बुल्ली बाई और सुल्ली डील इस सड़ते हुए समाज में फैले ज़हर के लक्षण हैं

इस साल की शुरुआत में जहाँ एक ओर देशभर में लोग नये साल का जश्न मना रहे थे, वहीं देश में दूसरी ओर मानवता को शर्मसार कर देने वाली बेहद घिनौनी घटना घटी। सोशल मीडिया पर ‘बुल्ली बाई’ नाम के एक ऐप के ज़रिए कई मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाते हुए इस ऐप पर उनकी बोली लगायी गयी। उनकी तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें भद्दे रूप में पेश किया गया। इस पूरे प्रकरण में उन महिलाओं को निशाना बनाया गया, जो राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों पर खुलकर अपना पक्ष रखती हैं, जो मौजूदा समाज में अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती हैं।
ग़ौरतलब है कि पिछले वर्ष ‘सुल्ली डील्स’ नाम के एक ऐप के ज़रिए भी इसी तरह की कोशिश की गयी थी। ‘सुल्ली’ (जो गाली हिन्दुत्ववादी फ़ासिस्टों द्वारा मुस्लिम महिलाओं को दी जाती है) के नाम से इस ऐप को बनाने का मक़सद ही यही था कि अपने हक़ों के लिए आवाज़ उठाने वाली महिलाओं को बदनाम किया जा सके। लोगों के काफ़ी प्रतिरोध के बाद इस ऐप को बन्द कराया गया, और प्रशासन द्वारा जाँच का आश्वासन दिया गया। लेकिन अगले छह महीने में ही यह दूसरी घटना प्रशासन को कटघरे में ज़रूर खड़ा करती है। ‘बुल्ली बाई’ ऐप के मामले में भी पुलिस ने काफ़ी दबाव में आने के बाद इसके दोषियों को गिरफ़्तार किया है। लेकिन इस साल के शुरुआत में एक बार फिर इस घिनौनी हरकतों को अंजाम देना यह साबित करता है कि पुलिस प्रशासन ने इससे पहले चन्द काग़ज़ी कार्रवाई के अलावा और कुछ भी नहीं किया है।
बुल्ली बाई ऐप बनाने के मामले के गिरफ़्तार 20 साल के नीरज बिशनोई के लैपटॉप से बरामद सामग्रियों से पता चलता है कि उसके दिमाग़ में किस हद तक नफ़रत और स्त्री-विरोधी मानसिकता भरी थी। यह कोई पहली घटना नहीं है, ज़्यादातर ऐसे मामलों को अंजाम देने वाले 18 से 20 साल के नौजवान हैं। सवाल यह उठता है कि आख़िर इस कुण्ठा, अवसाद और स्त्री विरोधी नफ़रती विचारधारा की जड़ कहाँ है? ज़ाहिरा तौर पर ऐसी मानसिकताओं के पैदा होने की ज़मीन व्यक्तिगत जीवन या पारिवारिक इतिहास में न होकर इस सामाजिक-आर्थिक ढाँचे में है।
बुल्ली बाई ऐप बनाने के मामले में कुछ लोगों की गिरफ़्तारी तो हो गयी लेकिन इस बीमारी के असली ज़िम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, और न होगी। नफ़रत का जो ज़हर ऐसे मानसिक बीमार अपराधियों को पैदा कर रहा है, वह समाज के बहुत बड़े हिस्से की रगों में घुल चुका है। जो लोग इस ज़हर की खेती और कारोबार कर रहे हैं, वे सत्ता में बैठे हैं, उनके कारिन्दे देश की हर अहम संस्था में पैठे हुए हैं।
इस मुनाफ़ाख़ोर व्यवस्था ने अपने विकास के साथ ही समाज में अलगाव और अकेलापन, आत्मग्रस्तता, स्वार्थपरता और कुण्ठाएँ बढ़ायी हैं। इसे और फलने-फूलने के लिए खाद्य-पानी देने का काम हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादी विचारधारा ने किया है, जो महिलाओं को एक वस्तु और बच्चे पैदा करने की मशीन से अधिक कुछ भी नहीं समझती है। मुस्लिम महिलाओं के ख़िलाफ़ इस तरह की नफ़रती सोच फैलाने वाले आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद जैसे उन्मादी संगठन हैं, जो धर्म के नाम पर मासूम लोगों का क़त्ल करना सीखाते हैं। इनकी विचारधारा में बलात्कार को विरोधी पर विजय के हथियार के रूप में महिमामण्डित किया जाता है, ऐसे में उनसे स्त्रियों के सम्मान और हक़ की उम्मीद करना हमारी मूर्खता होगी।
गुजरात के नरसंहार के दौरान यही लोग थे, जिन्होंने हाथों में त्रिशूल लिये गर्भवती महिलाओं के पेट चीरकर नवजातों को मार दिया, और कहा कि इस तरीक़े से वे हिन्दू राष्ट्र बनायेंगे। आज ये लोग देश के बड़े संस्थानों से लेकर शहरों और गाँवों की गलियों तक पहुँचकर इस नफ़रती बीमार मानसिकता को पहुँचाने का काम कर रहे हैं।
इस नफ़रती और स्त्री विरोधी मानसिकता की जड़ पूँजीवाद और इसकी सड़न से निकले फ़ासीवाद में है। पूँजीवाद पितृसत्तात्मक विचारधारा को फलने फूलने की ज़मीन प्रदान करता है। यह इस विचारधारा को आत्मसात कर मुनाफ़े पर टिकी इस व्यवस्था को बनाये रखने में इस्तेमाल करता है। हर बेचे जाने वाली वस्तुओं के समान महिलाओं के शरीर को भी बिकाऊ माल की तरह पेश किया जाता है। बड़े-बड़े वाणिज्यिक पोस्टरों से लेकर मोबाइल फ़ोन के विज्ञापनों तक के माध्यम से इस विचारधारा को फैलाने का काम किया जाता है। फ़ासीवादी विचारधारा स्त्री विरोधी मानसिकता को और अधिक घिनौने रूप में पेश करती है। यह एक ख़ास समुदाय को निशाना बनाकर जनता की तमाम समस्याओं का ठीकरा उनपर फोड़ देता है, और अपने ख़िलाफ़ उठने वाली तमाम आवाज़ों को हर तरीक़े से दबाने की कोशिश करता है।
‘बुल्ली बाई’ और ‘सुल्ली डील्स’ जैसे ऐप इसी बीमार मानसिकता की अभिव्यक्ति है। इस घटना को फ़ासीवाद द्वारा अवाम विरोधी, स्त्री विरोधी हमले की ही अगली कड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए। साथ ही आज इसके ख़िलाफ़ हर प्रगतिशील इन्सान को एकजुट होकर आवाज़ उठानी होगी। हमें इस बीमार मानसिकता के बरक्स एक सही और बेहतर विचार लोगों के बीच लेकर जाना होगा, और इन फ़ासीवादी स्त्री विरोधी, जन विरोधी तत्वों को अपने समाज से बेदख़ल करना होगा।

मज़दूर बिगुल, फ़रवरी 2022


 

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