लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में माकपा-सीटू के मजदूर विरोधी कारनामे
संघर्षशील मजदूर साथियों को समझौतापरस्त, भ्रष्ट और दलाल नेतृत्व से पीछा छुड़ाकर मजदूर आन्दोलन में आये गतिरोध को तोड़ना होगा

लखविन्दर

भारत के मजदूर आन्दोलन पर जरा सी भी ईमानदार नजर रखने वाले लोगों के लिए आज यह बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि सी.पी.आई.एम. (माकपा) और उसका मजदूर विंग सी.आई.टी.यू. (सीटू) किस कदर खुलकर पूँजीपतियों की सेवा में लगे हुए हैं। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, बस पिछले 8-10 वर्षों की इनकी कारगुजारियों पर नजर डाल ली जाये तो कोई शक नहीं रह जाता कि माकपा-सीटू के झण्डे का लाल रंग नकली है और ये मजदूरों की पीठ में छुरा घोंपने का ही काम कर रहे हैं। देश में जहाँ-जहाँ भी इनका जोर चला, इन्होंने बड़ी चालाकी के साथ मजदूर आन्दोलन का बेड़ा गर्क करने में किसी तरह की कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।

लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में माकपा-सीटू ने जो समझौतापरस्त, दलाल, भ्रष्ट, पूँजीपतिपरस्त और घोर मजदूर विरोधी भूमिका अदा की है, उसकी चर्चा से पहले हम लुधियाना के मजदूर आन्दोलन के आगे बढ़ने की जबरदस्त सम्भावनाओं के बारे में कुछ बातें करेंगे।

लुधियाना देश के बड़े ओद्योगिक शहरों में से एक है। पिछले कुछ वर्षों में यहाँ के मजदूर अपने बुनियादी हकों के लिए लड़ते रहे हैं। लुधियाना के बड़े कारखानों जैसे हीरो साइकिल, रॉकमैन, एवन, रॉलसन, हाईवे, गरेटवे, बजाज संस के हजारों-हजार मजदूरों का संघर्ष; 2008 में हिन्दुस्तान टायर्ज काण्ड के बाद लुधियाना के दसियों हजार मजदूरों द्वारा कारखाना मालिकों, पुलिस-प्रशासन के खिलाफ जुझारू संघर्ष; दिसम्बर 2009 में ढण्डारी काण्ड के समय सरकार, पुलिस-प्रशासन, गुण्डा गिरोहों के खिलाफ लुधियाना की सड़कों पर फूटा दसियों हजार मजदूरों के ग़ुस्से का लावा; अभी हाल में पोद्दार टायर्ज लिमिटेड के हजारों मजदूरों द्वारा अपने एक मजदूर साथी के कारखाने से सन्दिग्धा रूप से गायब हो जाने के बाद सड़कों पर उतर आना – ये कुछेक उदाहरण ही यह समझने के लिए काफी हैं कि आज लुधियाना की मजदूर आबादी में पूँजीपतियों, उनकी सरकार, पुलिस-प्रशासन, गुण्डा गिरोहों के खिलाफ कितनी नफरत, बेचैनी और विद्रोह की भावना है। इसी के परिणामस्वरूप लुधियाना के मजदूरों का ग़ुस्सा कभी योजनाबद्ध-संगठित रूप में तो कभी स्वत:स्फूर्त-असंगठित रूप में फूटता ही रहता है। ऐसा यूँ ही नहीं है कि लुधियाना के औद्योगिक क्षेत्र में हमेशा धारा 144 लगी रहती है। यानी वहाँ कभी भी चार लोगों को इकट्ठा खड़े होने की इजाजत नहीं है। अब लुधियाना में पंजाब सरकार ने पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू कर दी है।

लेकिन लुधियाना का मजदूर आन्दोलन ख़ुद-ब-ख़ुद सही दिशा पकड़ लेगा, ऐसा सोचना गलत होगा। जोश, साहस, कुर्बानी की भावना से लबरेज और पूँजीपतियों और उनकी सरकार के खिलाफ आर-पार के संघर्ष की तमन्ना रखने वाली लुधियाना की मजदूर आबादी को अगर क्रान्तिकारी नेतृत्व नहीं हासिल होता और उसे योजनाबद्ध ढंग से संगठित नहीं किया जाता, तो लुधियाना का मजदूर आन्दोलन ऐसे ही बिना किसी तैयारी के, बिना किसी नेतृत्व के, बिना किसी योजना के स्वत:स्फूर्त संघर्षों की भूलभुलैया में चक्कर लगाता रहेगा, और कभी सही दिशा नहीं हासिल कर सकेगा या फिर अपना रूप बदल-बदलकर, झण्डे बदल-बदलकर और नारे बदल-बदलकर पूँजीवादी नेता, पार्टियाँ, संगठन व दलाल यूनियनों वाले मजदूरों को अपने संकीर्ण हितों के लिए इस्तेमाल करते रहेंगे।

लुधियाना के मजदूर आन्दोलन की इन विस्फोटक परिस्थितियों से पैदा हुए मजदूरों के संघर्षों के जुझारूपन की हवा निकालने में माकपा-सीटू वाले पूरा जोर लगाते रहे हैं। अपनी इन घिनौनी हरकतों में वे एक हद तक कामयाब भी हुए हैं। इस तरह वे नकली लाल झण्डा उठाये लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में भितरघात का अपना काम बख़ूबी करते रहे हैं और कर रहे हैं।

पिछले समय में 2004 से लुधियाना के हीरो साइकिल, रॉकमैन, के.डब्ल्यू, एवन, रॉलसन, हाईवे, बजाज संस, मूनलाइट आदि बड़े कारखानों में चले मजदूरों के संघर्ष में माकपा-सीटू का समझौतापरस्त, दलाल, भ्रष्ट, कायर, पूँजीपतिपरस्त चरित्र बहुत खुलकर सामने आया है। उन्होंने मजदूरों के संघर्षों को भारी क्षति पहुँचायी और मजदूरों में निराशा फैलायी। हम संक्षेप में यहाँ उन तरीकों की चर्चा जरूर करेंगे जिनके जरिये इन भितरघातियों ने मजदूरों के संघर्षों की धार को कुन्द किया और कारखाना मालिकों को फायदा पहुँचाया।

जब केन्द्र में माकपा सरकार को समर्थन दे रही थी, तो कारखाना मालिकों के खिलाफ अपने संघर्षों में मजदूर यह सोचकर कि माकपा अब सत्ता में है, इसके पास अपने आन्दोलन के लिए नेतृत्व लेने गये। सभी के सभी कारखानों के आन्दोलनों में माकपा-सीटू ने मजदूरों को जुझारू संघर्ष करने से रोकने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया। सभी कारखानों के संघर्षों में मजदूरों की जुझारू पहलकदमी को दबाया गया। धरने कारखाना गेटों की बजाय गेट से दूर, माकपा-सीटू के दफ्तर या पार्कों आदि में लगते रहे। मजदूरों को अदालती केसों के जरिये मसले हल करने का भरोसा दिलाया जाता रहा। एक कारखाना के मजदूरों को दूसरे कारखाना के मजदूरों का सहयोग लेने से रोकने के लिए माकपा-सीटू वालों ने भरसक जोर लगाया। इसमें वे काफी हद तक कामयाब भी रहे।

आज जिस तरह कारखाना मालिक, सरकार, पुलिस-प्रशासन की एक चौकड़ी हो गयी है, उससे साफ कि जब तक लुधियाना के विभिन्न कारखानों के मजदूरों में आपसी तालमेल नहीं बनता, जब तक वे एकजुट होकर कारखाना मालिकों के बर्बर राज पर धावा नहीं बोलते, तब तक असल कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती।

सीटू-माकपा के नेतृत्व में मालिकों के साथ होने वाले फैसलों में भी तरीका एकदम गैरजनवादी रहता है। सीटू-माकपा के एक-दो नेता मालिकों के साथ समझौता कर लेते रहे, जो मजदूरों पर थोप दिया जाता रहा। कभी-कभी कुछ मजदूर भी साथ ले लिये जाते, लेकिन बहुसंख्यक मजदूरों की राय लिये बिना, फैसलों में उनकी भागीदारी के बिना ही समझौते मजदूरों पर थोप दिये गये। बातचीत की जगह आदि तय करने के लिए मालिकों की पसन्द का खास धयान रखा जाता रहा। फैसले या तो मैनेजमेण्ट टेबल पर या फिर होटलों में होते रहे। एवन में हुआ समझौता तो सबसे बदनाम समझौतों के सारे रिकॉर्ड ही तोड़ गया, जब हड़ताल करके मालिक का नुकसान करने के तथाकथित जुर्म के रूप में मजदूरों से आठ दिन तक बिना वेतन के काम करवाने का समझौता माकपा-सीटू के नेताओं ने मालिकों से किया। यह फैसला मजदूरों पर जबरदस्ती थोप दिया गया।

आज भी लुधियाना हीरो साइकिल प्राइवेट लिमिटेड और बजाज संस में बनी यूनियनों की पीठ पर माकपा-सीटू के नेता सवार हैं। दोनों ही कारखानों में मजदूर अपने अधिकारों के लिए मालिकों के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए छटपटा रहे हैं। लेकिन माकपा-सीटू वाले उन्हें अपनी चालाकियों से बुरी तरह उलझाये हुए हैं और जुझारू आन्दोलन की राह में रुकावट बने हुए हैं। दोनों ही कारखानों में आज मजदूर माकपा-सीटू की समझौतापरस्त, दलाल और कायर नेतागिरी से लगभग परिचित हो चुके हैं, लेकिन वे सोचते हैं कि इनसे टूटकर आखिर जायेंगे कहाँ? वे माकपा-सीटू के नेताओं के मुँह पर भी गालियाँ देते हैं, लेकिन उनसे पीछा छुड़ाकर कहीं और जाने का रास्ता भी इन मजदूर साथियों को दिखायी नहीं दे रहा।

हीरो साइकिल में मजदूरों का ‘लाल झण्डा हीरो साइकिल मजदूर यूनियन’ के नाम से संगठन बना हुआ है। मजदूरों ने बर्बर कारखाना मालिकों के खिलाफ बहुत ही शानदार जोश, साहस और एकजुटता का प्रदर्शन किया था। इसी के फलस्वरूप कारखाने में आठ घण्टे दिहाड़ी लागू हुई; मालिक-मैनेजमेण्ट द्वारा की जाने वाली धक्काजोरी, अपमान, मारपीट, गाली-गलौच बन्द हुई। अगर माकपा-सीटू का जोर चलता तो वे हीरो साइकिल के मजदूरों के संघर्ष की धार को इस कदर कुन्द कर देते कि उन्हें ये अधिकार भी न मिलते। आज लाल झण्डा हीरो साइकिल मजदूर यूनियन के मजदूर साथियों में इन भितरघातियों की वजह से स्थिति बेहद निराशाजनक बनी हुई है। कुशलता के अनुसार वेतन बढ़ोत्तरी, महँगाई भत्ता, बोनस, मकान किराया, कारखाने से निकाले गये संघर्षशील मजदूर साथियों के खिलाफ दर्ज झूठे पुलिस केस वापस लेने, उन्हें काम पर वापस लेने आदि माँगों पर हीरो साइकिल के मजदूरों का संघर्ष आगे नहीं बढ़ाया गया।

मजदूरों को माकपा-सीटू के चालाक नेताओं ने बड़ी होशियारी से कानूनी लफ्फाजी में उलझाया हुआ है। शुरू से ही माकपा-सीटू के नेताओं ने पैसे के हिसाब-किताब में व्यवस्था और पारदर्शिता लाने के बारे में कुछ नहीं किया। इस बारे में वे चालाकी भरे बहाने बनाते रहे। यूनियन के पैसे के हिसाब-किताब में शुरू से होती आ रही घपलेबाजी का मामला सब मजदूरों के सामने है। हीरो साइकिल मजदूरों का कहना है कि संघर्ष की जीत के नाम पर माकपा-सीटू ने उनके हाथ में यूनियन रजिस्ट्रेशन का झुनझुना पकड़ा दिया है। जब मजदूरों को उनके अधिकार ही हासिल नहीं होने तो इस रजिस्ट्रेशन का क्या फायदा है?

बजाज संस के संघर्ष का तो माकपा-सीटू वालों ने और भी बुरा हाल किया है। बजाज संस के कुछ मजदूर साथियों ने उनका नाम ना छापे जाने की शर्त पर बिगुल मजदूर दस्ता को एक पत्र के जरिये सीटू-माकपा के कॉमरेडों के खिलाफ ग़ुस्सा कुछ इस तरह से जाहिर किया

बजाज संस का मालिक तीन साल से तरक्की मजदूरों को नहीं दे रहा है। और जब वर्कर अपने सीटू नेता के पास जाते हैं तरक्की के लिए तो वे बोलते हैं कि तरक्की की बात कानून में नहीं लिखी है।

आज बजाज संस में सीटू की यूनियन लगे पाँच वर्ष से ऊपर हो गये हैं जबकि यहाँ यूनियन का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। इस बात को हर बार श्रमिक सीटू नेताओं के पास उठाते हैं। रजिस्ट्रेशन के लिए तो वे बोलते हैं कि कागज अप्लाई हुआ है। कभी कहते हैं डिमांड नोटिस वापस आ गया है। और रजिस्ट्रेशन कराने के नाम पर कितनी बार सौ-सौ रुपये प्रत्येक वर्कर से फण्ड ले चुके हैं। और वर्करों को ऍंधोरे में रखते हैं।

यहाँ तक कि मजदूरों के प्रधान बलराम सिंह पर जानलेवा हमले के बाद भी सीटू नेताओं ने मैनेजमेण्ट के ऊपर कोई कानूनी कार्रवाई तक न करके आपस में समझौता कर लिया। और मजदूरों को बताया तक नहीं। …

आज भी श्रमिकों के ऊपर बहुत धक्केशाहियाँ हो रही हैं। अभी हाल में ही सी-94 में वर्कर और स्टाफ में कहा-सुनी हुआ। और स्टाफ वालों ने श्रमिक को पीटा और कम्पनी ने श्रमिकों को बाहर निकाल फेंक दिया और स्टाफ को रख लिया। इसमें सीटू के नेताओं ने कोई फैसला नहीं लिया।

आज यूनियन लगे पाँच वर्ष से ऊपर हो गया। लेकिन श्रमिकों को न ही वर्दी मिला, न ही हाउस एलाउंस मिला। न डीए मिला, न ही बोनस में बढ़ोत्तरी हुआ। न छुट्टी के पैसे में बढ़ोत्तरी हुआ। यहाँ तक कि बढ़ोत्तरी तो दूर की बात है जो छुट्टी का पैसा मिला है, वो पहले से भी कम पैसा मिला है। और इन नेता लोगों का कहना है कि जो मिला है, वो ठीक है।

श्रमिकों का जब भी पैसा बढ़ा उससे बहुत ही ज्यादा सीटू वालों ने प्रोडक्शन बढ़वा दिये। और आठ घण्टे काम करने के लिए कुर्बानी देने वाले कितने अपने महान नेताओं को वर्करों ने खो दिया था, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि आज के दलाल नेताओं ने ख़ुद ही वर्करों से 12 घण्टे, 16 घण्टे, 20 घण्टे काम के करवा दिये हैं। और छुट्टी के दिन भी ओवरटाइम ये कम्पनियों में चलवाते हैं। और वर्करों के विरोध करने पर सीटू नेता कहते हैं जो मर्जी वो करो लेकिन हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है।

श्रमिकों के अन्दर के प्रधान लालेश्वर को जब कम्पनी के गुण्डों ने कम्पनी के अन्दर ही बहुत बुरी तरह पीटा तो सीटू नेताओं ने मजदूरों को चुप रहने के लिए मजबूर किया और कहा कि कानूनी कार्रवाई होगा। इस पर उन्होंने कोई संघर्ष नहीं होने दिया। इन सीटू वालों ने हमारे साथ बहुत धोखा किया है।

बजाज संस के मजदूर साथियों का यह पत्र इस बात की पुष्टि करता है कि माकपा-सीटू मालिक-भक्ति में बहुत गहरे उतर चुकी है। उनसे मजदूर हित की उम्मीद करना बेकार ही नहीं बल्कि मूर्खता भी है।

किसी भी चुनावी पार्टी की तरह माकपा के नेताओं का मकसद भी जनता का भला करना नहीं बल्कि जनता को मूर्ख बनाकर कुर्सियाँ हासिल करना है। माकपा का मजदूर विंग सीटू मजदूरों में उसका वोट बैंक बनाने का एक जरिया है। माकपा यह दावा करती है कि वह देश में क्रान्ति के लिए लड़ रही है, लेकिन जैसाकि उसका सारा इतिहास बताता है कि उसने आज तक पूँजीपतियों की ही सेवा की है। चुनाव पूँजीपतियों से लिये गये चन्दों से ही लड़े और जीते जा सकते हैं, इसलिए माकपा वास्तव में कभी पूँजीपतियों के खिलाफ नहीं जायेगी।

भले ही माकपा और सीटू ने अपने विश्वासघात, समझौतापरस्ती और दलाली से लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में हार, पस्ती, निराशा का माहौल बनाने की कोशिश की है और उसमें वे सफल भी हुए हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मजदूर संघर्ष का रास्ता ही छोड़ देंगे।

हमें पूरा यकीन है कि मजदूरों के दिलों में शोषण, लूट, दमन, अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का साहस कभी मर नहीं सकता। आज भले ही लुधियाना के बड़े कारखानों के संघर्षशील मजदूरों की पहलकदमी और जोश पर माकपा-सीटू के कारण निराशा छायी हो, लेकिन यह भी निश्चित है कि संघर्ष फिर अंगड़ाई लेगा। लेकिन यह संघर्ष तभी सही दिशा में पूरे जोशो-खरोश, पूरे जुझारूपन और साहस के साथ आगे बढ़ सकता है जब मजदूर आन्दोलन से इन भितरघातियों को उठाकर बाहर फेंक दिया जायेगा।

 

बिगुल, मई 2010


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments