ग़रीबों पर मन्दी का कहर अभी जारी रहेगा
पूँजीवाद के विनाशकारी संकट से उबरने के आसार नहीं!
इस व्यवस्था को क़ब्र में पहुँचाकर ही इन संकटों से निजात मिलेगी!!

सम्‍पादक मण्‍डल

योजना आयोग ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में भविष्यवाणी की है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर घटेगी और खाद्य वस्तुओं के दाम बढे़ंगे। 2013 तक चलने वाली इस पंचवर्षीय योजना के दौरान विकास दर पहले 9.0 प्रतिशत रहने का अनुमान था लेकिन अब कहा जा रहा है कि यह महज़ 7.8 प्रतिशत रहेगी। रिपोर्ट के मुताबिक सेवा क्षेत्र और भवन निर्माण के क्षेत्रों में विकास की दर थोड़ी बढे़गी लेकिन कृषि और मैन्युफैक्चरिंग की दर घट सकती है।

उधर, आर्थिक विकास एवं सहकार संगठन (ओईसीडी) और संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की संयुक्त रिपोर्ट ‘कृषि अनुमान 2009-2018’ के मुताबिक दुनिया की अर्थव्यवस्था की हालत भी ज़्यादा अच्छी नहीं है। रिपोर्ट कहती है कि अगर अगले दो-तीन साल में विश्वव्यापी मन्दी से उबरने की प्रक्रिया शुरू हो गयी तो कृषि की हालत में ज़्यादा गिरावट नहीं आयेगी, लेकिन अगर मन्दी की स्थिति और गम्भीर हुई तो खाद्य संकट फिर से गम्भीर हो जाने का जोखिम बढ़ जायेगा।

भारत और दुनिया की ग़रीब आबादी के लिए इस हालत के नतीजे बहुत गम्भीर होंगे। पिछले दो वर्ष से चले आ रहे भीषण खाद्यान्न संकट ने गरीबों के लिए जीना दूभर कर दिया है। पूँजीवादी आँकड़ों के खेल के चलते पिछले कुछ महीनों से देश में मुद्रास्फीति की दर घटकर शून्य हो चुकी है और अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में भी कीमतें कम हो चुकी हैं लेकिन देश की गरीब आबादी को इससे कोई राहत नहीं मिली है। बल्कि अनाज की जमाखोरी के चलते बाज़ार में गेहूँ, चावल, दाल, तेल सबकी कीमतें पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी हैं।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में विकास दर धीमी रहने का मतलब है कि उद्योगों में बेरोज़गारी और वेतन कटौती बढ़ेगी तथा पूँजीपति काम के घण्टे बढ़ाकर और रफ्तार तेज़ करके मजदूरों को ज़्यादा से ज़्यादा निचोड़ने की कोशिश करेंगे। बेरोज़गारी और वेतन कटौती के असर से गरीबों के लिए खाद्यान्न संकट और भी गम्भीर हो जायेगा।

योजना रिपोर्ट के मुताबिक सेवा क्षेत्र और भवन निर्माण क्षेत्र में मन्दी का असर कम होने के संकेत मिल रहे हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था की रीढ़ मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र ही है, जबकि सबसे अधिक लोगों को रोज़गार कृषि के क्षेत्र में मिला हुआ है। अगर कृषि और मैन्युफैक्चरिंग मन्दी की मार से तंग रहेंगे, तो अन्य सेक्टरों की कुछ बेहतर स्थिति अस्थायी ही हो सकती है।

खेती का संकट पूरी तरह पूँजीवादी नीतियों का परिणाम है। वैसे तो पूँजीवाद के तहत उद्योग के मुकाबले खेती हमेशा ही पिछड़ी रहती है लेकिन भूमण्डलीकरण के दौर की नीतियों ने खेती को पूरी तरह उद्योग की दासी बना दिया है। इसका आधुनिकीकरण भी मुनाफ़े के तंत्र और उद्योग की ज़रूरतों के अनुसार बेतरतीब और विकृत ढंग से हुआ है। विज्ञान और तकनोलॉजी की इतनी अधिक तरक्की के बावजूद आज भी हिन्दुस्तान की खेती मौसम के मिज़ाज पर निर्भर है। उत्पादन इन्सान की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नहीं बल्कि बाज़ार में मुनाफा कमाने के लिए किया जाता है। एक तरफ करोड़ों लोग भूखे-नंगे हैं, दूसरी तरफ खाद्य फसलों का रकबा कम होता जा रहा है और कारों का ईंधन बनाने के लिए जटरोफ़ा, रतनजोत आदि की खेती से लेकर फूल वगैरह की पैदावार का रकबा बढ़ता जा रहा है। खेती के लिए नये-नये खाद, बीज, कीटनाशक, खरपतवारनाशक आदि की ज़रूरत बढ़ रही है और पूँजी निवेश पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। इसके चलते कर्ज़ और घाटे के जाल में उलझकर आत्महत्या करने वालों में छोटे किसानों की संख्या सबसे अधिक हो चुकी है। देश के हर हिस्से में बन रहे ‘सेज़’ के लिए लाखों हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन को खाली कराकर उद्योगों को सौंप दिया गया है तथा इतनी ही और ज़मीन हड़पे जाने की तैयारी है।

खेती के संकट के कारण गाँवों से मेहनतकशों के उजड़ने का सिलसिला रुकने वाला नहीं है। दूसरी ओर, उद्योगों में इस भारी आबादी को खपाने की अभी क्षमता ही नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि आज उद्योगों में श्रम सघनता घट रही है और मशीनीकरण बढ़ रहा है। नयी तकनोलॉजी के कारण कई मज़दूरों का काम एक-दो मज़दूरों से करा लिया जा रहा है। ऊपर से मन्दी की मार से मैन्युफैक्चरिंग उद्योग के उबरने के आसार जल्दी नज़र नहीं आ रहे है। ऐसे में गाँवों से उजड़ रही भारी ग़रीब आबादी शहरी बेरोज़गारों की फ़ौज में इज़ाफ़ा ही करेगी। इससे उनकी मोलभाव करने की शक्ति और कम होगी तथा मालिकों को मनमानी दरों पर मज़दूरों से बेतहाशा काम कराने का और मौका मिल जायेगा।

सेवा क्षेत्र में मन्दी का असर कम होने का अर्थव्यवस्था की आम स्थिति से कोई लेना-देना नहीं है। देश के बहुत बड़े परभक्षी उच्च मध्यवर्ग के पास मेहनतकशों को निचोड़कर अपार धन इकट्ठा हो चुका है। दफ्तरों में बैठे-बैठे बस कंप्यूटर, टेलीफोन और कलम चलाकर हर महीने लाखों की कमाई करने वाले इस अनुत्पादक वर्ग के पास खर्च करने को काले धन की कमी नहीं है। इसी की बदौलत होटल, मनोरंजन, संचार, बैंक-बीमा आदि में मन्दी कम होती दिख रही है। मुख्यतः काले धन के निवेश से ही भवन निर्माण क्षेत्र में भी लम्बी मन्दी के बाद उठान के संकेत मिल रहे हैं। सिर पर छत का जुगाड़ करने के लिए घर खरीदने की चाहत रखने वाली भारी आबादी के लिए तो अब भी घर एक सपना ही है, मगर अपनी वाली कमाई के निवेश के लिए घर या दुकान खरीदकर रख देने वालों की कमी नहीं है।

पूँजीवाद के तमाम हकीम-वैद्यों के हर तरह के टोनों-टोटकों के बावजूद पूँजीवाद का संकट दूर होता नज़र नहीं आ रहा है। तमाम पूँजीवादी आर्थिक संस्थाओं के आकलन बताते हैं कि अभी अगले दो-तीन वर्ष के भीतर मन्दी दूर होने के आसार नहीं हैं। और अगर उसके बाद धीरे-धीरे मन्दी का असर दूर हो भी गया तो वह उछाल अस्थायी ही होगी। भूलना नहीं चाहिए कि यह मन्दी पहले से चली आ रही दीर्घकालिक मन्दी के भीतर की मन्दी है और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था इससे उबरेगी तो कुछ ही वर्षों में इससे भी भीषण मन्दी में फँस जायेगी। इस बूढ़ी, जर्जर, आदमखोर व्यवस्था को क़ब्र में धकेलकर ही इसकी अन्तहीन तकलीफ़ों का अन्त किया जा सकता है – और इन्सानियत को भी इसके पंजों से मुक्त किया सकता है।

 

बिगुल, सितम्‍बर 2009


 

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