क्यों असफ़ल हुआ अस्ति मज़दूरों का साहसिक संघर्ष?

ऑटो मज़दूर संघर्ष समिति

2014-11-28-AMSS-ASTI-2मानेसर के अस्ति इलेक्ट्रॉनिक्स इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड से निकाले गये 310 मज़दूरों का संघर्ष बिना किसी नतीजे के बिखर गया। अन्त में मज़दूर पक्ष को प्रबन्धन, श्रम प्रशासन और केन्द्रीय ट्रेड यूनियन एच.एम.एस. ने थकाकर एक ऐसे समझौते के लिए बाध्य कर दिया जिसमें निकाले गये मज़दूरों को वास्तव में कुछ नहीं मिला। ज्ञात हो कि पिछले साल 1 नवम्बर को दोपहर 3 बजे कम्पनी प्रबन्धन ने बिना किसी पूर्व सूचना के कम्पनी नोटिस बोर्ड पर 310 ठेका मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया। जिसके बाद निकाले गये मज़दूरों ने प्रतिरोध करते हुए 3 नवम्बर से ही फ़ैक्टरी गेट पर स्थाई धरना देना शुरू कर दिया। निकाले गये 310 मज़दूरों में से 250 महिला मज़दूर थीं। ये सभी मज़दूर पिछले तीन-चार सालों से कम्पनी की मुख्य उत्पादन लाइन स्थाई मज़दूरों से अभिन्न ऑपरेटर का काम कर रहे थे। वेतन देने से लेकर ड्यूटी लगाने का काम मुख्य तौर से कम्पनी प्रबन्धन करता था। लेकिन जब कम्पनी ने मज़दूरों को बाहर का रास्ता दिखाया तो सारा ज़िम्मा तीन ठेका कम्पनियों पर डाल दिया। असल में आज पूरे गुड़गाँव के औद्योगिक बेल्ट की ऑटोमोबाइल सेक्टर की कम्पनियों में मुख्य उत्पादन लाइन पर इस तरह लाखों ठेका मज़दूरों को बेहद कम मज़दूरी पर खटाया जा रहा है जो श्रम क़ानूनों की नज़र में सरासर ग़ैर-क़ानूनी है। लेकिन प्रबन्धन-प्रशासन-सरकार का गठजोड़ सरेआम सभी श्रम-क़ानूनों का उल्‍लंघन करता है। वहीं दूसरी तरफ़ केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संघ भी ठेका मज़दूरों के मुद्दों पर मुँह पर ताला लगाकर बैठी रहती है। वास्तव में, ठेका मज़दूरों के मुद्दों पर तो केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संघ ठेका मज़दूरों के संघर्ष के ख़िलाफ़ काम करती है। अस्ति के मामले में भी यही हुआ, जहाँ की स्थाई मज़दूरों की कारख़ाना यूनियन समाजवादियों के यूनियन संघ एच.एम.एस. से जुड़ी हुई है। अस्ति कारख़ाने के तमाम स्थाई मज़दूर ठेका मज़दूरों के संघर्ष की मदद करना चाहकर भी नहीं कर पाये, क्योंकि उन्हें एच.एम.एस. ने ऐसा करने ही नहीं दिया। कारख़ाना यूनियन को तमाम क़ानूनी कार्यों के लिए एच.एम.एस. और उसके नेताओं की ज़रूरत पड़ती रहती है जिसके कारण मज़दूर उसकी बात मानने को मजबूर महसूस करते हैं। नतीजतन, अस्ति में ठेका मज़दूरों का संघर्ष अलग-थलग पड़ गया। जुबानी समर्थन तो तमाम यूनियनों और नेताओं ने दिया, लेकिन वास्तविक समर्थन किसी ने नहीं दिया। ऐसे में, ठेका मज़दूर अकेले ही साहस से लड़े।

निश्चित तौर पर, अस्ति मज़दूर आन्दोलन में मज़दूरों ने शानदार बहादुरी का परिचय दिया। इसकी असफलता के पीछे कुछ-कुछ कारण तो वे हैं जोकि आज पूरे ऑटोमोबाइल पट्टी के मज़दूर आन्दोलन के ठहराव का कारण बने हुए हैं। लेकिन इस संघर्ष के इस तरह से समाप्त होने के पीछे श्रम विभाग द्वारा अनसुनी और थकाये जाने की रणनीति, एच.एम.एस. की ग़द्दारी और प्रबन्धन के अड़ियल रवैये के अलावा, अस्ति मज़दूर आन्दोलन के भीतर सक्रिय उन “इंक़लाबी-क्रान्तिकारी कामरेडों” की अदूरदर्शिता और बचकाना रवैया भी था, जिनके बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं और जो अतीत में कुछ और सम्भावनासम्पन्न संघर्षों को असफलता के दलदल में डुबो चुके हैं।

अस्ति मज़दूरों ने छँटनी के बाद फ़ैक्टरी गेट के संघर्ष के साथ ही श्रम-विभाग में भी अपनी शिकायत दर्ज करायी। इसके पश्चात श्रम विभाग ने मज़दूरों को थकाने और निराश करने के लिए तारीख़ पर तारीख़ की नौटंकी चलायी ताकि ठेकेदारों के पास पूरा मौक़ा रहे कि वे मज़दूरों को फ़ोन से और घर-घर जाकर पूरा हिसाब-किताब कर लें। हड़ताल के 20वें दिन मज़दूरों ने आन्दोलन के सलाहकार बने, इंक़लाबी मज़दूरों का केन्द्र होने और क्रान्तिकारी नौजवानों का संगठन होने का दावा करने वाले कुछ राजनीतिक नौबढ़ संगठनों के कहने पर आमरण अनशन शुरू कर दिया। जिसमें 7 मज़दूरों को आमरण अनशन पर बैठा दिया गया। मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय कोई भी संगठन या संगठनकर्ता इस बात को जानता है कि आन्दोलन में आमरण अनशन का रास्ता अन्तिम तौर पर निर्णायक दबाव डालने के लिए अपनाया जाता है। उद्वेलन का पहला ही क़दम कभी आमरण अनशन नहीं होता है; बल्कि प्रतीकात्मक भूख हड़ताल, क्रमिक भूख हड़ताल और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के ज़रिये एक ओर प्रशासन पर निरन्तरता से दबाव बनाने और साथ ही बिरादर मज़दूर आबादी में संघर्ष के लिए हमदर्दी और समर्थन विकसित करने के बाद ही आमरण अनशन का रास्ता अपनाया जाता है। आमरण अनशन को बिना माँगें माने वापस लेना शर्मनाक बात होती है। यही कारण है कि आमरण अनशन उद्वेलन की एक चरणबद्ध प्रक्रिया में अक्सर आख़िरी और निर्णायक चरण में अपनाया जाने वाला क़दम होता है। लेकिन “इंक़लाबी-क्रान्तिकारी कामरेडों” ने अस्ति मज़दूरों के नेतृत्व को यह सुझाव दिया कि आमरण अनशन की शुरुआत कर देनी चाहिए। और नेतृत्व ने भी अदूरदर्शिता दिखलाते हुए इस सुझाव को अपना लिया। नतीजतन, अन्त में बिना माँगों के माने ही आमरण अनशन तोड़ना पड़ा जोकि मज़दूरों के हौसले को पस्त कर गया। इसका ज़िम्मेदार अस्ति मज़दूरों का नवोदित नेतृत्व उतना नहीं था जितना कि “इंक़लाबी-क्रान्तिकारी कामरेडों” का बचकाना और मूर्खतापूर्ण रवैया।

2014-11-26-AMSS-ASTI-1जब मज़दूरों के सब्र का बाँध टूटने लगा तब हड़ताल के लगभग 1 महीने बाद पहली बार अतिरिक्त श्रमायुक्त कार्यालय पर मज़दूरों ने धरना दिया। तब तक मज़दूर कारख़ाने के पास ही बैठे हुए थे, जिसका न तो प्रशासन पर कोई विशेष दबाव पड़ रहा था और न ही प्रबन्धन पर। सही रास्ता यह होता कि मज़दूर अपने विरोध प्रदर्शन, धरने और भूख हड़ताल के स्थान के तौर किसी ऐसे स्थान को चुनते जोकि प्रशासनिक महत्व रखता हो। लेकिन ऐसा किया ही नहीं गया। इसमें भी काफ़ी हद तक इन “इंक़लाबी-क्रान्तिकारी कामरेडों” की रायबहादुरी की काफ़ी भूमिका थी।

अन्त में धरना श्रमायुक्त कार्यालय पर दिया गया लेकिन तब तक कम्पनी प्रबन्धन और ठेकेदारों ने कई मज़दूरों को आन्दोलन से तोड़कर उनका हिसाब-किताब कर दिया था। वैसे भी 1 महीने के संघर्ष में यह बात सामने आ चुकी थी कि गुड़गाँव श्रम विभाग, प्रबन्धन और एच.एम.एस. अस्ति के ठेका मज़दूरों को थकाने का काम कर रहे थे। ऐसे में, अस्ति मज़दूरों के बीच इस बात को लेकर खुलकर विचार-विमर्श होना चाहिए था कि आगे की रणनीति क्या हो। लेकिन “इंक़लाबी-क्रान्तिकारी कामरेडों” ने यहाँ भी वही किया जो इन्होंने मारुति सुजुकी मज़दूर आन्दोलन में किया था, और जो आन्दोलन के पतन का एक कारण भी बना। “क्रान्तिकारी/इंक़लाबी कामरेडों” ने फिर मारुति आन्दोलन की तरह ही सिर्फ़ अस्ति ठेका मज़दूर संघर्ष समिति के मज़दूरों के संघर्ष की भावी रणनीति के बारे में चर्चा को सिर्फ़ कमेटी सदस्य तक ही सीमित रखा और उसे किसी भी क़ीमत पर बाहर नहीं जाने दिया। यानी असल में अपनी ही अहमकाना रणनीति को थोपने का काम किया। और मारुति सुजुकी मज़दूर आन्दोलन की ही तरह इन्होंने यहाँ भी गै़र-जनवादी प्रधानी की राजनीतिक संस्कृति को मज़दूरों के बीच स्थापित करने का काम किया। कहने के लिए “क्रान्तिकारी/इंक़लाबी कामरेडों” मज़दूरों की पहलक़दमी की जुबानी बात करते हैं, लेकिन असल व्यवहार में इनकी राजनीति ट्रेड यूनियन अवसरवाद की होती है।

2014-12-09-Asti-5अस्ति मज़दूर आन्दोलन सड़क के संघर्ष और क़ानूनी संघर्ष दोनों रास्ते पर सही क़दम न उठाने की वजह से टूट गया। स्पष्ट है कि अगर आपका आन्दोलनात्मक पक्ष कमज़ोर पड़ रहा है तो फिर क़ानूनी संघर्ष को और भी प्रभावी और चतुराई के साथ इस्तेमाल करना चाहिए। श्रम विभाग में सुनवाई नहीं हो रही थी और मज़दूरों को तारीख़ें दे-देकर थकाया जा रहा था। बाद में तो श्रम विभाग ने सीधे तौर पर हाथ खड़े कर दिये थे। लेकिन इसके बावजूद “इंक़लाबी-क्रान्तिकारी कामरेडों” ने इसे हर क़ीमत पर उच्च न्यायालय की ओर जाने से रोका और कहते रहे कि “यह आख़िरी हथियार है!” आख़िरी हथियार इस्तेमाल करने का इनका वक़्त ही नहीं आया और आन्दोलन बिखर गया! ‘ऑटो मज़दूर संघर्ष समिति’ ने अस्ति की नेतृत्वकारी समिति के सामने यह प्रस्ताव भी रखा कि देश के अग्रणी श्रम वकील के ज़रिये हाईकोर्ट जाने का रास्ता खुला हुआ है और अब ऐसा न करना देर करना होगा। मज़दूर नेतृत्व इस पर तैयार भी हो रहा था। लेकिन “इंक़लाबी-क्रान्तिकारी कामरेड” हमेशा की तरह कानाफूसी और कुत्साप्रचार की राजनीति कर इस प्रभावी क़दम को उठाने से अस्ति मज़दूर आन्दोलन को रोक दिया।

इन्हीं कमियों के चलते अस्ती मज़दूरों का सम्भावनासम्पन्न संघर्ष एक और निराशापूर्ण हार में समाप्त हुआ। निश्चित तौर पर, यह कोई आख़िरी आन्दोलन नहीं है और आये दिन ऑटोमोबाइल पट्टी के किसी न किसी हिस्से से हड़ताल या आन्दोलन की लपटें उठती रहती हैं। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि हम मज़दूर अपने दुश्मनों और भितरघातियों को पहचान लें। चुनावी पार्टियों से जुड़े केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संघ, “इंक़लाबी-क्रान्तिकारी कामरेडों” (जिनमें से एक संगठन की ख्याति ही टर्मिनेटेड वर्कर्स सेण्टर के तौर पर बन गयी है क्योंकि ये हर संघर्ष का ख़ात्मा इसी तरह कराते हैं कि जो बचता वह केवल मज़दूरों की छँटनी और निष्कासन होता है!) जैसे राजनीतिक नौबढ़ों और अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादियों से हमें सावधान रहना होगा। ये पहले भी कई संघर्षों को डुबा चुके हैं।

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2015

 


 

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