कौशल विकास: मज़दूरों के लिए नया झुनझुना और पूँजीपतियों के लिए रसमलाई

तपिश

भाजपा की सरकार ने गाजे-बाजे के साथ कौशल विकास योजना की शुरुआत की है। ग़रीबों-मज़दूरों की अच्छी-ख़ासी तादाद इस योजना की ओर ललचाई निगाहों से देख रही है। जनता समझ रही है कि शायद इस बार भाजपा सरकार और भाजपा नेता अपने वायदे सचमुच में निभाने वाले हैं। वैसे देखा जाये तो इसमें नया कुछ भी नहीं है। जनता इतने ही भोलेपन के साथ चुनावबाज़ पार्टियों के वायदों पर पिछले 68 सालों से यकीन करती चली आ रही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह चुनाव लड़ने वाली राजनीतिक पार्टियों के नारों के पीछे छिपे हुए शासक वर्ग के हितों को देखने-समझने में नाकाम रहती है।

मोदी सहित भाजपा के तमाम नेता धुआँधार तरीक़े से ‘कौशल विकास योजना’ का धुआँ छोड़ने में लगे हुए हैं। सरकार और नेता दोनों ही दावा कर रहे हैं कि वर्ष 2022 तक 45 से 50 करोड़ लोगों को न सिर्फ़ हुनर सिखाये जायेंगे बल्कि उन्हें रोज़गार भी दिया जायेगा। इन सरकारी दावों की सच्चाई समझने के लिए कुछ और तथ्यों को जान लेना ज़रूरी है। सरकार का कहना है कि सरकारी स्कूलों और आईटीआई संस्थानों को कम्पनियों द्वारा विभिन्न कोर्स चलाने के लिए दिया जायेगा, इस तरह ग़रीबों और निम्न मध्यवर्ग के बेटे-बेटियों को कुशल श्रमिक बनाने का रास्ता तैयार किया गया है। लेकिन चूँकि पहले से ही असंगठित क्षेत्र में करीब 44 करोड़ कामगार काम कर रहे हैं उनको कुशल श्रमिक बनाने के लिए अलग से एक विशेष योजना तैयार की गयी है, मोदी सरकार इन 44 करोड़ कामगारों को कारख़ानों में प्रशिक्षण देने वाली है और यहीं पर इस योजना का असली पेंच है। सवाल यह है कि जब इतने कारख़ाने हैं ही नहीं तब भला इतने बड़े-बड़े दावे क्यों किये जा रहे हैं! असल में यह कौशल विकास के नाम पर मज़दूरों को लूटने और पूँजीपतियों को सस्ता श्रम उपलब्ध कराने का हथकण्डा मात्र है। देश में एपेरेन्टिस एक्ट 1961 नाम का एक क़ानून है जिसके तहत चुनिन्दा उद्योगों में ट्रेनिंग की पहले से ही व्यवस्था मौजूद है। इस क़ानून के तहत कारख़ानों में काम करने वाले एपेरेन्टिस या ट्रेनी पहले से ही ज़्यादातर श्रम क़ानूनों के दायरे से बाहर हैं। सरकार के अनुसार इस समय देश में मात्र 23800 कारख़ाने ऐसे हैं जो एपेरेन्टिस एक्ट 1961 के अन्तर्गत आते हैं। सरकार की मंशा है कि अगले 5 सालों में इन कारख़ानों की संख्या बढ़ाकर 1 लाख कर दी जाये। ज़ाहिर सी बात है कि यह योजना केवल 5 साल के लिए नहीं है और इसका मक़सद है कि ट्रेनिंग या कौशल विकास के नाम पर ज़्यादा से ज़्यादा कारख़ानों को श्रम क़ानूनों और न्यूनतम वेतन के क़ानूनों के दायरे से बाहर कर दिया जाये।

कौशल विकास की इस योजना के दो पहलू हैं। एक का सम्बन्ध पूँजीपतियों से है और दूसरा मज़दूरों से जुड़ा है। इस समय पूँजीवाद भयानक मन्दी की दहलीज़ पर खड़ा है। इस मन्दी की मार से ग्रीस जैसा देश दिवालिया हो चुका है और बहुत से दिवालिया हो सकते हैं। भारत का रिज़र्व बैंक भी भारत के पूँजीपतियों को आने वाली मन्दी के विरुद्ध लगातार चेतावनी दे रहा है। एक तरफ़ पूँजी का अम्बार लगा हुआ है, लेकिन मुनाफ़े की गिरती हुई दरों के कारण पूँजीपति और बैंक उद्योगों में पैसा लगाने यानी नये उद्योग खोलने से बच रहे हैं। इन हालातों में मुनाफ़े की दर तभी बढ़ सकती है, जबकि श्रमशक्ति को सस्ता कर दिया जाये यानी मज़दूरियाँ घटायी जायें। अब सरकार सीधे-सीधे तो यह काम कर नहीं सकती, इसलिए कौशल विकास की झाँसापट्टी देकर इसे अंजाम दे रही है। ख़ुद पूँजीपतियों के संगठनों द्वारा जुटाये गये आँकडे़ कौशल विकास द्वारा बेरोज़गारी ख़त्म करने के दावों की पोल खोल देते हैं। उद्योगपतियों के संगठन एस्सोचेम ने बताया है कि उत्तर पूर्व के राज्यों में 20 लाख से अधिक लोग बेरोज़गार हैं, अगर वहाँ कारख़ाने लगाये जायें तो मात्र 1.5 लाख लोगों को ही रोज़गार मिल सकता है। उसी तरह तमिलनाडु का उदाहरण लें जो गुजरात के बाद देश का सबसे अधिक औद्योगिकीकृत राज्य है, लेकिन यहाँ भी कारख़ानों में काम करने वाले नियमित श्रमिकों की संख्या काफ़ी कम है और ज़्यादातर मज़दूर (66 प्रतिशत आबादी) कैजुअल लेबर का काम करती है।

इतने भर से साफ़ है कि कौशल विकास के नाम पर मज़दूरों की श्रमशक्ति की आखि़री बूँद तक निचोड़ लेने की और देशी-विदेशी पूँजीपतियों को अकूत मुनाफ़ा कमाने की छूट देने की पूरी तैयारी कर ली गयी है। हुनर सिखाने और रोज़गार देने के लोक लुभावन नारे का वर्ग सार यही है।

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2015


 

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