पाँच राज्यों के विधान सभा चुनावों के नतीजों से फ़ासीवाद का विस्तार स्पष्ट: मज़दूर वर्ग के लिए इसके मायने क्या हैं?
पाँच राज्यों के इन चुनावी नतीजों से कुल मिलाकर जो तस्वीर उभरती है वह निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए चिन्ता का सबब है। फ़ासीवादी दानव की बढ़ती ताक़त और देश के नए हिस्सों में उसका पैर पसारना निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए एक बुरी ख़बर है क्योंकि इसमें कोई दो राय नहीं कि फ़ासीवादी भाजपा मज़दूरों की दुश्मन नंबर वन है। परन्तु ऐसे में बदहवास होकर किसी ग़ैर-फ़ासीवादी पार्टी का पिछलग्गू बनने से मज़दूरों की समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला और न ही इससे फ़ासीवादियों को निर्णायक शिकस्त मिलने वाली है। आज ज़रूरत योजनाबद्ध ढंग से मज़दूर वर्ग के बीच क्रान्तिकारी विचारों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार करने की है और फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष को पूँजीवाद-विरोधी संघर्ष के अभिन्न अंग के रूप में आगे बढ़ाने की है।























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