Category Archives: फ़ासीवाद / साम्‍प्रदायिकता

पाँच राज्‍यों के विधान सभा चुनावों के नतीजों से फ़ासीवाद का विस्‍तार स्‍पष्‍ट: मज़दूर वर्ग के लिए इसके मायने क्‍या हैं?

पाँच राज्‍यों के इन चुनावी नतीजों से कुल मिलाकर जो तस्‍वीर उभरती है वह निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए चिन्‍ता का सबब है। फ़ासीवादी दानव की बढ़ती ताक़त और देश के नए हिस्‍सों में उसका पैर पसारना निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए एक बुरी ख़बर है क्‍योंकि इसमें कोई दो राय नहीं कि फ़ासीवादी भाजपा मज़दूरों की दुश्‍मन नंबर वन है। परन्‍तु ऐसे में बदहवास होकर किसी ग़ैर-फ़ासीवादी पार्टी का पिछलग्‍गू बनने से मज़दूरों की समस्‍याओं का समाधान नहीं होने वाला और न ही इससे फ़ासीवादियों को निर्णायक शिकस्‍त मिलने वाली है। आज ज़रूरत योजनाबद्ध ढंग से मज़दूर वर्ग के बीच क्रान्तिकारी विचारों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार करने की है और फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष को पूँजीवाद-विरोधी संघर्ष के अभ‍िन्‍न अंग के रूप में आगे बढ़ाने की है।

भाजपा और आरएसएस के झूठे प्रचार से सावधान!!

‘ऑपइण्डिया’ ने मज़दूर बिगुल के ख़िलाफ़ एक झूठा प्रचार करते हुए वीडियो पोस्ट किया जिसमें ‘ऑपइण्डिया’ यह दावा कर रहा है कि मज़दूर बिगुल ने हिंसा करवायी या हिंसा करने के लिए कहा। ‘ऑपइण्डिया’ के ग़लत इरादे से किये गये इस झूठे प्रचार के ख़िलाफ़ मज़दूर बिगुल ने उन्हें एक क़ानूनी नोटिस भेजा है और आगे की सख़्त क़ानूनी कार्यवाई कर रहा है।

मोदी सरकार का “सरेण्डर” और भारतीय शासक वर्ग का चरित्र

हालिया समय में मोदी सरकार की विदेश नीति के कुछ फ़ैसलों और रुख़ के चलते विपक्षी दलों ने नरेन्द्र मोदी के अमेरिका और इज़रायल के आगे “सरेण्डर” पर तीखी टिप्पणी की है। केजरीवाल ने तो मोदी को ट्रम्प का ग़ुलाम भी बता दिया। इस रवैये पर भारत के क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट खेमे की तरफ़ से भी अलग-अलग समझदारी पेश की गयी है। मोदी सरकार की “नतमस्तक” प्रतीत होती विदेश नीति जिस लघुकालिक सन्धि-बिन्दु और जिन आकस्मिक कारणों से पैदा हुई है उसका ठोस विश्लेषण करने की जगह नवजनवादी क्रान्ति के फ्रेमवर्क में फँसे कम्युनिस्टों ने इसे भारतीय पूँजीपति वर्ग के दलाल चरित्र का सत्यापन बता दिया है। यह सच है कि मोदी सरकार का हालिया दिनों में रुख़ 2014 के कार्यकाल से अपनाये गये आम रुख़ से अलग रहा है। मसलन अमेरिका के साथ व्यापारिक सौदा कर मोदी सरकार ने रूस से तेल ख़रीदना बन्द कर दिया। अमेरिका के राष्ट्रपति और उसके सेक्रेटरी द्वारा अमेरिका के साथ व्यापार सौदे पर भारत को “इजाज़त” देना या ट्रम्प का यह कहना कि उसने भारत को “अल्टीमेटम” दिया आदि बयानों को मोदी सरकार के अमेरिका के आगे “नतमस्तक” होने के उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है। मोदी सरकार ईरान पर इज़रायल और अमेरिका द्वारा हाल ही में थोपे गये साम्राज्यवादी युद्ध पर चुप रही और खामनेई की हत्या पर भी मोदी सरकार ने तत्काल कोई बयान जारी नहीं किया और इसपर भी चुप्पी साध ली। आइए, मोदी सरकार के इस बदले हुए रुख़ के आधार पर नवजनवादी क्रान्ति फ्रेमवर्क के पैरोकार कम्युनिस्टों द्वारा भारतीय शासक वर्ग को दलाल कहे जाने की बात की जाँच-पड़ताल करते हैं।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था और विज्ञान के विकास की पोल खुल गयी एआई समिट और गलगोटिया यूनिवर्सिटी प्रकरण में

ऐसा नहीं है कि यह विज्ञान और तर्कणा विरोधी बातें बस बयानबाज़ी तक सीमित हैं। सरकार द्वारा सांस्थानिक रूप से छद्म विज्ञान को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश की जा रही है। सरकार द्वारा शिक्षा को लेकर लायी गयी तमाम नितियाँ और उठाये गये सारे क़दम यह साफ़-साफ़ बताते हैं कि कैसे योजनाबद्ध तरीक़े से शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है और इसे बर्बाद किया जा रहा है। छात्रों के तर्क करने की शक्ति पर हमला किया जा रहा है, उनकी आलोचनात्मक क्षमता को बाधित करके उसे सचेतन तौर कुन्द किया जा रहा है, वे सरकार की किसी भी नीति या बात पर सवाल न खड़ा करें, बस चुपचाप अनुशासित होकर फ़ासीवादी सरकार के हुक्म की तामील करें इसके लिए ही उन्हें अवैज्ञानिक और अतार्किक बनाने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है ताकि उन्हें आसानी से फ़ासीवादी उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनाया जा सके। पाठ्यक्रम से उद्भव के सिद्धान्त, पीरियॉडिक टेबल आदि विषयों का हटाया जाना, इतिहास का मिथ्याकरण करना आदि इसी दूरगामी फ़ासीवादी परियोजना के परिणाम हैं।

साम्प्रदायिक जुनून का मुकाबला करते हुए शहीद होने वाले महान क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के शहादत दिवस (25 मार्च) के अवसर पर

देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निस्सन्देह, अत्यन्त बुरा था, जिस दिन स्वाधीनता के क्षेत्र में ख़िलाफ़त, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचार्यों को स्थान देना आवश्यक समझा गया। एक प्रकार से उस दिन हमने स्वाधीनता के क्षेत्र में एक कदम पीछे हटकर रखा था। हमें अपने उसी पाप का फल भोगना पड़ रहा है। देश की स्वाधीनता के संग्राम ही ने मौलाना अब्दुल बारी और शंकराचार्य को देश के सामने दूसरे रूप में पेश कर उन्हें अधिक शक्तिशाली बना दिया और हमारे इस काम का फल यह हुआ कि इस समय हमारे हाथों ही से बढ़ायी इनकी और इनके जैसे लोगों की शक्तियाँ हमारी जड़ उखाड़ने और देश में मजहबी पागलपन, प्रपंच और उत्पात का राज्य स्थापित कर रही हैं।

फ़ासीवादियों और ज़ायनवादियों की प्रगाढ़ होती एकता!

नरेन्द्र मोदी द्वारा इज़रायल की यह दो-दिवसीय यात्रा एक ऐसे समय में हुई है जब जेफ़री एपस्टीन जैसे पतित व्यक्ति के साथ भाजपा के नेताओं-मंत्रियों और अम्बानी जैसे पूँजीपतियों की संलिप्तता का मामला सामने आया था। जेफ़री एप्सटीन एक गलीज़ नरभक्षी था और बच्चियों के साथ बलात्कार व यौन अपराध का अन्तरराष्ट्रीय रैकेट चलाता था। उसके घृणित कारनामे न केवल पूँजीवादी समाज की सड़ाँध और गलाज़त को प्रदर्शित करते हैं बल्कि दुनिया भर के शासक वर्गों की पतनशीलता को भी उघाड़ कर रख देते हैं। ऐसे घृणित व्यक्ति के साथ भाजपा के नेताओं और खुद नरेन्द्र मोदी के कथित सम्बन्ध आम जनता के लिए कई सवाल खड़े कर रहे थे। एप्स्टीन 2008 में ही यौन अपराधी साबित हो चुका था, मगर इसके बावजूद 2017 में अनिल अम्बानी, हरदीप सिंह पुरी आदि का एप्सटीन के साथ मेलजोल और अमेरिकी अधिकारियों के साथ मीटिंग्स का कार्यक्रम बनाना किन वज़हों से हो सकता है? क्या यह राजनीतिक व व्यापारिक फ़ायदों के लिए था या फ़िर निजी फ़ायदों के लिए? एप्स्टीन स्वयं एक ज़ायनवादी था और इज़रायली ख़ुफ़िया एजेंसी मोस्साद का एजेण्ट था। उसके साथ रिश्तों की बात सामने आने पर दुनिया के कई रसूख़दार व्यक्तियों को गिरफ़्तार किया गया है और कई से उनके पदों से इस्तीफ़े ले लिये गये हैं। सिर्फ़ डोनाल्ड ट्रम्प का अमेरिका और मोदी का भारत ही ऐसे देश हैं, जहाँ एप्सटीन फ़ाइलों में नाम आने के बाद भी किसी पर कार्रवाई तो दूर, जाँच की भी घोषणा नहीं की गयी है। सवाल है कि 2008 में एप्स्टीन की घिनौनी असलियत दुनिया के सामने आने के बाद भी भाजपा के नेताओं की बातचीत ऐसे घृणित, बलात्कारी व्यक्ति के साथ क्यों हो रही थी?

शर्मनाक!! योगी का बुलडोज़र अब क्रान्तिकारी शहीदों की मूर्तियों पर भी चल रहा है!!

23 मार्च को जब सारा देश भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस पर उनको याद कर रहा था, तो उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में सरकारी बुलडोज़र हमारे तीन शहीद क्रान्तिकारियों की मूर्तियों को चकनाचूर कर रहा था! जिस शाहजहांपुर की जनता को अपने इंक़लाबी सपूतों रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्ला ख़ां और रोशन सिंह पर फ़ख्र है, उसी शाहजहांपुर के सरकारी अमले ने शहर के टाउनहॉल चौक पर 1972 में स्थापित इन तीनों की प्रतिमाओं को रात तीन बजे बुलडोज़र चलाकर ध्वस्त कर दिया।

मोदी के इज़रायल दौरे और मोदी सरकार द्वारा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ जैसी साम्राज्यवादी साज़िश के समर्थन पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन!

भारत सरकार का पक्ष शुरू से ही फ़िलिस्तीनी आवाम के मुक्ति-संघर्ष के समर्थन में रहा है मगर भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से फ़िलिस्तीन के प्रति इनके रुख में काफ़ी तेज़ी से बदलाव आया है। नरेन्द्र मोदी इज़रायल का दौरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन चुके हैं। जहाँ वह एक तरफ़ अरब देशों के विदेश मंत्रियों को फ़िलिस्तीन के प्रति भारत के समर्थन का भरोसा दिलाते हैं, वहीं दूसरी ओर इज़रायल के साथ उनकी प्रगाढ़ होती मित्रता किसी से छुपी हुई नहीं है और अब तो वह इज़रायल के भ्रमण पर भी जा रहें है। यह पूरी तरह साफ़ है कि भाजपा की केन्द्र सरकार ने इज़रायल को अन्तरराष्ट्रीय समर्थन देकर उसके नरसंहार को परोक्ष रूप से जायज़ ठहराया है। यह फ़िलिस्तीन की जनता की पीठ में छुरा घोंपने के समान है। भले ही कागजों पर वे फ़िलिस्तीनी राज्य का समर्थन करने का ढोंग करते हों लेकिन ये ढोंग अन्तरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि बचाने की एक खोखली और शर्मनाक कोशिश मात्र हैं। यह एक बार फिर मोदी सरकार के दोमुँहें और अवसरवादी चरित्र को बेनकाब करता है।

बंगाल में चुनाव आयोग की मिलीभगत से एसआईआर के ज़रिये चुनाव को ‘हाईजैक’ करने में जुटी फ़ासिस्ट भाजपा!

बंगाल के साथ-साथ अन्य 12 राज्यों में घोषित या अघोषित तौर पर एसआईआर की प्रक्रिया जारी है। इन तमाम राज्यों में ख़ासकर ग़रीबों, मुसलमानों, दलितों, स्त्रियों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल और अन्य राज्यों में एसआईआर का कोई एक स्वरूप नहीं है। हर राज्य में भाजपा व मोदी सरकार अलग-अलग तरीक़ों से चुनाव आयोग के साथ मिलकर इसे अंजाम दे रही है। सवाल यह भी उठता है कि बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ से ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर अलग-अलग राज्यों में काम करने के लिए जाते हैं और प्राकृतिक आपदाओं समेत अन्य कारकों की वजह से उनके प्रमाण पत्र या पहचान कार्ड उनके पास नहीं है, क्या उन सबको डिटेंशन कैंप में भेज दिया जायेगा? फ़ासीवादी भाजपा की मानें तो अब “अमृतकाल” में  इस देश में ऐसा ही होगा!

फ़ासिस्टों की गुण्डागर्दी के ख़िलाफ़ उठ खड़े होते आम लोग 

पिछले 11 वर्षों से देशभर में संघ-भाजपा गिरोह के लोगों की मनमानी और गुण्डागर्दी चलती रही है। मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, स्त्रियों, आम ग़रीब आबादी और संघ-भाजपा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छात्रों-युवाओं, प्रगतिशील लोगों पर हमले, मारपीट से लेकर बुलडोज़र चढ़ाने और मॉब लिंचिंग तक की इन्हें खुली छूट मिली हुई है। लेकिन पिछले कुछ समय से माहौल बदल रहा है। जगह-जगह लोग इनकी गुण्डई के ख़िलाफ़ उठ खड़े हो रहे हैं और इन्हें दुम दबाकर भागना पड़ रहा है।