उम्मीद है आयेगा वह दिन
खदान मज़दूरों के जीवन पर एमील ज़ोला के प्रसिद्ध उपन्यास के अंश

इस बार ‘मज़दूर बिगुल’ के पाठकों के लिए प्रस्तुत है फ़्रांस के प्रसिद्ध लेखक एमील ज़ोला के उपन्यास ‘जर्मिनल’ का एक अंश। हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक द्रोणवीर कोहली ने इसका अनुवाद ‘उम्मीद है आयेगा वह दिन’ नाम से किया है। ‘जर्मिनल’ की घटनाएँ उन कोयला खदानों की बड़ी दुनिया में घटित होती हैं जिन्हें फ़्रांस के उदीयमान पूँजीवाद के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत होने के नाते उस समय सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्योग का दर्जा हासिल हो चुका था। बेहद ख़तरनाक स्थितियों में धरती के अँधेरे गर्भ में उतरकर हाड़तोड़ मेहनत करने वाले अनुशासित मज़दूरों की भारी आबादी खनन उद्योग की बुनियादी ज़रूरत थी। आधुनिक युग के ये उजरती ग़ुलाम खदानों के आसपास बसे खनिकों के गाँवों में नारकीय जीवन बिताते थे। एकजुटता इस नये वर्ग की उत्पादक कार्रवाई से निर्मित चेतना का एक बुनियादी अवयव थी और उसकी एक बुनियादी ज़रूरत भी। ‘जर्मिनल’ खदान मजदूरों की ज़िन्दगी के वर्णन के साथ-साथ मज़दूर वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच के सम्बन्धों का प्रामाणिक चित्र उपस्थित करता है। साथ ही, यह खदान मजदूरों की एक हड़ताल के दौरान और उसके बाद घटी घटनाओं का मूल्यांकन प्रकारान्तर से उस दौर के उन राजनीतिक आन्दोलनों के सन्दर्भ में भी करता है जो सर्वहारा वर्ग की समस्याओं के अलग-अलग समाधान तथा उनके अलग-अलग रास्ते प्रस्तुत कर रहे थे। मोटे तौर पर ऐसी तीन धाराएँ उस समय यूरोप में मौजूद थीं—मार्क्सवाद, अराजकतावाद और ट्रेडयूनियवाद। – सम्पादक

सभा प्लां-दे-दाम में रखी गयी थी। वहाँ पिछले दिनों बड़ी संख्या में पेड़ काट डाले गये थे। सो, काफ़ी खुली जगह बन गयी थी। हल्की-सी ढलान भी थी, जिसके चारों तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। एकदम सीधे और बराबर तनों वाले ‘बीच’ पेड़ों के झुरमुट थे, जिनके सफ़ेद-सफ़ेद तनों पर लाइकेन वनस्पति के ध्ब्बे-से दिखायी पड़ते थे। जिन विशाल पेड़ों को काटकर डाला गया था, वे अब भी वहाँ पड़े थे। बायीं ओर चिरी लकड़ी का टाल-सा लगा था। धुँधलका होने के साथ-साथ सर्दी भी बढ़ने लगी थी और नीचे गिरी सिवार और वनस्पतियाँ पैरों तले आकर चटचटाने लगती थीं। धरती पर तो एकदम अँधेरी रात थी, लेकिन ऊपर धुँधले आकाश में ऊँची टहनियों की काली छाया दिखायी पड़ती थी, जहाँ उभरता चन्द्रमा शीघ्र ही सितारों की रोशनी को मन्द कर देगा।
क़रीब तीन हज़ार खान मज़दूर इस खुली जगह पर आकर इकट्ठा हो गये थे—क्या मर्द, क्या औरतें, क्या बच्चे। भीड़ उमड़ी पड़ती थी। लोग आते जा रहे थे और खाली जगह को भरते जा रहे थे और फिर पेड़ों के नीचे भी फैल जा रहे थे। तिस पर भी आनेवालों का ताँता लगा था। अन्धकार में डूबे मानव सिरों का समुद्र वहाँ तक ठाठें मार रहा था जहाँ तक झाड़ियाँ उगी थीं। हल्की-हल्की मरमराहट-सी सुनायी पड़ जाती थीं। निकट खड़े लोग सुन रहे थे। एक तो लवाक था, जिसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं। दूसरा पियरों था, जो उनकी तरफ़ पीठ करके खड़ा था और इसलिए व्याकुल हो रहा था कि बीमारी का स्वाँग अब नहीं कर पाया। फिर बोनमोर्त और बूढ़ा मूक था, जो एक ठूँठ पर साथ-साथ बैठे थे और गहरी सोच में डूबे लगते थे। उनके पीछे मसखरी करने वाले लोग खड़े थे—जकारी, मूके और दूसरे लोग, जो सबकी खिल्ली उड़ाने के इरादे से ही आये थे।
इनके विपरीत, स्त्रिायाँ एकदम गम्भीर बनी खड़ी थीं, मानो चर्च में आयी हों। ला लवाक दबी ज़बान में गाली-गुफ़्तार कर रही थी और ला माह्द बिना कुछ बोले-चाले, बस, सिर हिलाकर प्रतिक्रिया प्रकट करती थी। फ़िलोमेन खाँस रही थी, क्योंकि जाड़े के कारण साँस लेने में उसे तकलीफ़ होती थी। मूकेत ही ऐसी औरत थी जिसका चेहरा खिला हुआ था। वह प्रसन्न इस बात से थी कि ला ब्रूले अपनी बेटी को फटकारते हुए कह रही थी कि तू एकदम बेहूदी छोकरी है। कहती थी—माँ को इसलिए कहीं भेज दिया था इसने ताकि पीछे बैठकर ख़ुद सारा खरगोश चट करे। एकदम बेहया लड़की है, जो अपने मरद की कायरता के कारण मुटिया रही है! यांलैं टाल के ऊपर चढ़ गया था। फिर लिडी को भी उसने खींचकर अपने साथ बैठा लिया और बेबेर को झिड़ककर कहा कि वह ऊपर क्यों नहीं आता। आकाश की पृष्ठभूमि में उनकी आकृतियाँ सबसे ऊपर दिख रही थीं।
वास्तव में, झगड़ा रासनर ने ही शुरू किया था। वह चाहता था कि संसदीय प्रणाली का अनुसरण करते हुए कमेटी चुनी जाये। बां-ज़्वाइयो में हारने से वह तिलमिलाया हुआ था और इस फ़िराक में था कि किसी तरह बदला चुकाये। वह डींग मार रहा था कि प्रतिनिधियों के ही नहीं, खान मज़दूरों के सामने जाकर खड़े होने की देर है, खोयी प्रतिष्ठा वह पुनः प्राप्त कर लेगा। एतियन समझता था कि जंगल के बीच किसी कमेटी की बात सोचना निरी मूर्खता है। क्या ये लोग नहीं जानते कि जंगली जानवरों की तरह उनका पीछा किया जा रहा है? अब इंक़लाबी तौर-तरीके अपनाने की ज़रूरत थी।
एतियन ने जब देखा कि यह बहस-मुबाहिसा तो ख़त्म होने वाला नहीं, सो वह दौड़ा और धरती पर पड़े पेड़ के तने पर खड़ा हो गया और सबका ध्यान आकर्षित करने के लिए ऊँचे स्वर में बोला: ‘कामरेडो! कामरेडो!’
रासनर ने प्रतिवाद किया, तो माह्द ने उसका मुँह बन्द कर दिया। भीड़ में जो बड़बड़ाहट-कुड़कुड़ाहट-सी हो रही थी, वह भी धीरे-धीरे थम गयी।
एतियन गर्जन-तर्जन के साथ बोल रहा था: ‘कामरेडो! उन लोगों ने हमारे बोलने पर पाबन्दी लगायी है, और हमारे पीछे पुलिस भी छोड़ रखी है, मानो हमने कोई अपराध किया हो। यही वजह है कि इस जगह पर आकर सभा करने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं था। यहाँ हम आज़ाद हैं। यह हमारा अपना घर है। यहाँ हमारी ज़बान को कोई पकड़ नहीं सकता, जिस तरह कोई परिन्दों का या जानवरों का बोलना बन्द नहीं कर सकता।’
भीड़ ने चिल्ला-चिल्लाकर उसका समर्थन किया।
‘हाँ, यह जंगल हमारा है। यहाँ हमें बोलने का हक है… बोलो, बोलो।’
एक क्षण एतियन तने पर निश्चल-सा खड़ा देखता रहा। चन्द्रमा अभी बहुत नीचे था और चाँदनी सबसे ऊपर वाली टहनियों पर पड़ रही थी। अँधेरे में डूबी भीड़ धीरे-धीरे शान्त और स्थिर होती जा रही थी। एतियन भी एकदम छाया-सा लग रहा था—देखकर ऐसे लगता था जैसे अन्ध्कार में कोई शलाका खड़ी हो।
एतियन ने बाँह उठाकर धीरे-धीरे बोलते हुए भाषण शुरू किया। लेकिन उसके स्वर में अब वह गर्जन-तर्जन नहीं था। उसने ऐसा सन्तुलित लहजा अपनाया, जैसा कि जनता का साधरण प्रतिनिधि सारी स्थिति की जानकारी देने के लिए बोलता है। सबसे पहले उसने वही बातें कहीं जिन पर पुलिस के मुखिया ने बां ज़्वाइयों में रोक लगायी थी। इसके बाद उसने हड़ताल का सारा इतिहास बताया और वैज्ञानिक शब्दावली की उधार ली गयी शैली में अपनी बात समझाने की कोशिश की। सिर्फ़ तथ्य ही उसने बताये और तथ्यों के अलावा और कोई बात नहीं कही। उसने कहा कि वह हड़ताल के ख़िलाफ़ है, खान मज़दूर भी तो हड़ताल नहीं करना चाहते थे। मगर उन्हें हड़ताल करने को विवश होना पड़ा है, क्योंकि प्रबन्धकों ने खान में बल्लियाँ-शहतीर लगाने की मजूरी अलग से देने की प्रणाली लागू कर दी है। फिर उसने प्रतिनिधियों की पहली मुलाक़ात के बारे में बताया जो मैनेजर के बँगले पर हुई थी, और प्रबन्धकों की बदनीयती की चर्चा की। फिर ऐसी ही दूसरी मुलाक़ात का ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने दो सांटीम की रियायत देने की बात कही थी, और यह रकम असल में वही थी जिसे उन्होंने मज़दूरों से छीनने की कोशिश की थी। यह था सारा किस्सा-कोताह।
इसके बाद उसने उस ख़र्च का हिसाब उनके सामने रखा जिस कारण इमरजेंसी फ़ण्ड ख़त्म हो गया था और यह भी बताया कि बाहर से जो धन आया, उसका उपयोग भी किस तरह किया गया, और फिर कुछ वाक्यों में इण्टरनेशनल यानी कि प्लूकार्ट और दूसरे लोगों का पक्ष लेते हुए बताया कि किस तरह वे दुनिया को फ़तह करने की लड़ाई लड़ रहे हैं और इस लड़ाई में आनेवाली कठिनाइयों के कारण वे क्यों यहाँ के मज़दूरों की ज़्यादा मदद नहीं कर पा रहे हैं। इसीलिए हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं—कम्पनी हाज़िरी की किताबें लौटा रही है और बेल्जियम से मज़दूरों को लाने की बात कहकर डरा रही है और इसके साथ-साथ उनके उन साथियों को भी धमकियाँ देने लगी है जो थोड़ा डगमगा रहे हैं। यही नहीं, कुछेक खान मज़दूरों को बहला-फुसलाकर उन्होंने काम पर आने के लिए राज़ी भी कर लिया है।
एतियन एक ही लहजे में बोलता जा रहा था, जैसे इन सारी अप्रिय बातों के बारे में उन्हें कायल करना चाहता हो। कहता था कि भूखों मरने की नौबत आ गयी है और आशा का दामन छूटता जा रहा है, संघर्ष करते-करते हिम्मत पस्त होने लगी है। मगर फिर एकाएक अपनी आवाज़ बुलन्द करते हुए उसने संक्षेप में दूसरी बातें बतायीं।
‘कामरेडो! इन हालात में आप लोगों को आज यहाँ फ़ैसला करना होगा। क्या हड़ताल जारी रखना चाहते हैं? अगर हाँ, तो कम्पनी को झुकाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?’
तारों भरे आसमान के नीचे एकदम सन्नाटा छा गया। अन्धकार की चादर में अदृश्य भीड़ इन दहला देने वाले शब्दों की मार से जैसे एकदम मौन और अवाक् हो गयी थी। उस वक्त, बस, एक ही आहट थी—पेड़ों में से छनकर आती भीड़ की हताश आहें!
एतियन ने फिर बोलना शुरू किया। अबके उसका स्वर एकदम भिन्न था। ऐसे बोल रहा था, जैसे किसी यूनियन का सेक्रेटरी नहीं, बल्कि फ़ौज का कमाण्डर हो, कोई धर्मप्रचारक हो, जो सच्चाई का दिग्दर्शन कराने आया हो। वह कह रहा था—क्या तुम लोग इतने कायर हो कि काम पर वापस जाना चाहते हो? क्या बेकार ही महीने भर से तकलीफ़ें बरदाश्त करते आ रहे हो? क्या टाँगों में पूँछ दबाकर तुम लोग कोयला-खानों मे चले जाओगे? क्या अपनी तकलीफ़ों का सिलसिला फिर से शुरू करने को तैयार हो, जिन्हें ज़माने भर से भोगते आ रहे हो? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम इसी वक्त जान दे दें जिससे कामगारों को भूखों मारनेवाले पूँजीपतियों के अत्याचारों का अन्त हो? क्या वह वक्त नहीं आ गया कि भूख के आगे नासमझ लोगों की तरह घुटने टेकना बन्द करें? अगर इस वक्त घुटने टेकोगो, तो भुखमरी से ऐसे हालात फिर पैदा हो जायेंगे कि शान्त से शान्त आदमी भी फिर से बग़ावत करने के लिए मजबूर हो जायेगा…
और इस तरह एतियन ने शोषण की चक्की में पिसते खान मज़दूरों की तस्वीर पेश की। बोला कि जब भी मालिकों को होड़ में क़ीमतें घटानी पड़ जाती हैं, तो तबाही लाने वाले इस संकट की सारी मार किस तरह मज़दूरों को ही को झेलनी पड़ती है और ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं कि भुखमरी की नौबत आ जाती है। नहीं! बल्लियाँ-शहतीर लगाने के लिए मजूरी की नयी प्रणाली हमें मंज़ूर नहीं—इसकी ओट में कम्पनी बचत करना चाहती है। यह कोशिश है एक-एक मज़दूर की हर रोज एक घण्टे की मजूरी हड़प लेने की और इस बार तो इन लोगों ने हद ही कर दी है। अब वह दिन दूर नहीं जब दीन-दुखी लोग धीरज खो बैठेंगे और इंसाफ़ लेकर रहेंगे।
एतियन तनिक रुका। वह बाँहें पसारे देख रहा था। ‘इंसाफ़’ शब्द कानों में पड़ते ही भीड़ में उत्तेजना फैल गयी थी। और लोग ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगे थे और करतल-ध्वनि ऐसे गूँज रही थी, जैसे आँधी में सूखे पत्ते सरसराते हैं।
‘इंसाफ़!…! इंसाफ़ हो! इंसाफ़ हो!’
एतियन धीरे-धीरे जोश में आता जा रहा था। रासनर की तरह उसे कोई बात एकदम साफ़-स्पष्ट और सहज तरीके से कहने का तरीका तो आता नहीं था। प्रायः उपयुक्त शब्द ही नहीं मिलते थे और वह अपने ही वाक्यों में उलझकर रह जाता था और सायास बोलने से सारी देह तन जाती थी। मगर इसका एक फ़ायदा यह मिलता था कि हकलाते-लड़खड़ाते हुए उसे मज़दूरों के कठोर परिश्रम को अभिव्यक्त करने वाले कुछ ऐसे सटीक रूपक सूझ जाते थे जो श्रोताओं के दिलों को गहराई तक छू लेते थे। फिर एक मज़दूर के हाव-भाव—कोहनियों को पीछे ले जाना, भिंची हुई मुट्ठियों के साथ उन्हें आगे लाना, जबड़ों को इस तरह भींचना मानो काटने को तत्पर हो—इन सबका मज़दूरों पर विलक्षण प्रभाव पड़ता। हरेक की ज़बान पर एक ही बात होती—बहुत बड़ा आदमी तो नहीं है यह, लेकिन अपनी बात कहने का ढब जानता है।
‘वेतन ग़ुलामी का ही एक नया ढंग है,’ वह थरथराते स्वर में बोलता जा रहा था। ‘कोयला-खान पर मिल्कियत खान मज़दूर की होनी चाहिए, बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह समुन्दर मछुआरे का होता है, उसी तरह जिस तरह ज़मीन की मिल्कियत किसान की होती है… मेरी बात आप लोग ग़ौर से सुनें। कोयला-खान तुम लोगों की है, यानी उन सब लोगों की है जिन्होंने सौ साल से ज़्यादा समय तक अपने ख़ून से, अपने दुख-दर्द से इसकी कीमत अदा की है!’

‘हाँ, बिलकुल सही कहता है, बिलकुल सही कहता है!’
इस स्थल पर एतियन ने अपना प्रिय विषय उठाया – उत्पादन के उपकरणों पर सामूहिक नियंत्रण, और जब वह अपने इस सिद्धान्त को शब्दों में व्यक्त करने लगता था, तो अपनी बेढब-सी शब्दावली का प्रयोग करके एकदम उल्लसित हो उठता था। उसमें एक ज़बरदस्त तब्दीली आ गयी थी। जिस तरह नया मुल्ला ऊँची बाँग देता है, उसी तरह उसे यह कहने की झक सवार हुई थी कि वेतन-प्रणाली में सुधार करने की आवश्यकता है—और उसने यह राजनीतिक सिद्धान्त प्रतिपादित करना शुरू किया था कि वेतन-प्रणाली को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए। उसके समष्टिवाद ने—जो बां ज़्वाइयो की सभा होने तक अमूर्त और लोकोपकारी था—अब एक जटिल कार्यक्रम का रूप ले लिया था, जिसके प्रत्येक पक्ष की वह वैज्ञानिक विवेचना करने लगता था। वह यह कल्पना किया करता था कि राज्य या राष्ट्र को नष्ट करके ही स्वाधीनता प्राप्त की जा सकती है। उसके बाद, जब सरकार पर जनता का नियंत्रण हो जायेगा, तभी सुधार कार्य आरम्भ होगा: यानी प्राचीन कम्यून वाले जीवन का आविर्भाव होगा, ओछे और दमनकारी परिवार की जगह समतावादी और स्वतन्त्र परिवार की स्थापना होगी, नागरिक, राजनीतिक और आर्थिक मामलों में पूर्ण समानता होगी और श्रम के उपकरणों का तथा श्रमजनित फल का अधिग्रहण करके वैयक्तिक स्वाधीनता सुनिश्चत की जायेगी, और अन्ततः निःशुल्क तकनीकी प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की जायेगी जिसका सारा खर्च समाज वहन करेगा। इन सब उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पुराने भ्रष्ट समाज का आमूलचूल रूपान्तरण करना आवश्यक होगा।
एतियन ने विवाह-प्रथा तथा उत्तराधिकार की पद्धति पर भी आक्रमण किया और व्यक्तिगत धन-सम्पदा की सीमा भी निर्धरित की, और मृत शताब्दियों के अन्यायपूर्ण कीर्ति-स्तम्भों को भी ध्वस्त करना शुरू किया—ये सब बातें उसने एक हाथ को हवा में भाँज-भाँजकर कही। उसके हाव-भाव उस दरांती की तरह थे जो पकी फसल को काटती जाती है। फिर, दूसरे हाथ से उसने भावी मानवता का निर्माण करने की बात प्रतिपादित करनी शुरू की, सच्चाई और इंसाफ़ की ऐसी इमारत की तामीर की जो बीसवीं शताब्दी के आगमन के साथ खड़ी होगी। …
‘अब हमारी बारी है,’ अन्ततः वह चिल्लाकर बोला। ‘अब सत्ता और सम्पत्ति लेने की बारी हमारी है!’
सारा वन उसकी जय-जयकार करने लग गया। तब तक चाँद अपनी चाँदनी से उस सारे स्थल को नहला चुका था और मनुष्यों के सिरों का उमड़ता सागर एकदम साफ दिखायी पड़ने लगा था जो बड़े-बड़े धूसर पेड़ों के तनों के बीच झाड़-झंखाड़ की अस्पष्ट पंक्ति तक ठाँठे मार रहा था। उस हिमानी आकाश तले उत्तेजित चेहरों का वह विशाल जनसमूह था—जो धधकती आँखों से देख रहे थे, मुँह खुले थे उनके, एक-एक व्यक्ति जोश से उफन रहा था। भुखमरी के कगार पर पहुँचे स्त्री-पुरुषों-बालकों को खुला आमन्त्रण दिया जा रहा था कि वे उस प्राचीन थाती को न्यायतः लूट लें जिससे उन्हें बेदखल किया गया है। अब तो उन्हें जाड़ा भी नहीं सता रहा था। एतियन के गर्म शब्दों ने उन्हें एकदम भीतर तक तपा दिया था। एक प्रकार की श्रद्धापूर्ण उत्प्रेरणा उन्हें धरती से उठाकर ऊपर ले गयी थी। यह बिल्कुल वैसी ही आशावादिता थी जैसी कि शुरू-शुरू के ईसाइयों में हुआ करती थी, जो भावी न्यायपूर्ण शासन-पद्धति के लिए पलकें बिछाये रखते थे। उसके अनेक वाक्य इतने अस्पष्ट थे कि उनके पल्ले पड़ ही नहीं सकते थे। तकनीकी और अमूर्त तर्क-वितर्क भी उनकी समझ में नहीं आ सकता था। मगर प्रतीत होता था इस दुर्बोधता और अमूर्तता ने उनके भीतर और अधिक आशाओं का संचार कर दिया था और वे उस दैदीप्यमान, चकाचौंधपूर्ण भविष्य की ओर आस लगाये देखने लगे थे। यह कैसा स्वप्न था! – वे लोग मालिक बनेंगे, सारे कष्ट, दुख-दर्द मिट जायेंगे और अन्ततः सारी धन-सम्पदा पर उन्हीं का स्वत्व हो जायेगा।
‘यह सही बात है। अब हमारी बारी है!… शोषण करने वाले… मुर्दाबाद!’
…तभी वे हैरान होकर क्या देखते हैं कि बूढ़ा बोनमोर्त पेड़ के तने पर खड़ा है और इतने कोलाहल में भी अपनी बात कहने की कोशिश कर रहा है। अभी तक तो वह और मूक अपनी ही उधेड़बुन में लगे थे, मानो अपने बीते दिनों की यादों में खोये हों। अब निस्सन्देह बोनमोर्त उस आवेग को स्वर देने के लिए बड़बड़ा रहा था जिसके वशीभूत उसके भीतर विगत यदा-कदा इतनी शिद्दत के साथ सिर उठाता था कि उसके अन्तस्थल से पुरानी स्मृतियाँ उबलकर बाहर आने लगती थीं और ऐसे में जब बोलना शुरू करता था, तो घण्टों बोलता रहता था, थकता ही नहीं था।
एकदम शान्ति छा गयी थी और सब लोग इस बूढ़े की बात सुनने को आतुर थे। चाँदनी में बोनमोर्त की आकृति एकदम ज़र्द-सी लगती थी। चूँकि उसने ऐसी-ऐसी बातें कहनी शुरू कर दी थीं जिसका सीधा सम्बन्ध यहाँ होने वाले विचार-विमर्श से बिल्कुल नहीं था। सो लोग मुँह बाये देखे जा रहे थे। बोनमोर्त लम्बे-चौड़े क़िस्से बयान कर रहा था जिनका कोई सिर-पैर नहीं था। एक तो उसने अपनी जवानी का किस्सा सुनाया। फिर अपने दो चाचा-ताऊ का किस्सा छेड़ दिया जो ला वोरअ में कुचलकर मारे गये थे। फिर उसने निमोनिया की बात बतायी, जिसने उसकी पत्नी की जान ले ली थी। लेकिन ये सब क़िस्से सुनाते हुए भी उसने अपनी इस धारणा को विस्मृत नहीं किया: वह बता रहा था कि हालात कभी अच्छे नहीं थे और न कभी अच्छे होंगे। उदाहरण देते हुए कह रहा था कि तब पाँच सौ लोग यहाँ इस जंगल में एकत्र हुए थे, क्योंकि बादशाह ने काम के घण्टे घटाना मंज़ूर नहीं किया था। मगर इस क़िस्से को बीच में ही छोड़ उसने एक और हड़ताल का किस्सा छेड़ दिया: कितनी ही हड़तालें वह अपनी आँखों से देख चुका है। सबका अन्त इन्हीं पेड़ों के नीचे हुआ—यहाँ प्लां-दे-दाम में, वहाँ ला शारबोनियर में या उससे भी और आगे सो-द्यु-लू की तरफ। कभी कड़ाके की सर्दी होती थी, कभी गर्मी का मौसम। एक शाम तो इतनी तेज़ बारिश हुई थी कि उन्हें एक शब्द भी सुने बिना भागना पड़ा था। फिर बादशाह के फ़ौजी आते थे और रायफ़ल की गोलियों के साथ सारा खेल ख़त्म हो जाता था।
‘हम इस तरह हाथ खड़े करके हलफ़ लेंगे कि हम नीचे कोयला-खान में हरगिज़ नहीं जायेंगे… ओह, मैंने तो हलफ़ ले लिया है, मैंने हलफ़ ले लिया है।’
भीड़ मुँह बाये बेचैनी के साथ खड़ी थी। एतियन सारा तमाशा देख रहा था। एकाएक कूदकर वह पेड़ के गिरे तने पर खड़ा हो गया और बूढ़े बोनमोर्त को भी अपनी बग़ल में खड़ा कर लिया। तभी क्या देखता है कि शावाल अपने दोस्तों के बीच सबसे आगे खड़ा है। उसे देखते ही उसे लगा कि हो न हो, कैथरीन भी यहीं कहीं होगी। यह बात ज़हन में आते ही उसके भीतर एक नयी ज्वाला फूट पड़ी। उसके भीतर यह इच्छा जोर मारने लगी कि कैथरीन भी उसकी जय-जयकार होते हुए देखे।
‘कामरेडो! आपने हमारे बुज़ुर्गवार की बातें सुनीं—कैसी-कैसी मुसीबतें इन्होंने झेली हैं, कैसे-कैसे कष्ट हमारे बच्चे झेलेंगे अगर हम इन चोरों और हत्यारों का सफ़ाया हमेशा के लिए नहीं कर डालते।’
एतियन का भीषण रूप देखते ही बनता था। आज तक उसने इस प्रकार की उग्र बात मुँह से कभी नहीं निकाली थी। बूढ़े बोनमोर्त को उसने एक बाँह से थाम रखा था और उसका प्रदर्शन ऐसे कर रहा था जैसे वह गरीबी-कंगाली, दुख-दारिद्रय का ध्वज हो। फिर बोला कि हम बदला लेंगे। फिर जल्दी-जल्दी कुछ वाक्य बोलकर उसने माह्द का उल्लेख किया और बताया कि इस सारे परिवार को कोयला-खान ने किस तरह सताया है, कम्पनी ने उसे बरबाद करके छोड़ दिया है। और देखो, आज भी यह परिवार—सौ साल तक खटने-मरने के बाद भी—पहले से कहीं ज़्यादा भूख का शिकार है। फिर तुलना करने के लिए उसने बोर्ड के तोंदुल सदस्यों का खाका खींचा, जो थैलीशाह बने बैठे हैं और वो जो स्टॉकहोल्डर हैं, वे भी कैसे अय्याशों की तरह रहते हैं और तिनका तक तोड़कर दुहरा नहीं करते और खान मज़दूरों की कमाई पर पलते हैं। कितनी घिनौनी बात है?—कोयला-खानों में दुनिया मर-खप रही है, बाप से लगाकर बेटे तक, क्या इसलिए कि मिनिस्टरों की मुँहभराई दी जा सके, और अभिजात, कुलीन और बूर्जुआ वर्ग के लोग पार्टियाँ देते फिरें और गर्म कमरों में बैठे मुटियाते रहें?
एतियन ने खान मज़दूरों की बीमारियों का भी अध्ययन किया था। अब वह उनकी पूरी सूची उनके सामने रखकर और विस्तार से बताने लगा, जिन्हें सुनकर दिल दहल जाता था: जैसे, अनीमिया, कण्ठमाला, काली खाँसी, दमा, लकवा। बता रहा था कि वे लोग कितने अभागे हैं कि उन्हें मशीनों के आगे पशु चारे की तरह डाला जाता है, गाँवों में ढोर-डंगरों की तरह हाँका-खदेड़ा जाता है। बड़ी-बड़ी वे सब कम्पनियाँ उन्हें निगलती जा रही हैं जो इसी कोशिश में रहती हैं कि गरीबी यहाँ से जाये ही नहीं। ये लोग देश के सभी कामगारों, लाखों कामगारों को अपनी एड़ी के नीचे रखने की दुरभिसन्धि करते रहते हैं, ताकि कुछ हज़ार निठल्ले लोग बैठकर गुलछर्रे उड़ा सकें। लेकिन खान मज़दूर अब इतने नादान नहीं, धरती के नीचे रहने वाले जानवर नहीं। खानों की गहराइयों से एक फ़ौज पैदा हो रही है, नागरिकों की फसल पैदा हो रही है, बीज अंकुरित हो रहा है और किसी दिन धूप में एकाएक धरती का सीना चीरकर वह फूट निकलेगा। फिर देखेंगे कि साठ साल के ऐसे आदमी को चालीस बरस की नौकरी के बाद वे कैसे फ़कत डेढ़ सौ फ़्रैंक की पेंशन देने की हिम्मत करते हैं जो थूकता है तो उसके गले से कोयला निकलता है और उसकी टाँगें कोयला-खान के पानी में खड़े-खड़े सूज जाती हैं। जी हाँ, मज़दूर पूँजीपति से, उस व्यक्तित्वहीन देवता से हिसाब माँगेगा जिसके बारे में मज़दूर को कोई ज्ञान नहीं है और जो अपने रहस्यमय डेरे में कहीं पोढ़ता रहता है और उन भूखे-प्यासे लोगों की ही जान लेने को उद्यत रहता है जो उसका पेट भरते हैं। मज़दूर उसे ढ़ूँढेंगे और विवश करेंगे कि वह उस विनाशकारी अग्नि के प्रकाश में अपना चेहरा दिखाये और फिर उसे रक्त में बोड़ देंगे—उस घिनौने सुअर को, उस विकराल बुत को जो मनुष्य मांस का भक्षण करता है!
वह चुप खड़ा देख रहा था, लेकिन उसकी बाँहें तब भी पसरी हुई थीं। वह अब भी “उधर वाले शत्रु” की तरफ इशारा कर रहा था। जानता नहीं था कि वह शत्रु है “किधर” लेकिन होगा तो यहीं कहीं आख़िर। इस बार भीड़ ने इतना तुमुलघोष किया कि मोंसू में बैठे बूर्जुआओं के कान खड़े हो गये और वे वैनदाम वन की तरफ फैली-फैली आँखों से देखने लगे कि कहीं भयंकर रूप से भू-स्खलन तो नहीं हो रहा।
लोहा गर्म था। एतियन ने चोट मारने की सोची।
‘कामरेडो! क्या फ़ैसला है तुम लोगों का?… हड़ताल जारी रखना चाहते हो?’
‘हाँ, हाँ!’ सब गर्जन-तर्जन के साथ बोले।
‘तो ऐसा करने के लिए क्या कदम उठाये जायें?… अगर कोई कायर सुबह कोयला-खान में जाते हैं, तो समझो कि हमारी हार हुई है।’
भीड़ ने एक बार फिर आवाज़ बुलन्द की।
‘बुज़दिल… मुर्दाबाद, मुर्दाबाद!’
‘तो आप लोग तसदीक करते हैं कि उन लोगों को अपने फ़र्ज़ की, उस हलफ़ की याद दिलायी जाये जो उन्होंने लिया है… तो अब हम ऐसा कर सकते हैं कि जाकर कोयला-खानों के बाहर खड़े हो जाते हैं। विश्वासघात करने वालों की समझ में बात आ जायेगी कि वे मनमर्ज़ी नहीं कर सकते, और कम्पनी भी देखेगी कि हम सबमें एका है—हम प्राण दे देंगे, लेकिन घुटने नहीं टेकेंगे।’
‘ठीक है, ठीक है, चलो, चलो, कोयला-खानों की तरफ चलो!’

मज़दूर बिगुल, फ़रवरी 2022


 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन

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