हालिया छात्र-युवा आन्दोलन की प्रमुख उपलब्धियों नें से एक यह रही कि इसने आम जनता के व्यापक हिस्सों को निष्क्रियता की स्थिति से जगाने का काम किया और मोदी-शाह शासन द्वारा संचालित “हिन्दू-मुसलमान” और “मन्दिर-मस्जिद” की साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति के नक़ली मुद्दों को नकारते हुए उनके बरक्स आम जनता के वास्तविक मुद्दों को एक हद तक विमर्श के केन्द्र में फिर से स्थापित करने का काम किया, इसलिए फ़ासीवादी ताक़तों की बौखलाहट स्वाभाविक ही है। और चूँकि फ़ासीवादियों के पास उठाये जा रहे सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने के लिए नये-नये राजनीतिक शब्द गढ़ने की अपनी पुरानी तरकीब का सहारा लेना पड़ रहा है और झूठे दावे करने पड़ रहे हैं कि यह देशविरोधी तत्व देश में “हिंसा और अराजकता” फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। ग़ौरतलब है कि देश की “सीमाओं के भीतर” होने वाले युद्ध की बात भी नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में की। लेकिन सबसे पहले मोदी जी को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि यह युद्ध कौन छेड़ रहा है और किसके ख़िलाफ़ छेड़ रहा है? पिछले 12 सालों का लेखा-जोखा निकालकर देख लिया जाये तो यह मोदी-शाह हुकूमत है जिसने देश में आतंक और हिंसा का माहौल क़ायम किया है, जिसकी लम्पट गुण्डा वाहिनियों ने कभी “लव जिहाद” तो कभी “गौ रक्षा” के नाम पर मुसलमानों का जीवन दूभर कर दिया है, जिसकी ट्रोल आर्मी ने सोशल मीडिया पर लड़कियों को बलात्कार, एसिड अटैक, हत्या तक की धमीकियाँ देकर उन्हें आतंकित करने का काम किया है, जिसकी आततायी पुलिस ने हर शान्तिपूर्ण आन्दोलन में निहत्थे मज़दूरों-नौजवानों को बर्बर दमन का निशाना बनाया है। दरअसल यह ख़ुद मोदी सरकार है जिसने पिछले 12 सालों में एक युद्ध छेड़ रखा है देश की अवाम के ख़िलाफ़!
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