Category Archives: अर्थनीति : राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय

जीएसटी : कॉरपोरेट पे करम, जनता पे सितम का एक और औज़ार

इस समाज में कोई भी नीति ऐसी नहीं हो सकती जो सब वर्गों के लिए समान हितकारी हो और हर नीति का विश्लेषण इस आधार पर होना चाहिए कि इसका फ़ायदा किस तबक़े को होगा, नुक़सान किस तबक़े को। ऐसे वर्ग विभाजित, ग़ैर-बराबरी और शोषण पर आधारित समाज में प्रत्येक नीति का विभिन्न वर्गों की जि़न्दगी पर असर समझे बग़ैर की गयी कोई भी चर्चा निरर्थक या गुमराह करने वाली है। इस दृष्टिकोण से इसके कुछ अहम बिन्दुओं की चर्चा ज़रूरी है।

बेहिसाब बढ़ती महँगाई यानी ग़रीबों के ख़िलाफ सरकार का लुटेरा युद्ध

मेहनतकश जनता की मज़दूरी में लगातार आ रही गिरावट के कारण उसकी खरीदने की शक्ति कम होती जा रही है। दिहाड़ी पर काम करने वाली लगभग 50 करोड़ आबादी आज से 10 साल पहले जितना कमाती थी आज भी बमुश्किल उतना ही कमा पाती है जबकि कीमतें दोगुनी-तीन गुनी हो चुकी हैं। इससे ज़्यादा मानवद्रोही बात और क्या हो सकती है कि जिस देश में आज भी करोड़ों बच्चे रोज़ रात को भूखे सोते हैं वहाँ 35 से 40 प्रतिशत अनाज गोदामों और रखरखाव की कमी के कारण सड़ जाता है। एक्सप्रेस-वे, अत्याधुनिक हवाईअड्डों, स्टेडियमों आदि पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करने वाली सरकारें आज तक इतने गोदाम नहीं बनवा सकीं कि लोगों का पेट भरने के लिए अनाज को सड़ने से बचाया जा सके।

अफ्रीका में ‘आतंकवाद के ख़ि‍लाफ़ युद्ध’ की आड़ में प्राकृतिक ख़ज़ानों को हड़पने की साम्राज्यवादी मुहिम

पूँजीवाद के उभार के दौर में इस महाद्वीप की भोली-भाली मेहनतकश जनता को ग़ुलाम बना कर पशुओं की तरह समुद्री जहाज़ों में लाद कर यूरोप और अमेरिका की मण्डियों में बेचा जाता था। अमेरिकी इतिहासकार एस.के. पैडोवर लिखते हैं कि मशीनरी और क्रेडिट आदि की तरह ही सीधी ग़ुलामी हमारे औद्योगीकरण की धुरी है। ग़ुलामी के बिना आपके पास कपास और कपास के बिना आपका आधुनिक उद्योग नहीं खड़ा हो सकता। ग़ुलामी व्‍यवस्‍था ने ही उपनिवेशों को सम्‍भव बनाया, और उपनिवेशों ने जिन्होंने विश्व व्यापार को जन्म दिया। विश्व व्यापार बड़े स्तर के मशीनी उद्योग की ज़रूरत है। मज़दूर वर्ग के शिक्षक कार्ल मार्क्स ने भी, अफ्रीका की मेहनतकश जनता को ग़ुलाम बनाकर, पूँजीवादी उद्योग में, स्थिर मानवीय पूँजी के तौर पर उपयोग करने का अमानवीय कारनामों का ज़िक्र किया है।

मोदी की नोटबन्दी ने छीने लाखों मज़दूरों से रोज़गार

नरेन्द्र मोदी ने तो प्रत्येक वर्ष दो करोड़ लोगों को रोज़गार देने का वादा कर दिया। लेकिने ये दो करोड़ रोज़गार तो क्या पैदा होने थे, नोटबन्दी द्वारा लाखों मज़दूरों का रोज़गार छीन लिया गया। इस तरह नोटबन्दी से बेरोज़गारी की समस्या और अधिक भयानक बन गयी। वैसे तो नोटबन्दी के दौरान यह साफ़ दिख ही रहा था कि मज़दूरों की नौकरियाँ छिन रही हैं। ख़ासकर दिहाड़ी पर काम करने वाले या कच्चे मज़दूरों के रोज़गार छिनना सबके सामने था। लेकिन मोदी सरकार द्वारा नोटबन्दी के नुक़सानों को बेशर्मी से झुठलाया जा रहा था। मोदी सरकार की पोल इसके श्रम मन्त्रालय के लेबर ब्यूरो द्वारा जारी इस रिपोर्ट ने ही खोल दी है।

किसकी सेवा में जुटे हैं प्रधान सेवक महोदय!

वोडाफ़ोन पर ब्याज़/पेनाल्टी समेत 30 हज़ार करोड़ का इनकम टैक्स बकाया है| 2014 तक उसके वकील अरुण जेटली होते थे, सुप्रीम कोर्ट से फैसला भी करा लिया था कि टैक्स बनता ही नहीं| मगर मामला ख़त्म नहीं हो पाया था क्योंकि प्रणब मुखर्जी के समय में पिछली तारीख से कानून बदल दिया गया था|

भारतीय अर्थव्यवस्था का गहराता संकट और झूठे मुद्दों का बढ़ता शोर

भविष्य के ‘‘अनिष्ट संकेतों’’ को भाँपकर मोदी सरकार अभी से पुलिस तंत्र, अर्द्धसैनिक बलों और गुप्तचर तंत्र को चाक-चौबन्द बनाने पर सबसे अधिक बल दे रही है। मोदी के अच्छे दिनों के वायदे का बैलून जैसे-जैसे पिचककर नीचे उतरता जा रहा है, वैसे-वैसे हिन्दुत्व की राजनीति और साम्प्रदायिक तनाव एवं दंगों का उन्मादी खेल जोर पकड़ता जा रहा है ताकि जन एकजुटता तोड़ी जा सके। अन्‍धराष्ट्रवादी जुनून पैदा करने पर भी पूरा जोर है। पाकिस्तान के साथ सीमित या व्यापक सीमा संघर्ष भी हो सकता है क्योंकि जनाक्रोश से आतंकित दोनों ही देशों के संकटग्रस्त शासक वर्गों को इससे राहत मिलेगी।

बेहिसाब बढ़ती छँटनी और बेरोज़गारी

छँटनी और बेरोज़गारी इस वक़्त पूरे देश की आम मेहनतकश जनता के लिए एक भारी चिन्ता का विषय है। 2014 के चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता नरेन्द्र मोदी ने पिछली सरकार की रोज़गार सृजन न कर पाने के लिए तीव्र आलोचना की थी और इसे अपना मुख्य लक्ष्य बताते हुए प्रति वर्ष करोड़ों नयी नौकरियाँ देने का वादा किया था। लेकिन वस्तुस्थिति इसके ठीक उलट है। 2015-16 के आर्थिक सर्वे में कहा गया कि 2011-12 में बेरोज़गारी 3.8% थी, जो 2015-16 में बढ़कर 5% हो गयी। वैसे यह संख्या और भी ज़्यादा है क्योंकि किसी भी काम में साल के कुछ भी दिन लगे व्यक्तियों को इसमें बेरोज़गार नहीं गिना जाता।

बैंक कानून में संशोधन अध्यादेश : हज़ारों करोड़ कर्ज़ लेकर डकार जाने वालों की भरपाई का बोझ उठाने के लिए जनता तैयार रहे

2001-02 के समय में जो आर्थिक संकट का दौर था उसमें पूँजीवादी देशों के केन्द्रीय बैंकों द्वारा ब्याज़ दरों को कम कर पूँजीपतियों को राहत देने की नीति अपनायी गयी थी जिसे सस्ती मुद्रा नीति भी कहा जाता है। इससे जो सस्ता धन क़र्ज़ के रूप में उपलब्ध हुआ उससे ज़मीन-मकान और शेयर-बाण्ड्स जैसी वित्तीय सम्पत्तियों के दामों में भारी वृद्धि द्वारा एक नक़ली सम्पन्नता का माहौल बनाया गया जिससे कुछ समय तक बाज़ार में माँग बढ़ी ख़ास तौर पर किश्तों पर ख़रीदारी द्वारा। पूँजीपतियों को भी ख़ूब सस्ता क़र्ज़ निवेश के लिए मिला और उन्होंने उत्पादक क्षमता में निवेश भी किया। लेकिन कुछ साल बाद ही इससे पैदा हुए तीव्र आर्थिक संकट ने इस माँग को चौपट कर दिया। अभी रिज़र्व बैंक के अनुसार भारतीय उद्योग स्थापित क्षमता के 68-70% पर ही काम कर पा रहे हैं। इसलिए कुछ उद्योगों का दिवालिया होना इसका स्वाभाविक नतीजा है। यही बैंकों के क़र्ज़ों को संकट में डाल रहा है।

क्या छँटनी/बेरोज़गारी की वज़ह ऑटोमेशन है?

19वीं सदी से शुरू हुए श्रमिक संघर्षों ने 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन के सिद्धांत को स्थापित किया था। लेकिन आज भी स्थिति है कि अधिकांश कामगार इससे बहुत ज़्यादा, 12-14 घंटे तक भी काम करने के लिए मजबूर हैं; खुद को मज़दूर न मानने वाले सफ़ेद कॉलर वाले बैंक, आईटी, प्रबंधन, आदि वाले तो सबसे ज्यादा! फिर श्रमिक फालतू कैसे हो गए, जैसा कि कहा जा रहा है कि आगे काम ही नहीं रहेगा?

मज़दूर विरोधी आर्थिक सुधारों के खि़लाफ़ ब्राज़ील के करोड़ों मज़दूर सड़कों पर उतरे

28 अप्रैल 2017 को ब्राज़ील में इस देश की अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल हुई है। सभी 26 राज्यों और फे़डर्ल जि़ले में हुई हड़ताल में साढ़े तीन करोड़ मज़दूरों ने हिस्सा लिया है। अगले दिनों में भी ज़ोरदार प्रदर्शन हुए हैं। मई दिवस पर बड़े आयोजन किये गये हैं। इन प्रदर्शनों में अनेकों जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों में तीखी झड़पें हुई हैं। पुलिस ने जगह-जगह प्रदर्शनों को रोकने के लिए पूरा ज़ोर लगाया, लेकिन अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरे मज़दूरों के सामने पुलिस की एक न चली। गोलीबारी, आँसू गैस, गिरफ़्तारियाँ, बैरीकेड – पुलिस ने मज़दूरों को रोकने के लिए बहुत कुछ अाज़माया, लेकिन मज़दूरों का सैलाब रोके कहाँ रुकता था। सड़कें जाम कर दी गयीं। पुलिस के बैरीकेड तोड़ फेंके गये। गाँवों में ट्रैक्टरों से गलियाँ बन्द कर दी गयीं। ‘‘भूतों’’ से पीछा छुड़ाते हुए टेमेर जिस नये घर में आया है, वहाँ ज़ोरदार प्रदर्शन हुआ। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश की तो ज़बरदस्त पथराव के ज़रिये जवाब दिया गया।