बात पर मार-पीट आम बात है।

मज़दूरों की ज़िन्दगी तबाह और बर्बाद है। बेरोज़गारी का आलम यह है कि लेबर चौक पर सौ में से 10 मज़दूर ऐसे भी मिल जायेंगे जिन्हें महीने भर से काम नहीं मिला। ऐसे में, जब कोई रास्ता नहीं बचता, तो ज़िन्दगी बचाने के लिए वो उल्टे-सीधे रास्ते अपना लेते हैं। ऐसे ही एक तरीक़े के बारे में बताता हूँ — भारत सरकार ने बढ़ती आबादी को रोकने के लिए नसबन्दी अभियान चलाया है। इसी अभियान में लगे दो एजेण्ट यहाँ के लेबर चौक पर लगभग हर रोज़ आते हैं और नसबन्दी कराने पर 1100 रुपये नकद दिलाने का लालच देकर हमेशा कई मज़दूरों को ले जाते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि भूख से मरते लोग कोई रास्ता नहीं होने पर इसके लिए भी तैयार हो जाते हैं।

ऐसे एक एजेण्ट से बात करने पर उसने बताया, ‘हम दो लोग हैं। हमको हर रोज़ पाँच आदमी चाहिए ही चाहिए। एक नसबन्दी कराने के लिए सरकार से 850 रुपये का कमीशन मिलता है।’ यानी हर रोज़, दोनों की कुल करीब 4000 रुपये (प्रति एजेण्ट 2000 रुपये रोज़) की कमाई होती है। उसने बताया कि लेबर चौक, बस अड्डा, रास्ते से गुज़रते बेरोज़गारों से बात करने पर पाँच लोग आराम से मिल जाते हैं। कुछ लोगों को मुँहा-मुँही प्रचार के काम में भी लगा रखा है और वो जब भी इसके लिए आदमी लाते हैं तो उनको भी सौ या दो सौ रुपये दे देते हैं। नसबन्दी कराने वाले को 1100 रुपये देने की बात पूछने पर वह गोलमोल जवाब देकर दूसरी ओर निकल गया।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त-सितम्बर 2012

 


 

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