क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों से मज़दूर का वार्तालाप
सज्जनो, स्वयंस्फूर्ति की पूजा थोड़ी कम कीजिए और ख़ुद अपनी क्रियाशीलता को बढ़ाने की चिन्ता ज्यादा कीजिये!

लेनिन

lenin with people

हमारे ”अर्थवादियों” को, जिनमे राबोचेये देलो भी शामिल है, सफलता इसलिए मिली कि उन्होंने अपने को पिछड़े हुए मज़दूरों के अनुसार ढाल लिया था। लेकिन ऐसी माँगो के लिए लड़ने की इन तमाम बातों को, जिनमें कि ”कोई ठोस नतीजे निकलने की उम्मीद”, आदि हो, सामाजिक-जनवादी मज़दूर, क्रान्तिकारी मज़दूर (और ऐसे मज़दूरों की संख्या बढ़ रही है) क्रोध के साथ ठुकरा देगा, क्योंकि वह समझेगा कि वह रूबल में एक कोपेक की बढ़ोत्तरी के पुराने राग का ही एक नया संस्करण है। ऐसा मज़दूर राबोचाया मीस्ल तथा राबोचेये देलो के अपने सलाहकारों से कहेगा : सज्जनो, आप लोग एक ऐसे काम में हद से ज्यादा जोश-ख़रोश के साथ दखल देकर, जिसे हम खुद बख़ूबी कर सकते हैं, अपना अमूल्य समय बेकार में नष्ट कर रहे हैं, और जो काम आपको सचमुच करना चाहिए, उसे आप नहीं कर रहे हैं। आपने यह कहकर कोई बड़ी होशियारी की बात नहीं कही है कि सामाजिक-जनवादियों का कार्यभार आर्थिक संघर्ष को ही राजनीतिक रूप देना है। यह तो केवल पहला कदम है, यह सामाजिक-जनवादियों का मुख्य कार्यभार नहीं है, क्योंकि दुनिया भर में और रूस में भी आर्थिक संघर्ष को राजनीतिक रूप देने की शुरुआत तो अकसर ख़ुद पुलिस ही कर देती है, और उससे मज़दूर ख़ुद इस बात को समझना सीखते हैं कि सरकार किसके पक्ष में है।* ”मालिकों तथा सरकार के ख़िलाफ मज़दूरों के जिस आर्थिक संघर्ष” का आप लोग इतना शोर मचा रहे हैं, उससे ऐसा लगता है, मानो आपने किसी नये अमरीका को खोज निकाला हो, वैसा संघर्ष इस समय रूस के अनेक दूरस्थ स्थानों में स्वयं मज़दूरों द्वारा चलाया जा रहा है, जिन्होंने हड़तालों का तो नाम सुना है, पर समाजवाद के बारे में लगभग कुछ नहीं सुना है। ऐसी ठोस माँगें उठाकर, जिनसे कोई ठोस नतीजे निकालने की उम्मीद हो, आप हम मज़दूरों में जो ”क्रियाशीलता” उत्प्रेरित करना चाहते हैं, उसका परिचय तो हम आज भी दे रहे हैं, अपने रोज़मर्रा के व्यवसायगत छोटे-मोटे कामों में हम स्वयं ये ठोस माँगें पेश कर रहे हैं, बहुधा बुद्धिजीवी की किसी भी सहायता के बिना। परन्तु यही क्रियाशीलता हमारे लिए काफी नहीं है। हम बच्चे नहीं हैं कि केवल ”आर्थिक” राजनीतिक की पतली लपसी से ही सन्तुष्ट हो जायें; हम तो हर वह चीज़ जानता चाहते हैं, जो दूसरे लोग जानते हैं, हम राजनीतिक जीवन के तमाम पहलुओं को विस्तार से समझना और प्रत्येक राजनीतिक घटना में सक्रिय भाग लेना चाहते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि बुद्धिजीवी लोग हमें वे बातें कम बतायें, जो हम पहले से जानते हैं,** और वे बातें ज्यादा बतायें, जो हम अभी नहीं जानते और जो हम अपने कारख़ाने के और ”आर्थिक” अनुभव से कभी नहीं सीख सकते, मतलब यह कि आप लोग हमें राजनीतिक ज्ञान दीजिये। आप, बुद्धिजीवी लोग, यह ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, उससे सौ गुनी और हज़ार गुनी अधिक मात्रा में यह ज्ञान आप हमें दें; और आप यह ज्ञान हमें केवल उन दलीलों, पुस्तिकाओं और लेखों के रूप में ही न दें (जो अकसर काफी नीरस होते हैं — हमें स्पष्टवादिता के लिए माफ करें!) बल्कि हमारी सरकार और हमारे शासक वर्ग जीवन के तमाम क्षेत्रों में इस समय जो कुछ कर रहे हैं, उसका सजीव भण्डाफोड़ करते हुए आप हमें यह ज्ञान दें। अपनी इस ज़िम्मेदारी को पूरा करने में थोड़ा और जोश दिखाइये और ”आम मज़दूरों की क्रियाशीलता को बढ़ाने” की बातें थोड़ी कम कीजिये। आप जितना समझे हैं, हम उससे कहीं अधिक क्रियाशील हैं और हम उन माँगों तक के लिए सड़कों पर खुलेआम लड़ने में समर्थ हैं, जिनमें कोई ”ठोस नतीजे” निकलने की उम्मीद नहीं है! और हमारी क्रियाशीलता को ”बढ़ाना” आपका काम नहीं है, क्योंकि आपमें तो ख़ुद क्रियाशीलता ही का अभाव है। सज्जनो, स्वयंस्फूर्ति की पूजा थोड़ी कम कीजिये और ख़ुद अपनी क्रियाशीलता को बढ़ाने की चिन्ता ज्यादा कीजिये!

फुटनोट

* ”आर्थिक संघर्ष को ही राजनीतिक रूप देने” की माँग राजनीतिक कार्य के क्षेत्र में स्वयंस्फूर्ति की पूजा करने की प्रवृत्ति को सबसे स्पष्ट रूप में व्यक्त करती है। बहुधा आर्थिक संघर्ष स्वयंस्फूर्त ढंग से, अर्थात ”क्रान्तिकारी कीटाणुओं, यानी बुद्धिजीवियों” के हस्तक्षेप के बिना ही, वर्ग-चेतन सामाजिक-जनवादियों के हस्तक्षेप के बिना ही, राजनीतिक रूप धारण कर लेता है। उदाहरण के लिए, समाजवादियों के कोई हस्तक्षेप न करने पर भी ब्रिटिश मज़दूरों के आर्थिक संघर्ष ने राजनीतिक रूप धरण कर लिया। लेकिन सामाजिक-जनवादियों का कार्यभार यहीं ख़त्म नहीं हो जाता कि वे आर्थिक आधार पर राजनीतिक आन्दोलन करें; उनका कार्यभार इस ट्रेड-यूनियनवादी राजनीति को सामाजिक-जनवादी राजनीतिक संघर्ष में बदलना और आर्थिक संघर्ष से मज़दूरों में राजनीतिक चेतना की जो चिंगारियाँ पैदा होती हैं, उनका इस्तेमाल इस मकसद से करना है कि मज़दूर को सामाजिक-जनवादी राजनीतिक चेतना के स्तर पर उठाया जा सके। किन्तु मार्तीनोव जैसे लोग मज़दूरों की अपने आप उठती हुई राजनीतिक चेनता को और ऊपर उठाने तथा बढ़ाने जाने के बजाय स्वयंस्फूर्ति के सामने शीश झुकाते हैं और उबा देने की हद तक बार-बार यही बात दोहराते रहते हैं कि आर्थिक संघर्ष मज़दूरों को अपने राजनीतिक अधिकारों के अभाव के बारे में सोचने की ”प्रेरणा देता है”। सज्जनो, यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि अपने आप उठती हुई ट्रेड-यूनियनवादी राजनीतिक चेतना आपको यह प्रेरणा नहीं दे पाती कि सामाजिक-जनवादी होने के नाते आपके क्या कार्यभार हैं।

** यह साबित करने के लिए कि ”अर्थवादियों” से मज़दूरों का यह काल्पनिक वार्तालाप सत्य पर आधरित है, हम दो ऐसे गवाहों का हवाला देंगे, जिन्हें असन्दिग्ध रूप में मज़दूर आन्दोलन का प्रत्यक्ष अनुभव है और जिन पर हम ”मतवादियों” का पक्ष लेने का सबसे कम सन्देह किया जा सकता है क्योंकि उनमें से एक गवाह तो एक ”अर्थवादी” हैं (जो राबोचेये देलो को भी एक राजनीतिक मुखपत्र समझते हैं!) और दूसरे गवाह एक आतंकवादी हैं। पहले गवाह ने एक बहुत ही सच्चा और सजीव लेख लिखा है जिसका शीर्षक है पीटर्सबर्ग का मज़दूर आन्दोलन और सामाजिक-जनवादी आन्दोलन के व्यावहारिक कार्यभार और जो राबोचेये देलो के अंक 6 में प्रकाशित हुआ था। लेखक ने मज़दूरों को तीन श्रेणियों में बाँटा है : (1) वर्ग-चेतन क्रान्तिकारी (2) बीच का स्तर और (3) बाकी सब। उनका कहना है कि बीच के इस स्तर को ”अक्सर अपने उन आर्थिक हितों की अपेक्षा राजनीतिक जीवन के मसलों में कहीं ज्यादा दिलचस्पी होती है, जिनका आम सामाजिक परिस्थितियों से सम्बन्ध बहुत पहले से समझ लिया गया है”… राबोचाया मीस्ल की ”सख्त आलोचना की गयी है”: वह सदा उन्हीं बातों को बार-बार दुहराता रहता है, जिनके बारे में हम बहुत दिन पहले जानकारी प्राप्त कर चुके हैं, जिनके विषय में हम बहुत पहले पढ़ चुके हैं”, ”राजनीतिक समीक्षा में फिर कुछ नहीं है” (पृ. 30-21)। लेकिन तीसरा स्तर भी: ”अपेक्षाकृत युवा और अधिक संवेदनशील मज़दूर, जिनको शराबखाना और गिरजाघर अभी कम भ्रष्ट कर पाये हैं, जिन्हें शायद ही कभी कोई राजनीतिक साहित्य पाने का मौक़ा मिलता है, कुछ अस्पष्ट ढंग से राजनीतिक घटनाओं के बारे में बहस करते हैं और विद्यार्थी उपद्रवों की उन्हें जो भी थोड़ी-बहुत ख़बरें मिल जाती हैं, उन पर विचार करते हैं” आदि। आतंकवादी लिखते हैं: ”…अपने शहर के तो नहीं, पर दूसरे शहरों के कारख़ानों की ज़िन्दगी की छोटी-छोटी बातों को वे एकाध् बार पढ़ लेते हैं और फिर उन्हें नहीं पढ़ते… ये बातें उन्हें नीरस लगती हैं… मज़दूरों के किसी अख़बार में राज्यसत्ता के बारे में कुछ न कहना… मज़दूरों को छोटा बच्चा समझना है… मज़दूर दुधमुँहे बच्चे नहीं हैं (स्वोबोदा, क्रान्तिकारी-समाजवादी दल द्वारा प्रकाशित, पृ 69-70)।

(लेनिन की रचना ‘क्या करें?’ का अंश)

शीर्षक हमारा लगाया हुआ है — सम्पादक


 

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