न कोई नारा, न कोई मुद्दा
चुनाव नहीं ये लुटेरों के गिरोहों के बीच की जंग है
सम्पादकीय
लोकसभा चुनाव की महानौटंकी देश में चालू हो गयी है। चुनावी महारथियों की हुंकारें शुरू हो गयी हैं। एक-दूसरे को चुनावी जंग में धूल चटाने के ऐलान के साथ ही चुनावी हम्माम में एक-दूसरे को नंगा करने की होड़ भी मची हुई है।
जो चुनावी नज़ारा दिख रहा है, उसमें तमाम जोड़-तोड़, तीन-तिकड़म और सिनेमाई ग्लैमर की चमक-दमक के बीच यह बात बिल्कुल साफ उभरकर सामने आ रही है कि किसी भी चुनावी पार्टी के पास जनता को लुभाने के लिये न तो कोई मुद्दा है और न ही कोई नारा। जु़बानी जमा खर्च और नारे के लिये भी छँटनी, तालाबन्दी, महँगाई, बेरोज़गारी कोई मुद्दा नहीं है। कांग्रेस बड़ी बेशर्मी के साथ ‘इंडिया शाइनिंग़ की ही तर्ज़ पर ‘जय हो’ का राग अलापने में लगी हुई है, तो भाजपा उसकी पैरोडी करते हुए यह भूल जा रही है कि पाँच वर्ष पहले वह भी देश को चमकाने के ऐसे ही दावे कर रही थी। विधानसभा चुनावों में आतंकवाद के मुद्दा न बन पाने के कारण भाजपा न तो उसे ज़ोरशोर से उठा पा रही है और न ही छोड़ पा रही है। वरुण गाँधी के ज़हरीले भाषण का पहले तो उसने विरोध किया और फिर वोटों के ध्रुवीकरण के लालच में उसे भुनाने में जुट गयी।
उदारीकरण-निजीकरण की विनाशकारी नीतियाँ किसी पार्टी के लिये मुद्दा नहीं हैं क्योंकि इन नीतियों को लागू करने पर सबकी आम राय है। पिछले दो दशक के दौरान केन्द्र और राज्यों में संसदीय वामपन्थियों समेत सभी पार्टियाँ या गठबन्धन सरकारें चला चुके हैं या चला रहे हैं और सबने इन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाया है। देशी-विदेशी पूँजी की खिदमत करने के मामले में राष्ट्रीय या बड़ी चुनावी पार्टियाँ ही नहीं क्षेत्रीय स्तर के क्षत्रप भी होड़ मचाये हुए हैं।
संसदीय वामपन्थी अवसरवाद के अपने पिछले रिकार्ड को भी धता बताते हुए मायावती से लेकर जयललिता जैसी महाभ्रष्ट और फासिस्ट नेताओं से लेकर उदारीकरण की नीतियों के पोस्टरब्वाय चन्द्रबाबू नायडू तक के साथ मोर्चा बनाये घूम रहे हैं।
यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि देश को चलाने के सवाल पर किसी पार्टी की बुनियादी नीतियों में कोई अन्तर नहीं है। तभी तो बड़े आराम से इस गठबन्धन के दल उछलकर उस गठबन्धन में शामिल हो जा रहे हैं।
तब फिर सवाल उठता है कि चुनाव किस बात का? चुनाव में फैसला महज़ इस बात का होना है कि अगले पाँच साल तक सिंहासन पर बैठकर जनता को डसने और ख़ून चूसने का अधिकार कौन हासिल करेगा।
देश का पूँजीवादी जनतंत्र आज पतन के उस मुकाम पर पहुँच चुका है, जहाँ अब इस व्यवस्था के दायरे में ही सही, छोटे-मोटे सुधारों के लिये भी आम जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है। अब तो जनता को इस चुनाव में चुनना सिर्फ यह है कि लुटेरों का कौन सा गिरोह उन पर सवारी गाँठेगा। विभिन्न चुनावी पार्टियों के बीच इस बात के लिये चुनावी जंग का फैसला होना है कि कुर्सी पर बैठकर कौन देशी-विदेशी पूँजीपतियों की सेवा करेगा। कौन मेहनतकश अवाम को लूटने के लिये तरह-तरह के कानून बनायेगा। कौन मेहनतकश की आवाज कुचलने के लिये दमन का पाटा चलायेगा।
ऐसे में मेहनतकश अवाम के सामने विकल्प क्या है? ‘बिगुल’ के पन्नों पर हम बार-बार यह सच्चाई दुहराते रहे हैं कि विकल्प एक ही है-मौजूदा पूँजीवादी जनतंत्र का नाश और उसके स्थान पर मेहनतकशों के सच्चे जनतंत्र की स्थापना। केवल तभी मेहनतकशों को देशी-विदेशी पूँजी की गुलामी से सच्ची आज़ादी मिलेगी और पूँजीवादी जनतंत्र का पहाड़ जैसा बोझ छाती से हटाया जा सकेगा। मौजूदा पूँजीवादी जनतंत्र को उखाड़ फेंककर ही एक ऐसा समाज बनाया जा सकता है, जिसमें उत्पादन, राजकाज और पूरे समाज पर मेहनतकश अवाम का नियंत्रण कायम हो। केवल तभी भूख, बेकारी, भ्रष्टाचार से मुक्त एक नया मानवीय समाज बनाया जा सकता है।
मेहनतकश अवाम के हरावलों को मौजूदा लोकसभा चुनाव के मौके पर पूँजीवादी जनतंत्र का ठोस ढंग से भण्डाफोड़ करने के साथ ही साथ ही आम मेहनतकशों के बीच यह विकल्प भी पेश करना होगा। भले ही आज आम मेहनतकश अवाम को यह असम्भव सा लगे लेकिन हमें उनके दिलों में यह विश्वास जमाना ही होगा कि यह सम्भव है और यही एकमात्र रास्ता है।
बिगुल, अप्रैल 2009













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