उद्धरण
चन्द्रशेखर आज़ाद का शहादत दिवस (27 फ़रवरी -1931)
कि आज़ादियों का बढ़ता हुआ सफ़ीना
रुके न एक पल को
मगर ये क्या?
ये अँधेरा, से कारवाँ रुका क्यों है
चले चलो कि अभी काफ़िला-ए-इन्क़लाब को
आगे, बहुत आगे जाना है
फासीवाद जब भी हिंसा का इस्तेमाल करता है, उसका प्रतिकार सर्वहारा हिंसा द्वारा किया जाना चाहिए। यहाँ मेरा मतलब व्यक्तिगत आतंकवादी कार्रवाइयों से नहीं है, बल्कि सर्वहारा वर्ग के संगठित क्रान्तिकारी वर्ग संघर्ष की हिंसा से है। फैक्ट्री “हण्ड्रेड्स” को संगठित करके जर्मनी ने एक शुरुआत कर दी है।
यह संघर्ष तभी सफल हो सकता है जब एक सर्वहारा संयुक्त मोर्चा होगा। इस संघर्ष के लिए पार्टी-प्रतिबद्धताओं को लाँघकर मज़दूरों को एकजुट होना होगा। सर्वहारा संयुक्त मोर्चे की स्थापना के लिए सर्वहारा की आत्मरक्षा सबसे बड़े उत्प्रेरकों में से एक है। हर मज़दूर की आत्मा में वर्ग-चेतना को बैठाकर ही हम फासीवाद को सामरिक बल से उखाड़ फेंकने की तैयारी में भी सफल हो पायेंगे, जो कि इस मुकाम पर सर्वाधिक ज़रूरी है।
क्लारा जे़टकिन (1923)
मज़दूर बिगुल, जनवरी-फरवरी 2014















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