Category Archives: अर्थनीति : राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय

नया वित्त विधेयक : एक ख़तरनाक क़ानून

बुर्जुआ जनतन्त्र में जैसा प्रचार किया जाता है, सारी जनता के लिए जनतन्त्र वैसा होता नहीं। असल में तो यह मेहनतकश लोगों पर बुर्जुआ अधिनायकत्व है, सत्ताधारी पूँजीपति वर्ग द्वारा मज़दूर वर्ग के शोषण की व्यवस्था की हिफ़ाज़त का औज़ार है। यह पूँजीपति वर्ग की ज़रूरत के मुताबिक़ ही काम करता है – जब जनतन्त्र का नाटक करना हो तो वह किया जाता है; जब संकट की स्थिति में जनतन्त्र का नाटक छोड़कर मेहनतकश तबके पर फासीवाद का नग्न आक्रमण करना हो तो यही संवैधानिक व्यवस्था बिना किसी रुकावट के उसकी भी पूरी इजाज़त देती है।

बेरोज़गारी ख़त्म करने के दावों के बीच बढ़ती बेरोज़गारी!

अधिकांश प्रतिष्ठानों ने अपना मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए मज़दूरियों पर होने वाले ख़र्चों में बड़ी कटौतियाँ करने की योजनाएँ बनायी हैं और उत्पादन की आधुनिक तकनीकों का विकास उनके मनसूबों को पूरा करने में मदद पहुँचा रहा है। पूँजीवाद के आरम्भ से ही पूँजीपति वर्ग ने विज्ञान और तकनीकी पर अपनी इज़ारेदारी क़ायम कर ली थी। तब से लेकर आज तक उत्पादन की तकनीकों में होने वाले हर विकास ने पूँजीपतियों को पहले से अधिक ताक़तवर बनाया है और मज़दूरों का शोषण करने की उनकी ताक़त को कई गुना बढ़ा दिया है।

अर्थव्यवस्था की विकास दर बढ़ने के आँकड़े : जुमला सरकार का एक और झूठ

पि‍छले दिनों, चुनावों से ठीक पहले जुमला सरकार ने एक और फर्जी आँकड़ा जारी किया कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था की विकास दर और तेज हो गई! कॉर्पोरेट कारोबारी मीडिया में भी कोई इसको स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि दिसम्बर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7% की बढ़ोत्‍तरी हो गयी। सच तो यह है कि हर कंपनी के इस तिमाही के नतीजे बता रहे हैं बिक्री में कमी आयी, चाहे साबुन-तेल-चाय पत्ती हो या स्कूटर-मोटर साइकिल या पेंट – मगर सरकार कहती है निजी खपत 10% बढ़ गई है! शायद लोगों ने नोटबंदी के वक्त बैंकों की लाइनों में लगकर भारी खरीदारी की, पर बिक्री हुई नहीं। खेतों में खड़ी फसल आयी भी नहीं थी मगर आँकड़ों में खेती में पिछले महीने से वृद्धि और भी बढ़ गई, रिकॉर्ड उत्पादन होने वाला है। अगर ऐसा है तो फिर सरकार 25 लाख टन गेहूँ आयात क्यों कर रही है, वह भी महँगे दामों पर?

पूँजीपतियों की हड़ताल

ये महज चन्द उदाहरण नहीं है बल्कि हर पूँजीवादी देश में चलने वाली एक आम रिवायत है। पूँजीपति लगातार निवेश, नौकरियाँ, कर्ज़, माल और सेवाएँ – यानी वे संसाधन जिन पर समाज की निर्भरता है – रोककर सरकारों पर दबाव बनाते रहते हैं और लोगों की कीमत पर अपने मुनाफे़ के लिए काम करवाते हैं। उनके हथकण्डों में छँटनी करना, नौकरियाँ और पैसे दूसरे देशों में भेजना, कर्ज़ देने से इंकार करना या फिर ऐसा करने की धमकी देना शामिल होता है। इसके साथ ही यह वादा भी होता है कि जब सरकार उनके मनमाफ़ि‍क नीतिगत बदलाव कर देगी तो वे अपना रुख बदल लेंगे।

चुनावी पार्टि‍यों के फ़ण्ड से काले धन को सफ़ेद करने की स्कीम

ये आँकड़े सभी चुनावबाज़ पार्टि‍यों के ‘काले धन’ और ‘भ्रष्टाचार’ की लड़ाई की पोल खोल देते हैं। असल में आज चुनावी पार्टि‍याँ ही काले धन को सफ़ेद बनाने के कारोबार में एक नायाब तरीक़़ा है। इससे एक तीर से दो नि‍शाने सध जाते हैं। एक ओर काला धन सफ़ेद हो जाता है, दूसरी ओर पूँजीपति‍ घराने अपना निवेश बेहद समझदारी से करते हैं ताकि‍ हर पाँच साल में होने वाले चुनाव में चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में आये वो नीतियाँ अपने आका पूँजीपति‍ घरानों के लि‍ए ही बनाये। ऐसे में जब भी चुनावी पार्टि‍यों के ‘काले धन’ ‘पारदर्शि‍ता’ की बात आती है तो ये तमाम चोर-चोर मौसेरे भाई एक हो जाते हैं, यह एकता दरअसल इनकी वर्ग प्रतिबद्धता के कारण है, मतलब यह कि ये सभी चुनावबाज़ पार्टियाँ मज़दूर-ग़रीब कि‍सान वि‍रोधी नीति‍ बनाने से लेकर पूँजीपति‍यों को क़ुदरती सम्पदा और मानवीय श्रम लूटाने में एक हैं।

बजट और आर्थिक सर्वेक्षण: अर्थव्यवस्था की ख़स्ता हालत को झूठों से छिपाने और ग़रीबों की क़ीमत पर थैलीशाहों को फ़ायदा पहुँचाने का खेल

अनौपचारिक क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 45% है और औपचारिक क्षेत्र से अपनी कम लागत की वजह से प्रतियोगिता में बाज़ार के एक बड़े हिस्से पर छाया हुआ है। अभी इन सारे प्रावधानों-उपायों से इसे औपचारिक की ओर धकेला जा रहा है जहाँ कम लागत का फ़ायदा समाप्त हो जाने से यह बड़ी कॉर्पोरेट पूँजी के सामने नहीं टिक पायेगा। इससे बड़ी संख्या में श्रमिक बेरोज़गार होंगे, छोटे काम-धन्धों में लगे कारोबारी और छोटे किसान बरबाद हो जायेंगे। लेकिन अर्थव्यवस्था में ज़्यादा विकास-विस्तार न होने पर भी मौजूदा बाज़ार में ही इस बड़ी कॉर्पोरेट पूँजी और उसके कार्टेलों का एकाधिकार, और नतीजतन मुनाफ़ा बढ़ेगा। इसलिए इसके प्रवक्ता कॉर्पोरेट मीडिया और आर्थिक विशेषज्ञ बजट की तारीफ़ों के पुल बाँधने में लगे हैं।

मोदी मण्डली के जन-कल्याण के हवाई दावे बनाम दौलत के असमान बँटवारे में तेज़ वृद्धि

सन् 2014 से 2016 तक ऊपर की 1 प्रतिशत आबादी के पास भारत में कुल दौलत में हिस्सा 49 प्रतिशत से 58.4 प्रतिशत हो गया है। इस तरह ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी की दौलत में भी वृद्धि हुई है। रिपोर्ट मुताबिक़ 80.7 प्रतिशत दौलत की मालिक यह ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी सन् 2010 में 68.8 प्रतिशत की मालिक थी। यह आबादी भी मोदी सरकार के समय में और भी तेज़ी से माला-माल हुई है।

बिल गेट्स की चैरिटी – आम लोगों का स्वास्थ्य ख़राब करके कमाई करने का एक और तरीक़ा

इस फ़ाउण्डेशन द्वारा समय-समय पर नये-नये टीके (vaccine) अलग-अलग बीमारियों के लिए, प्राइवेट कम्पनियों से बनवाये जाते हैं जैसे कि पोलियो के लिए (oral vaccine) काली खाँसी के लिए, निमोनिया के लिए, बच्चेदानी के कैंसर के लिए आदि और फिर इसका इस्तेमाल करने के लिए प्रचार चलाया जाता है। इसके लिए देश के नामी चेहरों को पैसे देकर ख़रीदा जाता है और तथाकथित मानवता की भलाई का डंका हर टीवी चैनल पर पीटा जाता है। पोलियो बूँदों के प्रचार के दौरान अमिताभ बच्चन ने अपनी अदाकारी के जोहर दिखाते हुए इस मुहिम काे सहयोग किया। बिल गेट्स की इस मानवता की भलाई वाली भावना का दूसरा हिस्सा भी है, जो छुपा लिया जाता है। यह दूसरा हिस्सा सिद्ध करता है कि यह भलाई आम लोगों के लिए असल में कैसे दुख और मौत लेकर आती है।

नोटबन्दी को लेकर सारे सरकारी दावे झूठे: जनता की मेहनत की कमाई पर डाका

पहले से ही वंचित शोषित मेहनतकश जनता को ही नोटबन्दी के इस क़दम का सबसे ज़्यादा बोझ उठाना पड़ रहा है जबकि असली काले धन वाले अपनी कमाई को न सिर्फ़ खपाने में सफल हुए हैं बल्कि उनको अगर कहीं कुछ नुक़सान हो भी गया हो तो उसके मुआवज़े का भी इन्तज़ाम सरकार इस बजट में कर देगी – कॉर्पोरेट और इनकम टैक्स में कमी करके- जिसका फ़ायदा सिर्फ़ शीर्ष 5% लोगों को होगा जबकि उसकी भरपाई के लिए बढ़ाये जाने वाले अप्रत्यक्ष करों का बोझ बहुसंख्य मेहनतकश जनता को ही उठाना पड़ेगा। इसलिए ये लोग नोटबन्दी को ग़लत नहीं कहते, क्योंकि इन तबक़ों को तो असल में ही ‘थोड़ी असुविधा’ के बाद इससे फ़ायदा होने वाला है।

नोटबन्दी और बैंकों के ‘‘बुरे क़र्ज़’’

काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक का हवाला देकर सरकार की असली मंशा काला धन पर हमला नहीं बल्कि पूँजीपतियों की सेवा करना है। यहाँ एक और तथ्य का जि़क्र करते हुए चलें। नोटबन्दी के फै़सले के बाद बैंकों ने ब्याज़ दरें घटा दी हैं। इससे ज़ाहिरा तौर पर जनता को तो कोई लाभ नहीं होगा पर 7.3 लाख करोड़ का क़र्ज़ दबाये बैठे 10 बड़े ऋणग्रस्त कॉरपोरेट घरानों के लिए तो यह क़दम सोने पर सुहागा होने जैसा है। भई साफ़़ है, यह जनता नहीं पूँजीपतियों की सरकार है।