12 फ़रवरी की “हड़ताल” से मज़दूरों को क्या हासिल हुआ ?
हड़ताल मज़दूर वर्ग के सबसे अहम हथियारों में से एक होता है। एक अकेले मज़दूर का पूँजीवादी समाज में कोई मूल्य नहीं होता है। लेकिन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था और समूचा पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के श्रम के शोषण पर ही आधारित होता है। इसलिए एक वर्ग के तौर पर, मज़दूर वर्ग की सामूहिक शक्ति से बड़ी शक्ति और कोई नहीं। पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के बेशी श्रम को निचोड़कर ही ज़िन्दा रहता है। उसके मुनाफ़े का स्रोत मज़दूरों की मेहनत होती है। समूचा समाज ही मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश आबादी के श्रम पर टिका होता है। ऐसे में, मज़दूर वर्ग यदि काम रोक दे तो मुनाफ़े का चक्का भी ठप्प हो जाता है। हड़ताल का अर्थ होता है मज़दूर वर्ग द्वारा अपनी माँगों की पूर्ति के लिए काम रोकना, मुनाफ़े के चक्के को ठप्प करना और पूँजीपति वर्ग और उसकी राज्यसत्ता को बाध्य करना कि वह उसकी माँगों को पूरा करे। क्या 12 फ़रवरी को केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व ने वाकई हड़ताल का आयोजन करवाया? आप सभी इस सवाल का जवाब जानते हैं। हर जगह पर हड़ताल के नाम पर एकदिनी रस्मी विरोध प्रदर्शन, जुलूस-जलसा कर दिया गया, ताकि मज़दूर वर्ग का बढ़ता असन्तोष कुछ हद तक निकल जाये।
पूरा लेख पढें →


























