कॉमरेड सुनीति कुमार घोष को लाल सलाम!
वयोवृद्ध कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी नेता, सिद्धान्तकार और इतिहासकार कॉमरेड सुनीति कुमार घोष का 94 वर्ष की आयु में 11 मई को कोलकाता में निधन हो गया।
का. घोष नक्सलबाड़ी किसान उभार से शुरू हुए कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के नेतृत्व के अन्तिम जीवित सदस्यों में से एक थे। वे 1968 में गठित ऑल इंडिया कोआर्डिनेशन कमिटी ऑफ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरीज (एआईसीसीसीआर) की नेतृत्वकारी टीम के सदस्य थे और 1970 में सीपीआई (एमएल) के गठन के बाद उसकी पहली केंद्रीय कमेटी के सदस्य थे। सीपीआई (एमएल) के मुखपत्र ‘लिबरेशन’ के वे पहले संपादक थे। चारु मजूमदार के निधन के बाद 1974 में आन्दोलन के पुनर्गठन के लिए जब केंद्रीय सांगठनिक कमेटी (सीओसी), सीपीआई (एमएल) का गठन हुआ तो वे उसके भी नेतृत्व का हिस्सा थे। 1977 में सीओसी के विघटन के बाद वे कुछ दिनों तक सक्रिय राजनीति कार्रवाइयों से जुड़े रहे। उसके बाद उन्होंने अपना ध्यान सैद्धान्तिक लेखन और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आंदोलन के इतिहास के दस्तावेजों के संकलन पर केंद्रित किया। उनके संपादन में दो खंडों में ‘लिबरेशन’ में प्रकाशित महत्वपूर्ण लेखों का संकलन ‘लिबरेशन एंथोलॉजी’ प्रकाशित हुआ।
इसके अतिरिक्त भारत के पूंजीपति वर्ग पर केंद्रित उनकी पुस्तक ‘द इंडियन बिग बुर्जुआजी’ काफी चर्चा में रही। भारत में संविधान निर्माण के इतिहास और उसकी प्रकृति पर उनकी एक पुस्तिका ‘द इंडियन कांस्टीटूशन एंड इट्स रिव्यू’, रिसर्च यूनिट फॉर पोलिटिकल इकॉनमी द्वारा प्रकाशित हुई। राष्ट्रीयता की समस्या पर उनकी पुस्तक ‘इंडियाज नेशनेलिटी क्वेश्चन एंड रूलिंग क्लासेज़’ तथा भारत-चीन युद्ध पर ‘द हिमालयन एडवेंचर’ शीर्षक उनकी पुस्तक भी काफी चर्चित रही हैं। उन्होंने कई अन्य पुस्तिकाएँ तथा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में महत्वपूर्ण लेख भी लिखे।
का. सुनीति कुमार घोष अपनी अंतिम सांस तक मार्क्सवाद-लेनिनवाद के प्रति समर्पित बने रहे और उसकी क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु की हिफाजत के लिए सचेष्ट रहे। अन्तिम सांस तक वे कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के पुनर्निर्माण की समस्याओं और चिन्ताओं से जूझते रहे। भारतीय सर्वहारा के इस योद्धा को हम अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनका क्रान्तिकारी अभिवादन करते हैं।
मज़दूर बिगुल, मई 2014













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