डीज़ल, पेट्रोल और गैस से मोदी सरकार ने की बेहिसाब कमाई
फिर भी सरकारी कम्पनियों और जनता की लूट जारी
पिछले क़रीब सात साल के अपने कार्यकाल में मोदी सरकार ने पेट्रोलियम के उत्पादों से सरकारी ख़ज़ाने में में क़रीब पच्चीस लाख करोड़ रुपये से भी ज़्यादा की कमाई की है। मगर उसके बाद भी उसका ख़जा़ना ख़ाली ही रह रहा है। सरकारी घाटा पूरा करने के नाम पर न केवल मुनाफ़ा देने वाले सार्वजनिक उपक्रमों को औने-पौने दामों पर बेचकर हज़ारों करोड़ रुपये और बटोरे जा रहे हैं, बल्कि ओएनजीसी, एचएएल जैसी अनेक सरकारी कम्पनियों को लूटकर भीतर से खोखला कर दिया गया है। ऊपर से जनता पर नये-नये टैक्स और सेस लगाना जारी है।
मोदी सरकार को आयात किया गया कच्चा तेल बेहद सस्ते दामों पर मिला है। डीलर को मिलने वाला मूल्य पेट्रोल की कीमत का 36 प्रतिशत ही होता है। लेकिन केन्द्र सरकार इस पर 37 प्रतिशत टैक्स वसूलती है और करीब 23 प्रतिशत वैट राज्य सरकारों लगाती हैं। शेष 3-4 प्रतिशत डीलर का कमीशन, ढुलाई खर्च आदि होता है। यानी सरकारों के टैक्स ही हैं जो पेट्रोल की कीमतों को 90 के पार (और कहीं-कहीं 100 के पार) पहुँचा दे रहे हैं।
सरकार की कमाई का अनुमान इसी बात से लगाइए कि पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में इस वर्ष तेल की खपत में 9.8 प्रतिशत गिरावट आने की संभावना है। फिर भी पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्सों से केन्द्र सरकार में 82 प्रतिशत की भारी वृद्धि होगी। सिर्फ़ इस वर्ष में मोदी सरकार तेल पर टैक्स से 4 लाख करोड़ रुपये कमायेगी।
सरकार के अलावा रिलायंस और एस्सार (निजी क्षेत्र की तेल शोधन कम्पनियों) ने भी इस दौर में बम्पर कमाई की है। गैस सब्सिडी कम करते-करते लगभग ख़त्म ही कर दी गयी है। लगातार जारी बढ़ोत्तरी के बाद जल्द ही सभी के लिए गैस के दाम 900 रुपये की सीमा पार करने वाले हैं।
इसके अलावा मोदी सरकार ने जीएसटी लागू करके, राज्यों को दी जाने वाली बजटीय सहायता में कटौतियों के ज़रिये, केंद्र की सब्सिडी के कोटे को लगातार कम करके भी क़रीब बीस लाख करोड़ रुपये ज़्यादा कमाये हैं ।
इस बेहिसाब नंगी लूट के बाद भी सरकार ख़ुद को घाटे में बता रही है और पूरी बेशर्मी के साथ बेरोज़गारी और महँगाई से तबाह जनता को और भी बुरी तरह निचोड़ने पर आमादा है। उसे भरोसा है कि राम मन्दिर, राष्ट्रवाद और मुस्लिम विरोध के नशे में मस्त जनता से अभी उसे कोई ख़तरा नहीं है। जो भी आवाज़ उठायेंगे उनको क़ैद कर दिया जायेगा, मीडिया तो उनका भोंपू बना ही हुआ है, सोशल मीडिया का मुँह बन्द रखने के लिए भी नये क़ानून बनाये जा रहे हैं।
उन्हें लगता है कि आन्दोलन और विरोध के बावजूद उनकी सत्ता पर कोई ख़तरा नहीं है। अमित शाह अगले 50 साल तक राज करने के दावे करते रहते हैं। हालाँकि किसी को उन्हें अपने पुरखों के इतिहास का यह तथ्य याद दिला देना चाहिए कि हिटलर और उसके साथी 1000 साल तक की योजनाएँ बनाया करते थे। मगर उसके 10 साल के अन्दर ही हिटलर ने अपने बंकर में आत्महत्या कर ली।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2021













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