• February 28, 2026

    12 फ़रवरी की “हड़ताल” से मज़दूरों को क्‍या हासिल हुआ ?

    हड़ताल मज़दूर वर्ग के सबसे अहम हथियारों में से एक होता है। एक अकेले मज़दूर का पूँजीवादी समाज में कोई मूल्‍य नहीं होता है। लेकिन पूँजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था और राजनीतिक व्‍यवस्‍था और समूचा पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के श्रम के शोषण पर ही आधारित होता है। इसलिए एक वर्ग के तौर पर, मज़दूर वर्ग की सामूहिक शक्ति से बड़ी शक्ति और कोई नहीं। पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के बेशी श्रम को निचोड़कर ही ज़‍िन्‍दा रहता है। उसके मुनाफ़े का स्रोत मज़दूरों की मेहनत होती है। समूचा समाज ही मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश आबादी के श्रम पर टिका होता है। ऐसे में, मज़दूर वर्ग यदि काम रोक दे तो मुनाफ़े का चक्‍का भी ठप्‍प हो जाता है। हड़ताल का अर्थ होता है मज़दूर वर्ग द्वारा अपनी माँगों की पूर्ति के लिए काम रोकना, मुनाफ़े के चक्‍के को ठप्‍प करना और पूँजीपति वर्ग और उसकी राज्‍यसत्‍ता को बाध्‍य करना कि वह उसकी माँगों को पूरा करे। क्‍या 12 फ़रवरी को केन्‍द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्‍व ने वाकई हड़ताल का आयोजन करवाया? आप सभी इस सवाल का जवाब जानते हैं। हर जगह पर हड़ताल के नाम पर एकदिनी रस्‍मी विरोध प्रदर्शन, जुलूस-जलसा कर दिया गया, ताकि मज़दूर वर्ग का बढ़ता असन्‍तोष कुछ हद तक निकल जाये।

  • February 28, 2026

    मोदी सरकार द्वारा लाये गये चार लेबर कोड और वीबी-ग्रामजी क़ानून के ख़िलाफ़ चलाये जा रहे अभियान क...

    केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों को और ग़रीब किसानों और ग्रामीण मज़दूरों की नुमाइन्दगी का दावा करने वाले यूनियनों व सगठनों को ऐसी आम हड़ताल का आह्वान करना चाहिए। व्यापक मज़दूर-मेहनतकश आबादी को इन संगठनों व यूनियनों पर ऐसी आम हड़ताल का ऐलान करने का दबाव बनाना चाहिए। हम एक बार फिर से केन्द्रीय ट्रेड यनिूयन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व से दिली अपील करते हैं कि वे वक़्त की नज़ाकत और ज़रूरत को समझें। इस देश के मज़दूर वर्ग पर इससे बड़ा और कोई हमला नहीं हो सकता है और मोदी-शाह सरकार किसी भी तरह के रस्मी कवायद, ज़ुबानी जमाख़र्च, प्रतीकात्मक प्रदर्शन आदि करने से सुनने वाली नहीं है। उसे झुकाने के लिए आज अपने सबसे बड़े हथियारों में से एक यानी आम हड़ताल का इस्तेमाल करना ही होगा। इस वक़्त अगर केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की तरफ़ आगे बढ़ती हैं तो हम यह बात बिल्कुल दावे के साथ कह सकते हैं कि अन्य यूनियनें व संगठन भी उनका भरपूर साथ देंगे।

  • January 24, 2026

    मुनाफ़ाख़ोर पूँजीवादी व्यवस्था, फ़ासिस्ट सरकार और पानी में फैलता ज़हर

    केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB) की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 20 प्रतिशत भूजल ऐसा है जिसमें नाइट्रेट, यूरेनियम और आर्सेनिक जैसे ख़तरनाक तत्व पाए गए हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि देशभर में पानी को प्रदूषित करने वाला सबसे बड़ा केमिकल कैल्शियम बाई कार्बोनेट (CaHCO3) है। इस रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2023 में कुल 15259 सैम्पल लिए गए। इनमें से 20.7 प्रतिशत सैम्पल में नाइट्रेट की मात्रा BIS के मानक यानी 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज़्यादा थी।  भारत के 56 प्रतिशत जिले ऐसे हैं जहाँ के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित से ज़्यादा है। राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह मात्रा काफी ज़्यादा है। पश्चिम बंगाल, झारखण्ड , बिहार, उत्तर प्रदेश, असम और मणिपुर राज्यों के सैम्पल में आर्सेनिक पाया गया। देश के 263 जिले ऐसे हैं जहाँ के भूजल में फ्लोराइड तक पाया गया।

  • December 30, 2025

    ‘चार लेबर कोड’ मज़दूरों-कर्मचारियों के अधिकारों पर सबसे बड़ा हमला है! अब एकदिवसीय हड़तालों ...

    अपने तीसरे कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार खुलकर उन सभी कार्यभारों को पूरा कर रही है जिनके लिए देश के पूँजीपति वर्ग ने सत्ता की कमान उसके हाथ में सौंपी थी। आर्थिक मन्दी से बिलबिलाया हुआ पूँजीपति वर्ग लम्बे समय से “धन्धे की आज़ादी” के लिए किलबिला रहा था। वही “आज़ादी” मोदी सरकार ने चार लेबर कोड की शक्ल में मालिकों और पूँजीपतियों को बतौर सौगात थमायी है। देश के करोड़ों मज़दूरों-कर्मचारियों की बदहाल ज़िन्दगी को और भी तबाह करने वाले चार ख़तरनाक लेबर कोड मोदी सरकार पिछले महीने लागू कर चुकी है। 21 नवम्बर को अचानक एक अधिसूचना जारी करके सरकार ने इसकी घोषणा कर दी। यह फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा मज़दूरों और कर्मचारियों के अधिकारों पर अबतक का सबसे बड़ा हमला है।

  • December 30, 2025

    शान्ति (SHANTI) विधेयक, 2025 – कॉरपोरेट मुनाफ़े के लिए मानव जीवन को ख़तरे में डालने का बेशर्म दस्ता...

    बड़े पैमाने पर होने वाले परमाणु रिसाव, कचरे का अनुचित प्रबन्धन व निपटारा तथा परमाणु संचालन से जुड़े अन्य बड़े जोख़िम वाले कारकों से होने वाली आपदाओं को छिपाने, उन्हें कम करके दिखाने और उनकी ज़िम्मेदारी से पूँजीपतियों और निजी प्रतिष्ठानों को मुक्त करने की मंशा से ही यह विधेयक मूलतः संचालित है। जैसे-जैसे आप इस विधेयक को पढ़ेंगे तो पायेंगे कि यह पूरा क़ानून इस अत्यन्त ख़तरनाक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी और विदेशी भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया है। वहीं दूसरी तरफ़ सार्वजनिक सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताओं को पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर दिया गया है। यह विधेयक पूरी निर्माण श्रृंखला यानी खनन से लेकर संयंत्र संचालन और कचरा प्रबन्धन तक के लिए एक ही लाइसेंस की अनुमति देता है। इससे निजी कम्पनियाँ बिना किसी वास्तविक जवाबदेही और दण्ड से मुक्त रहते हुए अधिकतम मुनाफ़ा कमा सकती हैं।