आपस की बात
हालात बदलने के लिए एक होना होगा
मो. हाशिम, खजूरी खास, दिल्ली
मेरा नाम मो. हाशिम है। मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ। ज़िला अलीगढ़ का रहने वाला हूँ। मेरे पापा मज़दूर थे। मेरे घर में बहुत परेशानी थी जब मैं केवल आठ साल का था तभी से गाँव में मेहनत करता था, इसके लिए मैं एक धनी किसान के पास काम करता था। वो मुझसे बहुत काम लेता था। जिस कारण मैं पढ़ नहीं पाया। बाद में मैं गाँव से अपने माँ-बाप को लेकर शहर में आया। मैं परिवार के साथ श्रीराम कालोनी, खजूरी खास दिल्ली में अपने मामा के पास मज़दूरी करता था। यहाँ भी मामा मुझे बहुत मारते थे। इनके पास मैंने करीब साल भर काम किया। एक दिन मुझे मज़दूर बिगुल अख़बार मिला। जिसको पढ़ने के बाद मुझे घुटन भरी ज़िन्दगी से लड़ने का तरीक़ा पता चला। बहुत से मेरे भाई आज भी उन्हीं फ़ैक्टरियों में काम करते हैं और मालिक की मार-फटकार सहते हैं। हम सब जैसे-तैसे ज़िन्दगी की गाड़ी खींच रहे हैं। मैं अब एक दूसरी जगह काम करता हूँ। मेरी उम्र तक़रीबन 24 साल है। वहाँ के मालिक से मैं अगर कारीगरों के हक़ के बारे में बोलता हूँ तो मालिक मुझसे चिढ़ता है और मशीन में ताला लगवा देता है। असल में सभी मालिकों की एक ही नीयत होती है – कैसे ज़्यादा से ज़्यादा मज़दूरों का ख़ून-पीसना निचोड़ा जाये।
आज मैं अपनी माँ और पत्नी के साथ खजूरी खास में किराये पर रहता हूँ। 12 घण्टे काम करता हूँ जिससे मैं 8000 हज़ार रुपये कमाता हूँ, जिसमें से 2000 रुपये कमरे का किराया जाता है, बचे 6000 रुपये में मुश्किल से घर का ख़र्च चलता है, न तो इतने पैसे में हम दूध, फल, अच्छा खाना खा सकते हैं, न ही अच्छे कपडे़ पहन सकते हैं। मैं जानता हूँ कि मेरे जैसे कितने भाई हैं जो इसी तरह ज़िन्दगी जीते हैं। बाक़ी सरकार भी मज़दूर के लिए कुछ नहीं करती है। असल में सरकार भी पैसे वालों की होती है, क्योंकि सारे देश का काम तो हम मज़दूर करते हैं, ये पैसे वाले तो मज़े लेते हैं। हम मेहनत करके ख़ून-पसीना बहाते हैं, तब भी दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं होती। इसलिए इसे बदलने में सभी मज़दूर भाइयों को एक होने की ज़रूरत है।
मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2014














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