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देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई के बच्चों में बढ़ता कुपोषण

मुम्बई भी ऐसा ही एक ऊपरी तौर पर चमकदार शहर है जहाँ एक ओर अम्बानी, टाटा, बिड़ला, अडानी जैसे भारी दौलतमन्द लोग रहते हैं; वहीं यहाँ की अधिकांश मेहनतकश जनसंख्या भारी ग़रीबी और तंगहाली में गन्दगी से बजबजाती, दड़बों की तरह भरी झोपड़पट्टियों में रहने को मजबूर है। हालत यह है कि इस ‘मायानगरी’ के दो तिहाई निवासियों को इस शहर की सिर्फ़ 8% जगह ही रहने को मयस्सर है। शायद इनमें से भी बहुतों ने 2014 के चुनाव के पहले के भारी प्रचार से चकाचौंध होकर नरेन्द्र मोदी के ‘सबका साथ सबका विकास’ और ‘अच्छे दिनों’ के वादों में भरोसा किया था, देश के चहुमुँखी विकास से अपनी जि़न्दगी में बेहतरी आने का सपना देखा था। पर नतीजा क्या हुआ?

अर्थव्यवस्था में सुधार के हवाई दावों की हक़ीक़त

11 अगस्त को ही सरकार ने अर्धवार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण जारी किया जिसकी मुख्य बात थी कि अर्थव्यवस्था पर संकुचन या डिफ़्लेशन का दबाव है और जीडीपी में वृद्धि दर सरकारी अनुमान से कम रहने की सम्भावना है। इस संकुचन का अर्थ है कम माँग के चलते दाम न बढ़ा पाने की मज़बूरी से मुद्रास्फीति या महँगाई का नहीं बढ़ना। और विस्तार में जायें तो रिज़र्व बैंक और सरकार दोनों का विश्लेषण कहता है कि महँगाई की दर कम रहने की वजह एक तो कृषि उत्पादों के दामों में कमी है; दूसरे, माँग की कमी से अन्य उत्पादक दाम बढ़ाने में असमर्थ हैं, इसलिए महँगाई की दर 4% के नीचे आ गयी है।

जीएसटी : कॉरपोरेट पे करम, जनता पे सितम का एक और औज़ार

इस समाज में कोई भी नीति ऐसी नहीं हो सकती जो सब वर्गों के लिए समान हितकारी हो और हर नीति का विश्लेषण इस आधार पर होना चाहिए कि इसका फ़ायदा किस तबक़े को होगा, नुक़सान किस तबक़े को। ऐसे वर्ग विभाजित, ग़ैर-बराबरी और शोषण पर आधारित समाज में प्रत्येक नीति का विभिन्न वर्गों की जि़न्दगी पर असर समझे बग़ैर की गयी कोई भी चर्चा निरर्थक या गुमराह करने वाली है। इस दृष्टिकोण से इसके कुछ अहम बिन्दुओं की चर्चा ज़रूरी है।

आधार पर सरकारी ज़बर्दस्ती की वजह क्या है?

भ्रष्टाचार व चोरी को रोकने के नाम पर लाये गये आधार का अपना पूरा ढाँचा ही भ्रष्टाचार पर टिका है। 12 जुलाई के हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार अब तक आधार बनाने वाली साढ़े 6 लाख एजेंसियों में से 34 हज़ार से अधिक को भ्रष्ट और जालसाजीपूर्ण गतिविधियों में लिप्त पाया गया है। इसमें फ़र्ज़ी दस्तावेज़ पर आधार बनाना, पैसा लेकर पता बदलना, आदि शामिल हैं। आधार बनवाने के लिए दिये गये दस्तावेज़ इनके पास ही छोड़ दिये गये हैं, जिनका दुरुपयोग करने में इनके ऊपर कोई रोकथाम नहीं है। इससे भी बढ़कर जो हाथ और आँखों की जैविक जानकारी आधार बनवाने के इन्होंने एकत्र की थी, प्रतिलिपि भी इनके पास ही छोड़ दी गयी है, जिसका इस्तेमाल ये दूसरों के नाम पर कर सकते हैं।

किसान आंदोलन : कारण और भविष्य की दिशा

सबसे पहले तो हमें इस ग़लत समझ से छुटकारा पाना होगा कि किसान नाम का कोई एकरूप समरस वर्ग है, जिसमें सब किसानों के एक समान आर्थिक हित हैं। 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वे तथा 2011-12 की कृषि जनगणना के अनुसार गाँवों के कुल 18 करोड़ परिवारों में से 30% खेती, 14% सरकारी/निजी नौकरी व 1.6% ग़ैर कृषि कारोबार पर निर्भर हैं; जबकि बाक़ी 54% श्रमिक हैं। खेती आश्रित 30% (5.41 करोड़) का आगे विश्लेषण करें तो इनमें से 85% छोटे (1 से 2 हेक्टेयर) या सीमान्त (1 हेक्टेयर से कम) वाले किसान हैं। बाक़ी 15% बड़े-मध्यम किसानों के पास कुल ज़मीन का 56% हिस्सा है। ये 85% छोटे-सीमान्त किसान खेती के सहारे कभी भी पर्याप्त जीवन निर्वाह योग्य आमदनी नहीं प्राप्त कर सकते और अर्ध-श्रमिक बन चुके हैं। किसानों के सैम्पल सर्वे 2013 का आँकड़ा भी इसी की पुष्टि करता है कि सिर्फ़ 13% किसान (अर्थात बड़े-मध्यम) ही न्यूनतम समर्थन मूल्य से फ़ायदा उठा पाते हैं।

किसकी सेवा में जुटे हैं प्रधान सेवक महोदय!

वोडाफ़ोन पर ब्याज़/पेनाल्टी समेत 30 हज़ार करोड़ का इनकम टैक्स बकाया है| 2014 तक उसके वकील अरुण जेटली होते थे, सुप्रीम कोर्ट से फैसला भी करा लिया था कि टैक्स बनता ही नहीं| मगर मामला ख़त्म नहीं हो पाया था क्योंकि प्रणब मुखर्जी के समय में पिछली तारीख से कानून बदल दिया गया था|

बेहिसाब बढ़ती छँटनी और बेरोज़गारी

छँटनी और बेरोज़गारी इस वक़्त पूरे देश की आम मेहनतकश जनता के लिए एक भारी चिन्ता का विषय है। 2014 के चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता नरेन्द्र मोदी ने पिछली सरकार की रोज़गार सृजन न कर पाने के लिए तीव्र आलोचना की थी और इसे अपना मुख्य लक्ष्य बताते हुए प्रति वर्ष करोड़ों नयी नौकरियाँ देने का वादा किया था। लेकिन वस्तुस्थिति इसके ठीक उलट है। 2015-16 के आर्थिक सर्वे में कहा गया कि 2011-12 में बेरोज़गारी 3.8% थी, जो 2015-16 में बढ़कर 5% हो गयी। वैसे यह संख्या और भी ज़्यादा है क्योंकि किसी भी काम में साल के कुछ भी दिन लगे व्यक्तियों को इसमें बेरोज़गार नहीं गिना जाता।

आर.एस.एस. और बी.एम.एस. के मई दिवस विरोध के असली कारण

मई दिवस द्वारा अपने वाजिब हक के लिये लडने के संदेश को ‘अच्छा नहीं’ कहने वाला संगठन आखिर विश्वकर्मा जयंती से मज़दूरों को क्या संदेश देना चाह्ता है? ये मज़दूरों को बताते हैं कि मालिक लोग अपनी मेहनत व प्रतिभा से उद्योग लगाते हैं, उससे मज़दूरों को रोजगार मिलता है, उनके परिवारों की रोजी-रोटी चलती है; इसलिये मज़दूरों को उनका अहसानमंद होना चाहिये। जिन मशीनों-औजारों पर काम करके उनकी रोजी-रोटी चलती है उनकी पूजा करनी चाहिये, उनकी सफाई-देखभाल करनी चाहिये और ज़्यादा से ज़्यादा काम करने की शपथ लेनी चाहिये, जिससे उत्पादकता बढे। लेकिन वह मज़दूरों को यह नहीं बताते कि मालिक का मुनाफा मजदुर के श्रम से उत्पाद की वस्तु के मूल्य में होने वाले इजाफे से ही आता है – तो मज़दूर जितना ज़्यादा श्रम करेंगे मालिकों उनकी मेहनत के मूल्य को उतना ही ज़्यादा अपनी जेब में डालकर और भी सम्पत्तिशाली होते जायेंगे और इससे मज़दूरों को कुछ हासिल नहीं होगा। मज़दूरों का नाम लेने वाला लेकिन अन्दर से मालिकों के हितों का पोषण करने वाला कोई संगठन ही मज़दूरों को ऐसा संदेश देने को अच्छा बता सकता है।

बैंक कानून में संशोधन अध्यादेश : हज़ारों करोड़ कर्ज़ लेकर डकार जाने वालों की भरपाई का बोझ उठाने के लिए जनता तैयार रहे

2001-02 के समय में जो आर्थिक संकट का दौर था उसमें पूँजीवादी देशों के केन्द्रीय बैंकों द्वारा ब्याज़ दरों को कम कर पूँजीपतियों को राहत देने की नीति अपनायी गयी थी जिसे सस्ती मुद्रा नीति भी कहा जाता है। इससे जो सस्ता धन क़र्ज़ के रूप में उपलब्ध हुआ उससे ज़मीन-मकान और शेयर-बाण्ड्स जैसी वित्तीय सम्पत्तियों के दामों में भारी वृद्धि द्वारा एक नक़ली सम्पन्नता का माहौल बनाया गया जिससे कुछ समय तक बाज़ार में माँग बढ़ी ख़ास तौर पर किश्तों पर ख़रीदारी द्वारा। पूँजीपतियों को भी ख़ूब सस्ता क़र्ज़ निवेश के लिए मिला और उन्होंने उत्पादक क्षमता में निवेश भी किया। लेकिन कुछ साल बाद ही इससे पैदा हुए तीव्र आर्थिक संकट ने इस माँग को चौपट कर दिया। अभी रिज़र्व बैंक के अनुसार भारतीय उद्योग स्थापित क्षमता के 68-70% पर ही काम कर पा रहे हैं। इसलिए कुछ उद्योगों का दिवालिया होना इसका स्वाभाविक नतीजा है। यही बैंकों के क़र्ज़ों को संकट में डाल रहा है।

क्या छँटनी/बेरोज़गारी की वज़ह ऑटोमेशन है?

19वीं सदी से शुरू हुए श्रमिक संघर्षों ने 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन के सिद्धांत को स्थापित किया था। लेकिन आज भी स्थिति है कि अधिकांश कामगार इससे बहुत ज़्यादा, 12-14 घंटे तक भी काम करने के लिए मजबूर हैं; खुद को मज़दूर न मानने वाले सफ़ेद कॉलर वाले बैंक, आईटी, प्रबंधन, आदि वाले तो सबसे ज्यादा! फिर श्रमिक फालतू कैसे हो गए, जैसा कि कहा जा रहा है कि आगे काम ही नहीं रहेगा?