मुनाफाख़ोर मालिक, समझौतापरस्त यूनियन
रामाधार
बादली औद्योगिक क्षेत्र में एफ. 2/80 फैक्टरी है। (ज्यादातर फैक्ट्रियों में नाम के बोर्ड नहीं हैं, सिर्फ पता होता है ताकि क़ानूनी कार्रवाई की नौबत आये तो मज़दूर के लिए मुसीबत बढ़ जाये।) दो बंसल भाई इसके मालिक हैं और इसमें बाल्टी, टंकी व अनेक प्रकार के बर्तन बनते हैं। इस फैक्टरी में करीब 100 मज़दूर काम करते हैं, जिनमें करीब 35 मज़दूर एक ठेकेदार के नीचे पीस रेट पर काम करते हैं। इन मज़दूरों का मालिक से कोई सीधा वास्ता नहीं है। कुछ मज़दूरों को ठेकेदार ने काम की कमी की बात कहकर हटा दिया है। इसके अलावा, 40 पुराने कारीगर हैं। कुछ कारीगरों की तनख्वाह 7000 रुपये हैं जो ”मालिक के आदमी” माने जाते हैं।
इस फैक्ट्री के मज़दूर वेतन बढ़ाने की माँग कर रहे हैं। मज़दूरों का कहना है कि मज़दूरी की सरकारी दर बढ़ी है और महँगाई भी बढ़ी है इसलिए 1100 रुपये बढ़ने चाहिए जबकि मालिक ने इस साल जनवरी में सिर्फ 600 रुपये बढ़ाये हैं। मज़दूरों का कहना है कि यूँ तो 1000 रुपये और बढ़ने चाहिए, लेकिन अगर मालिक 500 रुपये भी बढ़ाता है तो वे समझौता करने को तैयार हैं। फैक्ट्री में एक ही ज़िले के करीब 30 लोग हैं जो वेतन बढ़ोत्तरी के लिए संघर्ष करने को तैयार हैं और 40-50 अन्य कारीगर व हेल्पर भी उनका साथ दे रहे हैं। दूसरी तरफ, मालिक ने पहले मई में और फिर जून में बढ़ोत्तरी करने की बात कही थी, लेकिन जुलाई आने पर पहले काम कम होने का बहाना करके वेतन बढ़ाने से इन्कार कर दिया, लेकिन फिर 12 जुलाई को 200 रुपये बढ़ाने की बात कही। हालाँकि, मज़दूरों ने तब तक तनख्वाह नहीं ली थी।
मज़दूरों के पास जानकारी का अभाव होने और संघर्ष का कोई मंच नहीं होने के कारण, उन्होंने सीटू की शरण ले ली। मज़दूरों का कहना है कि हम लड़ने को तैयार हैं, लेकिन हमें कोई जानकारी नहीं है इसलिए हमें किसी यूनियन का साथ पकड़ना होगा। जबकि सीटू ने मज़दूरों से काम जारी रखने को कहा है और लेबर आफिसर के आने पर समझौता कराने की बात कही है। आश्चर्य की बात यह है कि संघर्ष का नेतृत्व करने वाले किसी भी आदमी ने यह स्वीकार नहीं किया कि वे संघर्ष कर रहे हैं। सीटू की सभाओं में झण्डा उठाने वाले फैक्ट्री के एक व्यक्ति का कहना था कि हमारी मालिक से कोई लड़ाई नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ मालिक को सीटू के नेतृत्व में आन्दोलन चलने से कोई समस्या नहीं है, वहीं सीटू के लिए यह संघर्ष नहीं ”आपस की बात” है।
मज़दूर बिगुल, अगस्त-सितम्बर 2012














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