एक तरफ़ भूख और अकाल – दूसरी तरफ़ गोदामों में सड़ता अनाज
यह है पूँजी की मुनाफ़ाखोर व्यवस्था की सच्चाई…

एक तरफ़ देश के आधे से अधिक जिले भीषण सूखे और अकाल से जूझ रहे हैं, देशभर में करोड़ों लोग अनाज की बढ़ती क़ीमतों के कारण आधा पेट ख़ाकर गुज़ारा कर रहे हैं, दूसरी ओर सरकारी गोदामों में पड़ा लाखों टन अनाज सड़ रहा है।

कृषि मन्त्री शरद पवार ने संसद में बताया कि इस वर्ष अप्रैल-मई के महीनों के दौरान परिवहन और भण्डारण के दौरान 2.2 लाख टन गेहूँ और चावल सड़ गया। इस अनाज से 12 लाख लोगों का एक साल तक पेट भरा जा सकता था। विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तव में बर्बादी इससे भी ज़्यादा की होगी। पंजाब के तरनतारन ज़िले में 5300 टन गेहूँ खुले में पड़े-पड़े सड़ गया। अब यह गेहूँ जानवरों को खिलाने लायक भी नहीं रह गया है। जिस अनाज से 30,000 लोगों को एक साल तक खाना खिलाया जा सकता था, उसे अब खाद बनाने के लिए नीलाम कर दिया जायेगा! ये तो मात्र एक उदाहरण है। चण्डीगढ़ के पास खमाणू में गेहूँ की कई लाख बोरियाँ दो साल से खुले में पड़े-पड़े सड़ गयीं। पंजाब में कुल 155 लाख टन गेहूँ आज भी खुले में रखा हुआ है। तय है कि इसका भी अच्छा-खासा हिस्सा सड़ ही जायेगा।

Rotting_grains_17812दूसरे राज्यों का हाल भी ऐसा ही है। पश्चिम बंगाल में कुल 57,770 टन गेहूँ की सरकारी ख़रीद की गयी जिसका भारी हिस्सा खुले में पड़ा है। बिहार में गोदाम नहीं होने के कारण इस साल किसानों से 2 लाख टन धान खरीदा ही नहीं गया। उड़ीसा में 55 लाख टन अनाज की ख़रीद का लक्ष्य है लेकिन सिर्फ़ 7 लाख टन अनाज के भण्डारण का इन्तज़ाम है। नागरिक आपूर्ति विभाग के एक अफसर का कहना है कि उनका विभाग हर साल 1.2 प्रतिशत को “बरबाद” दिखा देता है, लेकिन वास्तव में बरबादी इससे बहुत ज़्यादा होती है। यानी हर वर्ष 50 हज़ार से लेकर एक लाख टन अनाज की बरबादी। बिहार में हर साल 27 लाख टन अनाज की सरकारी ख़रीद हेाती है जिसमें से 5 प्रतिशत यानी क़रीब एक लाख पैंतीस हज़ार टन अनाज गोदामों में खराब हो जाता है। देश के दूसरे राज्यों में भी हर साल जितना अनाज बरबाद हो जाता है उससे लाखों लोगों का पेट भरा जा सकता है।

सवाल सिर्फ़ भण्डारण में कमी के कारण अनाज के सड़ जाने का ही नहीं है – हर साल गोदामों में लाखों टन अनाज चूहे खा जाते हैं। ज़ाहिर है, इन “चूहों” में सरकारी कर्मचारियों और अफ़सरों का भी अच्छा-खासा हिस्सा होता है जो इस अनाज को काले बाज़ार में बेच डालते हैं।

कुछ वर्ष पहले अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा था कि देश में अनाज का इतना अधिक भण्डार है कि अगर अनाज की बोरियों को एक के ऊपर एक रखा जाये तो उनकी ऊँचाई चाँद तक पहुँच जायेगी। लेकिन इस विशाल भण्डार के बावजूद देश में कई करोड़ लोग हर रात भूखे सोते हैं। आज भी देश के बहुत से इलाकों में भूख से तड़पकर लोगों की मौत हो जाती है। गोदामों में अनाज सड़ता रहता है, या उसे चूहे खाते रहते हैं और बाज़ार में अनाज की क़ीमतें आसमान पर पहुँच जाती हैं। ग़रीबों- मेहनतकशों की थाली से दालें तो ग़ायब ही हो चुकी हैं, रोटियाँ भी कम होती जा रही हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा बनायी गयी भूख से पीड़ित 88 देशों की सूची  में भारत नीचे से 66वें स्थान पर है!

ऐसा घिनौना मज़ाक सिर्फ़ पूँजीवादी व्यवस्था में ही हो सकता है – जहाँ मुनाफ़े से बढ़कर कोई चीज़ नहीं है। गोदामों में पड़ा अनाज अगर बाज़ार में आ जायेगा, या पेट भरने के लिए ग़रीबों को दे दिया जायेगा, तो बाज़ार में आपूर्ति ज़्यादा होने के कारण अनाज की क़ीमतें गिरने लगेंगी और मुनाफ़ा कम हो जायेगा। मुनाफ़े पर टिकी व्यवस्था में यह गुनाह कैसे हो सकता है! इसलिए भूख से मरें तो मरें – बाज़ार व्यवस्था को गड़बड़ नहीं होना चाहिए।

मुनाफ़े का यह ख़तरनाक तर्क पूरी दुनिया में ऐसे ही काम करता है। सबसे ज़्यादा अनाज पैदा करने वाले अमेरिका और आस्‍ट्रेलिया में हर साल लाखों टन अनाज सुअरों को खिला दिया जाता है जबकि अफ्रीका, एशिया और लातिनी अमेरिका के बहुत से देशों में भयानक भुखमरी फैली होती है। आज एक खेत से जितनी पैदावार हो सकती है, केवल उसके आधार पर हिसाब लगाया जाये, तो अकेले अमेरिका, कनाड़ा और ऑस्ट्रेलिया पूरी दुनिया का पेट भरने लायक अनाज पैदा कर सकते हैं। लेकिन वहाँ की सरकारें हर साल किसानों को करोड़ों डालर की सब्सिडी इसलिए देती हैं ताकि वे अपने खेत परती छोड़ दें। वजह वही मुनाफ़ा – अगर पैदावार ज़्यादा होगी तो बाज़ार में जिन्सों की क़ीमतें गिर जायेंगी और पूँजीपतियों के मुनाफ़े में कमी आ जायेगी।

मालों और उत्पादक शक्तियों की बरबादी पूँजीवाद के ज़िन्दा रहने की शर्त है। अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ जब बाज़ार में कीमतें बनाये रखने के लिए बड़े-बड़े जहाज़ों में भरकर अनाज समुद्र में गिरा दिया जाता था या जला दिया जाता था। अब बरबादी के नये-नये तरीके आ गये हैं और बरबादी का पैमाना भी ज़्यादा बड़ा हो गया है।

जिस व्यवस्था में करोड़ों लोग भूख से तड़पते हों, जहाँ हिन्दुस्तान जैसे देश में रोज़ 9 हज़ार बच्चे, भूख, कुपोषण और उससे पैदा होने वाली बीमारियों से मर जाते हों और फिर भी लाखों टन अनाज पड़े-पड़े सड़ जाता हो, उस व्यवस्था को जितनी जल्दी हो तबाह कर दिया जाना चाहिए। पूँजीवाद की मौत देश के करोड़ों ग़रीब, मेहनतकश लोगों के जीने की शर्त है!!

 

बिगुल, सितम्‍बर 2009


 

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