ई.एस.आई. ख़त्म करने की मोदी सरकार की मज़दूर-विरोधी साज़िशें

7 अप्रैल को मोदी सरकार द्वारा श्रम सुधारों के नाम पर मज़दूरों पर एक और बड़े हमले का ऐलान हुआ है। सरकार ई.एस.आई. क़ानून में एक बड़ा संशोधन करने की तैयारी में है। इस संशोधन के बाद पूँजीपतियों के लिए मज़दूरों को ई.एस.आई. सुविधा देना अनिवार्य नहीं रह जायेगा बल्कि वैकल्पिक हो जायेगा और इसकी जगह वे मज़दूरों का निजी बीमा कम्पनियों से बीमा करवा सकेंगे।

निजी बीमा कम्पनियों द्वारा लोगों की लूट जगजाहिर है। साधारण जनता को बीमे का फायदा लेने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। बहुत कम लोग बीमे का फायदा वास्तव में ले पाते हैं। बेशक ई.एस.आई. स्कीम में ग़म्भीर कमियाँ हैं, लेकिन इनके बावजूद ई.एस.आई. स्कीम निजी बीमे से बहुत बेहतर है। जो सुविधाएँ ई.एस.आई. के जरिए मज़दूरों को मिल पातीं हैं वे सुविधाएँ निजी कम्पनी से कभी नहीं मिल पायेंगी।

modi and teaपूँजीपतियों और सरकारी तंत्र की मिलीभगत के चलते पहले ही बहुत थोड़े से मज़दूरों के ई.एस.आई. कार्ड बने हैं। विभाग के अधिकारी पूँजीपतियों से पैसा खाते हैं और मज़दूरों को ई.एस.आई. सुविधा न देने वाले पूँजीपतियों पर कार्रवाई नहीं करते। ऐसा भी काफ़ी बड़े स्तर पर होता है कि पूँजीपति मज़दूरों के वेतन से ई.एस.आई. का पैसा काट लेते हैं लेकिन ई.एस.आई. विभाग को जमा नहीं करवाते। लेकिन पूँजीपति वर्ग मज़दूरों को ई.एस.आई. सुविधा देने या मज़दूरों के दवा-इलाज पर पैसा खर्च करने के झंझट से ही मुक्ति पाना चाहता है। इसी कोशिश में ई.एस.आई. को वैकल्पिक बनाया जा रहा है। पूँजीपति जो पैसा ई.एस.आई. विभाग को जमा करवाते थे अब निजी बीमा कम्पनी को देंगे। कोई भी समझ सकता है पूँजीपतियों को ऐसा विकल्प मिल जाने से पूँजीपतियों के लिए और भी बड़े स्तर पर मज़दूरों को ई.एस.आई. सुविधा न देना आसान हो जायेगा। ई.एस.आई. विभाग के एक बड़े अधिकारी ने बताया कि सरकार इस तरह की व्यवस्था करने जा रही है कि विभिन्न विभागों – श्रम विभाग, ई.पी.एफ. विभाग, ई.एस.आई. विभाग, आय कर विभाग आदि से अलग-अलग इंस्पेक्टर कम्पनियों में जाँच-पड़ताल के लिए न जायें बल्कि एक ही इंसपेक्टर हो। सरकार ई.एस.आई. अस्पतालों और डिस्पेंसरियों को बन्द करने या इन्हें सिविल अस्पतालों-डिस्पेंसरियों में बदलने, सरकारी अस्पतालों को ई.एस.आई. से जोड़ने आदि की तैयारी कर रही है। ई.एस.आई. विभाग द्वारा चलाये जा रहे क़रीब 400 मेडिकल कालेजों, नर्सिंग व डेंटल संस्थानों को बन्द करने का ऐलान तो सरकार कर ही चुकी है। इन सबसे से स्पष्ट है कि सरकार का इरादा वास्तव में ई.एस.आई. विभाग ही बन्द करने का है। उपरोक्त ई.एस.आई. अधिकारी ने भी इस बात की पुष्टि की है। गौरतलब है कि ई.एस.आई. विभाग के कर्मचारियों ने सरकार की इस नीति के खिलाफ़ एक सप्ताह काला बिल्ला लगाकर रोष जाहिर किया है।

अन्य मज़दूर विरोधी श्रम सुधारों के अलावा फैक्ट्री एक्ट, 1948 के अन्तर्गत आने वाले कारखानों की एक बड़ी संख्या को इस क़ानून से बाहर करने की तैयारी हो रही है। अभी फैक्ट्री एक्ट उन कारखानों पर लागू होता है जहाँ 10 या अधिक (जहाँ बिजली का इस्तेमाल होता हो) और 20 या अधिक (जहाँ बिजली का इस्तेमाल न होता हो) मज़दूर काम करते हैं। सरकार क़ानून में संशोधन करके पहले मामले में मज़दूरों की संख्या 20 या अधिक और दूसरे मामले में मज़दूरों की संख्या 40 या अधिक तय करने की कोशिश में है। अगर यह संशोधन हो जाता है हो इस क़ानून के दायरे से बाहर रह जाने वाले कारखानों के मज़दूर तो क़ानूनन ई.एस.आई., ई.पी.एफ. जैसी सुविधाओं से बाहर हो जायेंगे। बाकी बची कसर ई.एस.आई. को वैकल्पिक बना देने से निकाल दी जायेगी।

पूँजीपति वर्ग द्वारा मज़दूर वर्ग पर हमलों का जवाब देने के लिए फिलहाल मज़दूर वर्ग की तैयारी नहीं है। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने पूँजीपतियों का पक्ष चुन लिया है और मज़दूरों से दगा कर चुकी हैं। सरकार के विरोध के लिए ये कुछ दिखावे भरी कार्रवाइयाँ जरूर करती हैं लेकिन श्रम क़ानूनों में मज़दूर विरोधी संशोधनों के साथ इनकी पूरी सहमति है। देश के विभिन्न हिस्सों में मज़दूरों के जुझारू संगठन भी बन रहे हैं जो एक शुभ संकेत है। लेकिन अभी मज़दूरों की सांगठनिक ताक़त बहुत कमज़ोर है। इस कमज़ोरी को दूर करने के लिए सरकार के हमलों की गम्भीरता को समझने वाले वर्ग सचेत मज़दूरों को मज़दूरों की वर्गीय एकता और संघर्ष को मज़बूत करने के लिए ज़ोरदार कोशिशें करनी होंगी।

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल 2015


 

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