Category Archives: अर्थनीति : राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय

अर्थव्यवस्था चकाचक है तो लाखों इंजीनियर नौकरी से निकाले क्यों जा रहे हैं?

पिछले कुछ महीनों में देश की सबसे बड़ी 7 आईटी कम्पनियों से हज़ारों इंजीनियरों और मैनेजरों को निकाला जा चुका है। प्रसिद्ध मैनेजमेंट कन्सल्टेंट कम्पनी मैकिन्सी ‍की रिपोर्ट के अनुसार अगले 3 सालों में हर साल देश के 2 लाख साफ्टवेयर इंजीनियरों को नौकरी से निकाला जायेगा। यानी 3 साल में 6 लाख। ऐसा भी नहीं है कि केवल आईटी कम्पनियों से ही लोग निकाले जा रहे हैं। सबसे बड़ी इंजीनियरिंग कम्पनियों में से एक लार्सेन एंड टुब्रो (एल एंड टी) ने भी पिछले महीने एक झटके में अपने 14,000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। ये तो बड़ी और नामचीन कम्पनियों की बात है, लेकिन छोटी-छोटी कम्पनियों से भी लोगों को निकाला जा रहा है। आईटी सेक्टर की कम्पनियों की विकास दर में भयंकर गिरावट है। जिन्होंने 20 प्रतिशत का लक्ष्य रखा था उनके लिए 10 प्रतिशत तक पहुँचना भी मुश्किल होता जा रहा है। अर्थव्यवस्था की मन्दी कम होने का नाम नहीं ले रही है और नये रोज़गार पैदा होने की दर पिछले एक दशक में सबसे कम पर पहुँच चुकी है।

रेलवे का किश्तों में और गुपचुप निजीकरण जारी

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र की भाजपा सरकार ने भारतीय रेल के निजीकरण का मन बना लिया है और क्रमिक ढंग से यह सिलसिला चालू भी कर दिया है। अभी हाल ही में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लगे जुड़वा शहर हबीबगंज का रेल स्टेशन म.प्र. की निजी कम्पनी बंसल पाथवे के हवाले कर दिया गया है। यह कम्पनी न सिर्फ़ इस स्टेशन का संचालन करेगी बल्कि रेलगाड़ियों के आवागमन का भी नियन्त्रण करेगी। जुलाई 2016 में कम्पनी के साथ किये गये क़रार के अन्तर्गत कम्पनी हवाई अड्डों के तर्ज पर रेलवे स्टेशन की इमारत का निर्माण करेगी और स्टेशन की पार्किंग, खान-पान सब उसके अधीन होगा और उससे होने वाली आमदनी भी उसकी होगी।

क्या रेलवे में दो लाख से ज़्यादा नौकरियाँ कम कर दी गयी हैं…

2017 की यूपीएससी की परीक्षा के लिए 980 पद तय हुए हैं। पिछले पाँच साल में यह सबसे कम है। बाक़ी आप क़ब्रिस्तान और श्मशान के मसले को लेकर बहस कर लीजिए। इसी को ईमानदारी से कर लीजिए। लोग अब नालों के किनारे अन्तिम संस्कार करने लगे हैं। ज़्यादा दूर नहीं, दिल्ली से सिर्फ़ बीस किमी आगे लखनऊ रोड पर। बोलिए कि इसके विकल्प में कोई सरकार क्या करने वाली है। क़ब्रिस्तानों पर भूमाफि़याओं के क़ब्ज़े हैं। ये माफि़या हिन्दू भी हैं और मुस्लिम भी हैं। बताइए कि क्या ये ज़मीनें मुक्त हो पायेंगी। लेकिन इसमें ज़्यादा मत उलझिए। नौकरी के सवाल पर टिके रहिए। मर गये तो कौन कैसे फूँकेंगे या गाड़ेगा यह कैसे पता चलेगा और जानकर करना क्या है। हम और आप तो जा चुके होंगे।

नया वित्त विधेयक : एक ख़तरनाक क़ानून

बुर्जुआ जनतन्त्र में जैसा प्रचार किया जाता है, सारी जनता के लिए जनतन्त्र वैसा होता नहीं। असल में तो यह मेहनतकश लोगों पर बुर्जुआ अधिनायकत्व है, सत्ताधारी पूँजीपति वर्ग द्वारा मज़दूर वर्ग के शोषण की व्यवस्था की हिफ़ाज़त का औज़ार है। यह पूँजीपति वर्ग की ज़रूरत के मुताबिक़ ही काम करता है – जब जनतन्त्र का नाटक करना हो तो वह किया जाता है; जब संकट की स्थिति में जनतन्त्र का नाटक छोड़कर मेहनतकश तबके पर फासीवाद का नग्न आक्रमण करना हो तो यही संवैधानिक व्यवस्था बिना किसी रुकावट के उसकी भी पूरी इजाज़त देती है।

बेरोज़गारी ख़त्म करने के दावों के बीच बढ़ती बेरोज़गारी!

अधिकांश प्रतिष्ठानों ने अपना मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए मज़दूरियों पर होने वाले ख़र्चों में बड़ी कटौतियाँ करने की योजनाएँ बनायी हैं और उत्पादन की आधुनिक तकनीकों का विकास उनके मनसूबों को पूरा करने में मदद पहुँचा रहा है। पूँजीवाद के आरम्भ से ही पूँजीपति वर्ग ने विज्ञान और तकनीकी पर अपनी इज़ारेदारी क़ायम कर ली थी। तब से लेकर आज तक उत्पादन की तकनीकों में होने वाले हर विकास ने पूँजीपतियों को पहले से अधिक ताक़तवर बनाया है और मज़दूरों का शोषण करने की उनकी ताक़त को कई गुना बढ़ा दिया है।

अर्थव्यवस्था की विकास दर बढ़ने के आँकड़े : जुमला सरकार का एक और झूठ

पि‍छले दिनों, चुनावों से ठीक पहले जुमला सरकार ने एक और फर्जी आँकड़ा जारी किया कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था की विकास दर और तेज हो गई! कॉर्पोरेट कारोबारी मीडिया में भी कोई इसको स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि दिसम्बर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7% की बढ़ोत्‍तरी हो गयी। सच तो यह है कि हर कंपनी के इस तिमाही के नतीजे बता रहे हैं बिक्री में कमी आयी, चाहे साबुन-तेल-चाय पत्ती हो या स्कूटर-मोटर साइकिल या पेंट – मगर सरकार कहती है निजी खपत 10% बढ़ गई है! शायद लोगों ने नोटबंदी के वक्त बैंकों की लाइनों में लगकर भारी खरीदारी की, पर बिक्री हुई नहीं। खेतों में खड़ी फसल आयी भी नहीं थी मगर आँकड़ों में खेती में पिछले महीने से वृद्धि और भी बढ़ गई, रिकॉर्ड उत्पादन होने वाला है। अगर ऐसा है तो फिर सरकार 25 लाख टन गेहूँ आयात क्यों कर रही है, वह भी महँगे दामों पर?

पूँजीपतियों की हड़ताल

ये महज चन्द उदाहरण नहीं है बल्कि हर पूँजीवादी देश में चलने वाली एक आम रिवायत है। पूँजीपति लगातार निवेश, नौकरियाँ, कर्ज़, माल और सेवाएँ – यानी वे संसाधन जिन पर समाज की निर्भरता है – रोककर सरकारों पर दबाव बनाते रहते हैं और लोगों की कीमत पर अपने मुनाफे़ के लिए काम करवाते हैं। उनके हथकण्डों में छँटनी करना, नौकरियाँ और पैसे दूसरे देशों में भेजना, कर्ज़ देने से इंकार करना या फिर ऐसा करने की धमकी देना शामिल होता है। इसके साथ ही यह वादा भी होता है कि जब सरकार उनके मनमाफ़ि‍क नीतिगत बदलाव कर देगी तो वे अपना रुख बदल लेंगे।

चुनावी पार्टि‍यों के फ़ण्ड से काले धन को सफ़ेद करने की स्कीम

ये आँकड़े सभी चुनावबाज़ पार्टि‍यों के ‘काले धन’ और ‘भ्रष्टाचार’ की लड़ाई की पोल खोल देते हैं। असल में आज चुनावी पार्टि‍याँ ही काले धन को सफ़ेद बनाने के कारोबार में एक नायाब तरीक़़ा है। इससे एक तीर से दो नि‍शाने सध जाते हैं। एक ओर काला धन सफ़ेद हो जाता है, दूसरी ओर पूँजीपति‍ घराने अपना निवेश बेहद समझदारी से करते हैं ताकि‍ हर पाँच साल में होने वाले चुनाव में चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में आये वो नीतियाँ अपने आका पूँजीपति‍ घरानों के लि‍ए ही बनाये। ऐसे में जब भी चुनावी पार्टि‍यों के ‘काले धन’ ‘पारदर्शि‍ता’ की बात आती है तो ये तमाम चोर-चोर मौसेरे भाई एक हो जाते हैं, यह एकता दरअसल इनकी वर्ग प्रतिबद्धता के कारण है, मतलब यह कि ये सभी चुनावबाज़ पार्टियाँ मज़दूर-ग़रीब कि‍सान वि‍रोधी नीति‍ बनाने से लेकर पूँजीपति‍यों को क़ुदरती सम्पदा और मानवीय श्रम लूटाने में एक हैं।

बजट और आर्थिक सर्वेक्षण: अर्थव्यवस्था की ख़स्ता हालत को झूठों से छिपाने और ग़रीबों की क़ीमत पर थैलीशाहों को फ़ायदा पहुँचाने का खेल

अनौपचारिक क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 45% है और औपचारिक क्षेत्र से अपनी कम लागत की वजह से प्रतियोगिता में बाज़ार के एक बड़े हिस्से पर छाया हुआ है। अभी इन सारे प्रावधानों-उपायों से इसे औपचारिक की ओर धकेला जा रहा है जहाँ कम लागत का फ़ायदा समाप्त हो जाने से यह बड़ी कॉर्पोरेट पूँजी के सामने नहीं टिक पायेगा। इससे बड़ी संख्या में श्रमिक बेरोज़गार होंगे, छोटे काम-धन्धों में लगे कारोबारी और छोटे किसान बरबाद हो जायेंगे। लेकिन अर्थव्यवस्था में ज़्यादा विकास-विस्तार न होने पर भी मौजूदा बाज़ार में ही इस बड़ी कॉर्पोरेट पूँजी और उसके कार्टेलों का एकाधिकार, और नतीजतन मुनाफ़ा बढ़ेगा। इसलिए इसके प्रवक्ता कॉर्पोरेट मीडिया और आर्थिक विशेषज्ञ बजट की तारीफ़ों के पुल बाँधने में लगे हैं।

मोदी मण्डली के जन-कल्याण के हवाई दावे बनाम दौलत के असमान बँटवारे में तेज़ वृद्धि

सन् 2014 से 2016 तक ऊपर की 1 प्रतिशत आबादी के पास भारत में कुल दौलत में हिस्सा 49 प्रतिशत से 58.4 प्रतिशत हो गया है। इस तरह ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी की दौलत में भी वृद्धि हुई है। रिपोर्ट मुताबिक़ 80.7 प्रतिशत दौलत की मालिक यह ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी सन् 2010 में 68.8 प्रतिशत की मालिक थी। यह आबादी भी मोदी सरकार के समय में और भी तेज़ी से माला-माल हुई है।