• September 30, 2026

    नोएडा मज़दूर आन्दोलन – सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानेश कुमार पुत्री को दी राहत, जुर्माने के आà...

    दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला भारत उन चन्देक देशों में से है जहाँ का संविधान ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ के क़ानून की इजाज़त देता है, जिसके तहत केवल सरकार या पुलिस प्रशासन के अधिकारियों के ‘मनोगत तौर पर सन्तुष्ट’ होने के आधार पर किसी को भी बिना किसी सबूत या ट्रायल के अधिकतम 12 माह तक जेल में रखा जा सकता है। 1980 में इस क़ानून के बनने के पहले 1977 तक ऐसा ही एक दूसरा क़ानून ‘मीसा’ 1971 से प्रभाव में था। उसके पहले 1950 में एक प्रिवेण्टिव डिटेंशन क़ानून आया था। 1977 से 1980 तक के तीन वर्ष ही आज़ाद भारतीय गणराज्य में ऐसा दौर हैं, जबकि ऐसा ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ का कोई क़ानून मौजूद नहीं था। इसके अलावा, आज़ाद भारत के पूरे इतिहास में आम इंसान की आज़ादी का मख़ौल बनाने वाला कोई न कोई ऐसा क़ानून मौजूद रहा है।

  • September 30, 2026

    एसआईआर मेहनतकश जनता का मताधिकार छीनने के लिए किया गया एक घोटाला है!

    पहले यह प्रक्रिया स्वयं सरकार की पहलक़दमी पर होती थी। पहले चुनाव आयोग का नारा था : ‘कोई वोटर न छूटे’। लेकिन बहुत कम लोगों ने ग़ौर किया होगा कि अब उसका नारा हो गया है : ‘कोई योग्य वोटर न छूटे’। “योग्य वोटर” कौन होगा? यह मोदी-शाह की फ़ासीवादी सरकार तय करेगी! यहाँ एक बहुत बड़ा बदलाव किया गया है। पहले इस बात की ज़िम्मेदारी राज्यसत्ता पर होती थी कि वह यह पक्का करे कि हर नये वोटर का नाम मतदाता सूची में जुड़े। इसे ‘राजकीय पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’ कहा जाता है। दुनिया के हर देश में जहाँ पूँजीवादी जनवाद किसी न किसी हद तक काम करता है, वहाँ यही होता है। इसके बरक्स कुछ देशों में एक दूसरा मॉडल लागू किया जाता है जिसे कहा जाता है ‘व्यक्तिगत पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’। यह आम तौर पर सर्वसत्तावादी तानाशाहियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीक़ा है, जिसका मक़सद ही यह होता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम काटा जाये और उनके मताधिकार को छीन लिया जाये। इसके कारणों को हम कुछ आगे समझेंगे।

  • August 30, 2026

    स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिर की खोखले दावों, अनगिनत à¤...

    हालिया छात्र-युवा आन्दोलन की प्रमुख उपलब्धियों नें से एक यह रही कि इसने आम जनता के व्यापक हिस्सों को निष्क्रियता की स्थिति से जगाने का काम किया और मोदी-शाह शासन द्वारा संचालित “हिन्दू-मुसलमान” और “मन्दिर-मस्जिद” की साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति के नक़ली मुद्दों को नकारते हुए उनके बरक्स आम जनता के वास्तविक मुद्दों को एक हद तक विमर्श के केन्द्र में फिर से स्थापित करने का काम किया, इसलिए फ़ासीवादी ताक़तों की बौखलाहट स्वाभाविक ही है। और चूँकि फ़ासीवादियों के पास उठाये जा रहे सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने के लिए नये-नये राजनीतिक शब्द गढ़ने की अपनी पुरानी तरकीब का सहारा लेना पड़ रहा है और झूठे दावे करने पड़ रहे हैं कि यह देशविरोधी तत्व देश में “हिंसा और अराजकता” फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। ग़ौरतलब है कि देश की “सीमाओं के भीतर” होने वाले युद्ध की बात भी नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में की। लेकिन सबसे पहले मोदी जी को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि यह युद्ध कौन छेड़ रहा है और किसके ख़िलाफ़ छेड़ रहा है? पिछले 12 सालों का लेखा-जोखा निकालकर देख लिया जाये तो यह मोदी-शाह हुकूमत है जिसने देश में आतंक और हिंसा का माहौल क़ायम किया है, जिसकी लम्पट गुण्डा वाहिनियों ने कभी “लव जिहाद” तो कभी “गौ रक्षा” के नाम पर मुसलमानों का जीवन दूभर कर दिया है, जिसकी ट्रोल आर्मी ने सोशल मीडिया पर लड़कियों को बलात्कार, एसिड अटैक, हत्या तक की धमीकियाँ देकर उन्हें आतंकित करने का काम किया है, जिसकी आततायी पुलिस ने हर शान्तिपूर्ण आन्दोलन में निहत्थे मज़दूरों-नौजवानों को बर्बर दमन का निशाना बनाया है। दरअसल यह ख़ुद मोदी सरकार है जिसने पिछले 12 सालों में एक युद्ध छेड़ रखा है देश की अवाम के ख़िलाफ़!

  • August 30, 2026

    मज़दूर अधिकारों की क़ीमत पर ही सही, “उद्योग का भविष्य” चमकते रहना चाहिए!

    पिछले कुछ समय में हमारे देश के न्यायालयों ने एक के बाद एक कई ऐसे फैसले दिये हैं जिससे कि वे ‘न्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी कम बल्कि ‘अन्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी करते अधिक नज़र आये हैं। कई मसले देश की सुर्खियों में आये जो सीधे तौर पर न्यायालयों के जन-विरोधी चरित्र को दिखा रहे थे मगर ऐसे कई मसले सुर्खियों से भी ग़ायब रहे जो इस देश की आम मेहनतकश आबादी की ज़िंदगियों का फ़ैसला करते थे! इसी तरह का एक मसला बीते 20 अगस्त को चीफ़ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की खण्डपीठ द्वारा सुना गया। मामला उद्योग, उद्योगपतियों और मज़दूरों से जुड़ा हुआ था।

  • June 29, 2026

    जनता के विरोध से घबराकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लगाया एस्मा!

    उत्तर प्रदेश में लगे एस्मा का खास महत्व है। इसे हमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों में बढ़ते असंतोष को दबाने के क्रम में देखने की ज़रूरत है। इस समय उत्तर प्रदेश में गहराते आर्थिक संकट, बिजली संकट और इन संकटों की वजह से बढ़ते जनाक्रोश की परिस्थिति से निपटने के लिए एस्मा लगाया गया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले योगी सरकार अपने कुशासन और जनविरोधी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिरोध को पनपने से पहले ही कुचल देने कि कोशिशें कर रही है। इसीलिए योगी सरकार कभी एस्मा लगाती है तो कभी मज़दूर कार्यकर्ताओं के ऊपर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया जाता है ताकि लोग अपनी बुनियादी माँगों मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, न्यूनतम वेतन आदि के लिए एकजुट और संगठित न हो सकें।